Thursday, March 3, 2011

नरेंद्र मोदी और भागवत ने फिर किया महात्मा गाँधी की विरासत पर दावा

शेष नारायण सिंह

नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर महात्मा गाँधी का नाम लिया और उन्हें दूरदर्शी और मौलिक चिन्तक बताया .उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने महात्मा गाँधी के कुछ सपनों को पूरा कर दिया है . गोधरा की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में आर एस एस के मुखिया मोहन भागवत की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि अगर गाँधी जी होते तो इस बात से बहुत खुश होते कि गुजरात के हर गाँव में बिजली पंहुच चुकी है .मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि महात्मा गाँधी की मूल किताबों को पढने की ज़रुरत है.संक्षिप्त संस्करण पढने से पूरा ज्ञान नहीं मिलता. हालांकि महात्मा गाँधी का जीवन और काम ऐसा है जिसकी कसौटी पर कसने पर नरेंद्र मोदी का हर आचरण फेल हो जाएगा लेकिन आर एस एस और बीजेपी के इतिहास में किसी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के के न होने के दर्द को झेल रहे संघी संगठनों को महात्मा गाँधी को अपना लेने की जल्दी पड़ी रहती है . महात्मा गाँधी की पार्टी , कांग्रेस के लोग आजकल एक अन्य गाँधी को महान बनाने के अभियान में लगे रहते हैं इसलिए भी आर एस एस को महात्मा गाँधी की विरासत को अपना लेने में आसानी होती नज़र आने लगी है . यह शायद इसलिए होता है कि हर संगठन को अपने इतिहास में ऐसे लोगों की ज़रुरत पड़ती है जिनके काम पर गर्व किया जा सके. आर एस एस के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके ऊपर आज़ादी की लड़ाई के हवाले से गर्व किया जा सके. उनकी स्थापना 1925 में हुई थी. इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि आर एस एस की स्थापना अंग्रेजों के आशीर्वाद से हुई थी और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1920 के आन्दोलन में जो हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम हुई थी ,उसी को तोड़ने के लिए इस संगठन की स्थापना करवाई गयी थी. आर एस एस की विचारधारा वी डी सावरकर की किताब, " हिंदुत्व " को आधार मानती है . यह किताब भी सावरकर ने आर एस एस की स्थापना के एक साल पहले लिखी थी . आर एस एस के संस्थापक डॉ हेडगेवार ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व वाले 1920 के आन्दोलन में में हिस्सा लिया था और जेल भी गए थे .कलकत्ता में अपनी डाक्टरी की पढाई के दौरान उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया था लेकिन जब वे वी डी सावरकर के संपर्क में आये तो उनकी हिन्दुत्व की विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए और राजनीतिक हिंदुत्व के ज़रिये सत्ता हासिल करने की सावरकर की कोशिश के साथ चल पड़े. . इटली के फासिस्ट राजनीतिक चिन्तक ,माज़िनी की किताब " न्यू इटली "के बहुत सारे तर्क सावरकर की किताब 'हिंदुत्व " में मौजूद . जानकार कहते हैं कि जब 1920 में अंग्रेजों ने सावरकर को माफी दी थी तो उनसे एक अंडरटेकिंग लिखवा ली थी कि वे माफी मिलने के बाद ब्रिटिश इम्पायर के हित में ही काम करेगें . भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता को खंडित करना ऐसा ही एक काम था . लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध तक बात बदल चुकी थी . आर एस एस के लोग देश में चल रही आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे . हाँ अंग्रेजों का कोई विरोध भी नहीं कर रहे थे. जबकि महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरा देश आज़ादी की बात कर रहा था. जिन्ना के साथी और आर एस एस वाले गाँधी के आन्दोलन के खिलाफ थे. 1930 और 1940 के दशक भारत की आज़ादी के लिहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. इस दौर में आज़ादी के पक्षधर सभी नेता जेलों में थे लेकिन मुस्लिम लीग के जिन्ना के सभी साथी और आर एस एस के एम एस गोलवलकर और उनके सभी साथी एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए. ज़ाहिर है कि आर एस एस और उसकी राजनीति के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए आज़ादी के लड़ाई में अपने हीरो तलाशना बहुत ही मुश्किल काम है . महात्मा गाँधी की विरासत को अपनाने की कोशिश इसी समस्या के हल के रूप में की जाती है . लेकिन बात बनती नहीं क्योंकि जैसे ही आर एस एस वाले महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश करते हैं, कहीं से कोई आदमी आर एस एस के तत्कालीन सर संघचालक , माधव सदाशिव गोलवलकर की नागपुर के भारत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित किताब, " वी ,आर अवर नेशनहुड डिफाइंड " के 1939 संस्करण के पृष्ठ 37 का अनुवाद छाप देता है जिसमें श्री गोलवलकर ने लिखा है कि हिटलर एक महान व्यक्ति है और उसके काम से हिन्दुस्तान को बहुत कुछ सीखना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए . ज़ाहिर है कि दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में हिटलर के प्रशंसकों को अपना पूर्वज बताकर कोई भी गर्व नहीं कर सकता . महात्मा गाँधी को अपनाने की नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की कोशिश को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. आर एस एस ने इसके पहले भी इस तरह की कोशिश की है . एक बार तो सरदार भगत सिंह को ही अपना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन जब पता लगा कि सरदार भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे तो वह कार्यक्रम बंद किया गया . वी.डी. सावरकर को आजादी की लड़ाई का हीरो बनाने की कोशिश की गई, जब संघ परिवार की केंद्र में सरकार बनी तो सावरकर की तस्वीर संसद के सेंट्रल हाल में लगाने में सफलता भी हासिल की गई लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि 1910 तक के सावरकर और ब्रिटिश साम्राज्य से मांगी गई माफी के बाद आजाद हुए सावरकर में बहुत फर्क है और पब्लिक तो सब जानती है.सावरकर को राष्ट्रीय हीरो बनाने की बीजेपी की कोशिश मुंह के बल गिरी . इस अभियान का नुकसान बीजेपी को बहुत हुआ क्योंकि जो लोग नहीं भी जानते थे, उन्हें पता लग गया कि वी.डी. सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी और ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा करने का वचन दिया था . जब संसद में सावरकर की तस्वीर लगाने के मामले पर एन.डी.ए. सरकार की पूरी तरह से दुर्दशा हो गई तो सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश शुरू की गई. वैसे सरदार पटेल को अपनाने की आर.एस.एस. की हिम्मत की दाद देनी पडे़गी क्योंकि आर.एस.एस. को अपमानित करने वालों की अगर कोई लिस्ट बने तो उसमें सरदार पटेल का नाम सबसे ऊपर आएगा .सरदार पटेल ने ही महात्मा गांधी की हत्या वाले केस में आर.एस.एस. पर पाबंदी लगाई थी और उसके मुखिया गोलवलकर को गिरफ्तार करवाया था . जब हत्या में गोलवलकर का रोल सिद्ध नहीं हो सका तो उन्हें छोड़ देना चाहिए था लेकिन सरदार ने कहा कि तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक वह अंडरटेकिंग न दें. आर एस एस ने एक बार गुजराती होने के हवाले से महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश शुरू कर दी है . महात्मा गाँधी आज दुनिया भर में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं , उन्हें गुजरात की सीमा में सीमित करना बहुत ही संकीर्णता होगी

गोधरा ट्रेन हादसे की सी बी आई जांच की मांग , फैसले के खिलाफ माहौल बनना शुरू

शेष नारायण सिंह

गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बारे में जो फैसला आया है उससे सिविल सोसाइटी के लोग बहुत नाराज़ हैं मुंबई के विद्वान् और धर्मनिरपेक्ष चिन्तक, असगर अली इंजीनियर ने कहा है कि केस की जांच सही तरीके से नहीं हुई है लिहाज़ा इसकी जांच सी बी आई से करवाई जाए . अनहद की संयोजक और गुजरात में मुसलमानों को न्याय दिलवाने के लिए बड़े पैमाने पर सक्रिय ,शबनम हाशमी ने कहा है कि कि गुजरात पुलिस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से तैनात सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अगुवाई में एस आई टी ने जो जांच की है वह गड़बड़ है ,मामले की जांच सी बी आई से करवाई जानी चाहिए क्योंकि इस मामले में राघवन कमेटी ने भी एक तरह से गुजरात पुलिस की बात को ही सही ठहराकर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म को पूरा कर दिया है . उनका आरोप है कि राघवन ने इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की है . उनका कहना है कि निष्पक्ष जांच के बाद हो सकता है इस मामले की साज़िश में प्रवीण तोगड़िया ही शामिल पाए जाँए.

फरवरी २००२ में अयोध्या से वापस अहमदाबाद जाती हुई साबरमती एक्सप्रेस के एस-६ कोच में आग लग गयी थी और उसमें सवार सभी लोग मारे गए थे.गुजरात के पंचमहल जिले के गोधरा जंक्शन के पास यह हादसा हुआ था. एक ख़ास राजनीतिक बिरादरी के लोगों ने गोधरा कस्बे के मुसलमानों पर तुरंत आरोप लगाना शुरू कर दिया और भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार गुजरात के मुसलमानों ने झेला . ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बाद गुजरात के मुसलमानों पर भारी कहर बरपा हुआ . अब नौ साल बाद गोधरा का फैसला आया है .एक डिब्बे में आग लगाने के आरोप में पुलिस ने ९० से ज्यादा लोगों को अभियुक्त बनाया था जिसमें से अदालत ने ६३ लोगों को बरी कर दिया . ३१ लोगों को दोषी पाया गया था. अब सज़ा का फैसला आया है कि अभियुक्तों में से ११ लोगों को फांसी होगी और २० लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गयी है ..जानकार बताते हैं कि किसी भी मामले में ११ लोगों को फांसी की सज़ा देने का यह फैसला अपने आप में एक ख़ास घटना है . आम तौर पर इतने ज्यादा लोगों को फांसी की सज़ा नहीं होती. बहरहाल मामला अब अपील में जाएगा . विश्व हिन्दू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने जिन ६३ लोगों को बरी किया है , वह गलत है . उसके खिलाफ अपील की जायेगी.जिन लोगों को फांसी दी गयी है वह तो ठीक है लेकिन जिन्हें आजीवन कारावास की सज़ा मिली है,उसके खिलाफ भी अपील की जायेगी.और सब को फांसी दिलाई जाईए . प्रवीण तोगड़िया की बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत है.वह गुजरात की वर्तमान सरकार की विचारधारा के बहुत करीबी हैं और गुजरात के ज़्यादातर मामलों में उनकी राय का मह्त्व रहता है .

साबरमती एक्सप्रेस के एस -६ कोच में लगी आग एक दुखद घटना थी . अगर उसमें किसी साज़िश का पता लगता है तो वह और भी दुखद है . लेकिन गोधरा के अपराध के लिए किसी एक समुदाय को ज़िम्मेदार मानकर ,उसके लोगों को घेर घेर कर मारना और भी दुखद है . आने वाली नस्लें इस सारे काम के लिए उन लोगों को माफ़ नहीं करेगीं , जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. इसलिए गोधरा और उसके बाद हुए नरसंहार के हर मामले की बहुत ही गंभीरता से जांच होनी चाहिए थी . लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि गोधरा में ट्रेन में लगी आग की जांच शुरू से ही शक़ के दायरे में रही है. गुजरात पुलिस की जांच पर पीड़ितों को और अभियुक्तों को भरोसा नहीं था . न्याय की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट में फ़रियाद की गयी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मार्च २००८ में विशेष जांच टीम बना दी गयी जिसका मुखिया सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन को बनाया गया . राघवन ने शुरू में ही एक ऐसा फैसला ले लिया जिसकी वजह से बहुत ज्यादा हो हल्ला मच गया .उन्होंने नोएल परमार नाम के उस पुलिस अधिकारी को मुख्य जांच अधिकारी बना दिया कथित रूप से जिसके पक्षपात पूर्ण रवैय्ये की वजह से लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की गुहार की थी . बाद में उसे हटा दिया गया लेकिन उसकी जगह पर उसी परमार के एक ख़ास आदमी को रख लिया . मोटे तौर पर राघवन कमेटी ने गुजरात पुलिस की जांच को ही आगे बढ़ाया . सच्चाई यह है कि वे महीने में तीन बार गुजरात जाते थे और गुजरात पुलिस के अधिकारियों को ही जांच में इस्तेमाल करते थे . मुसलमानों और सामाजिक संगठनों ने कई बार मांग की कि गुजरात पुलिस के बाहर के लोगों को जांच के काम में लगाया जाय लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब गोधरा में ट्रेन में लगी आग के मामले में साज़िश की बात करन एवालों के खिलाफ माहौल बन रहा है और उम्मीद है कि बहुत सारे और मामलों की तरह इस मामले की भी दोबारा जांच होगी और फिर उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष जांच और उसके बाद मिलने वाले न्याय से संतुष्ट हो जायेगें.