Saturday, June 19, 2010

नीतीश कुमार ने बी जे पी से पिंड छुडाने का काम शुरू किया

खबर छोटी है लेकिन बात बहुत बड़ी है . बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने आर एस एस को अलविदा कह दिया और उस की राजनीतिक शाखा से पिंड छुडाने का काम शुरू कर दिया है . शिवानन्द तिवारी गुस्से में हैं. उनके छात्र जीवन के साथी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी गुस्से में हैं. नीतीश ने वह रक़म लौटा दी है जो मोदी ने कोसी की आपदा के समय बिहार सरकार को दी थी . मदद करके उसका उल्लेख करना वैसे भी ठीक काम नहीं है. लेकिन मोदी को शिष्टाचार का पाठ पढ़ाना पत्थर पर दूब उगाने जैसा नामुमकिन काम है मोदी ने पूरी दुनिया को बता दिया कि उनकी कृपा से बिहार सरकार को पांच करोड़ रूपये हासिल हुए थे. दर असल बी जे पी वालों से समझने में गलती हो गयी. उनको लगा कि नीतीश कुमार की पार्टी से उनका पक्का सम्बन्ध है . लेकिन जो लोग नीतीश को जानते हैं उनका कहना है कि नीतीश बी जे पी के साथ से खुश नहीं थे लेकिन जार्ज फर्नांडीज़ और शरद की बात मानकर बी जे पी को ढो रहे थे . उधर बी जे पी के बडबोले नेता लोग बिहार को अपनी सरकार बताते घूमते फिरते थे. नाराज़ नीतीश ने उनको औकात बताने का काम शुरू कर दिया है और बहुत जल्दी जे पी आन्दोलन के नौजवान नेता, नीतीश कुमार अपने साथियों सहित बी जे पी से पिंड छुड़ा लेंगें

Friday, June 18, 2010

प्रकाश झा की फिल्म ही नहीं लगती राजनीति

शेष नारायण सिंह
प्रकाश झा एक संवेदनशील फिल्मकार हैं . एक से एक अच्छी फ़िल्में बनायी हैं उन्होंने. उनकी फिल्म 'गंगाजल और अपहरण ' को देखने के बाद अंदाज़ लगा था कि किसी नीरस विषय पर वे इतनी संवेदनशील फिल्म बना सकते हैं . ज़ाहिर है कि आम फिल्मकार इस तरह की फिल्म नहीं बना सकता. अब उनकी नयी फिल्म आई है ,राजनीति . विश्वास ही नहीं हुआ कि इतनी चर्चित फिल्म को देखने के लिए मुंबई के इतने बड़े हाल में केवल १०-१२ लोग आये थे.. शुरू तो बहुत ही मज़बूत तरीके से हुई लेकिन बाद में साफ़ हो गया कि फिल्म बिलकुल मामूली है .नसीरुद्दीन शाह , अजय देवगन,मनोज बाजपेयी और नाना पाटेकर के अलावा बाकी कलाकारों का काम बहुत ही मामूली है.फिल्म के कलात्मक पक्ष पर कुछ ज्यादा कह सकने की मेरी हैसियत नहीं है लेकिन एक आम दर्शक पर जो असर पड़ता है उसके हिसाब से बात करने की कोशिश की जायेगी.पहली बात तो यह कि बोली के लिहाज़ से फिल्म में भौगोलिक असंतुलन है . नक्शा मध्य प्रदेश का दिखाया जाता है और बोली बिहार की है .इसी भोजपुरी हिन्दी के बल पर गंगाजल और अपहरण ने गुणवत्ता की दुनिया में झंडे बुलंद किये थे. दूसरी बात कि फिल्म में जो सबसे सशक्त करेक्टर पृथ्वी और समर का है .वह कुछ मॉडलनुमा अभिनेताओं से करवाया गया है जिनके मुंह से डायलाग ऐसे निकलते हैं जैसे पांचवीं जमात का बच्चा याद किया गया अपना पाठ सुनाता है .. फिल्म में जो कुछ दृश्य नसीरुद्दीन शाह के हैं वे फिल्मकार के काम को और भी मुश्किल बना देते हैं . जो ऊंचाई नसीर ने भास्कर सान्याल के चरित्र को दे दी है , यह बेचारे मोडल टाइप कलाकार उसे कभी भी नहीं प्रस्तुत कर सकते . उनसे तो इसकी उम्मीद करना भी बेमानी है . बाकी सब कुछ प्रकाश झा वाला ही है लेकिन कहानी बहुत ही बम्बइया हो गयी है . राजनीतिक सुप्रीमेसी के लिए लड़ी गयी लड़ाई इस तरह से पेश कर दी गयी है जैसे किसी शहर में ठेके में मिली कमाई के लिए लड़ाई लड़ी जाती है . कहीं महाभारत के सन्दर्भ मिल जाते हैं तो कहीं श्याम बेनेगल की कलियुग के . जब फिल्म बन रही थी ,उस वक़्त से ही ऐसा प्रचार किया जा रहा था कि प्रियंका गाँधी की तरह दिखने वाली एक अभिनेत्री को शामिल किया गया है और वह उनके व्यक्तित्व को नक़ल करने की कोशिश करेगी लेकिन ऐसा कोसों तक नहीं दिखा. आखीर के कुछ दृश्यों में उस अभिनेत्री ने प्रियंका की कुछ साड़ियों के रंग को कॉपी करने में आंशिक सफलता ज़रूर पायी है . बाकी उस रोल में प्रियंका गांधी कहीं नहीं नज़र आयीं .उनके व्यक्तित्व के किसी पक्ष को नहीं दिखा पायी कटरीना नाम की कलाकार . कुल मिलाकर प्रकाश झा ने एक ऐसी फिल्म बना दी ,जो प्रकाश झा की फिल्म तो बिलकुल नहीं लगती क्योंकि प्रकाश झा से उम्मीदें थोडा ज़्यादा की जाती हैं . उन्हें मेरे जैसे लोग श्याम बेनेगाल, मणि रत्नम, शुरू वाले राम गोपाल वर्मा की लाइन में रखने के चक्कर में रहते हैं . यह फिल्म तो उन्होंने ऐसी बना दी जो कोई भी राज कपूर , सुनील दत्त या मोहन कुमार बना देता, . इन्ही लोगों की वजह से फ़िल्मी गाँव पेश किये जाते हैं जहां सारे लोग अजीबो गरीब भाषा बोलते हैं , वहां के छप्परों के नीचे बारिश से नहीं बचा जा सकता , गरीब से गरीब आदमी के घर में जर्सी गाय बंधी होती है . इन फंतासीलैंड के फिल्मकारों की वजह से ही ज़्यादातर ठाकुर काले कुरते पहने होते हैं , माँ भवानी की पूजा करते रहते हैं , काला तिलक लगाते हैं और हमेशा दुनाली बन्दूक लिए रहते हैं .

अगर प्रकश झा का नाम न होता तो इस फिल्म को दारा सिंह की पुरानी फिल्मों की तरह ठाकुर दिलेर सिंह टाइप फिल्मों के सांचे में रखा जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं है . प्रकश झा से उम्मीद ज़्यादा की जाती है .मनोज बाजपेयी को चुनौती देने वाला जो नौजवान है वह किसी बड़े नेता के बेटे के रोल तक तो ठीक है , वहीअमरीका जाना , ड्राइवर को काका कहना, और किसी पैसे वाले की लडकी से इश्क करना लेकिन जब वह भारतीय राजनीति के खूंखार खेल में अजय देवगन और मनोजबाजपेयी जैसे बड़े अभिनेताओं को चुनौती देता है तो लगता है कि बस अब कह पड़ेगा कि यह बहादुरी मैंने फला साबुन से नहा कर पायी है . आप भी इस्तेमाल करें. उनके चेहरे पर हिन्दी हार्टलैंड की राजनीति की क्रूरता का कोसों तक पता नहीं है . कुल मिलाकर फिल्म इतनी साधारण है कि इसे फिल्म समीक्षा का विषय बनाना भी एक सड़क छाप काम है . लेकिन करना पड़ता है

Thursday, June 17, 2010

फर्जी शक़ की बुनियाद पर केवल मुसलमानों को क्यों पकड़ती है पुलिस

शेष नारायण सिंह

पुणे की जर्मन बेकरी के विस्फोट के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने मुंह की खाई है .राज्य के पुलिस महानिदेशक,डी शिवनंदन ने बयान दे दिया है कि जर्मन बेकरी केस में पुलिस का काम बिलकुल गलत ढर्रे पर चल रहा था और अब तक जो कुछ भी जांच हुई है उसका केस से कोई मतलब नहीं है. जांच को फिर से करना होगा .जांच का काम ए टी एस को दिया गया था . राज्य के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी ने ऐलानियाँ कहा है कि अब तक की जांच को कूड़े दान के हवाले करके नए सिरे से तफ्तीश होगी . उन्होंने अखबार वालों को बताया कि ए टी एस को केस का ठीक से अध्ययन करना पड़ेगा,वैज्ञानिक तरीके से सबूत हटाना पड़ेगा और तब उन लोगों के एपह्चान करनी पड़ेगी जो जर्मन बेकरी काण्ड के लिए वास्तव में ज़िम्मेदार हैं . यानी अब तक पुलिस ने जो भी किया उसमें पेशागत ईमानदारी बिलकुल नहीं है , .इस बात की जांच की जानी चाहिए कि जिन लोगों को भी पुलिस ने पकड़ रखा था ,उनके खिलाफ केस क्यों बनाया गया. वैसे भी महाराष्ट्र पुलिस आजकल तरह तरह के गैरकानूनी काम के सिलसिले में ख़बरों में है . उनके एक इन्स्पेक्टर को गिरफ्तार किया गया है क्योंकि उसने सुपारी लेकर एक बिल्डर को जान से मारने की कोशिश की थी. ऐसे और भी बहुत से मामले सामने आ चुके हैं जिसमें पुलिस के तथा कथित इनकाउंटर स्पेशलिस्टों ने निरीह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था .जर्मन बेकरी का मामला थोडा पेचीदा है. जिस आदमी के बारे में सर्वोच्च पुलिस अधिकारी ने न बताया है कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं है , जब उसे ए टी एस वालों ने पकड़ा था तो क्या माहौल था उस पर नज़र डाल लेने से पुलिस की मानसिकता ठीक से समझ में आ जायेगी.
पुणे की जर्मन बेकरी में करीब ४ महीने पहले हुए धमाके में १७ लोग मारे गए थे . पुलिस ने अब्दुल समद उर्फ़ भटकल नाम के एक आदमी को २४ मई को कर्णाटक में जाकर पकड़ लिया था . यह समद इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य यासीन भटकल नाम के आदमी का भाई है .तो क्या पुलिस किसी प्रतिबंधित संगठन के सदस्य के भाई को बिना किसी बुनियाद के गिरफ्तार कने के लिए आज़ाद है . अब्दुल समद की गिरफ्तारी के बाद तो माहौल ही बदल गया . पुलिस ने दावा किया कि जर्मन बेकरी में लगे क्लोज़ सर्किट टी वी की तस्वीरें देखने के बाद यह गिरफ्तारी हुई थी और वास्तव में जो आदमी बेकरी के अन्दर बम रख रहा था , वह भटकल ही है और उसे गिरफ्तार करके ए टी एस वालों ने बड़ी वाह वाही बटोरी थी. हद तो तब हो गयी जब केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने महाराष्ट्र ए टी एस को सार्वजनिक रूप से बधाई दी.और कहा कि कि समद जर्मन बेकरी धमाके का एक प्रमुख संदिग्ध है और उसको पकड़ कर पुलिस ने बहुत बड़ा काम किया है . आज जब पुलिस ने खुद ही यह स्वीकार कर लिया है कि उसके खिलाफ कोई केस नहीं है तो समद के नागरिक अधिकारों का मलीदा बनाने वालों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए . किसी भी आतंकवादी मामले में किसी भी मुसलमान कोपकड़ लेने की पुलिस की मानसिकता का इलाज़ किये जाने की ज़रुरत है . समद को गलत तरीके से हिरासत में ले लेने का यह कोई इकलौता मामला नहीं है . मुंबई में ही ऐसे कई नौजवान बंद हैं जनके ऊपर पोटा का केस बनाकर पुलिस ने पकड़ लिया था लेकिन बाद में पता चला कि उन पर कोई मामला ही नहीं था . इन हालात कोदुरुस्त करने की ज़रुरत है . जब से गुजरात में नरेंद्र मोदी का राज आया है , वहां की पुलिस अपने राजनीतिक आका को खुश करने के लिए किसी भी मुसलमान को पकड़ लेती है और उसे प्रताड़ना देकर छोड़ देती है . गुजरात पुलिस ने मुंबई की लड़की इशरत जहां को भी इसी तरह के मामले में पकड़ा था और बाद में फर्जी मुठभेड़ दिखा कर मारा डाला था. उसी मामले में पुलिस वाले आजकल जेल की हवा खा रहे हैं . . लेकिन वह तब संभव हुआ अजब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पंहुचा .
ज़रुरत इस बात की है कि शक़ की बिना पर लोगों को गिरफ्तार करने की पुलिस की ताक़त की कानूनी समीक्षा की जाए. वरना मुंबई और गुजरात की जेलों में ऐसे सैकड़ों मुसलमान बंद हैं जिनके ऊपर जो दफाएँ लगाई गयी हैं उन में कहीं तीन साल ,तो कहीं ७ साल की सज़ा होती है लेकिन यह लडके पिछले ८-१० साल से बंद हैं और बाद में उन्हें बाइज्ज़त बरी कर दिया जाएगा. . यह न्याय व्यवस्था की एक बड़ी कमी है और इस पर फ़ौरन सिविल सोसाइटी , मीडिया और राजनीतिक बिरादरी की नज़र पड़नी चाहिए . और अंग्रेजों के वक़्त की नज़रबंदी की पुलिस की ताक़त को कम करके देश को एक सभ्य प्रशासन देने की कोशिश करनी चाहिए

फिर पूछें कि मौत का सौदागर कौन है

शेष नारायण सिंह


(डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट से साभार )

दिसंबर १९८४ में हुए भोपाल गैस हादसे का विवाद एक बार फिर जिंदा हो गया है . राजीव गाँधी का नाम आते ही बी जे पी को लगने लगा है कि शायद बोफर्स टाइप कुछ काम बन जाए और राजनीतिक फसल में मुनाफ़ा हो . उधर दिल्ली में बैठे कांग्रेस के ज़रुरत से ज्यादा वफादार लोग राजीव के नाम को बचाने के चक्कर में उल जलूल बयान दे रहे हैं . जिन्होंने भोपाल की उस खूंखार रात को देखा है उनके लिए भोपाल गैस त्रासदी के किसी अपराधी को माफ़ कर् पाना मुश्किल है . अब भोपाल गैस काण्ड पर विधिवत राजनीति शुरू हो गयी है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन राजनीतिक किलेबंदी के चक्कर में मुद्दे से जनमत का ध्यान हटाने की कोशिश को भी बात को को हड़प लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. मुद्दा यह है कि भोपाल के इतने बड़े मामले को जिन लोगों ने मामूली कानून व्यवस्था के मामले की तरह पेश किया , वे ज़िम्मेदार हैं और उन्हें सवालों के घेरे में लिया जाना चाहिए . हादसा जिस दिन हुआ उस दिन मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ,अर्जुन सिंह थे , उनकी जो भी ज़िम्मेदारी हो उसके लिए उन्हें दण्डित किया जाना चाहिये. उन पर आरोप है कि उन्होंने युनियन कार्बाइड के मुखिया को देश से भाग जाने में मदद की. लेकिन इस मामले में इस से बहुत बड़े बड़े घपले हुए हैं . उन पर भी नज़र डाली जानी चाहिए और सब को कटघरे में लाया जाना चाहिए जिस से भविष्य में कोई भी नेता या अधिकारी इस तरह के काम करने से डरे . भोपाल गैस काण्ड में बहुत सारे आयाम हैं. यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि दंड संहिता की धाराओं को हल्का किसने किया , लोगों के पुनर्वास के काम में ढिलाई किसने बरती , एक अभियुक्त को तत्कालीन गृह मंत्री और राष्ट्रपति के पास कौन लेकर गया और क्यों यह मुलाक़ात करवाई गयी. उस वक़्त के ताक़तवर लोगों की क्या भूमिका थी . यह सब ऐसे सवाल हैं जिनकी जांच करने से आगे की बात साफ़ करने में मदद मिलेगी. लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. दिसंबर ८४ से लेकर आजतक इस मामले में बहुत सारे लोग आये हैं. उसमें भोपाल के जिला प्रशासन के वे अधिकारी हैं जिन्होंने मामले को हल्का किया . इसमें पुलिस का रोल है , मुकामी न्यायपालिका का रोल हैं , मुकामी नेताओं का रोल है. सब की पड़ताल की जानी चाहिए . और इस तरह से अर्जुन सिंह के बाद जो लोग भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री हुए हों सबसे पूछ ताछ की जानी चाहिए . अगर ऐसा हुआ तो पिछले २५ वर्षों के हर मुख्य मंत्री की जवाबदेही और ज़िम्मेदारी तय की जा सकेगी और आने वाले दौर में मुख्य मंत्री मनमानीकरने से बाज़ आयेगें. हाँ अगर कांग्रेस के उस वक़्त के मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री को सूली पर चढ़ाना है तो मीडिया में जिस तरह का काम चल रहा है , उसे जारी रखा जा सकता है लेकिन अगर सही बात को सामने लाना है तो मीडिया के लिए भी लाजिम है कि वह सारी बातों को बहस के घेरे में लाये और बात को आगे बढाए. भारत के कानून ऐसे हैं कि वह यह सुनिश्चित करने के अवसर देते हैं कि किसी के साथ अन्याय न हो . इसके लिए कभी भी किसी मुक़दमे में दुबारा जांच की जा सकती है . इस बात की भी जांच की जानी चाहिए कि क्या अर्जुन सिंह के बाद से लेकर अब तक किसी मुख्य मंत्री ने जांच के बारे में कोई जानकारी ली क्योंकि जनता के प्रतिनधि के रूप में चुने गए हर मुख्यमंत्री का यह कि वह जनता के हितों के कस्टोडियन के रूप में काम करे.इसलिए यह ज़रूरी है कि कि दिग्विजय सिंह , मोतीलाल वोरा, उमा भारती , कैलाश जोशी. सुन्दर लाल पटवा ,राजीव गाँधी, वी पी सिंह , पी वी नरसिंह राव, एच डी देवेगोड़ा, अटल बिहारी वाजपेयी, और मनमोहन सिंह की भूमिका की भी जांच कर लेनी छाहिये . मीडिया को भी चौकन्ना रहने की ज़रुरत है कि वह बी जे पी की ओर से एजेंडा फिक्स कर रहे लोगों की बात को भी ध्यान में रखें लेकिन बी जे पी वालों को बचाने की कोशिशों का भी पर्दा फाश करें. ताज़ा खबर यह है कि मौत के सौदागर वाली बहस भी शुरू हो गयी है . और गुजरात २००२ के लिए ज़िम्मेदार नेता ने पूछना शुरू कर दिया है कि मौत का सौदागर कौन है . उन नेता जी को भी यह बताने की ज़रुरत है कि मौत का सौदागर वह होता है जो अपनी निगरानी में हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारे . वे खुद तय कर लें कि उस सांचे में कौन फिट बैठता है.

Tuesday, June 15, 2010

पंद्रह हज़ार करोड़ रूपये का मुआवजा देंगें लीबिया के गद्दाफी

शेष नारायण सिंह

आतंकवाद के प्रायोजकों के लिए बहुत बुरी खबर है . आतंकवादियों को मदद देने वालों को सभ्य समाज की ताक़त दबोचती ज़रूर है . ओसामा बिन लादेन का उदाहरण दुनिया के सामने है .उसे अंदाज़ भी नहीं रहा होगा कि आतंक की कीमत इतनी भारी हो सकती है . ताज़ा उदाहरण नरेंद्र मोदी का है . गुजरात में आतंक और २००२ के नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार नेता, नरेंद्र मोदी की पूरी दुनिया के सभ्य समाजों में प्रवेश की मनाही है . अभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें ज़रा संभल के रहने की चेतावनी दी है .इसके पहले अमरीका और यूरोप के देशों की कुछ सरकारों ने उनकी वीजा की अर्जी को ठुकरा कर उन्हें अपनी हैसियत में रहने की ताकीद की थी. १९७४ में चिली के राष्ट्रपति अलेंदे को मार कर चिली में आतंक का शासन कायम करने वाले पिनोशे का भी वही हाल हुआ जो बाकी आतंक फैलाने वालों का होता है . आतंक की सियासत के आदिपुरुष, एडोल्फ हिटलर को अपने किये की जो सज़ा मिली, उस से दुनिया में आतंक की खेती करने वाले आजतक सबक लेते हैं .१९८४ में सिखों को चुन चुन कर आतंक का शिकार बनाने वाले अर्जुन दास, ललित माकन, हरिकिशन लाल भगत ,सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर का हश्र दुनिया ने देखा ही है .आतंक की सियासत के नतीजों को भोगने का एक नया मामला सामने आया है . करीब ३५ साल से अमरीका और पश्चिमी यूरोप के देशों के खिलाफ अभियान चला रहे, लीबिया के राष्ट्रपति , कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को तीसरी दुनिया के बहुत सारे देशों में इज्ज़त से देखा जाता था लेकिन अपने आपको गलत समझने के चक्कर में वे आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक हो गए.और इंग्लैंड में आतंक फैला रहे आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के आतंकवादियों को हथियार देने लगे जिसका इस्तेमाल करके उन लोगों ने आयरलैंड और इंग्लैण्ड में खूब आतंक फैलाया . हज़ारों लोगों का मौत के घाट उतारा और सामान्य जीवन को खतरनाक बनाया .. अब तो दुनिया जानती है कि लाकरबी विमान विस्फोट काण्ड भी कर्नल गद्दाफी के दिमाग की उपज थी क्योंकि अब उन्होंने ही उसे स्वीकार कर लिया है ... हालांकि सबको मालूम है कि गद्दाफी ने अमरीकी और पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादी मुल्कों की उस लूट पर लगाम लगाई थी जो पेट्रोल के आविष्कार के बाद से ही जारी थी . लेकिन अपने उत्साह में उन्होंने निर्दोष लोगों को मारने का काम शुरू कर दिया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था लेकिन गद्दाफी निरंकुश तानाशाह थे और उनको टोकने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी . बाद में जब सोवियत रूस का विघटन हुआ तो गद्दाफी ने पश्चिम के देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी लेकिन वह कोशिश उनको बहुत महंगी पड़ रही है . लाकरबी विमान के हादसे के शिकार हुए लोगों के परिवारों को वे बहुत बड़ी रक़म बतौर मुआवजा दे चुके हैं . और अब खबर आई है कि वे आयरलैंड में आतंक के शिकार हुए परिवारों को भी करीब १५ हज़ार करोड़ रूपये के बराबर की रक़म देने वाले हैं . हालांकि वे इसे मुआवजा नहीं मान रहे हैं , उनका कहना है कि यह तो मानवीय सहायता के लिए दिया जा रहा है लेकिन यह तय है कि कि लीबिया की सरकार आयरलैंड के आतंक के शिकार लोगों को बहुत बड़ी रक़म दे रही है .. गद्दाफी ने आयरलैंड के आतंकवादियों को एक खतरनाक विस्फोटक सेमटैक्स की सप्लाई की थी . यह एक प्लास्टिक विस्फोटक है और आर डी एक्स जैसा असर करता है . गद्दाफी की सरकार की तरफ से सप्लाई किये गए सेमटैक्स का इस्तेमाल कम से कम दस आतंकवादी वारदातों में हुआ था लन्दन के विख्यात डिपार्टमेंटल स्टोर, हैरड्स और लाकरबी विमान के धमाके में इसी विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ था. लाकरबी धमाके के शिकार लोगों के परिवार वालों को तो गद्दाफी पहले ही मुआवाज़ा दे चुके हैं . यह सारी रक़म रखवा लेने के बाद ब्रिटेन की सरकार ने गद्दाफी को केवल यह राहत दी है कि वे आयरलैंड में मानवीय सहायता के नाम पर कुछ कार्यक्रम चला सकते हैं जिस से यह लगे कि वे जो कुछ भी दे रहे हैं अपनी खुशी से दे रहे हैं ,उन पर कोई दबाव नहीं है . बहर हाल तरीकों पर चर्चा करना यहाँ उद्देश्य नहीं है लेकिन यह पक्का है कि आतंकवादी की राजनीति हमेशा हार कू ही गले लगाती है और इंसानियत हर बार विजयी रहती है . भविष्य के आतंकवादियों को इन पुराने आतंकियों के अंजाम को देख कर सबक ज़रूर लेना चाहिए

Monday, June 14, 2010

दांतेवाडा के आस पास दलितों की बेटियों की इज्ज़त लूटी जा रही है

शेष नारायण सिंह


छत्तीस गढ़ के दांतेवाडा जिले में माओवादी आतंकवादियों ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस के ७६ सिपाहियों को ६ अप्रैल २०१० की रात में मार डाला था. मारे गए पुलिस के वे जवान अपनी ड्यूटी कर रहे थे , उनको बहुत ही मुश्किल से सी आर पी की नौकरी मिली थी. गरीबी से जूझ रहे भारत के गावों में जब किसी बच्चे को सी आर पी एफ , बी एस एफ, आई टी बी पी या अन्य अर्ध सैनिक संगठनों में नौकरी मिल जाती है तो खुशी मनाई जाती है ., प्रीतिभोज किया जाता है और इलाके में परिवार की इज़्ज़त बढ़ती है . संपन्न इलाकों के लोगों की समझ में यह बात नहीं आयेगी लेकिन व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि इन अर्ध सैनिक बलों में नौकरी पाने के लिए इन बच्चों के मातापिता बड़ी रक़म बतौर रिश्वत के भी देते हैं . सरकारी नौकरी की सुरक्षा के लिए गरीब आदमी सब कुछ करता है . लेकिन जब दांतेवाडा में आतंकवादियों ने इन्ही गरीब परिवारों के बच्चों को मार डाला तो पूरे देश में गम और गुस्से का माहौल बन गया .वैसे भी जिन लोगों के हाथों में माओवादी लुटेरों ने बंदूक पकड़ा दी है , वे भी तो गरीब लोगों की औलादें हैं और उनको बेवक़ूफ़ बना कर कुछ पैसों की लालच में फंसाया गया है . इसलिए माओवादी आतंक के इस खूनी खेल में दोनों तरफ ही शिकार हो रही शोषित पीड़ित जनता है और शासक वर्गों के लोग उनको अपने हित में इस्तेमाल कर रहे हैं . वास्तव में सरकारी नेताओं और माओवादी आतंकवादियों का वर्गचरित्र एक ही है. . वे दोनों ही गरीबों को चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं . लेकिन इस सब में सबसे ज्यादा ज़िम्मेदारी सरकारों की है , केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की . उन्होंने विदेशी और स्वदेशी पूंजीपतियों के हाथों आदिवासी इलाकों की खनिज सम्पदा को औने पौने दामों में बेच कर इन इलाकों में रहने वाले और इस खनिज सम्पदा के असली वारिस लोगों के भविष्य को बड़ी पूंजी के हाथों गिरवी रख दिया है. ज़ाहिर हैं यह वही लोग हैं जो राजनीति और नौकरशाही में बड़े पदों पर विराजमान हैं और हज़ारों करोड़ की रिश्वत खा कर आम आदमी का शोषण कर रहे हैं . दूसरी तरफ माओवादी हैं जो अपने हितों के लिए गरीब आदिवासी जनता के हाथों में बंदूक पकड़ा रहे हैं . इस सारे ड्रामे में मुकामी बदमाश भी शामिल हो गए हैं और चारों तरफ से राष्ट्र हित पर हमला बोल दिया गया है .यहाँ यह भी साफ़ कर देना ज़रूरी है कि राज्य या केंद्र में सरकार चाहे जिस पार्टी की हो , सभी पार्टियां घूस की लालच में अपने देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं . जहां भी आतंकवाद बढ़ता है, वहां हालात पर सामाजिक कंट्रोल बिलकुल ख़त्म हो जाता है . उसके बाद हालात पर लोकल ठगों का क़ब्ज़ा हो जाता है , सरकार का हुक्म नहीं चलता और आतंकवादी संगठन जो अपने को क्रांतिकारी समझ रहे होते हैं, वे बदमाशों को भी अपना मानने की गलती कर बैठते हैं और हालात बेकाबू हो जाते हैं . दांतेवाडा के आस पास भी यही हो रहा है. हालात के बेकाबू होने का सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को होता है जो गरीब होते हैं और जिनमें शिक्षा का अभाव होता है . कुछ चालाक और शातिर किस्म के लोग आतंकवादियों और सरकारी एजेंसियों के मुखबिर बन जाते हैं और आतंक की वजह से जो लूट होती है उनको यही करते हैं .
दांतेवाडा के आस पास आजकल हर लेवल पर आतंक का राज है . दैनिक हिन्दू अखबार के रिपोर्टर ने दांतेवाडा जिले के गावों का दौरा करने के बाद अपनी आँखों से देखा कि पुलिस और माओवादियों के मुखबिर किस तरह से लोगों का शोषण कर रहे हैं . इस इलाके में आजकल पुलिस का बहुत ही भारी बंदोबस्त है . लिहाजा माओवादी आतंकवादियों की गतिविधियाँ तो उतनी ज्यादा नहीं हैं लेकिन पुलिस के मुखबिर खुले आम लूट पाट कर रहे हैं . मुकरम गाँव में जाकर संवाददाता ने पाया कि मुखबिरों ने तीन लड़कियों को मारा पीटा और उनके साथ बलात्कार किया . उनके शरीर के नाजुक स्थानों पर लात से मारा और बच्चियों को फेंक कर चले गए.इन लड़कियों ने बताया कि जब एक बड़ा पुलिस अधिकारी उधर से गुज़रा तब यह लोग उन्हें फेंक कर भागे वरना पता नहीं क्या हो सकता था. यह तो एक गाँव की घटना है . छत्तीस गढ़ और झारखण्ड में इस तरह के हज़ारों गाँव हैं और इमकान है कि हर जगह यही हो रहा होगा . इस घटना का पता तो बाकी दुनिया को इस लिए चल गया कि वहां एक सम्मानित अखबार का रिपोर्टर पंहुच गया . इस रिपोर्टर ने पड़ोस के गाँव में भी इसी तरह का आतंक देखा जो कि सरकारी पक्ष से हो रहा है
दांतेवाडा नरसंहार को दो महीने हो गए हैं और आस पास का इलाका पूरी तरह से छावनी की शक्ल अख्तियार कर चुका है .वहां गए रिपोर्टर को गाँव वालों ने बताया कि जब गाँव के मर्द खेतों में काम करने चले जाते हैं , तो आस पास तैनात पुलिस वाले गश्त के बहाने गाँवों में आते हैं और औरतों को परेशान करते हैं इस तरह की अमानवीय आचरण की बहुत सारी घटनाएं इन इलाकों में हो रही हैं .सरकारों और सिविल सोसाइटी को चाहिए कि फ़ौरन से पेशतर ज़रूरी कार्रवाई करें वरना बहुत देर हो जायेगी. .

Saturday, June 12, 2010

इरान पर सुरक्षा परिषद् की नयी पाबंदी से भारत पर भी असर पडेगा

शेष नारायण सिंह

किसी और मुल्क को अपनी बराबरी न करने देने की अमरीकी जिद का एक और नमूना सामने है . अमरीका ने इरान की सरकार के ऊपर फिर से पाबंदी लगा दी है .और पश्चिम एशिया में अमरीकी दादागीरी का एक और कारनामा अंजाम दे दिया है . अमरीका को इरान का परमाणु कार्यक्रम रास नहीं आ रहा है . हर बार की तरह इस बार भी इरान पर पाबंदी लगाने के लिए अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का इस्तेमाल किया . अजीब बात यह है कि पांच स्थायी सदस्यों, ब्रिटेन,फ्रांस,चीन और रूस में किसी ने भी किसी तरह का विरोध नहीं किया. बाकी १० अ-स्थायी सदस्यों में ७ ने अमरीका का साथ दिया , दो ने विरोध किया और एक ने वोते में हिस्सा नहीं लिया. अ-स्थायी सदस्यों के वोट का बहुत मतलब नहीं है लेकिन अमरीका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह अब इकलौता सुपर पॉवर है और उसकी मनमानी के आगे किसी की नहीं चलने वाली है . सुरक्षा परिषद् मेंचर्चा के दौरान अमरीकी राजदूत, सूज़न राईस ने कहा कि इस बार की पाबंदियाँ निर्णायक साबित होंगीं.उन्हें शिकायत है कि इरान ने उन अवसरों का इस्तेमाल नहीं किया जब उसे अपने परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण साबित करने के अवसर दिए गए. ब्राज़ील और तुर्की ने पाबंदियों क अविरोध किया. इन दोनों ही देशों ने इरान के साथ परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण इस्तेमाल के लिए पिछले महीने ही समझौता किया है . दोनों ही मुल्कों ने कहा कि पाबंदी लगान इसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है . पाबंदी की धमकी, और किसी मुल्क को अलग थलग करने की कोशिश के नतीजे बहुत ही दुखदायी हो सकते हैं . अगर अमरीका को इरान के परमाणु कार्यक्रम से कोई शिकायत हा इतो उसे बातचीत के ज़रिये सुलझाने की कोशिश करना चाहिए. पाबंदियों की घोषणा के तुरंत बाद अमरीकी राष्ट्रपति , बराक ओबामा ने प्रेस को संबोधित किया और कहा कि इस बार इरान पर लगाई गयी पाबंदियां ज्यादा प्रभावी होंगीं और पिछले ३ बार की पाबंदियों से बेहतर नतीजे लायेंगीं . उन्होंने कहा कि पाबंदियों का मतलब यह नहीं है कि बातचीत के रास्ते बंद हो गए हैं . ओबामा ने दावा किया कि इरान से कूटनीतिक स्तर पर संवाद जारी रहेगा. लेकिन नयी पाबंदियां इरान को अलग थलग करने की गंभीर कोशिश हैं . इन पाबंदियों के तहत इरान कहीं से भी भारी हथियार नहीं खरीद सकता, उसके माल को किसी भी बन्दरगाह या हवाई अड्डे पर जांच के लिए रोका जा सकता है . उन बैंकों के लाइसेंस रद्द किये जायेंगें जिनके ऊपर शक़ होगा कि वे इरानी परमाणु कार्यक्रम में किसे एताढ़ से भी सहयोग कर रही हैं. इरान के साथियों के घेरने की कोशिश भी की जायेगी . क्योंकि रूस, फ्रांस और अमरीका ने पिछले महीने हुए ब्राजील, तुर्की और इरान के परमाणु समझौते की भी आलोचना की है . यह देश अपने आपको वियान ग्रुप कहते हैं और एक तरह से बाकी दुनिया के परमाणु कार्यक्रमों की चौकी दारी करने का ठेका ले रखा है .

अमरीकी कोशिश के बाद सुरक्षा परिषद् की तरफ से घोषित इन पाबंदियों का भारत पर भी असर पडेगा. इंदिरा गाँधी के युग में तो किसी अमरीकी राष्ट्रपति की हिम्मत नहीं थी कि वह भारत को यह समझाए कि कइसी तीसरे देश के साथ कैसा बर्ताव करना है लेकिन अब मामला बदल गया है . अभी पिछले दिनों ही संयुक्त राष्ट्र के एक मंच पर भारत के प्रतिनिधि ने अमरीका के दबाव में आकर इरान के खिलाफ वोट दिया था . लेकिन इस बार मामला बिलकुल अलग है.अमरीकी दबाव में सुरक्षा परिषद् ओर से आये इस प्रतिबन्ध पर इरान ने बिलकुल अलगर्ज़ रवैया अपनाया है . इरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र का यह प्रताव किसी काम का नईं है इसे इस्तेमाल किये गए रूमाल की तरह किसी कूड़े दान में फेंक देना चाहिए.इरान ने घोषणा की है इस पाबंडे एके प्रताव के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा . इरान का इस्लामी गणराज्य यूरेनियम के संवर्धन के अपने कार्यक्रम को बदस्तूर जारी रखेगा . ज़ाहिर है कि अगर इरान सुरक्षा परिषद् और अमरीका की पाबंदी वाली धमकी को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है तो वह उम्मीद करेगा कि उस से अच्छा सम्बन्ध बनाने के इच्छुक देश भी इस पाबंदी की घोषणा के बाद इरान से अपन एरिष्टों में तबदीली न लायें . इरान के इस रुख से भारत के लिए परेशानी बढ़ सकती है . भारत का इरान से मज़बूत आर्थिक सम्बन्ध है . हालांकि अमरीका से भारत के आर्थिक सम्बन्ध आब जायद हो गए हैं लेकिन इरान से जो सम्बन्ध हैं उनके खराब होने पर भारत की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें प्रभावित होंगीं जिससे विकास की गति भी धीमी पड़ेगी और आम आदमी पर आर्थिक बोझ भी बढेगा यानी इरान को नाराज़ करके भारत महंगाई के दलदल में फंस सकता है . ज़ाहिर है कि नयी दिल्ली की कोई भी सरकार बैठे ठाले इस मुसीबत से बचना चाहेगी.इसका मतलब यह हुआ कि भारत के सामने सुरक्षा परिषद् की इरान संबंधी पाबंदी आने के बाद कठिन परिस्थितियाँ पैदा हो गयी हैं .सबसे बड़ी बात तो यह है कि इरान से भारत आने वाली गैस की पाईपलाइन की योजना ही प्रभावित होगी. दुनिया जानती है कि इस पाईपलाइन के बाद देश की ऊर्जा की ज़रूरतों पर बहुत ही सकारात्मक असर पडेगा.ऐसी हालत में अमरीका की इरान को घेरने की नयी कोशिश का बाकी दुनिया की कूटनीति पर उल्टा प्रभाव पड़ने की आशंका है .

पाकिस्तान के एक इलाके पर तालिबानी कब्जा

शेष नारायण सिंह

एमनेस्टी इंटरनेशनल की नयी रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां पाकिस्तानी सरकार का कोई अधिकारी घुस नहीं सकता . यह इलाके वास्तव में तालिबानी कब्जे में हैं और वहां, मानवाधिकारों का दिन रात क़त्ल हो रहा है .इस इलाके के लोगों को किसी तरह की कानूनी सुरक्षा नहीं हासिल है और लोग तालिबानी आतंक के शिकार हो रहे हैं .पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के क्षेत्र में रहने वाले इन करीब चालीस लाख लोगों को पाकिस्तानी सरकार ने तालिबानियों के रहमो-करम पर छोड़ दिया है . इसके अलावा पाकिस्तान में करीब दस लाख ऐसे लोग हैं जो तालिबानी आतंक से तो आज़ाद हैं लेकिन पाकिस्तानी सरकार उनकी समस्याओं को हल करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही है और लोग भूखों मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं . उन्हें मदद की अर्जेंट ज़रुरत है लेकिन पाकिस्तानी सरकार किसी भी पहल का जवाब नहीं दे रही है .एमनेस्टी इंटरनेशनल के सेक्रेटरी का दावा है कि अगर फ़ौरन कुछ न किया गया तो पाकिस्तानी सरकार की उपेक्षा के शिकार इन इंसानों को बचाया नहीं जा सकेगा.एमनेस्टी ने पाकिस्तान सरकार और तालिबान के नेताओं से अपील की है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करें और इन परेशान लोगों के मानवाधिकार से खिलवाड़ न करें.संगठन ने बताया है कि लड़ाकों और फौजियों के अलावा २००९ में इस क्षेत्र में करीब १३०० सिविलियन मारे गए थे. इस साल यह संख्या और भी बढ़ जाने की आशंका है .स्वात घाटी तालिबानी आतंक का सबसे मज़बूत ठिकाना है . वहां से भाग कर आये लोगों की शिकायत है कि पाकिस्तानी सरकार ने उनकी जिंदगियों को बेमतलब मान कर उन्हें पूरी तरह से भुला दिया है और अब तालिबानी चील कौवे उनको नोच रहे हैं .वहां स्कूलों में अब किताबें नहीं पढाई जातीं , तालिबान आतंकवादी उन स्कूलों में बाकायदा बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देता है . आतंक फैलाने के अन्य तरीकों की शिक्षा भी इन्हीं स्कूलों में दी जा रही है.

पाकिस्तान के पिछले साठ साल के इतिहास पर नज़र डालें तो अंदाज़ लग जायेगा कि गलत राजनीतिक फैसलों का क्या नतीजा होता है.पाकिस्तान की स्थापना के साथ ही यह पक्का पता लग गया था कि एक ऐतिहासिक और भौगोलिक अजूबा पैदा हो गया है .मौलाना आज़ाद ने विभाजन के वक़्त ही बता दिया था कि यह मुल्क जिन्नाह के जीवन काल तक ही चल पायेगा . उसके बाद इसके टुकड़े होने से कोई नहीं रोक सकता. इसीलिये जब जनरल अय्यूब ने पाकिस्तान को फौजी तानाशाही के बूटों तले रौंदने का फैसला किया तो तस्वीर साफ़ होने लगी थी. तानाशाही से अपने को अलग करने की कोशिश कर रहे पूर्वी बंगाल की जनता ने अपने आपको पाकिस्तान से अलग कर लिया . अब बाकी बचे पाकिस्तान में तबाही का माहौल है . १९७१ में अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और पाकिस्तानी हुक्मरान , याहया खां और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने भारत के खिलाफ एक हज़ार साल तक की लड़ाई की मंसूबाबंदी की थी. . वे दोनों तो ज़बानी जमा खर्च से आगे नहीं बढ़ सके लेकिन उनके उत्तराधिकारी जनरल जिया-उल-हक ने इस धमकी को अंजाम तक पंहुचाने की कोशिश की. उन्होंने अमरीकी पैसे की मदद से भारत में आतंकवाद के ज़रिये हमले करना शुरू कर दिया .इसके लिए उन्होंने पाकिस्तानी फौज का इस्तेमाल किया और तरह तरह के आतंकवादी संगठन खड़े कर दिए .पहले भारत के राज्य ,पंजाब में दहशतगर्दी का काम शुरू करवाया . उनके मरने के बाद वे ही दहशतगर्द कश्मीर में सक्रिय हो गए लेकिन भारत की ताक़त के सामने पाकिस्तान की सारी तरकीबें फेल हो गयीं और जो आतंकवादी संगठन भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने के लिए बनाये गए थे ,आज वही पाकिस्तानी राष्ट्र को तबाह करने पर आमादा हैं . यह तालिबान वगैरह उसी आतंकवादी फलसफे को लागू करने के लिए सक्रिय हैं . बस फर्क यह है कि अब निशाने पर पाकिस्तान है . और पाकिस्तान का एक बड़ा इलाका वहां के असली शासक , फौज से नाराज़ है . बलूचों के सरदार अकबर खां बुग्ती को जिस बेरहमी से जनरल मुशर्रफ ने मारा था उसकी वजह से बलूचिस्तान अब पाकिस्तान से अलग होना चाहता है . अलग सिंध की मांग पाकिस्तान से भी पुरानी है , वह भी बिलकुल आन्दोलन की शक्ल अख्तियार करने के लिए तैयार है . पख्तून पहले से ही अफगानिस्तान से ज्यादा बिरादराना महसूस करते हैं . हमारे खान अब्दुल गफ्फार खां ही काबुल में दफनाये गए थे . दर असल यह उनकी आख़िरी इच्छा थी. तो वह इलाका भी भावनात्मक रूप से कभी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बन सका . जो हमारे रिश्तेदार विभाजन के बाद वहां जाकर बसे हैं , उनको भी पंजाबी प्रभाव वाली फौज अभी मोहाजिर की कहती है . यानी वह भी अभी भारत के उन इलाकों को ही अपना घर मानते हैं जहां उनके पुरखों की हड्डियां दफन हैं . केवल पंजाब है जो अपने को पाकिस्तान कहलाने में गर्व महसूस करता है .
इस पृष्ठभूमि में यह बिलकुल साफ़ है कि पाकिस्तान के एकता का कोई केस नहीं है . लेकिन अजीब बात है कि सबसे पहले पाकिस्तानी राजनीतिक और फौजी हुक्मरान के हाथ से वे इलाके निकल रहे हैं जिनके बारे में आम तौर पर बात ही नहीं की जाती थी. अगर स्वात घाटी और उसके आस पास के इलाके में पाकिस्तान फ़ौरन अपना इकबाल बुलंद नहीं करता तो तालिबान के कब्जे में एक बड़ा भौगोलिक भूभाग आ जायेगा जिसके बाद पाकिस्तान को खंड खंड होने कोई नहीं बचा सकता .

Thursday, June 10, 2010

प्रधान मंत्री की श्रीनगर यात्रा एक ज़रूरी पहल है

शेष नारायण सिंह

(डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट से साभार )

प्रधान मंत्री डॉ मनमोहन सिंह की कश्मीर यात्रा से दिल्ली के शासकों को बहुत उम्मीदें हैं . पिछले २० वर्षों से भी ज्यादा वक़्त से आतंकवादी हमलों को झेल रहे कश्मीरी अवाम को कुछ सुकून देने की केंद्र सरकार की कोशिश साफ़ नज़र आ रही है. आतंकवाद पर दुनिया भर में दबाव बना हुआ है. ऐसी हालत में प्रधानमंत्री की कोशिश है कि विकास के मुद्दों को पुरजोर तरीके से चर्चा का विषय बनाया जाए. उनकी मौजूदा यात्रा नयी दिल्ली के नीति नियामकों की इसी सोच का नतीजा है . यात्रा के पहले दिन ही प्रधान मंत्री ने सभी वर्गों के लोगों से बात की . उनको भरोसा दिलाने की कोशिश की कि केंद्र सरकार राज्य के विकास को गंभीरता से लेती है..अलगाववादियों की गतिविधियों को भी बेमानी साबित करने की दिशा में गंभीर पहल की गयी . उन्होंने जब यात्रा शुरू होने के पहले यह ऐलान कर दिया कि शान्ति और विकास के लिए किसी से भी बात करने में कोई हर्ज़ नहीं है, तो आतंक वालों का आधा खेल तो पहले ही बिगड़ गया था . बाकी वहां जाकर दुरुस्त करने की कोशिश की . विकास का हमला करने की मनमोहन सरकार की रणनीति के सफल होने की उम्मीद दिल्ली और इस्लामाबाद में की जा रही है . हालांकि सरहद के दोनों तरफ की अतिवादी ताकतें अभी इस फ़िराक़ में हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच झगडा बना रहे . दर असल इन अतिवादी ताक़तों की राजनीति की बुनियाद ही यही है . लेकिन मनमोहन सिंह ने विकास के रास्ते शान्ति की पहल कर दी है . वक़्त ही बतायेगा कि भारत सरकार का यह जुआ शान्ति की दिशा में सही क़दम साबित होता है कि नेताओं और अफसरों के लिए रिश्वत की गिज़ा का माध्यम बनता है . प्रधान मंत्री ने राज्य के मुख्य मंत्री की बहुत तारीफ़ की और कहा कि जिस तरह से उमर अब्दुल्ला ने राज्य के विकास और उसके लिए ज़रूरी केंद्रीय मदद की मांग की , उस से वे बहुत प्रभावित हुए हैं . इसका मतलब यह हुआ कि जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर सरकारी धन भेजा जाने वाला है . लगता है कि प्रधानमंत्री की पुनर्निर्माण योजना के वे ६७ प्रोजेक्ट भी शुरू हो जायेंगें जो अर्थव्यवस्था के ११ क्षेत्रों को कवर करते हैं और उन पर केंद्र सरकार २४ हज़ार करोड़ रूपये खर्च करने की योजना बना चुकी है . डॉ मनमोहन सिंह की जम्मू-कश्मीर यात्रा का शान्ति के हित में बहुत ही अधिक महत्व है . राज्य के वे लोग जो अब तक गलत राजनीतिक सोच की वजह से परेशान रहे हैं उनको भी उम्मीद का एक अवसर नज़र आना चाहिए .

जम्मू -कश्मीर इस बात का उदाहरण है कि गलत राजनीतिक फैसलों से किस तरह देश का भविष्य तबाह किया जा सकता है . जिस कश्मीर की तुलना स्वर्ग से की जाती थी , वहां रहने वाले लोग देश के सबसे खस्ताहाल इलाके के नागरिक कहे जाते हैं . कश्मीर बहुत पहले से गलत राजनीतिक सोच का शिकार रहा है. पुराने इतिहास में न जाकर देश विभाजन के वक़्त की राजनीति को ही देखने से कश्मीरी अवाम की बदकिस्मती का एक खाका दिमाग में उभरता है . उस वक़्त का कश्मीर नरेश एक अजीब इंसान था . विभाजन के दौरान ,बहुत दिनों तक वह पाकिस्तान से सौदेबाजी करता रहा कि वह उनके साथ जाना चाहता था. वो तो जब पाकिस्तान ने कबायलियों के साथ अपने फौजी भेजकर ज़बरदस्ती कश्मीर पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की तब उसकी समझ में आया कि वह कितनी बड़ी बेवकूफी का शिकार हो रहा था .बहर हाल वह सरदार पटेल की शरण में आया और उन्होंने उसे अपने साथ मिला लिया और पाकिस्तानी फौज़ को वापस खदेड़ दिया गया . शेख अब्दुल्ला उस दौर के हीरो थे. सरदार पटेल ने जब जम्मू-कश्मीर को अपने साथ लिया था तो राज्य को एक विशेष दर्जा देने का वचन दिया था . उसी वचन को पूरा करने के लिए संविधान में अनुच्छेद ३७० की व्यवस्था की गयी. लेकिन जो पार्टियां आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थीं, उन्हें सरदार पटेल के वचन या भारतीय संविधान का सम्मान करने की तमीज नहीं थी और उन्होंने उसका विरोध शुरू कर दिया . नतीजा यह हुआ कि कई फैसलों में गलतियां हुईं और जवाहर लाल नेहरू ने १९५३ में शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया . उसके बाद तो गलत फैसलों की बाढ़ सी आ गई. राज्य के सबसे लोकप्रिय नेता को गिरफ्तार करके केंद्र सरकार ने वह गलती की जिसका खामियाजा आज तक भोगा जा रहा है . दिल्ली की पसंद की सरकार बनाने के लिए जम्मू-कश्मीर में हमेशा राजनीतिक अड़ंगेबाज़ी का सिलसिला चलता रहा. बताते हैं कि शेख साहेब की गिरफ्तारी के बाद पहली बार राज्य में निष्पक्ष चुनाव १९७७ में ही हुए . लेकिन उसके बाद पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का राज हो गया और वह १९७१ की पाकिस्तानी फौज की हार का बदला लेना चाहते थे और भारत को कमज़ोर करना उनका प्रमुख उद्देश्य था . पहले तो उसने पंजाब में आतंकवाद को हवा दी और साथ साथ कश्मीर में भी काम शुरू करवा दिया .इधर दिल्ली में भी अदूरदर्शी लोगों के हाथ में सत्ता आ गयी. इंदिरा गाँधी के दूसरे कार्यकाल में अरुण नेहरू बहुत बड़े सलाहकार बन कर उभरे. उन्होंने इंदिरा और राजीव ,दोनों को ही कश्मीर मामले में गलत फैसले करने के लिए उकसाया , अरुण नेहरू ने ही वह गैर ज़िम्मेदार बयान दिया था जिसमें कहा गया था कि कश्मीर में चल रहा अलगाव वादियो का आन्दोलन वास्तव में कानून व्यवस्था की समस्या है . कोई अज्ञानी ही इतनी बड़ी समस्या को कानून व्यवस्था की समस्या कह सकता है . अरुण नेहरू ने इसी स्तर की सलाह राजीव गाँधी को उपलब्ध कराई जिसकी वजह से केंद्र सरकार ने थोक में गलत फैसले किये . नतीजा सामने है . बाद में जब जगमोहन को वहां राज्यपाल बनाकर भेजा गया तब तो मूर्खता पूर्ण फैसलों का दौरदौरा शुरू हो गया . जगमोहन ने तो अपनी मुस्लिम विरोधी सोच की सारी कारस्तानियों को अंजाम दिया . मीरवाइज़ फारूक की शव यात्रा पर गोली चलवाना जगमोहन के दिमाग की ही उपज हो सकता था . जगमोहन ने ही निर्दोष मुसलमानों को फर्जी तरीके से फंसाना शुरू कर दिया . मुफ्ती मुहम्मद सईद का गृह मंत्री होना , कश्मीर का सबसे बड़ा दुर्भाग्य माना जाता है . उनके शासनकाल में ही वहां आतंकवाद खूब पला बढा . बाद में केंद्र में ऐसी सरकारें आती रहीं जिनके पास स्पष्ट जनादेश नहीं था. लिहाज़ा सब कुछ गड़बड़ होता रहा . उधर पाकिस्तान में आई एस आई और फौज की ताक़त बहुत बढ़ गयी . पाकिस्तान ने आतंक के ज़रिये भारत को दबाने की कोशिश की . यह अलग बात है कि उसी चक्कर में पाकिस्तान खुद ही नष्ट हो गया लेकिन भारत का नुकसान तो हुआ .उसी नुक्सान को संभालने के लिए आज मुल्क हर स्तर पर कोशिश कर रहा है . प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए . अभी यह उम्मीद करना भी ठीक नहीं होगा कि सब कुछ जल्दी ही दुरुस्त हो जाएगा लेकिन यह तो तय है कि सही दिशा में क़दम उठा दिया गया है . नतीजा भविष्य की कोख में है.

Wednesday, June 9, 2010

काकोरी के शहीदों की शान को सलामत रखना होगा

शेष नारायण सिंह

भारत की आज़ादी के इतिहास में काकोरी नाम सोने के अक्षरों में लिखा गया है .और काकोरी के शहीदों में ठाकुर रोशन सिंह का नाम बहुत ही इज्ज़त से लिया जाता है . वे काकोरी केस के उन बहादुरों में से थे जिनको फांसी की सज़ा सुनायी गयी थी. काकोरी के केस की मूल योजना पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने बनायी थी.उनके साथियों में अशफाकुल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिरी, दुर्गा भाभी ,शचीन्द्र बख्शी ,चन्द्रशेखर आज़ाद , केशव चक्रवर्ती ,शचीन्द्र नाथ सान्याल, मन्मथ नाथ गुप्ता आदि थे. हालांकि बताया जाता है कि इन लोगों ने अपने आन्दोलन की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लखनऊ जाती हुई रेल गाडी को लूट लिया था जिसमें ब्रितानी सरकार का खजाना रखा हुआ था लेकिन सच्चाई यह है कि गांधी जी के असहयोग आन्दोलन के वापस लिए जाने के बाद जो शिथिलता आ गयी थी , उसे फिर से जीवित करना इन नौजवानों का उद्देश्य था . काकोरी में खजाना लूटे जाने के बाद अंग्रेजों को अंदाज़ लग गया था कि अब भारत की आजादी को रोक पाना मुश्किल है . जो दरिया झूम के उट्ठे थे उन्हें रोक पाना अंग्रेजों के बस की बात नहीं थी. . इन नौजवानों के अदालती डिफेंस के लिए जो कमेटी बनी, उसकी अध्यक्षता खुद मोती लाल नेहरू कर रहे थे . इसका मतलब यह लगाया गया कि इन बहादुरों को महात्मा गाँधी का समर्थन भी मिला हुआ है . यानी पूरे देश की जनता इनके साथ है . अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिल गयी थी लेकिन उसने पूरी सख्ती दिखाई और चार लोगों को फांसी की सज़ा दी गयी जबकि बाकी साथियों को आजीवन कारावास की सज़ा मिली. मौत की सज़ा पाने वालों में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खां, राजेंद्र लाहिरी और रोशन सिंह थे. देश की आज़ादी की शान के लिए यह चारों नौजवान फांसी के तख्ते पर चढ़े थे. इतिहास कारों का एक वर्ग इनके योगदान को कम करके आंकता है लेकिन सही बात यह है कि इनकी शहादत के बाद देश में तूफ़ान आ गया था और जब महात्मा गाँधी ने १९३०में सम्पूर्ण आज़ादी की बात की तो अंग्रेजों के कुछ पिट्ठू संगठनों के अलावा बाकी पूरा देश आज़ादी के साथ था, गाँधी के साथ था और अंग्रेजोंके खिलाफ था. जेलों में हिन्दुस्तानी अवाम को ठूंस दिया गया .सभी संगठनों के लोग जेलों में थे. जिन संगठनों के मुखिया जेल नहीं गए उन्हें अंग्रेजों के खैरख्वाह के रूप में आज भी पहचाना जाता है .
एक दुखद खबर आई है कि ठाकुर रोशन सिंह का पौत्र उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में एक धोखाधड़ी के केस में पकड़ लिया गया है . उसके ऊपर यह भी आरोप है कि उसने एक दलित महिला को धोखा देकर उसका यौन शोषण भी किया . भारत की आज़ादी के लड़ाई का नेतृत्व महात्मा गाँधी ने किया था लेकिन रोशन सिंह जैसे लोगों का उसमें कम योगदान नहीं है और उनका ही वंशज जब दलित के शोषण और धोखा धडी का काम करता है तो यह इस बात का संकेत हैं कि हमारी व्यवस्था में कहीं कुछ बहुत ही गड़बड़ हो गयी है . आरोप है कि रोशन के पौत्र ने एक दलित महिला से झूठ बोलकर शादी की और जब सच्चाई का पता उस महिला को चला तो उसने नाराज़गी ज़ाहिर की. रोशन सिंह के पौत्र ने उसे गाली दी और मारा पीटा अगर यह आरोप सच है तो बात बहुत बिगड़ चुकी है . उत्तर प्रदेश में समाज की भलाई की चिंता करने वालों को इस मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ..क्योंकि अगर श्हहीद रोशन सिंह के परिवार के लोगों में भी सामाजिक बराबरी की भावना नहीं रह गयी है तो ज़ाहिर है पिछले साठ वर्षों में देश ने बहुत कुछ खो दिया है . जो व्यक्ति मुल्क की आज़ादी के लिए फांसी पर झूल गया हो उसके परिवार में अगर दलितों का उत्पीडन करने वाला मौजूद है तो यह संस्कार रोशन सिंह के तो नहीं है . निश्चित रूप से समाज और सरकार ने यह हालात पैदा किये हैं . सरकार इस लिए कि आजकल लगभग सब कुछ सरकार के हवाले है . सामाजिक परिवर्तन के लिए भी अब राजनीतिक आन्दोलन नहीं चलते, बस सरकारी अनुदान के सहारे सामाजिक परिवर्तन की गाडी चल रही है .
ज़ाहिर है उत्तर प्रदेश में नौजवानों को जीवन मूल्यों की सही शिक्षा नहीं दी जा रही है . इसका एक कारण तो यह है कि पूरे राज्य में ग्रामीण इलाकों में प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहे हैं . बच्चों को शिक्षा नहीं दे रहे हैं . मजबूरी में यह बच्चे उन स्कूलों में जाते हैं जो निजी हाथों में हैं ,. उन स्कूलों में संचालकों की विचारधारा की घुट्टी पिलाई जाती है . ज़्यादातर स्कूलों में पाठ्यक्रम ऐसे हैं जो सामंती-साम्प्रदायिक रंग में रंगे हुए हैं . एक सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर जिलों में आर एस एस वालों ने सरस्वती शिशु मंदिर खोल रखे हैं . जहाँ पूरी तरह से सामंती माहौल है . वहां सांप्रदायिक पाठ्यक्रम भी है . उन स्कूलों में पढने वाले बच्चों को यह तो बताया जाता है कि सावरकर या गोलवलकर कितने महान थे लेकिन यह नहीं बताया जाता कि अशफाकुल्ला खान ने इस देश के आज़ादी के ;लिए अपनी कुर्बानी दी थी. ज़ाहिर है सामंती सोच की शिक्षा से ऐसे ही नौजवान समाज में आयेगें जैसा महान क्रांतिकारी रोशन सिंह का पौत्र है . सरकार और समाज को फ़ौरन संभालना होगा वरना आज़ादी के लिए दी गयी कुर्बानियां बेकार चली जायेंगीं और देश में एक ऐसा समाज कायम हो जाएगा जिसकी सामाजिक सोच सामंती होगी या साम्प्रदायिक होगी. सभी लोगों को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि हमारी आजादी की विरासत की हिफाज़त हो

Monday, June 7, 2010

कुछ तमाशा ये नहीं,कौम ने करवट ली है

शेष नारायण सिंह
महिलाओं के लिए संसद और विधान मंडलों में ३३ प्रतिशत आरक्षण के लिए औरतों ने मैदान ले लिया है .अब वे अपने हक को हर हाल में लेने के लिए संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ी हैं .करीब २० हज़ार किलोमीटर की यात्रा करके महिलाओं के तीन जत्थे दिल्ली पंहुचे थे और जब यह उत्साही महिलायें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से उनके आवास पर मिलीं तो वे बहुत प्रभावित हुईं और उन्होएँ अपने आप को इनके मिशन से जोड़ दिया. लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि अभी लम्बी लड़ाई है . उनको मालूम है कि महिला आरक्षण का विरोध कर रही जमातें किसी से कमज़ोर नहीं हैं और वे पिछले १२ वर्षों से सरकारों को अपनी बातें मानने पर मजबूर करती रही हैं .अपने को पिछड़ी जातियों के राजनीतिक हित की निगहबान बताने वाली राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के आरक्षण में अलग से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की बात कर रही हैं . बात तो ठीक है लेकिन महिलाओं को शक़ है कि यह टालने का तरीका है .महिला आरक्षण की ज़बरदस्त वकील, महिलाओं का कहना है कि एक बार महिलाओं के रिज़र्वेशन का कानून बन जाए तो शोषित वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण के लिए फिर आन्दोलन किया जा सकता है . लेकिन राजनीतिक पार्टियों के दादा लोग किसी भी वायदे पर ऐतबार नहीं करना चाहते .ऐतबार तो महिलाओं को भी इन नेताओं का नहीं है . सच्ची बात यह है कि २० हज़ार किलोमीटर की जागरूकता यात्रा करके लौटी इन औरतों को जिसने देखा है , उसे मालूम है कि महिला आरक्षण का माला अब राजनीतिक प्रबंधन की सीमा से बाहर जा चुका है . लगता है कि इतिहास एक नयी दिशा में चल पड़ा है और आने वाली नस्लें इन औरतों पर फख्र करेगीं . यह कोई तफरीह नहीं है , यहाँ इतिहास अंगडाई ले रहा है.

इसके पहले महिला आरक्षण कारवां ६ जून को दिल्ली पंहुचा था . पूरे भारत में करीब २० हज़ार किलोमीटर की यात्रा करके तीन काफिले जब दिल्ली के मावलंकर हाल के मैदान में पंहुचे तो उनका बाजे गाजे के साथ स्वागत किया गया. यह तीनों काफिले १८५७ की हीरो झलकारी बाई और लक्ष्मीबाई की बलिदान स्थली, झांसी से २० मई को चले थे. १८५७ में मई के महीने में ही भारतीय इतिहास की इन वीरांगनाओं ने ब्रितानी साम्राज्यवाद को चुनौती दी थी . और साम्राज्यवादी सामन्ती सोच के सामने इन्होने वीरता का वरण किया था और शहीद हुई थीं. . भारत की आज़ादी की नींव में जिन लोगों का खून लगा है , यह दोनों उसमें सर-ए-फेहरिस्त हैं . १८५७ में ही मुल्क की खुद मुख्तारी की लड़ाई शुरू हो गयी थी लेकिन अँगरेज़ भारत का साम्राज्य छोड़ने को तैयार नहीं था. उसने इंतज़ाम बदल दिया. ईस्ट इण्डिया कंपनी से छीनकर ब्रितानी सम्राट ने हुकूमत अपने हाथ में ले ली. लेकिन शोषण का सिलसिला जारी रहा. दूसरी बार अँगरेज़ को बड़ी चुनौती महात्मा गाँधी ने दी . १९२० में उन्होंने जब आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करना शुरू किया तो बहुत शुरुआती दौर में साफ़ कर दिया था कि उनके अभियान का मकसद केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं है, वे सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं , उनके साथ पूरा मुल्क खड़ा हो गया . . हिन्दू ,मुसलमान, सिख, ईसाई, बूढ़े ,बच्चे नौजवान , औरतें और मर्द सभी गाँधी के साथ थे. सामाजिक बराबरी के उनके आह्वान ने भरोसा जगा दिया था कि अब असली आज़ादी मिल जायेगी. लेकिन अँगरेज़ ने उनकी मुहिम में हर तरह के अड़ंगे डाले . १९२० की हिन्दू मुस्लिम एकता को खंडित करने की कोशिश की . अंग्रेजों ने पैसे देकर अपने वफादार हिन्दुओं और मुसलमानों के साम्प्रदायिक संगठन बनवाये और देश वासियों की एकता को तबाह करने की पूरी कोशिश की . लेकिन आज़ादी हासिल कर ली गयी. आज़ादी के लड़ाई का स्थायी भाव सामाजिक इन्साफ और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना भी थी . लेकिन १९५० के दशक में जब गांधी नहीं रहे तो कांग्रेस के अन्दर सक्रिय हिन्दू और मुस्लिम पोंगापंथियों ने बराबरी के सपने को चनाचूर कर दिया . इनकी पुरातन पंथी सोच का सबसे बड़ा शिकार महिलायें हुईं. इस बात का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब महात्मा गाँधी की इच्छा का आदर करने के उद्देश्य से जवाहर लाल नेहरू ने हिन्दू विवाह अधिनियम पास करवाने की कोशिश की तो उसमें कांग्रेस के बड़े बड़े नेता टूट पड़े और नेहरू का हर तरफ से विरोध किया. यहाँ तक कि उस वक़्त के राष्ट्रपति ने भी अडंगा लगाने की कोशिश की. हिन्दू विवाह अधिनियम कोई क्रांतिकारी दस्तावेज़ नहीं था . इसके ज़रिये हिन्दू औरतों को कुछ अधिकार देने की कोशिश की गयी थी. लेकिन मर्दवादी सोच के कांग्रेसी नेताओं ने उसका विरोध किया. बहरहाल नेहरू बहुत बड़े नेता थे , उनका विरोध कर पाना पुरातन पंथियों के लिए संभव नहीं था और बिल पास हो गया .

महिलाओं को उनके अधिकार देने का विरोध करने वाली पुरुष मानसिकता के चलते आज़ादी के बाद सत्ता में औरतों को उचित हिस्सेदारी नहीं मिल सकी. राजीव गाँधी ने पंचायतों में तो सीटें रिज़र्व कर दीन लेकिन बहुत दिन तक पुरुषों ने वहां भी उनको अपने अधिकारों से वंचित रखा . धीरे धीरे सब सुधर रहा है .लेकिन जब संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को आरक्षण देने की बात आई तो अड़ंगेबाजी का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया. किसी न किसी बहाने से पिछले १२ वर्षों से महिला आरक्षण बिल राजनीतिक अड़ंगे का शिकार हुआ पड़ा है . देश का दुर्भाग्य है कि महिला आरक्षण बिल का सबसे ज्यादा विरोध वे नेता कर रहे हैं जो डॉ राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सोच को बुनियाद बना कर राजनीति आचरण करने का दावा करते हैं . डॉ लोहिया ने महिलाओं के राजनीतिक भागीदारी का सबसे ज्यादा समर्थन किया था और पूरा जीवन उसके लिए कोशिश करते रहे,. . देश का दूसरा दुर्भाग्य यह है कि पिछले २० वर्षों से देश में ऐसी सरकारें हैं जो गठबंधन की राजनीति की शिकार हैं . लिहाज़ा कांग्रेस , बी जे पी या लेफ्ट फ्रंट की राजनीतिक मंशा होने के बावजूद भी कुछ नहीं हो पा रहा है . मर्दवादी सोच चौतरफा हावी है . इस बार भी राज्य सभा में बिल को पास करा लिया गया है लेकिन उसका कोई मतलब नहीं होता. असली काम तो लोक सभा में होना है और मामला हर बार की तरह एक बार फिर लटक गया है .. अब तो कांग्रेस और बी जे पी जैसी पार्टियां भी इस बिल से बच कर निकल जाना चाहती हैं . ऐसे माहौल में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए बनायी गयी संस्था, अनहद की अगुवाई में करीब दो सौ महिला संगठनों के कार्यकर्ता सामने आये और चल पड़ा जागरूकता का कारवां. झांसी से चल कर करीब बीस हज़ार किलोमीटर की यात्रा करके जो महिलायें दिल्ली पंहुची थीं , उनका उत्साह देखते बनता था . राजस्थान में महिला अधिकारों की अलख जगाने वाली भंवरी देवी थीं , तो गुजरात पुलिस के हाथों फर्जी इनकाउंटर में मारी गयी लड़की इशरत जहां के माँ शमीमा और उसकी बहन मुसर्रत भी थीं . अनहद की शबनम हाशमी का दावा है कि जब पूरे देश में जागरूक महिलाओं की ओर से आवाज़ उठेगी तो दिल्ली में बैठे सरकारी नेताओं के लिए महिलाओं के अधिकार को हड़प कर पाना बहुत मुश्किल होगा

Sunday, June 6, 2010

ता हद्दे नज़र शहरे-खामोशां के निशाँ हैं

शेष नारायण सिंह

गुजरात में एक दलित नेता और उनकी पत्नी को पकड़ लिया गया है . पुलिस की कहानी में बताया गया है कि वे दोनों नक्सलवादी हैं और उनसे राज्य के अमन चैन को ख़तरा है . शंकर नाम के यह व्यक्ति मूलतः आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन अब वर्षों से गुजरात को ही अपना घर बना लिया है . गुजरात में साम्प्रदायिकता के खिलाफ जो चंद आवाजें बच गयी हैं , वे भी उसी में शामिल हैं. विरोधियों को परेशान करने की सरकारी नीति के खिलाफ वे विरोध कर रहे हैं और लोगों को एक जुट करने की कोशिश कर रहे हैं .उनकी पत्नी, हंसाबेन भी इला भट के संगठन सेवा में काम करती हैं , वे गुजराती मूल की हैं लेकिन उनको गिरफ्तार करते वक़्त पुलिस ने जो कहानी दी है ,उसके अनुसार वे अपने पति के साथ आंध्र प्रदेश से ही आई हैं और वहीं से नक्सलवाद की ट्रेनिंग लेकर आई हैं . ज़ाहिर है पुलिस ने सिविल सोसाइटी के इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के पहले होम वर्क नहीं किया था. इसके पहले डांग्स जिले के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ,अविनाश कुलकर्णी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था . किसी को कुछ पता नहीं कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन वे अभी तक जेल में ही हैं .गुजरात में सक्रिय सभी मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं को चुप कराने की गुजरात पुलिस की नीति पर काम शुरू हो चुका है और आने वाले वक़्त में किसी को भी नक्सलवादी बता कर धर लिया जाएगा और उसक अभी वही हाल होगा जो पिछले १० साल से गुजराती मुसलमानों का हो रहा है .नक्सलवादी बता कर किसी को पकड़ लेना बहुत आसान होता है क्योंकि किसी भी पढ़े लिखे आदमी के घर में मार्क्सवाद की एकाध किताब तो मिल ही जायेगी. और मोदी क एपुलिस वालों के लिए इतना ही काफी है . वैसे भी मुसलमानों को पूरी तरह से चुप करा देने के बाद , राज्य में मोदी का विरोध करने वाले कुछ मानवाधिकार संगठन ही बचे हैं . अगर उनको भी दमन का शिकार बना कर निष्क्रिय कर दिया गया तो उनकी बिरादराना राजनीतिक पार्टी , राष्ट्रवादी सोशलिस्ट पार्टी और उसके नेता , एडोल्फ हिटलर की तरह गुजरात के मुख्यमंत्री का भी अपने राज्य में एकछत्र निरंकुश राज कायम हो जाएगा .
अहमदाबाद में जारी के बयान में मानवाधिकार संस्था,दर्शन के निदेशक हीरेन गाँधी ने कहा है कि 'गुजरात सरकार और उसकी पुलिस विरोध की हर आवाज़ को कुचल देने के उद्देश्य से मानवाधिकार संगठनो , दलितों के हितों की रक्षा के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के अन्य कार्यकर्ताओं को नक्सलवादी बताकर पकड़ रही है ' लेकिन विरोध के स्वर भी अभी दबने वाले नहीं है . शहर के एक मोहल्ले गोमतीपुर में पुलिस का सबसे ज़्यादा आतंक है, . वहां के लोगों ने तय किया है कि अपने घरों के सामने बोर्ड लगा देंगें जिसमें लिखा होगा कि उस घर में रहने वाले लोग नक्सलवादी हैं और पुलिस के सामने ऐसी हालात पैदा की जायेगीं कि वे लोगों को गिरफ्तार करें . ज़ाहिर है इस तरीके से जेलों में ज्यादा से ज्यादा लोग बंद होंगें और मोदी की दमनकारी नीतियों को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाएगा.वैसे भी अगर सभ्य समाज के लोग बर्बरता के खिलाफ लामबंद नहीं हुए तो बहुत देर हो चुकी होगी और कम से कम गुजरात में तो हिटलरी जनतंत्र का स्वाद जनता को चखना ही पड़ जाएगा.

वैसे गुजरात में अब मुसलमानों में कोई अशांति नहीं है , सब अमन चैन से हैं . गुजरात के कई मुसलमानों से सूरत और वड़ोदरा में बात करने का मौक़ा लगा . सब ने बताया कि अब बिलकुल शान्ति है , कहीं किसी तरह के दंगे की कोई आशंका नहीं है . उन लोगों का कहना था कि शान्ति के माहौल में कारोबार भी ठीक तरह से होता है और आर्थिक सुरक्षा के बाद ही बाकी सुरक्षा आती है.बड़ा अच्छा लगा कि चलो १० साल बाद गुजरात में ऐसी शान्ति आई है .लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि जो कुछ मैं सुन रहा था वह सच्चाई नहीं थी. वही लोग जो ग्रुप में अच्छी अच्छी बातें कर रहे थे , जब अलग से मिले तो बताया कि हालात बहुत खराब हैं . गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है जितना कि पाकिस्तान में हिन्दू का . गुजरात के शहरों के ज़्यादातर मुहल्लों में पुलिस ने कुछ मुसलमानों को मुखबिर बना रखा है , पता नहीं चलता कि कौन मुखबिर है और कौन नहीं है . अगर पुलिस या सरकार के खिलाफ कहीं कुछ कह दिया गया तो अगले ही दिन पुलिस का अत्याचार शुरू हो जाता है. मोदी के इस आतंक को देख कर समझ में आया कि अपने राजनीतिक पूर्वजों की लाइन को कितनी खूबी से वे लागू कर रहे हैं . लेकिन यह सफलता उन्हें एक दिन में नहीं मिली . इसके लिए वे पिछले दस वर्षों से काम कर रहे हैं . गोधरा में हुए ट्रेन हादसे के बहाने मुसलमानों को हलाल करना इसी रणनीति का हिस्सा था . उसके बाद मुसलमानों को फर्जी इनकाउंटर में मारा गया, इशरत जहां और शोहराबुद्दीन की हत्या इस योजना का उदाहरण है . उसके बाद मुस्लिम बस्तियों में उन लड़कों को पकड़ लिया जाता था जिनके ऊपर कभी कोई मामूली आपराधिक मामला दर्ज किया गया हो . पाकेटमारी, दफा १५१ , चोरी आदि अपराधों के रिकार्ड वाले लोगों को पुलिस वाले पकड़ कर ले जाते थे , उन्हें गिरफ्तार नहीं दिखाते थे, किसी प्राइवेट फार्म हाउस में ले जा कर प्रताड़ित करते थे और अपंग बनाकर उनके मुहल्लों में छोड़ देते थे . पड़ोसियों में दहशत फैल जाती थी और मुसलमानों को चुप रहने के लिए बहाना मिल जाता था .लोग कहते थे कि हमारा बच्चा तो कभी किसी केस में पकड़ा नहीं गया इसलिए उसे कोई ख़तरा नहीं था . ज़ाहिर है इन लोगों ने अपने पड़ोसियों की मदद नहीं की ..इसके बाद पुलिस ने अपने खेल का नया चरण शुरू किया . इस चरण में मुस्लिम मुहल्लों से उन लड़कों को पकड़ा जाता था जिनके खिलाफ कभी कोई मामला न दर्ज किया गया हो . उनको भी उसी तरह से प्रताड़ित करके छोड़ दिया जाता था . इस अभियान की सफलता के बाद राज्य के मुसलमानों में पूरी तरह से दहशत पैदा की जा सकी. और अब गुजरात का कोई मुसलमान मोदी या उनकी सरकार के खिलाफ नहीं बोलता ..डर के मारे सभी नरेन्द्र मोदी की जय जयकार कर रहे हैं. अब राज्य में विरोध का स्वर कहीं नहीं है . कांग्रेस नाम की पार्टी के लोग पहले से ही निष्क्रिय हैं . वैसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि विपक्ष का अभिनय करने के लिए उनकी ज़रूरत है .यह मानवाधिकार संगठन वाले आज के मोदी के लिए एक मामूली चुनौती हैं और अब उनको भी नक्सलवादी बताकर दुरुस्त कर दिया जाएगा. फिर मोदी को किसी से कोई ख़तरा नहीं रह जाएगा. हमारी राजनीति और लोकशाही के लिए यह बहुत ही खतरनाक संकेत हैं क्योंकि मोदी की मौजूदा पार्टी बी जे पी ने अपने बाकी मुख्यमंत्रियों को भी सलाह दी है कि नरेन्द्र मोदी की तरह ही राज काज चलाना उनके हित में होगा