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Thursday, March 20, 2014

अगर राजनेताओं का ढिंढोरची बना तो कहीं का नहीं रहेगा मीडिया


शेष नारायण सिंह 

लोकसभा चुनाव २०१४ में राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का भविष्य दांव पर लगा हुआ है इसके साथ साथ बहुत कुछ  कसौटी पर है , बहुत सारे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की परीक्षा हो रही है . इस चुनाव में सबसे ज़्यादा कठिन परीक्षा से मीडिया को गुजरना पड़ रहा है .सभी पार्टियां मीडिया पर उनके विरोधी का पस्ख लेने के आरोप लगा रही हैं . इस बार राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कई राजनीतिक पार्टियों के बारे में कहा जा रहा है कि वे मीडिया की देन हैं . आम आदमी पार्टी के बारे में तो सभी एकमत हैं कि उसे मीडिया ने ही बनाया है . लेकिन अब मीडिया से सबसे ज्यादा नाराज़ भी आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो ही हैं . वे कई बार कह चुके हैं कि मीडिया बिक चुका है . बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी की हवा बनाने में भी मीडिया की खासी भूमिका है . उनकी पार्टी के नेता आम तौर पार मीडिया  को अपना मित्र  मानते हैं . लेकिन अगर कहीं किसी बहस में कोई पत्रकार उनकी पार्टी के स्थापित मानदंडों का विरोध कर दे तो उसका विरोध तो करते ही हैं ,कई बार फटकारने भी लगते हैं . कांग्रेस के नेता आम तौर पर मीडिया के खिलाफ बोलते रहते हैं . उनका आरोप रहता है कि मीडिया के ज़्यादातर लोग उनके खिलाफ लामबंद हो गए  हैं और कांग्रेस की मौजूदा स्थति में मीडिया के  विरोध की खासी  भूमिका है . हालांकि ऊपर लिखी बातों में पूरी तरह से कुछ भी सच नहीं है  लेकिन सारी ही बातें आंशिक रूप से सच हैं . इस बात में दो राय नहीं  है कि इस चुनाव में मीडिया भी कसौटी पर है और यह लगभग तय है कि इन चुनावों के बाद सभी पार्टियों की शक्ल बदली हुयी होगी और मीडिया की हालत भी निश्चित रूप से बदल जायेगी .
आज से करीब बीस साल पहले जब आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो वह हर क्षेत्र में देखा गया . मीडिया भी  उस से अछूता नहीं रह गया . मीडिया संस्थाओं के नए मालिकों का प्रादुर्भाव हुआ , पुराने मालिकों ने नए नए तरीके से काम करना शुरू कर दिया . देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी के मालिक ने तो साफ़ कह दिया कि वे तो विज्ञापन के लिए अखबार निकालते हैं ,उसमें ख़बरें भी डाल दी जाती हैं . बहुत सारे मालिकों ने यह कहा नहीं लेकिन सभी कहने लगे कि धंधा तो करना ही है.  इस दौर में बहुत सारे ऐसे पत्रकार भी पैदा हो गए जो निष्पक्षता को भुलाकर कर  निजी एजेंडा की पैरवी में  लग गए. एक बहुत बड़े चैनल के मुख्य सम्पादक और अब एक पार्टी के उम्मीदवार हर सेमीनार में  टेलिविज़न चलाने के लिए लगने वाले पैसे का ज़िक्र करते थे और उसको इकट्ठा करने के लिए पत्रकारों की भूमिका में बदलाव के पैरोकारों में सबसे आगे खड़े नज़र आते थे . इस अभियान में उनको कई बार सही पत्रकारों के गुस्से का सामना भी करना पडा .जब अन्ना हजारे का रामलीला मैदान वाला शो हुआ तो उन पत्रकार महोदय की अजीब दशा थी . उनकी पूरी कायनात अन्नामय हो गयी थी . अब  जाकर पता चला है कि वे एक निश्चित योजना के अनुसार काम कर  रहे थे . आज वे उस दौर में अन्ना हजारे के  मुख्य शिष्य रहे व्यक्ति की पार्टी के नेता हैं . इस तरह की घटनाओं से पत्रकारिता की  निष्पक्षता की संस्था के रूप में पहचान  को  नुक्सान होता है .मौजूदा चुनाव में यह ख़तरा सबसे ज़्यादा है और इससे बचना पत्राकारिता की सबसे बड़ी चुनौती है .

टेलिविज़न आज पत्रकारिता का सबसे प्रमुख माध्यम है . चुनावों के दौरान  वह और भी ख़ास हो जाता है .वहीं पत्रकार की सबसे कठिन परीक्षा होती  है . आजकल टेलिविज़न में पत्रकारों के कई रूप देखने को मिल रहे हैं . एक तो रिपोर्टर  का है जिसमें उसको  उन बातों को भी पूरी ईमानदारी , निष्पक्षता और निष्ठुरता से बताना होता है जो सच हैं , उसे सच के प्रति प्रतिबद्ध रहना होता है ठीक उसी तरह जैसे भीष्म पितामह हस्तिनापुर के सिंहासन के साथ  प्रतिबद्ध थे. उसको ऐसी  बातों को भी रिपोर्ट करना होता है जिनको वह पसंद नहीं करता . दूसरा  रूप विश्लेषक का होता है जहां उसको  स्थिति की स्पष्ट व्याख्या करनी होती है . इस व्यख्या में भी उसको अपनी  प्रतिबद्धताओं से बचना होता है .और अंतिम रूप टिप्पणीकार  का है जहा पत्रकार अपने  दृष्टिकोण को भी  रख सकता है और उसकी तार्किक व्याख्या कर सकता है .. यह सारे काम बहुत  ही कठिन हैं और इनका पालन करना इस चुनाव में मीडिया के लोगों का सबसे कठिन लक्ष्य है , अब तक के संकेतों से साफ़ है कि मीडिया घरानों के मालिक अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से ही काम करने वाले है . पत्रकार की अपनी निष्पक्षता  कहाँ तक  पब्लिक डोमेन में आ पाती है यह देखना दिलचस्प होगा.

मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती पेड न्यूज का संकट है . पेड न्यूज़ के ज़्यादातर  मामलों में मालिक लोग खुद ही शामिल रहते हैं लेकिन काम तो पत्रकार के ज़रिये होता है इसलिए असली अग्निपरीक्षा पत्रकारिता के पेशे में लगे हुए लोगों की है .पेड न्यूज़ के कारण आज मीडिया की विश्वसनीयता पर संकट आ गया है। मीडिया पैसे लेकर खबर छापकर अपने पाठकों के विश्वास के साथ खेल रहा है और पेड न्यूज के कारण मीडियाकर्मियों की चारों तरफ आलोचना हो रही है। २००९ के लोकसभा चुनावों के दौरान यह संकट बहुत मुखर रूप से सामने आया था  .अखबारों के मालिक पैसे लेकर विज्ञापनों को समाचार की शक्ल में छापने लगे .. प्रभाष जोशीपी.साईंनाथ , परंजय गुहा ठाकुरता और विपुल मुद्गल ने इसकी आलोचना का अभियान चलाया  . प्रेस काउन्सिल ने भी पेड न्यूज की विवेचना करने के लिये  पराजंय गुहा ठाकुरता और के.श्रीनिवास रेड्डी की कमेटी बनाकर एक रिपोर्ट तैयार की जिसको आज के संदर्भ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जा सकता है. सरकारी तौर पर भी इस पर चिंता प्रकट की गयी और प्रेस कौंसिल ने पेड न्यूज को रोकने के उपाय किये . प्रेस कौंसिल ने बताया कि  कोई समाचार या विश्लेषण अगर पैसे या किसी और तरफादारी के बदले किसी भी मीडिया में जगह पाता है तो उसे पेड न्यूज की श्रेणी में रखा जाएगा ।प्रेस कौंसिल के इस विवेचन के बाद पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर तरह तरह के सवाल उठने लगे . सरकार भी सक्रिय हो गयी .और पेड न्यूज़ पर चुनाव आयोग की नज़र भी पड़ गयी. चुनाव आयोग ने पेड न्यूज के केस में २०११ में  पहली कार्रवाई की और उत्तर प्रदेश से विधायक रहीं उमलेश यादव को तीन साल के लिए अयोग्य करार दिया। आयोग ने महिला विधायक उमलेश यादव के खिलाफ यह कार्रवाई दो हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों पर हुए चुनाव खर्च के बारे में गलत बयान देने के लिए की . उमलेश यादव ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 के तहत अप्रैल 2007 में उत्तर प्रदेश में बिसौली के लिए हुए विधानसभा चुनाव के दौरान हुए चुनावी खर्च में अनियमितता की थी और अखबारों को धन देकर अपने पक्ष में ख़बरें छपवाई थीं . उत्तर प्रदेश की इस घटना के बाद और भी घटनाएं  हुईं .  लोगों को सज़ा भी मिली लेकिन समस्या बद से बदतर होती जा रही है . आज मीडियाकर्मी के ऊपर चारों तरफ से दबाव है और मीडिया और संचार माध्यामों की कृपा से ही पूरी दुनिया बहुत छोटी हो गयी है .मार्शल मैक्लुहान ने कहा  था कि एक दिन आएगा जब सारी दुनिया एक गाँव हो जायेगी , वह होता दिख रहा  है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि उस गाँव के लिए आचरण के नए मानदंड तय किये जाएँ . यह काम मीडिया वालों  को ही करना  है लेकिन उदारीकरण के चलते सब कुछ गड्डमड्ड हो गया है .इसके चलते आम आदमी की भावनाओं को कंट्रोल किया जा रहा  है .सब कुछ एक बाज़ार की शक्ल में देखा जा रहा है .यह बाज़ार पूंजी के ,मालिकों  और मीडिया संस्थानों को  विचारधारा की शक्ति को काबू करने की ताकत देता है .पश्चिमी दुनिया में  बाजार की ताक़त  को विचारधारा की स्वतंत्रता के बराबर माना जाता है लेकिन बाजार का गुप्त हाथ नियंत्रण के औजार के रुप में भी इस्तेमाल किया जाता  है .
आज भारत में यही पूंजी काम कर रही है और मीडिया पार उसके कंट्रोल के चलते ऐसे ऐसे राजनीतिक अजूबे पैदा हो रहे हैं जिनका भारत के भविष्य पर  क्या असर पडेगा कहना मुश्किल  है . राजनीतिक आचरण का उद्देश्य हमेशा से ज्यादा से ज़्यादा लोगों की नैतिक और सामूहिक इच्छाओं  को पूरा करना माना जाता रहा है .  दुनिया भर में जितने भी इतिहास को दिशा देने वाले आन्दोलन हुए हैं  उनमें आम आदमी सडकों पर उतर कर शामिल हुआ है . महात्मा गांधी का भारत की आज़ादी के लिए हुआ आन्दोलन इसका सबसे अहम उदाहारण है . अमरीका का महान मार्च  हो या फ्रांसीसी क्रान्ति ,, माओ का चीन की आज़ादी के लिए हुआ मार्च हो या लेनिन की बोल्शेविक क्रान्ति ,हर ऐतिहासिक  परिवर्तन के दौर में जनता सडकों पर जाकर शामिल हई है . लेकिन अजीब बात  है कि इस बार जनता  कहीं शामिल नहीं है , मीडिया के ज़रिये भारत में एक ऐसे परिवर्तन की शुरुआत करने की कोशिश की जा रही है जिसके बाद सारी व्यवस्था बदल जायेगी . व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर किया जा रहा यह वायदा कभी कार्यक्रम की तरह लगता है और कभी यह धमकी के रूप में प्रयोग होता है . यहाँ सब अब सार्वजनिक डोमेन में है . भारत की आज़ादी की मूल मान्यताओं , लिबरल डेमोक्रेसी को भी बदल डालने की कोशिश की जा रही है , मीडिया के दत्तक पुत्र की हैसियत  रखने वाले आम आदमी पार्टी के नेता  व्यवस्था पारिवर्तन के नाम पर संविधान को ही बेकार साबित करने के चक्कर  में हैं . उनकी  प्रतिद्वंदी पार्टी बीजेपी है जो संसदीय लोकतंत्र के नेहरू माडल को बदल कर गुजरात माडल लगाने की सोच रही है . पता नहीं क्या होने वाला है. देश का राजनीतिक भविष्य कसौटी पर है लेकिन उसके साथ साथ मीडिया का भविष्य भी कसौटी पर है . लगता है कि इस चुनाव के बाद यह तय हो जाएगा की मीडिया सामाजिक बदलाव की ताक़तों का निगहबान दस्ता रहेगा या वह सत्ता पर काबिज़ राजनीतिक ताक़तों का ढिंढोरा पीटने वालों में शामिल होने का खतरा तो नहीं उठा रहा  है .


Monday, July 23, 2012

महिलाओं की अस्मिता का निगहबान बन चुके मीडिया का सम्मान किया जाना चाहिए



शेष नारायण सिंह 

गुवाहाटी में एक लड़की के साथ जो हुआ वह बहुत बुरा  हुआ. आज सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से अपने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपमानित किया  जाता है .  टेलिविज़न और अखबारों में खबर के आ जाने के बाद ऐसा माहौल बना कि गुवाहाटी की घटना  के बारे में सबको मालूम  हो गया . लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस तरह की घटनाएं देश के हर कोने में होती रहती हैं . ज्यादातर मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती.  चर्चा तब होती है जब यह घटनाएं मीडिया में चर्चा का विषय बन जाती हैं . गुवाहाटी की घटना के साथ बिलकुल यही हुआ. देश के  लगभग सभी महत्वपूर्ण टेलिविज़न समाचार चैनलों ने  इस खबर को न केवल चलाया बल्कि कुछ प्रभावशाली चैनलों ने तो इस  विषय पर घंटों की चर्चा का कार्यक्रम भी प्रसारित किया . नतीजा सामने है . अब सबको मालूम है कि किस तरह से   एक समाज के रूप में हम असंवेदनशील हैं . घटना की जांच करने गयी महिला आयोग की एक प्रतिनधि और कभी दिल्ली विश्वविद्यालय की  नेता रही महिला ने तो वहां जाकर अपनी छवि मांजने की कोशिश की . इस चक्कर में पीड़ित लडकी का नाम भी उन्होंने  सार्वजनिक कर दिया . ऐसा नहीं करना चाहिए  था. महिलाओं के प्रति एक समाज के रूप में हमारा दृष्टिकोण आज पब्लिक डोमेन में है और इसके लिए सबसे ज्यादा  सम्मान का पात्र  मीडिया ही है .
आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभा भी रहा है . उसकी वजह से ही देश में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को जनता के सामने लाया जा  रहा है और सरकार में भी किसी स्तर पर ज़िम्मेदारी का भाव जग रहा है  . लेकिन एक बात स्वीकार करने में मीडिया कर्मी के रूप में हमें संकोच नहीं होना चाहिए . अक्सर देखा जा रहा है कि जब एक बात किसी मीडिया कंपनी या किसी मेहनती पत्रकार की कोशिश से  खबरों की दुनिया में आ जाती है तो बहुत सारे पत्रकार उसी खबर को आधार बनाकर खबरें लिखना शुरू कर देते हैं . पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है कि जब भी कोई खबर किसी भी रिपोर्टर की जानकारी में आती है तो वह उस व्यक्ति का पक्ष ज़रूर लेगा जिसके बारे में खबर है . कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति के बारे में खबर है उस तक पंहुचना ही बहुत मुश्किल होता है .  उस हालत में उस व्यक्ति से सम्बंधित जो लोग या जो भी संगठन हों उनसे जानकारी ली  जा सकती है .लेकिन इस काम में एक दिक्कत है . अगर वह  व्यक्ति प्रभावशाली हुआ  और  खबर उसके खिलाफ जा रही हो तो वह खबर को रोकने की कोशिश करवा सकता है . ज़ाहिर है कि उस से बात करने पर खबर दब सकती है .इस हालत में रिपोर्टर के पास इतने सबूत होने चाहिए कि वह ज़रुरत पड़ने पर अपनी खबर की सत्यता को साबित कर सके . उसके पास कोई दस्तावेज़ होना चाहिए, कोई टेप या कोई वीडियो  भी बतौर सबूत हो तो काफी है . लेकिन अगर किसी के  बयान के आधार पर कोई खबर लिखी जा रही है  तो उसके बयान की लिखित प्रति, उसका टेप किया बयान  या कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी में दिया गया उसका बयान होना ज़रूरी है . अगर ऐसा न किया गया तो पत्रकारिता के पेशे का अपमान होता है और आने वाले समय में पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल  उठ खड़े होते हैं . पत्रकार को किसी भी हालत में सुनी सुनायी बातों को  आधार बनाकर खबर नहीं लिखना चाहिए . दुर्भाग्य की बात यह है कि गुवाहाटी की घटना के बारे में इस तरह की पत्रकारिता हो गयी है . 
अभी एक दिन पहले एक बड़े अखबार में खबर छपी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष , ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे अगर छेड़खानी जैसे अपराधों से बचना चाहती हैं तो उन्हें ठीक से कपडे पहनना  चाहिए .  बात बहुत ही अजीब थी . मैंने तय किया कि इन देवी जी के इस बयान के  आधार पर ही इस बार  अपने इस कालम में महिलाओं की दुर्दशा की चर्चा की जायेगी . बड़े अखबार की खबर के हवाले से जब उनसे बात करने की कोशिश की गयी तो वे गुवाहाटी में थीं लेकिन  थोड़ी कोशिश के बाद उनसे संपर्क हो गया . जब उनसे बताया कि आप के ठीक से कपडे पहनने वाले बयान के बारे में बात करना है तो उन्होंने जो कहा  वह बिलकुल उल्टी बात थी. उन्होंने कहा कि कभी भी उन्होंने वह बयान नहीं दिया है जो एक अंग्रेज़ी अखबार में छपा है. उन्होंने सूचित किया कि वे  दिल्ली के अपने  दफ्तर को हिदायत दे चुकी हैं कि वे  के बयान जारी करके यह कहें कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने सम्बंधित अखबार या उसके रिपोर्टर से कोई बात नहीं की है और बयान पूरी तरह  से फर्जी है. उनके इस बयान के बाद भारत सरकार की एक  बड़ी अधिकारी को कटघरे में लेने की अपनी इच्छा पर घड़ों पानी पड़ गया लेकिन यह सुकून ज़रूर हुआ कि एक गलत खबर को आधार बनाकर अपनी बात कहने से बच गए . लेकिन आज सुबह के अखबारों को देखने से अपने पत्रकारिता पेशे में लगे हुए लोगों की कार्यप्रणाली से निराशा जरूर हुई . राष्ट्रीय महिला आयोग के दफतर ने शायद बयान जारी किया होगा क्योंकि उस बड़े अखबार में आज उस खबर का फालो अप नहीं है . लेकिन आज एक अन्य बड़े अखबार में उस खबर का फालो अप छपा है . जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष की लानत मलानत की गयी है.  दिल्ली में रहने वाली कुछ महिला नेताओं से बातचीत की गयी है और उनके बयान में महिला आयोग की कारस्तानी की निंदा की गयी है .जिन महिला नेताओं के बयान छपे हैं उनमें से कोई भी महिला आयोग की अध्यक्ष या उस से भी बड़े पद पर विराजने लायक हैं . इसलिए उनकी  बात समझ  में आती है .उन्हें चाहिए कि वे राष्टीय महिला आयोग की  मौजूदा  अध्यक्ष को बिलकुल बेकार की अधिकारी साबित करती रहें जिससे जब अगली बार उस पद पर नियुक्ति की बात  आये तो अन्य लोगों के साथ इनका नाम भी आये . लेकिन क्या  हमको भी यह शोभा देता है कि एक गलत खबर का फालो अप चलायें . पत्रकारिता की नैतिकता के पहले  अध्याय में ही लिखा  है कि खबर ऐसी हो जिसकी सत्यता की पूरी तरह से जांच की जा सके और जब सम्बंधित व्यक्ति या उसका दफ्तर ऐलानियाँ बयान दे रहा है कि वह बयान उनका नहीं है तो उस बयान के आधार पर खबरों का  पूरा  ताम झाम बनाना अनैतिक है .बहर हाल नतीजा यह हुआ कि यह कालम जो राष्ट्रीय माहिला आयोग की अध्यक्ष के खिलाफ एक सख्त टिप्पणी के रूप में सोचा गया था , औंधे मुंह गिर  पडा . अब उनके खिलाफ कभी फिर टिप्पणी  लिखी जायेगी लेकिन आज तो अपने पेशे की ज़िम्मेदारी पर ही कुछ बात करना ठीक रहेगा.
 गुवाहाटी की खबर के हवाले से मीडिया की भूमिका पर बात करना बहुत ही ज़रूरी है . धीरे धीरे खबर आ रही है कि उस घटना के लिए जो अपराधी छेड़खानी कर रहे थे , उनको सेट करने का काम एक टी वी पत्रकार ने ही  किया था.उस टी वी चैनल के मुख्य संपादक के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है. ज़ाहिर है  कि फर्जी तरीके से खबर बनाने के लिए  उस टी वी चैनल  ने इस तरह का आयोजन किया . इस प्रवृत्ति की निंदा की जानी चाहिए  लेकिन उस टी वी  चैनल की मिलीभगत साबित हो जाने के बाद गुवाहाटी की घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती .बल्कि यह ज़रूरी हो जाता है कि छेड़खानी कर रहे अपराधियों के साथ साथ उन पत्रकारों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाए जिन्होंने इस तरह का आयोजन करके एक लडकी की अस्मिता की धज्जियां उड़ाईं.इस बात की पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पार्टी गुवाहाटी के उस गैरजिम्मेदार  पत्रकार के हवाले से सभी खबरों की सत्यता को सवालों के घेरे में लेने  की कोशिश करेगें . लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए .  महिलाओं सहित अपने सभी नागरिकों के सम्मान की  रक्षा करना  सरकार का कर्तव्य  है और सरकार को उसे करते ही रहना चाहिए . देखा यह गया है कि  सरकार में बैठे लोग खबर की सच्चाई पर सवाल उठाने का मामूली सा मौक़ा हाथ आते ही खबर के  विषय को भूल जाते हैं . सत्ताधारी पार्टी के नेता बयानों की झड़ी लगा देते हैं और मुद्दा कहीं दफ़न हो जाता है . मीडिया को कोशिश करना चाहिए कि गुवाहाटी की घटना के साथ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के बारे में जो राष्ट्रीय बहस चल पड़ी है ,उसे उसके  अंजाम  तक पंहुचाएं.  

गुवाहाटी की घटना के साथ ही उत्तर प्रदेश के बागपत की बातें भी हो रही हैं . वहां के पुरुषों ने एक पंचायत करके अपने घरों की महिलाओं को सलाह दिया है कि वे दिन ढले घरों से बाहर न निकलें, सेल फोन का इस्तेमाल न करें और प्रेम  विवाह न करें . यानी उस पंचायत ने अब तक हुए विकास को उल्टी दिशा में दौडाने की कोशिश है . जहां की यह घटना है  वह देश की राजधानी से लगा हुआ इलाका है .  दिल्ली के इतने करीब हो कर भी महिलाओं के प्रति इतना आदिम रवैया बहुत ही अजीब  है . उस से भी अजीब है कि कई पार्टियों के राजनीतिक नेता महिलाओं के खिलाफ इस तरह का रुख रखने वालों के साथ खड़े पाए जा  रहे हैं . ज़ाहिर है एक समाज के रूप में हम कहीं फेल  हो रहे हैं . बागपत वाले मामले में मीडिया का रुख शानदार है और हर वह नेता तो मध्यकालीन सामंती सोच  के प्रभाव में आकर बयान दे रहा है  उसकी पोल लगातार खुल रही है .आज से करीब ३५ साल पहले भी इसी बागपत में माया त्यागी नाम की एक महिला के साथ पुरुष प्रधान मर्दवादी  सोच वालों ने अत्याचार किया था . उस वक़्त भी मीडिया के चलते ही वह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था. इतने वर्षों बाद भी आज बागपत और दिल्ली के आस पास के अन्य इलाकों में महिलाओं के प्रति जो रवैया है वह क्यों नहीं बदल रहा है , यह चिंता की बात  है और इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए . लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो  इस बात पर तब तक ध्यान नहीं देगें जब तक कि उनकी असफलताओं को मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक न किया  जाए.   पिछले कई वर्षों में यही हुआ है . जब १४ फरवरी के आस पास लड़कियों की अस्मिता पर बंगलोर में हमला हुआ था , उस वक़्त भी मीडिया के हस्तक्षेप से ही  अपराधी पकडे  गए थे . इसलिए साफ़ लगने लगा है कि इस देश में महिलाओं  के सम्मान की रक्षा  के काम में सबसे अहम भूमिका मीडिया की ही रहेगी .

Sunday, April 29, 2012

मीडिया को पूंजीवादी ताक़तों का एजेंट नहीं बनना चाहिए --अतुल अनजान



शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली,२८ अप्रैल.अपना एकछत्र राज कायम करने के लिए साम्राज्यवादी ताक़तें हर सीमा पार कर रही हैं . संसदीय लोकतंत्र की सीमाएं पार की जा रही हैं और संसदीय लोकशाही की संस्थाओं को बदनाम किया जा रहा है . पूंजीवाद की एजेंट ताक़तों की कोशिश है कि संसदीय लोकतंत्र की हर सम्माननीय संस्था को बदनाम किया जाए और लोकतंत्र को दफ़न करके ऐसी सत्ता व्यवस्था कायम की जाए जिस से साम्राज्यवादी विस्तारवादी शक्तियों को देश की सत्ता को तैनात करने में आसानी हो क्योंकि वही सत्ता तो इन ताकतों की चाकर सत्ता के रूप में काम कर सकेगी . दुर्भाग्य की बात यह है कि इस सारे काम में मीडिया की भूमिका पूंजीवादी ताक़तों के मुनीम की हो गयी है . अगर इस पर अवाम की तरफ से फ़ौरन रोक न लगाई गयी  तो देश के लोकतंत्र के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सेक्रेटरी अतुल कुमार अंजान ने आज यह बातें समाजवादी नेता स्व.गौरीशंकर राय की याद में आयोजित एक समारोह में कहीं . 

गौरी शंकर राय स्मृति समिति वालों की ओर से आज यहाँ आयोजित एक समारोह में पिछली  सदी के राजनीतिक इतिहास पर ज़ोरदार चर्चा हुई. गौरी शंकर राय की याद में उनके पुराने साथी और समाजवादी विचारक सगीर अहमद ने  स्वर्गीय राय के समर्थकों को इकठ्ठा किया था. बहुत बड़ी संख्या में लोग आये. आज़ाद हिंद फौज के कप्तान अब्बास अली आये तो जवाहर लाल नेहरू   विश्वविद्यालय के  आनंद कुमार आये. समाजवादी पार्टी के रेवती रमण सिंह आये तो किसी छोटे राज्य के एक राज्यपाल भी अपने फौजी सहायक के साथ मौजूद थे. कांग्रेस के हरिकेश बहादुर भी थे और जे डी ( यू ) के महामंत्री के सी त्यागी भी . बहर हाल भारी भीड़ के बीच लगभग  दिन भर चले कार्यक्रम में गौरी शंकर राय के करीब ५० साल के राजनीतिक जीवन के बहाने राजनीतिक मूल्यों पर चर्चा हुई और समाजवादी  लेखक मस्त राम कपूर  और कम्युनिस्ट नेता अतुल कुमार अनजान ने राजनीति के बुनियादी सवालों पर बात शुरू कर दी. ज़्यादातर नेता तो स्वर्गीय गौरी शंकर राय के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते  रहे लेकिन अतुल अनजान की  शुरुआत के बाद बहस राजनीति और मीडिया की भूमिका पर केंदित हो गयी. अतुल अनजान ने कहा कि  आज पूंजीवादी ताक़तों के एजेंट खूब सक्रिय हैं . मीडिया संगठनों पर उन्होंने लगभग पूरी तरह  से क़ब्ज़ा कर लिया है . कुछ गिने चुने अखबार बचे  हैं जो अभी भी आम आदमी के सवालों को उठा रहे हैं .योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया जा रहा है  कि समाजवाद का अब कोई मतलब नहीं रह गया है .मार्क्सवादी राजनीति अब  बेमतलब हो गयी है . दुर्भाग्य यह है कि पूंजीवादियों के कंट्रोल में चल रहे मीडिया घरानों में काम करने वाले लोग अपनी समझ को मालिक की मर्ज़ी के  हिसाब से ढाल कर काम कर रहे हैं . और किसी सेठ  के मुनीम की तरह काम कर रहे हैं , अजीब बात है कि  मोटी तनखाहें उठा रहे पत्रकार  टी आर पी की बात कर रहे हैं और कारोबार बढाने की बात करके उसे ही नई पत्रकारिता का व्याकरण बता रहे हैं . राजनीतिक बिरादरी के लोगों को  चोर और बेईमान के रूप में पेश करके राजनीति की परम्परा को बदलने की सजिश भी साथ साथ चल  रही है . भ्रष्ट राजनेता के हवाले  से पूरी राजनीतिक जमात को नाकारा साबित करने  की कोशिशभी इसी साज़िश का हिस्सा है .  
स्वर्गीय गौरी शंकर राय ने पूंजीवादी साम्राज्यवादी  राजनीतिक शक्तियों को बेनकाब करने के लिए आजीवन काम किया . अतुल अनजान ने कहा उनको याद करके आज यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि हर तरफ जनवादी ताक़तों को कमज़ोर करने की जो कोशिश चल रही है उसे नाकाम किया जाए .  

Monday, September 13, 2010

एक बार फिर पीपली लाइव बन गया दिल्ली का मीडिया

शेष नारायण सिंह

दिल्ली में बाढ़ का पानी कम होना शुरू हो गया है . यमुना नदी में इस साल अपेक्षाकृत ज्यादा पानी आ गया था . और उस ज्यादा पानी के चलते तरह तरह की चर्चाएँ शुरू हो गयी थी. इस सीज़न में ज़्यादातर नदियों में बाढ़ आती है लेकिन इस बार दिल्ली में यमुना नदी में आई बाढ़ को बहुत दिनों तक याद रखा जाएगा. उसके कई कारण हैं . सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि मानसून सीज़न के ख़त्म होते ही दिल्ली में कामनवेल्थ खेल आयोजित किये गए हैं . कुछ आलसी और गैरजिम्मेदार कांग्रेसी नेताओं की वजह से इन खेलों की तैयारी अपने समय से नहीं हो पायी है . अब तैयारियां युद्ध स्तर पर चल रही हैं और घूसजीवी अफसरों और कांग्रेसियों की चांदी है . खेलों की तैयारी से सम्बंधित सब कुछ अब जिस रफ़्तार से हांका जा रहा है, उसमें धन की कोई कीमत नहीं रह गयी है . भाई लोग जम कर लूट रहे हैं . डेंगू, स्वाइन फ़्लू, और वाइरल बुखार का ख़तरा बना हुआ है .ज़्यादातर अफसरों और नेताओं की ईमानदारी सवालों के घेरे में है और उनकी विश्वसनीयता पर तरह तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं . लेकिन इस सारी प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा सवाल मीडिया पर उठ रहा है . एक बड़े मीडिया घराने पर तो यह भी आरोप लग चुका है कि उस के अखबार ने कामनवेल्थ खेलों की पब्लिसिटी के ठेके के लिए कोशिश की थी लेकिन जब नहीं मिला तो आयोजन समिति के प्रमुख को औकात बताने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया.और कामनवेल्थ खेलों पर आरोपों की झड़ी लगा दी. मीडिया कंपनी पर आरोप इतने गंभीर पत्रकार ने अपने लेख में लगाया है कि उस मीडिया कंपनी सहित किसी के इभी हिम्मत उसका खंडन करने की नहीं है . बहर हाल आजकल टेलीविज़न के खबर देने वाले चैनलों ने बाढ़ को अपनी कवरेज के रेंज में ले लिया है . और बाढ़ का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया कि दूर दूर से लोग घबडा कर दिल्ली में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को फोन करने लगे और पूरी दुनिया में प्रचार हो गया कि दिल्ली बुरी तरह से बाढ़ की चपेट में आ गई है . लेकिन यह सच नहीं था . दिल्ली के कुछ निचले इलाकों में पानी आ गया था . वहां रहने वालों की ज़िंदगी दूभर हो गयी थी लेकिन पूरी दिल्ली बाढ़ की चपेट में हो , ऐसा कभी नहीं था . लेकिन टी वी न्यूज़ वालों ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया कि दुनिया की समझ में आ गया कि दिल्ली बाढ़ के लिहाज़ से एक खतरनाक शहर है . . इस सारे गडबडझाले में आंशिक सत्य , अर्ध सत्य और असत्य का भी सहारा लिया गया. सबसे अजीब बात तो यह थी कि दिन रात टी वी चैनलों में खबर आती रही कि हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज से पता नहीं कितने लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जाने वाला है जिसके बाद दिल्ली में हालात बहुत बिगड़ जायेगें . इस में आंशिक सत्य , अर्ध सत्य और असत्य सब कुछ है . सचाई यह है कि इन खबरों के पैदा होने के लिए जो लोग भी जिम्मेवार थे , उन्होंने होम वर्क नहीं किया था . उन्हें पता होना चाहिए था कि किसी भी बैराज से पानी छोड़ा या रोका नहीं जा सकता .बैराज बाँध की तरह ऊंचे नहीं होते .इसलिए पानी को बांधों की तरह रोका नहीं जा सकता .सकता अगर बैराज के गेट न खोले जाएँ तो पाने एअपने आप छलक कर बहने लगता है .बैराज नदी की तलहटी से नदी में बह रहे पानी की सतह पानी रोकने का इंतज़ाम है . इसलिए जब नदी में ज़रुरत से ज्यादा पानी आ जाता है तो वह अपने आप बैराज की दीवार के ऊपर बह जाता है . बैराज कोई बाँध नहीं है जिसमें पानी को रोका जा सके . जबकि बाँध में पानी को रोका भी जाता है और बाकायदा कंट्रोल किया जाता है . हथिनी कुंड के पानी की रिपोर्टिंग में यह बुनियादी गलती है . टेलिविज़न के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से जब इस विषय पर चर्चा की तो उन्होंने कहा कि आजकल रिपोर्टर बिना तैयारी के ही आ जाते हैं और अपने ज्ञान को अपडेट नहीं करते . जब उन्हें बताया गया कि यह तो आपका ही ज़िम्मा है तो बगलें झांकने लगे. अपनी टी वी पत्रकारिता के वे दिन याद आ गये जब एक अतिग्यानी और मालिक की कृपापात्र पत्रकार ने मेरे ऊपर दबाव डाल कर यह कहलवाने की कोशिश की थी कि पी एल ओ एक आतंकवादी संगठन है .किसी तरह जान बचाई थी . एक बार मुझे लगभग स्वीकार करना पड़ गया था कि चीन की राजधानी शंघाई है , बीजिंग नहीं क्योंकि इसी पत्रकार ने तर्क दिया कि उसने दोनों ही शहरों को देखा है और शंघाई बड़ा और अच्छा शहर है . . उस संकट की घड़ी में आज के एक नामी चैनल के मुखिया भी उसी न्यूज़ रूम में आला अफसर थे, और उन्होंने मेरी जान बचाई थी और कहा था कि चलो अगर शेष जी इतनी जिद कर रहे हैं तो बीजिंग को ही राजधानी मान लेते हैं . बाद में उन्होंने ही ऊपर तक बात करके मुसीबत से छुटकारा दिलवाया था .जब मैंने पीपली लाइव देखा तो मुझे यह घटना बरबस याद हो गयी क्योंकि उस फिल्म की निदेशक, भी उसी दौर में उसी न्यूज़ रूम में इस तरह के ज्ञानी पत्रकारों से मुखातिब होती रहती थी. मुराद यह है कि टी वी पत्रकारिता एक गंभीर काम है और न्यूज़ रूम में काम करने वाले सभी लोगों की जानकारी और क्षमता को मिलाकर टी वी न्यूज़ प्रस्तुत की जानी चाहिए . अगर ऐसा हो सके तो देश और समाज का बहुत भला होगा लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बार बार की गलतियों के बाद भी ऐसा नहीं हो रहा है. और एक बार फिर मीडिया गाफिल पाया गया है .कोशिश की जानी चाहिए कि टी वी के पत्रकार पीपली लाइव को हमेशा नज़र में रखें और अपने आपको मजाक का विषय न बनने दें .

Friday, June 4, 2010

मीडिया को रिटायर्ड फौजी अफसरों को महिमा मंडित नहीं करना चाहिए

शेष नारायण सिंह

जब से टेलिविज़न पर चौबीसों घंटे ख़बरों का सिलसिला शुरू हुआ है , एक अजीब प्रवृत्ति नज़र आने लगी है . शुरू तो यह एक बहुत ही मामूली तरीके से हुई थी लेकिन अब प्रवृत्ति यह खतरनाक मुकाम तक पंहुंच चुकी है. देखा गया है कि हर मसले पर पूर्व और वर्तमान फौजी अफसर अपनी राय देने लगे हैं और टेलिविज़न चैनलों पर उसे प्रमुखता से दिखाया जाने लगा है . समाचार संकलन अपने आप में एक गंभीर काम है , ज़रा सी चूक से क्या से क्या हो सकता है .टेलिविज़न के समाचार तो और भी गंभीर माने जाने चाहिए क्योंकि देखी गयी खबर का असर सुनी या पढी गयी खबर से ज्यादा होता है . इसलिए टेलिविज़न की ज़िम्मेदारी है कि वह मामले को हल्का फुल्का करके पेश करने की लालच में न पड़े. लेकिन ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है . यह लोकतंत्र और समाज के लिए ठीक नहीं है . आजकल कारगिल के युद्ध के बारे में तरह तरह की खबरें दिखाई जा रही हैं . किसी ब्रिगेडियर के साथ हुए अन्याय को केंद्र में रख कर कई टी वी चैनलों पर सेना और इतिहास से जुड़े तरह तरह के विषयों पर चर्चा की जा रही है . यह ठीक नहीं है . लोकतंत्र में बहस का महत्व है या यह कह सकते हैं कि बिना बहस के लोकतंत्र में जान ही नहीं आती लेकिन यह बहस उन मुद्दों के बारे में होनी चाहिए जो सरकारी नीति के बनाने में सहयोग कर सकें या उन पर निगरानी करने में काम आ सकें . राज काज और राजनीतिक विषयों पर बहस बहुत ज़रूरी है और उसे उत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा के नीतियों और योजनाओं को पब्लिक डोमेन में लाना राष्ट्रीय सुरक्षा से खेलना है और इसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.
खबर आई है कि कारगिल युद्ध में हेरा फेरी के आरोपी एक जनरल ने कहा है कि उस लड़ाई में भारत की जीत ही नहीं हुई थी. इस जनरल का आचरण संदेह के घेरे में आ चुका है और उसके बारे में अदालती हस्तक्षेप के बाद यह पता लग चुका है कि यह भाई हेरा फेरी का उस्ताद है . उसके दृष्टिकोण को पब्लिक डोमेन में लाने का कोई मतलब नहीं है . जहां तक कारगिल की लड़ाई की बात है , वह हमारी विदेश नीति की नाकामी का एक बड़ा उदाहरण है . भला बताइये , हमारा प्रधानमंत्री पाकिस्तान से दोस्ती बढाने के लिए सकारात्मक पहल कर रहा है और बस से लाहौर की यात्रा पर गया हुआ है और पाकिस्तानी फौज हमारे महत्वपूर्ण सैनिक ठिकानों पर क़ब्ज़ा कर रही है . और हमारी खुफिया एजेंसियों को भनक तक नहीं है . ज़ाहिर है कि उस वक़्त के कूटनीति के प्रबंधकों को दण्डित किया जाना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी पुराना फौजी मुंह उठाकर चला आये और कह दे कि जिस लड़ाई में हमारे इतने नौजवान शहीद हुए हों , वह बेकार की लड़ाई थी ., उसमें हमारी जीत ही नहीं हुई थी. यह बहुत ही गैरज़िम्मेदार बयान है और अगर कोई ऐसा आदमी कह रहा हो, जो उस लड़ाई के संचालन में बहुत ही महत्वपूर्ण पद पर रहा हो , तो और भी गंभीर बात है . हालांकि कि फौजियों को इतने गंभीर मामलों के राजनीतिक और कूटनीतिक पक्ष में शामिल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन अब बात बहस में घसीट ली गयी है तो बात को साफ़ कर देना ज़रूरी है . जहां तक कारगिल में हार जीत की बात है , निश्चित रूप से भारत ने वहां सैनिक सफलता पायी है . यह भी सही है कि उस लड़ाई में अपने बहुत से बहादुर अफसर और जवान शहीद भी हुए . लेकिन अगर उस वक़्त हमारी सेना सफल न हुई होती तो कारगिल और आसपास के इलाकों में सामरिक रूप से जिन ऊंचाइयों पर पाकिस्तानी सेना ने अपने अड्डे बना लिये थे , वह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है . वहां से पाकिस्तान को बेदखल कर के सैनिक सुरक्षा की अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करना अगर जीत नहीं है तो फिर क्या है . इस गैर ज़िम्मेदार,हेराफेरी मास्टर और कुंठित पूर्व जनरल के प्रलाप को पूरे देश में प्रचारित करके जिस न्यूज़ चैनल ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सवालों के घेरे में खड़ा करने की कोशिश की है , उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. सवाल पैदा होता है कि वह फौजी जिसकी बे-ईमानी की कथा अब जगज़ाहिर है , उसके अध् कचरे ख्यालात को राष्ट्रहित के खिलाफ इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है . जिस चैनल पर यह श्रीमान जी अपने आप को महिमामंडित कर रहे थे उसकी एक बहुत ही वरिष्ठ कार्यकर्ता पर पिछले दिनों पावर ब्रोकर होने के आरोप भी लग चुके हैं . कारगिल युद्ध के दौरान भी इस चैनल की एक रिपोर्टर पर आरोप लग चुका है कि उसकी एक खबर की वजह से हमारे कुछ सैनिक शहीद हुए थे . हालांकि इन खबरों में सच्चाई नहीं है लेकिन उस युद्ध के दौरान जो बंदा इंचार्ज था, उसको बहुत हाईलाईट करके कहीं एहसान का बदला तो नहीं चुकाया जा रहा है .

जहां तक कारगिल की लड़ाई को बेकार साबित करने की कोशिश है , वह भी बिलकुल बेकार की बात है .. उस लड़ाई में भारतीय फौज विजयी रही थी क्योंकि उसने महत्वपूर्ण सैनिक ठिकानों को पाकिस्तानी फौज से वापस लेकर वहां तिरंगा लहरा दिया था .. लेकिन असली जीत तो अंतरराष्ट्रीय मैदान में हुई थी. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अमरीका जाकर उसके राष्ट्रपति से मदद की गुहार की थी लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया था और चेतावनी दी थी कि अगर पाकिस्तानी फौजें फ़ौरन न हटीं तो मुश्किल हो जायेगी. परंपरागत रूप से आँख मूँद कर पाकिस्तान की मदद करने वाले अमरीका की नज़र में पाकिस्तान का यह पतन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत थी . लेकिन इन बातों से फौजी जनरलों को कोई मतलब नहीं होना चाहिए और समाचार माध्यमों को भी सावधान रहना चाहिए कि कहीं उनकी अधकचरी समझ की वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा न पैदा हो जाय

Thursday, May 13, 2010

अब मीडिया को भी काबू करने के चक्कर में हैं अफसराने-वतन

शेष नारायण सिंह

सावधानी हटी और दुर्घटना हुई. देश के नौकरशाह हमेशा इस फ़िराक़ में रहते हैं कि जहां से भी देश के राजकाज को प्रभावित किया जा सकता हो , वहां की चौधराहट उनके पास ही होनी चाहिए. देश में कहीं कोई कमेटी बने, कोई आयोग बने, कोई जांच बैठे, कोई सर्वे हो , आई ए एस वाले बाबू लोग किसी न किसी तिकड़म से वहां पंहुच जाते हैं . . ताज़ा मामला टेलिविज़न की ख़बरों को अर्दब में लेने की कोशिश से सम्बंधित है . टी आर पी के नाम पर इस देश में कुछ गैर ज़िम्मेदार न्यूज़ चैनलों ने खबरों को मजाक का विषय बना दिया था. देश के हर प्रबुद्ध वर्ग से मांग उठ रही थी कि खबरों को इस तरह से पेश करने की इन चैनलों की कोशिश पर लगाम लगाई जानी चाहिए . जब इन स्वम्भू पत्रकारों से कभी कहा जाता था, कि भाई खबरों को खबर की तरह प्रस्तुत करो , जोकरई मत करो . तो यह लोग कहते थे कि जनता यही पसंद कर रही है . ज़्यादातर नामी टी वी चैनलों पर हास्य विनोद से लदी हुई खबरें पेश की जा रही थीं . कुछ आलोचकों ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर यू ट्यूब बंद हो गया तो कुछ तथाकथित न्यूज़ चैनल बंद हो जायेंगें . यानी टी वी न्यूज़ चैनल के स्पेस में मनमानी और अराजकता का माहौल था . देश की नौकरशाही को इसी मौके का इंतज़ार था. चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था. खबरों को हल्का करके पेश करने वालों पर नकेल कसने की मांग चल रही थी. पर तौल रही नौकरशाही ने अपनी पहली चाल चल दी. दिल्ली में आई ए एस अफसरों के ठिकाने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पर एक बैठक हुई और उसमें कई अवकाश प्राप्त अफसरों ने अपनी अपनी राय दी. यह अफसर इतने सीनियर थे कि मुख्य चुनाव आयुक्त उनके सामने बच्चे लग रहे थे . बहर हाल उन्होंने ऐलान कर दिया कि टी वी चैनलों पर लगाम लगाए जाने की ज़रुरत है . अब यहाँ खेल की बारीकियों पर गौर करने से तस्वीर साफ़ हो जायेगी. जिन लोगों ने टी वे चैनलों पर कंट्रोल की बात की उनमें से ज़्यादातर अवकाश प्राप्त अफसर हैं . यानी अगर हल्ला गुल्ला हुआ तो सरकार बहुत ही आसानी से अपना पल्ला झाड लेगी लेकिन अगर कहीं कुछ न हुआ तो उनकी बात चीत को औपचारिक रूप दे दिया जाएगा. और मीडिया संगठनों को आई ए एस के कंट्रोल में थमा दिया जाएगा. ज़्यादातर मीडिया संगठनों के महाप्रभुओं ने इस मामले को नोटिस नहीं किया और नौकरशाही ने अगली चाल चल दी. सेल्फ रेगुलेशन की बात बहुत दिनों से चल रही थी लेकिन पैड न्यूज़ पर काबू करने के नाम पर अफसरों ने कहा कि सेल्फ रेगुलेशन से काम नहीं चलेगा. . इन मीडिया वालों को टाईट करना पड़ेगा और एक कमेटी बना दी गयी. . सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से एक कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया गया .. अजीब बात यह है कि इस कमेटी की अध्यक्षता फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अमित मित्रा को सौंपी गयी है . यानी जिन टी वी चैनलों के रिपोर्टरों के सामने वे घिघियाते रहते थे अब उनके मालिकों को वे तलब किया करेंगें .. पत्रकार कोटे में इस कमेटी में नीरजा चौधरी को शामिल किया गया है . डी एस माथुर नाम के एक आई ए एस अफसर भी हैं .. जबकि सूचना और प्रासारण मंत्रालय के एक अधिकारी इसके पदेन सचिव हैं . आईआईएम अहमदाबाद के डायरेक्टर को भी इसमें शामिल किया गया है . वे भी मीडिया पर नकेल कसने के चक्कर में ही रहेगें .. इस कमेटी के रिपोर्ट ३ महीने में आ जायेगी . जो लोग इस देश की नौकरशाही के मिजाज़ को समझते हैं उन्हें मालूम है कि रिपोर्ट में कुछ भी हो, किया वही जाएगा जो इस देश के आला अफसरों के हित में होगा और मीडिया की स्वतंत्रता को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया जाएगा. इस बार मीडिया की आज़ादी को समाप्त करने वालों में सबसे ज़्यादा उन मीडिया वालों का हाथ माना जाएगा जिन्होंने मीडिया को भडैती के साथ ब्रेकट करने की गलती कर दी थी.

उम्मीद की जानी चाहिए कि पूरे देश का प्रबुद्ध वर्ग नौकरशाही की इस साज़िश के खिलाफ आवाज़ उठाएगा. क्योंकि इस देश ने मीडिया पर सरकारी कंट्रोल का ज़माना देखा है . इमरजेंसी में जब सेंसर की व्यवस्था लागू की गयी थी तो खबरों को चापलूसी में बदलते बहुत लोगों ने देखा था. उस दौर में भी कुलदीप नैय्यर जैसे कुछ लोगों ने मीडिया की आज़ादी के लिए कुरबानी दी थी और जेल गए थे . इमरजेंसी के बाद सरकार को सेंसरशिप हटानी पड़ी लेकिन तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने पत्रकारों को याद दिलाया था कि सरकार ने उनसे झुकने को कहा था और वे रेंगने लगे थे . यानी सरकारी नकेल को पत्रकार बिरादरी ने खुशी खुशी स्वीकार कर लिया था. . बाद में जगन्नाथ मिश्र के शासन के दौरान बिहार सरकार ने भी मीडिया को दबोचने का कानून बनाने की कोशिश की थी लेकिन इतना हल्ला गुल्ला हुआ कि सब ठंडे पड़ गए. और अब बहुत ही बारीक तरीके से नौकरशाही ने मीडिया को अपने कंट्रोल में लेने की कोशिश की है . उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार भी शासक वर्गों के मीडिया को अर्दब में लेने के मंसूबे को नाकाम कर दिया जाएगा.

Wednesday, March 31, 2010

मीडिया और न्यायपालिका की बुलंदी का दौर

शेष नारायण सिंह

हरियाणा में एक अदालत ने उन लोगों को सज़ा-ए-मौत का हुक्म दे दिया है जिन्होंने एक विवाहित जोड़े को मार डाला था. मारे गए पति पत्नी का तथाकतित जुर्म यह था कि उन्होंने पंचायत की मर्जी के खिलाफ अपनी पसंद से शादी कर ली थी. . पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में यह बहुत पहले से होता रहा है . ग्रामीण इलाकों में पंचायतों की स्थिति बहुत ही मज़बूत रही है और उन्हें मनमानी करने का पूरा अधिकार मिलता रहा है . इन् इलाकों में कुछ बिरादरी के लोगों ने अपने आप को एक खाप के रूप में संगठित कर रखा है .यह व्यवस्था बहुत ही पुरानी है ,. दर असल जब सरकारों की भूमिका केवल अपनी रक्षा और अपने राजस्व तक सीमित थी तो सामाजिक जीवन को नियम के दायरे में रखने का ज़िम्मा बिरादरी की पंचायतों का होता था. उस दौर में ज़िंदगी एक लीक पर चलती रहती थी लेकिन सूचना क्रान्ति के साथ साथ सब कुछ बदल गया. गावों में रहने वाले लडके लड़कियां पूरी दुनिया की सूचना देख सकते हैं , जान सकते हैं और बाकी दुनिया में प्रचलित कुछ रीति रिवाजों को अपनी ज़िंदगी में भी उतार रहे हैं . अब उनको मालूम है कि सभ्य समाज में अपनी पसंद के जीवन साथी के साथ ज़िंदगी बसर करने का रिवाज़ है . उसे यह भी मालूम है कि यह मामला बिलकुल निजी है और उसमें किसी को दखल देने का अधिकार नहीं है . . सूचना क्रान्ति का ही दूसरा पहलू यह है कि देश के किसी भी इलाके से कुछ सेकंड के अन्दर ही कोई भी खबर पंहुचायी जा सकती है और कोई भी तस्वीर कहीं भी भेजी जा सकती है. यानी किसी भी गाँव में बैठी हुई कोई पंचायत क्या फैसला करती है , यह अब गाँव का मामला नहीं रह गया है . कोई भी घटना अब मिनटों के अन्दर पूरी दुनिया के सामने पेश की जा सकती है . पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में आजकल यही हो रहा है . सूचना क्रान्ति के पहले के ज़माने में खाप पंचायतें जो कुछ भी करती थें ,वह उन्हीं लोगों के बीच रह जाता था लेकिन अब वह पूरी दुनिया के सामने पेश कर दिया जाता है .. इसका मतलब यह नहीं है कि खाप पंचायतें पहले जो हुक्म देती थीं वे सही होते थे . फैसले तो गलत तब भी होते थे लेकिन अब उन फैसलों को बाकी दुनिया के पैमाने से नापा जाने लगा है .



ग्रामीण इलाकों में इन पंचायतों का इतना दबदबा है कि किसी नेता की हिम्मत नहीं पड़ रही है कि इस मामले में कोई पक्का रुख ले सके. हरियाणा के मुख्य मंत्री, भूपेंद्र सिंह हुड्डा से जब बात की गयी तो वे मामले को टाल गए. किसी टी वी चैनल में बी जे पी का एक छुटभैया नेता खाप पंचायतों को सही ठहरा रहे एक किसान नेता की तारीफ़ करने लगा . संतोष की बात यह यह है कि अब इन नेताओं के बस की बात नहीं है कि ये न्याय के रथ को विचलित कर सकें. अब सूचना क्रान्ति की बुलंदी का वक़्त है . इस क्रान्ति ने मीडिया को पूरी तरह से आम आदमी की पंहुच के अन्दर ला दिया है और किसी की भी दादागीरी लगभग हमेशा ही पब्लिक की नज़र में रहती है . . करनाल के किसी गाँव में एक ही गोत्र में शादी करने के कारण मौत के घाट उतार दिए गए मनोज और बबली का मामला भी इतिहास के इस मोड़ पर सामने आया जब कि कोई भी आदमी ऐलानियाँ तौर पर खाप वालों की मनमानी को सही ठहरा ही नहीं सकता.. करनाल के अतिरिक्त जिला और सेशन जज ने अपने १०५ पेज के फैसले में लडकी के भाई, चाचा और चचेरे भाई को को तो फांसी के सज़ा सुना दी . पंचायत के मुखिया को केवल उम्र क़ैद की सज़ा सुनायी. पंचायतों की इस तरह की मनमानी के किस्से रोज़ ही होते रहते हैं . नेताओं के अलगर्ज़ रवैय्ये के कारण इन् मामलोंमें कहीं कुछ होता जाता नहीं था . ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी जज ने खाप के आतंक से जुडे हुए मामले में शामिल लोगों को सज़ा सुनायी है . ज़ाहिर है इस फैसले की धमक दूर दूर तक महसूस की जायेगी. और भविष्य में मुहब्बत करके शादी करने वाले जोड़ों को भेड़ बकरियों की तरह मार डालने वाले इन आततायी पंचों को कानून का डर लगेगा . वरना अब तक तो यही होता था कि इनकी मनमानी के खिलाफ कहीं कोई कार्रवाई नहीं होती थी.

मौजूदा मामले में मारे गए लडके के परिवार वालों की भूमिका सबसे अहम है . उन्होंने तय कर लिया था कि उनके बच्चे को मारने वालों को न्याय की बेदी पर हाज़िर किये बिना उन्हें चैन नहीं है . लेकिन सबसे बड़ी भूमिका इस सारे मामले में मीडिया की है . जब से २४ घंटे के समाचार चैनल शुरू हुए हैं ,मीडिया के लोग इस तरह के मामलों को सार्वजनिक करने में संकोच नहीं कर रहे हैं . और जब सारी बात मीडिया की वजह से पहले ही पब्लिक डोमेन में आ जाती है तो उसे टाल पाना न तो नेताओं के लिए संभव होता है और न ही अन्य सरकारी संगठनों के अगर भविष्य में भी मीडिया इसी तरह से चौकन्ना रहा तो कुछ ही वर्षों में यह मध्यकालीन सामंती सोच ग्रामीण इलाकों से गायब हो जायेगी और फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के इन संपन्न इलाकों में मुहब्बत करने वालों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी.

Thursday, October 8, 2009

सत्ता का खूंखार चेहरा और गरीब आदमी

झारखंड के पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इदवार को उनके अपहर्ताओं ने निर्ममता पूर्वक मार डाला। फ्रांसिस एक मामूली आदमी थे और सरकारी नौकरी के सहारे अपने बच्चों का लालन पालन कर रहे थे। अपनी ड्यूटी करते हुए वे अपहरण का शिकार हो गए और अपनी जान गंवा बैठे। सरकारी तंत्र ने छूटते ही कह दिया कि माओवादियों ने उन्हें मार डाला है। टी.वी. चैनलों और अखबारों की खबरें भी यही बताती हैं।

हालांकि आज के जमाने में इस तरह के मामलों में सरकारों की विश्वसनीयता बहुत ही आदरणीय नहीं रह गयी है लेकिन सम्माननीय अखबारों ने भी इसे माओवादियों की करतूत बताया है इसलिए लगता है कि अति वामपंथी विचारधारा ने एक ऐसे आदमी की जान ले ली। एक टी.वी. चैनल में बहस करने आए वामपंथी लेखक और कार्यकर्ता गौतम नवलखा मानने को तैयार नहीं थे कि फ्रांसिस की बर्बर हत्या माओवादियों ने की होगी। उनको लगता था कि बिना तथ्यों की पूरी जानकारी हासिल किए इस विषय में कुछ भी कहना ठीक नहीं है।

यानी वे यह कहना चाह रहे थे कि हो सकता है कि माओवादियों को बदनाम करने के लिए किसी और ने फ्रांसिस को मार डाला हो। यह बात दूर की कौड़ी है हालांकि इस बात की संभावना से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। एक गौतम नवलखा की बात मानकर बाकी सारी दुनिया को झूठा ठहराना बहुत ही बेतुका राग है। सच्ची बात यह है कि मीडिया के पास इस तरह की वारदात के कारणों की जांच करने के तरीके होते है जिससे सच्चाई का पता लगाया जा सकता है। यह जानकारी किसी भी अदालत में सबूत तो नहीं बनती लेकिन होती सही है।

इस आधार पर भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि फ्रांसिस की हत्या माओवादियों ने ही की। फ्रांसिस की हत्या एक बहुत ही खतरनाक संकेत है। माओवादी राजनीति, निश्चित रूप से हिंसा का सहारा ले रही है। धनाढ्य वर्गों के हित पोषक भारत की राजनीतिक पार्टियां अपने वर्गों को लाभ पहुंचाने में जुटी हुई हैं। यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि माओवादियों के लाल कॉरिडर में पडऩे वाले राज्यों में राज करने वाली सभी पार्टियों का वर्ग चरित्र वही है जो किसी भी सामंतवादी साम्राज्यवादी पार्टी की सोच का होता है।

इन सारे इलाकों में कही भी भूमि सुधार नहीं हुआ है, राजनीतिक नेता सामंतों की तरह का आचरण करते हैं और गरीब आदमियों के लिए आने वाली सभी स्कीमों का पैसा हड़प लेते है। निराश हताश गरीब आदमी दिग्भ्रमित वामपंथियों के चंगुल में फंस जाता है और वह हथियार उठा लेता है।

इस तरह सत्ता के दो दावेदारों के बीच में लड़ाई शुरू हो जाती है। सरकारी सत्ता पर काबिज भू-स्वामियों-पूंजीपतियों के सेवक राजनेता एक तरफ और माक्र्सवादी शब्दजाल इस्तेमाल करके अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे, कम्युनिस्ट विचारधारा से दिशाभ्रम की स्थिति में पहुंच चुके शातिर सत्ताकामी वामपंथी सरगनाओं की मंडली दूसरी तरफ। अजीब बात है कि इस खेल में मरने वाला हर आदमी गरीब है। चाहे वह माओवादियों की तरफ से हो या सरकार की तरफ से। पुलिस का इंस्पेक्टर फ्रांसिस बहुत ही मामूली आदमी था, अगर उसे सरकारी नौकरी न मिली होती तो वह शायद कहीं मजदूरी कर रहा होता।

लेकिन ज्यों ही सत्ता के प्रतिष्ठानों के संचालक पकड़े जाते हैं तो तूफान मच जाता है। माओवादियों का यह नया खूंखार रूप उनके बड़े नेताओं कोबाद गांधी और छत्रधर महतो के पकड़े जाने के बाद ही समाने आया है। इसके बाद हुकूमतों को भी माओवादियों के बहाने आदिवासी इलाकों में आम आदमी को घेरकर मारने का मौका मिल जायेगा। यह बात सबको मालूम है कि इस खूनी खेल में कोई बड़ा आदमी नहीं मारा जायेगा।

आदिवासी इलाकों में चल रहे नए खून खराबे में एक नया आयाम भी जुड़ रहा है। बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों की खनिज संपदा अनमोल है और अब उस पर बहुराष्टï्रीय कंपनियों की नजर लगी हुई है। इस बात की पूरी संभावना है कि इन इलाकों में चल रहे ताजा खून खराबे में इस साम्राज्यवादी खेल का भी कुछ योगदान हो। जहां तक सरकारों का प्रश्न है, वे तो पूंजीपति वर्ग की भलाई के लिए ही सत्ता में हैं, उन्हें सत्ता पर स्थापित करने में थैलीशाहों की चमक के योगदान की भी चर्चाएं होती रहती हैं, इस बात की भी पूरी आशंका है कि माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व में भी कुछ ऐसे लोग हों जो पूंजीपति वर्ग का खेल जमाने में मदद कर रहे हों।

इस तरह की बात हर उस इलाके में हो चुकी है। जहां खनिज संपदा होती है पेट्रोल के इस्तेमाल के पहले अरब का इलाका एक ऐसा क्षेत्र था जहां कभी किसी की नजर नहीं जाती थी। समुद्र के रास्ते संपन्न इलाकों की खोज में निकलने वाले यूरोपीय यात्री पश्चिम एशिया के इस इलाके पर नजर ही नहीं डालते थे, सीधे भारत की तरफ बढ़ते थे, जहां की संपन्नता का तिलिस्म उनको खींचता रहता था।

लेकिन पेट्रोल और अन्य हाइड्रोकार्बन पदार्थों के ऊर्जा के मुख्य स्रोत के विकसित होने के बाद पश्चिम एशिया में साम्राज्यवादियों के हित साधन के रास्ते पैदा किए गए और आज पेट्रोलियम पदार्थों से संपन्न यह इलाका पूंजीपति साम्राज्यवादी शक्तियों की बर्बरता का केंद्र बना हुआ है। वहां रहने वाले लोगों को हर तरह के खूनी खेल का नतीजा झेलना पड़ रहा है।

भारत में नये विकसित हो रहे लाल कॉरिडर के क्षेत्र भी खनिज संपदा से लैस हैं। वहां पर राज करने वाली पार्टियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित साधन करने में कोई संकोच नहीं होगा। इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन क्षेत्रों की तबाही में माओवादी भी किन्हीं निहित स्वार्थों के कारिंदे हों। इसलिए सिविल सोसाइटी को चौकन्ना रहना पड़ेगा कि साम्राज्यवादियों के हितों की साधना के चक्कर में कहीं भारत का एक बड़ा हिस्सा विवादों के घेरे में न आ जाय और अवाम की पहले से ही मुश्किल जिंदगी और मुश्किल न हो जाय।

Wednesday, September 30, 2009

भ्रष्ट अफ़सरों की बेनामी संपत्ति जब्त हो

केंद्र सरकार भ्रष्टाचार पर निर्णायक हमला करने की तैयारी में है। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली का कहना है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए बनाए गए कानून में संशोधन करके और धारदार बनाने की योजना पर काम चल रहा है। अगर मोइली अपने मिशन में सफल होते हैं तो सरकारी अफसरों को रिश्वत लेने के पहले बार-बार सोचना पड़ेगा हालांकि रिश्वत लेना और देना जुर्म है लेकिन इसके लिए सजा का प्रावधान बहुत मामूली हैँ अभी तो पांच साल तक की कारावास की सजा की व्यवस्था है। घूसखोर सरकारी अफसर सोचता है कि अगर 100-200 करोड़ रुपये इकट्ठा कर लिए जाएं तो कुछ साल जेल में रहकर फिर वापसे आने पर बेइमानी से इकट्ठा किए गए धन का उपयोग बाकी जिंदगी आराम से किया जा सकता है।

लेकिन अगर जेल की सजा के साथ-साथ चोरी बेईमानी से उगाहा गया धन भी ज़ब्त होने लगे तो घुसखोर अधिकारी में कानून की दहशत पैदा होगी और भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। मामला अभी बहस के दौर में है। मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक एक्ट में अपराध साबित होने पर 5 से 7 साल तक की सजा तो हो सकती है लेकिन सरकार के पास अपराधी अफसर की संपत्ति जब्त करने का अधिकार नहीं है। मंत्री के अनुसार सरकार भ्रष्टाचार निरोधी कानून में संशोधन करने पर गंभीरता से विचार कर रही है भ्रष्टï साधनों से अर्जित संपत्ति को भी ज़ब्त किया जा सके।

सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार के मामले में बिहार का नाम अब तक सर्वोपरि रहा है। बिहार सरकार में पिछले कई दशकों से व्याप्त भ्रष्टाचार से परेशान राज्य के मुख्य मंत्री नीतिश कुमार पिछले दिनों कानून मंत्री वीरप्पा मोइली से मिले थे। उन्होंने सुझाव दिया कि एक ऐसा कानून बनना चाहिए जिससे भ्रष्टाचार के मामले में जब जांच अधिकारी चार्जशीट दाखिल कर दे, उसी वक्त अभियुक्त सरकारी अधिकारी की भ्रष्टï साधनों से अर्जित की गई संपत्ति जब्त कर ली जाय। दरअसल राज्य सरकार इस तरह के एक कानून के बारे में विचार कर रही है। अफसर बिरादरी इस तरह के कानून की चर्चा मात्र से सकते में हैं।

अगर कहीं यह कानून बन गया तो सरकारी नौकरी के रास्ते अरबपति बनने के सपनों की तो अकाल मृत्यु हो जायेगी। नीतीश कुमार के इस सुझाव के बाद केंद्र सरकार में तैनात सरकारी अफसरों ने प्रस्तावित कानून में अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि इस कानून के सहारे नेता लोग अफसरों से बदला लेंगे और ईमानदारी से काम करना मुश्किल हो जाएगा। सवाल यह है कि ईमानदारी से काम करते कितने लोग हैं। इस विषय पर सिविल सेवा के एक शीर्ष अधिकारी से बात करने पर तो तसवीर बिलकुल दूसरी नज़र आई। पिछले करीब 35 साल से सरकारी अधिकारियों के जीवन को बहुत करीब से देख रहे इस अधिकारी का जीवन बहुत ही पवित्र है।

राजनीतिक सत्ता के कई मठाधीशों ने इनको भ्रष्टाचार निरोधक कानून में फंसाने की कई बार कोशिश की लेकिन एक भी केस नहीं मिला। सरकारी तनख्वाह लेते हैं, सरकारी मान्यता प्राप्त सुविधाएं हैं और जीवन अपनी शर्तों पर जीते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान भ्रष्टाचार निरोधी कानून में संपत्ति जब्ती की व्यवस्था करने से भ्रष्टाचार रोकने में कोई मदद नहीं मिलेगी लेकिन रिकार्ड के लिए तो इन अफसरों की संपत्ति उतनी ही होती है जितनी सिविल सर्विस रूल्स के तहत होनी चाहिए। इनकी घूसखोरी वाली सारी संपत्ति बेनामी होती है।

कानून ऐसा होना चाहिए कि उस बेनामी संपत्ति को सरकार जब्त कर सके। लेकिन बेनामी संपत्ति को जब्त करना आसान इसलिए नहीं होगा कि उसका पता कैसे चलेगा। इस ईमानदार अफसर का सुझाव है कि अभियुक्त अधिकारी का नार्को टेस्ट कराया जाय जिससे वह अपनी सारी बेनामी संपत्ति और जमीन का पता बता दे और उस संपत्ति के बारे में गहराई से जांच करवाकर उसको जब्त कर लिया जाय। बेनामी संपत्ति के मामलों में अकसर देखा गया है कि जिसके नाम पर संपत्ति खरीदी गई रहती है, वह व्यक्ति या संस्था कही होती ही नहीं और इस संपत्ति पर दावेदारी नहीं की जा सकती। ऐसी हालत में लावारिस संपत्ति को जब्त करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।

कई बार यह बेईमान अफसर संपत्ति की रजिस्ट्री नौकरों या रिश्तेदारों के नाम करवाते हैं। उनकी भी विधिवत जांच की जा सकती है और संपत्ति जब्त की जा सकती है। बेनामी संपत्ति का पता लगाने का दूसरा तरीका यह है कि सरकारी अधिकारियों की संपत्ति की घोषणा को सार्वजनिक डॉमेन में डाल दिया जाय, किसी लोकप्रिय वेबसाइट पर डाल दिया जाय और जनता से सुझाव मांगे जायें कि जो सूचना अफसर ने दी है क्या वह सच है। जानकार बताते हैं कि देश के कोने कोने से ख़बर आ जायेगी कि अमुक अफसर की जमीन कहां है और उसका शापिंग मॉल कहां है, या उसका कारखाना कहां है। इस सूचना के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जा सकता है।

संपत्ति की जब्ती को राजनीतिक नेताओं की ओर से अफसरों पर नकेल कसने के औजार के रूप में इस्तेमाल होने की संभावना को ईमानदार अफसरों ने बिलकुल बोगस बताया। उनका कहना है कि राजनेताओं की घूसखोरी और बेईमानी की सारी व्यवस्था का जिम्मा भ्रष्ट अधिकारियों के मत्थे ही है। यही लोग नेताओं मंत्रियों के भ्रष्टाचार के कामिसार के रूप में काम करते हैं और राजनीतिक आकाओं के भ्रष्टाचार के जंगल मे अपनी बेईमानी की फुलवारी सजाते हैं।

अगर अफसरों में बेईमानी और घूसखोरी के प्रति खौफ पैदा हो गया तो राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर अपने आप लगाम लग जाएगी क्योंकि भ्रष्टाचार में अफसर की रूचि कम हो जायेगी। सूचना की क्रांति और मीडिया के जनवादी करण के इस युग में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में इंटरनेट भी बड़ी भूमिका बना सकती है और उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

Saturday, September 26, 2009

इस्लाम का आतंकवाद से कोई मतलब नहीं

दक्षिण अफ्रीका के तीन शहरों में शबाना आजमी की फिल्मों का रिट्रोस्पेक्टिव चल रहा है। इस मौके पर वहां तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कुछ कार्यक्रमों में शबाना आजमी शामिल भी हो रही हैं। ऐसे ही एक सेमिनार में उन्होंने कहा कि इस्लाम को आतंकवाद से जोडऩे की कोशिश अनुचित और अन्यायपूर्ण तो है ही, यह बिल्कुल गलत भी है। उनका कहना है कि इस्लाम ऐसा धर्म नहीं है जिसे किसी तरह के सांचे में फिट किया जा सके। शबाना आजमी ने बताया कि 53 देशों में इस्लाम पर विश्वास करने वाले लोग रहते हैं और जिस देश में भी मुसलमान रहते हैं वहां की संस्कृति पर इस्लाम का प्रभाव साफ देखा जा सकता है।

दरअसल अमरीका के कई शहरों में 9 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमलों के बाद के मुख्य अभियुक्त के रूप में ओसामा बिन लादेन का नाम आया जिसने अपने संगठन अल-कायदा के माध्यम से आतंक के बहुत से काम अंजाम दिए है। अमरीका ने योजनाबद्घ तरीके से ओसामा बिन लादेन और उसके साथियों को अपने अभियान का निशाना बनाना शुरू किया। यह दुनिया और सभ्य समाज की बद किस्मती है कि उन दिनों अमरीका का राष्ट्रपति एक ऐसा व्यक्ति जिसके बौद्घिक विकास के स्तर को लेकर जानकारों में मतभेद है।

आम तौर पर माना जाता है कि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश अव्वल दर्जे के मंद बुद्घि इंसान हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जिसे शक है कि बुश जूनियर कभी कभी समझदारी की बात भी करने की क्षमता रखते हैं। बहर-हाल अपने आठ साल के राज में उन्होंने अमरीका का बहुत नुकसान किया। अमरीकी अर्थ व्यवस्था को भयानक तबाही के मुकाम पर पहुंचा दिया, इराक और अफगानिस्तान पर मूर्खता पूर्ण हमले किए।

पाकिस्तान के एक फौजी तानाशाह की ज़ेबें भरीं जिसने आतंक का इतना जबरदस्त ढांचा तैयार कर दिया कि अब पाकिस्तान का अस्तित्व ही खतरे में है। अपने गैर जिम्मेदार बयानों से बुश ने जितने दुश्मन बनाए शायद इतिहास में किसी ने न बनाया हो। बहरहाल बुश ने ही शायद जानबूझकर यह कोशिश की कि मुसलमानों से आतंकवाद को जोड़कर वह उन्हें अलग थलग कर लेंगे। यह उनकी मूर्खतापूर्ण गलती थी। उनको जानना चाहिए था कि इस्लाम मुहब्बत, भाईचारे और जीवन के उच्चतम आदर्श मूल्यों का धर्म है।

अगर कोई मुसलमान इस्लाम की मान्यताओं से हटकर आचरण करता है तो वह मुसलमान नहीं है। इसलाम में आतंक को कहीं भी सही नहीं ठहराया गया है। अगर यही बुनियादी बात बुश जूनियर की समझ में आ गई होती तो शायद वे उतनी गलतियां न करते जितनी उन्होंने कीं। उन्होंने योजनाबद्घ तरीके से इस्लाम को आतंक से जोडऩे का अभियान चलाया। उसी का नतीजा है कि अमरीकी हवाई अड्डों पर उन लोगों को अपमानित किया जाता है जिनका नाम फारसी या अरबी शब्दों से मिलता जुलता है। अपने बयान में शबाना आजमी इसी अमरीकी अभियान को फटकार रही थीं।

अमरीकी विदेश नीति की इस योजना को सफल होने से रोकना बहुत जरूरी है। संतोष की बात यह है कि वर्तमान अमरीकी राष्टï्रपति बराक ओबामा भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। भारत में भी एक खास तरह की सोच के लोग यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सभी मुसलमान एक जैसे होते हैं। और अगर यह साबित करने में सफलता मिल गई तो संघी सोच वाले लोगों को मुसलमान को आतंकवादी घोषित करने में कोई वक्त नहीं लगेगा। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि संघी सोच के लोग आर.एस.एस. के बाहर भी होते हैं। सरकारी पदों पर बैठे मिल जाते हैं, पत्रकारिता में होते हैं और न्याय व्यवस्था में भी पाए जाते हैं।

एक उदाहरण से बात को स्पष्ट करने की कोशिश की जायेगी। सरकार की तरफ से सांप्रदायिक सदभाव के पोस्टर जारी किये जाते हैं जिसमें कुछ शक्लें बनाई जाती है। चंदन लगाए व्यक्ति को हिंदू, पगड़ी पहने व्यक्ति को सिख और एक खास किस्म की पोशाक वाले को पारसी बताया जाता है। मुसलमान का व्यक्तित्व दिखाने के लिए जालीदार बनियान, चारखाने का तहमद और एक स्कल कैप पहनाया जाता है। कोशिश की जाती है कि मुसलमान को इसी सांचे में पेश करके दिखाया जाय। सारे मुसलमान इसी पोशाक को नहीं पहनते लेकिन इस तरह से पेश करना एक साजिश है और इस पर फौरन रोक लगाई जानी चाहिए।

क्योंकि अगर ऐसा न हुआ और दुबारा बीजेपी का कोई आदमी प्रधानमंत्री बना तो भारत में भी वही हो सकता है जो बुश जूनियर ने पूरी दुनिया में कर दिखाया है। वैसे संघ बिरादरी ने यह कोशिश शुरू कर दी थी कि आतंकवाद की सारी घटनाओं को मुसलमानों से जोड़कर पेश किया जाय लेकिन जब मालेगांव के धमाकों में संघ के अपने खास लोग पकड़ लिए गए तो मुश्किल हो गई। वरना उसके पहले तो बीजेपी के सदस्य और शुभचिंतक पत्रकार मुसलमान और आतंकवादी को समानार्थक शब्द बताने की योजना पर काम करने लगे थे। शबाना आजमी जैसे और भी लोगों को सामने आना चाहिए और यह साफ करना चाहिए कि मुसलमान और इसलाम को आतंकवाद से जोडऩे की कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। धर्मनिरपेक्ष पत्रकारों को भी इस दिशा में होने वाली हर पहल का उल्लेख करना चाहिए क्योंकि एक वर्ग विशेष को आतंकवादी साबित करने की कोशिशों के नतीजे किसी के हित में नहीं होंगे।

Wednesday, September 23, 2009

क्या कांग्रेस वास्तव में धर्मनिरपेक्ष है?

जसवंत सिंह की किताब ऐसा कोई ऐतिहासिक दस्तावेज तो नहीं है, लेकिन जिन्ना की तारीफ जिस अंदाज से की गई है उसके बाद भारत और पाकिस्तान में उस किताब के हवाले से एक दिलचस्प बहस शुरू हो गई है। इसके पहले जसवंत सिंह की पुरानी पार्टी के नेता, लालकृष्ण आडवाणी ने जिन्ना के 11 अगस्त 1947 को कराची में दिए गए भाषण में धर्मनिरपेक्षता के विचार की तारीफ की थी और पार्टी में खलबली मच गई थी।

जसवंत सिंह ने नेहरू और पटेल की तुलना में जिन्ना के ज्यादा जिम्मेदार होने का संकेत देकर माहौल को बहुत गर्मा दिया था। इस बीच गुजरात पुलिस के कुछ बड़े अधिकारियों द्वारा मुंबई की एक लड़की इशरत जहां को फर्जी मुठभेड़ में मार डालने की बात भी बहस के दायरे में आ गई। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उंगली उठने लगी। उनके शुभचिंतक कहने लगे कि मोदी फिर एक बार अनावश्यक विवाद के घेरे में फंस गए और उनके विरोधी कहने लगे कि इशरत जहां कि हत्या नरेंद्र मोदी के सांप्रदायिक एजेंडे को पूरा करने की बड़ी योजना का एक मामूली टुकड़ा है।

बहस एक बार सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के विषय पर पहुंच गई और मोदी के समर्थकों ने उनके हर विरोधी को छदम धर्मनिरपेक्ष और उनके विरोधियों ने उन्हें फासिस्ट और सांप्रदायिक कहना शुरू कर दिया। इस पूरी बहस में कांग्रेस पार्टी के नेता आमतौर पर तमाशबीन बनकर आनंद ले रहे हैं और आमतौर पर धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदार के रूप में अपने आपको पेश कर रहे हैं। इस तरह सरदार पटेल, नेहरू, जिन्ना, आडवाणी, जसवंत सिंह, कांग्रेस पार्टी और नरेंद्र मोदी के हवाले से बहस एक बार धर्मनिरपेक्षता के इतिहास और राजनीति पर केंद्रित हो गई है।

ज़ाहिर है कि धर्मनिरपेक्षता के अहम पहलुओं पर एक बार फिर से गौर करने की ज़रूरत है और यह भी कि क्या कांग्रेस वास्तव में वैसी ही धर्मनिरपेक्ष है जैसी कि आजादी की लड़ाई के दौरान देश के महान नेताओं ने इसे बनाया था। जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है वह भारत के संविधान का स्थायी भाव है, उसकी मुख्यधारा है। संविधान की शुरूआत ही इसी बात से होती है कि भारत के लोगों ने एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक गणतंत्र के रूप में अपने आपको गठित कर लिया है।

धर्मनिरपेक्ष होना हमारे गणतंत्र के लिए अति आवश्यक है। इस देश में जो भी संविधान की शपथ लेकर सरकारी पदों पर बैठता है वह स्वीकार करता है कि भारत के संविधान की हर बात उसे मंज़ूर है यानी उसके पास धर्मनिरपेक्षता छोड़ देने का विकल्प नहीं रह जाता। यह अलग बात है कि किसी की कमीज दूसरे व्यक्ति की कमीज से ज्यादा उजली हो सकती है। इसकी बहस में आमतौर पर कांग्रेस को बहुत ही धर्मनिरपेक्ष माना जाता है। ऐसा लगता है कि यह मान लेना साधारणीकरण होगा। जहां तक आजादी की लड़ाई का सवाल है उसका तो उद्देश्य ही धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय का राज कायम करना था। इसलिए उस दौर में कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल नहीं उठते लेकिन आजादी की बाद की कांग्रेस के बारे में यह सौ फीसदी सही नहीं है।

60 के दशक तक तो कांग्रेस उसी रास्ते पर चलती नजर आती है लेकिन शास्त्री जी के बाद भटकाव शुरू हो गया था और जब कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्घांत पर कमजोरी दिखाई तो जनता ने और विकल्प ढूंढना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में पहली बार देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। 1909 में छपी इस किताब की प्रकाशन की आजकल शताब्दी भी चल रही है। गांधी जी एक महान कम्युनिकेटर थे, जटिल सी जटिल बात को बहुत साधारण तरीके से कह देते थे। हिंद स्वराज में उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।"

महात्मा जी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी राज्य की चूलें हिल गईं। आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गंाधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। शौकत अली, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने इस सोच को आजादी की लड़ाई का स्थाई भाव बनाया।
लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने जिन्ना टाइप लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। लेकिन कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता, सरदार वल्लभ भाई पटेल की धर्मनिरपेक्षता सीधे महात्मा गांधी वाली थी।

कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)। सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं।

सरदार अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, ''इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिए हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था। ............... मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूं। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ............ एक हफ्ते तक अपने हाथ बांधे रहिए और देखिए क्या होता है।

मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।" सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ। कांग्रेस के दूसरे नेता जवाहरलाल नेहरू थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता की कहानियां चारों तरफ सुनी जा सकती हैं। उन्होंने लोकतंत्र की जो संस्थाएं विकसित कीं, सभी में सामाजिक बराबरी और सामाजिक सद्भाव की बातें विद्यमान रहती थीं। प्रेस से उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे इसलिए उनके धर्मनिरपेक्ष चिंतन को सभी जानते हैं और उस पर कभी कोई सवाल नहीं उठता। लेकिन इनके जाने के बाद कांग्रेस की राजनीति ऐसे लोगों के कब्जे में आ गई जिन्हें महात्मा जी के साथ काम करने का सौभाग्य नहीं मिला था।


कांग्रेस के इंदिरा गांधी युग में धर्मनिरपेक्षता के विकल्प की तलाश शुरू हो गई थी। उनके बेटे और उस वक्त के उत्तराधिकारी संजय गांधी ने 1975 के बाद से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करने के संकेत देना शुरू कर दिया था। खासतौर पर मुस्लिम बहुल इलाकों में इमारतें ढहाना और नसबंदी अभियान में उनको घेरना ऐसे उदाहरण हैं जो सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ इशारा करते हैं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस को मुसलमानों ने वोट नहीं दिया। उसके बाद से ही कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत होने लगी। असम में छात्र असंतोष और पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाला को कांग्रेसी शह इसी राजनीति का नतीजा है।

कांग्रेस का राजीव गांधी युग राजनीतिक समझदारी के लिए बहुत विख्यात नहीं है। वे खुद प्रबंधन की पृष्ठभूमि से आए थे और उनके संगी साथी देश को एक कारपोरेट संस्था की तरह चला रहे थे। इस प्रक्रिया में वे लोग कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की मूल सोच से मीलों दूर चले गए। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद पर बैठते ही जिस तरह से सुनियोजित तरीके से कांग्रेसी नेताओं ने सिखों का कत्ले आम किया, वह धर्मनिरपेक्षता तो दूर, बर्बरता है। जानकार तो यह भी शक करते हैं कि उनके साथ राज कर रहे मैनेजर टाइप नेताओं को कांग्रेस के इतिहास की भी ठीक से जानकारी थी।

बहरहाल उन्होंने जो कुछ किया उसके बाद कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष जमात मानने के बहुत सारे अवसर नहीं रह जाते। उन्होंने अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया और आयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करवाया। ऐसा लगता है कि उन्हें हिन्दू वोट बैंक को झटक लेने की बहुत जल्दी थी और उन्होंने वह कारनामा कर डाला जो बीजेपी वाले भी असंभव मानते थे।

राजीव गांधी के बाद जब पार्टी के किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला तो पी.वी. नरसिंह राव गद्दी पर बैठे। उन्हें न तो मुसलमान धर्मनिरपेक्ष मानता है और न ही इतिहास उन्हें कभी सांप्रदायिकता के खांचे से बाहर निकाल कर सोचेगा। बाबरी मस्जिद का ध्वंस उनके प्रधानमंत्री पद पर रहते ही हुआ था। पी.वी. नरसिंह राव जुगाड़ कला के माहिर थे और इतिहास उनकी पहचान उसी रूप में करेगा। पी.वी.नरसिंह राव के दौर में ही देश में विदेशी पूंजी की धूम शुरू हो गई थी और उसके साथ ही राज करने के तरीकों में भी परिवर्तन हुए हैं। कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व घोषित तौर पर आर.एस.एस. की नीतियों की मुखालिफत करता है। और उसी के बल पर अपने को धर्मनिरपेक्ष कहता है। यहां एक लोच है।

धर्मनिरपेक्ष राजनीति किसी के खिलाफ कोई नकारात्मक प्रक्रिया नहीं है। वह एक सकारात्मक गतिविधि है। मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व को इस बात पर विचार करना पड़ेगा और धर्मनिरपेक्षता को सत्ता में बने रहने की रणनीति के तौर पर नहीं राष्ट्र निर्माण और संविधान की सर्वोच्चता के जरूरी हथियार के रूप में संचालित करना पड़ेगा। क्योंकि आज भी धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व वही है जो 1909 में महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में लिख दिया था।

Monday, September 21, 2009

मानवता का युद्ध अपराधी इजरायल

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने गाजा शहर पर हुए इजरायली सैनिक अभियान की सच्चाई खोल दी है। इस रिपोर्ट में वही बातें कही गईं हैं जो पूरी दुनिया को पहले से ही मालूम थीं लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अमरीका को भी सच्चाई मालूम हो जायेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इजरायली सेना ने जान बूझकर फिलस्तीनी अवाम के खिलाफ सैनिक शक्ति का इस्तेमाल किया। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तैयार करने का जिम्मा एक जज को सौंपा गया था।

रिचर्ड गोल्डस्टोन नाम के इस जज ने कहा है कि इजरायल ने जो कुछ भी गाजा में उन तीन हफ्तों में किया है, उसे युद्ध अपराध माना जाएगा कुछ मामले तो ऐसे हैं जहां इजरायली सेना की कार्रवाई "मानवता के खिलाफ" अपराध की श्रेणी में आ जाएगी इजरायल कहता रहा है कि सैनिक कार्रवाई फिलिस्तानी इलाकों से होने वाले हमलों के जवाब में है लेकिन सच्चाई यह है कि इजरायली सेना ने कम से कम चौदह सौ लोगों को मार डाला जिसमें करीब 500 महिलाएं और बच्चे हैं। यह जांच एक निष्पक्ष जज ने की है जो मूलतः दक्षिण अफ्रीका के रहने वाले हैं।

उन्होंने पता लगाया है कि नागरिक ठिकानों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। इजरायल ने आवश्यकता से अधिक सैनिक बल का इस्तेमाल करके सिविलियन संपत्ति और सार्वजनिक सुविधाओं की तबाही की जिसकी वजह से गाजा के सीधे सादे फिलिस्तीनियों को बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा। जांच से यह भी पता लगा कि इजरायली सेना ने संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी ठिकानों को भी नहीं बख्शा। 15 जनवरी की रात ऐसे ही एक ठिकाने पर हमला किया गया जहां करीब 700 सिविलयन रखे गए थे। इस हमले में फॉस्फोरस बम का इस्तेमाल किया गया जिसकी वजह से आग लग जाती है।

गाजा शहर के अल कुदस अस्पताल पर भी हमला किया गया इजरायल ने अस्पताल पर हमले के बाद बहाना बनाया था कि वहां फिलिस्तीनी आतंकवादी छुपे हुए थे। जांच से पता चला है कि इजरायल का यह बयान बिल्कुल गलत है, वहां कोई नहीं छुपा हुआ था। हमले में बेगुनाह लोग मारे गए थे। कई ऐसे भी मामलों से पर्दाफाश हुआ है जब इजरायली सेना ने निर्दोष बच्चों और औरतों को अगवा किया, उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और उनको आगे करके मानवीय शील्ड की तरह इस्तेमाल किया, फिलिस्तीनी ठिकानों पर हमला किया और तबाही मचाई।

ऐसे भी सबूत मिले हैं कि इजरायली सेना ने खेती को बर्बाद किया, पानी के कुओं में बमबारी की, पानी के टैंक बरबाद किए और जिंदगी को नामुमकिन बनाने की कोशिश की। उनका लक्ष्य स्पष्ट था कि फिलिस्तीनी अवाम के लिए इतनी मुश्किले पैदा कर दी जायं कि उनकी जिंदगी तबाह हो जाय। इजरायली सेना हमेशा से यही करती रही है, इसमें नया कुछ नहीं है। नया है तो बस उस उम्मीद का मर जाना, जो दुनिया के सभ्य समाजों ने अमरीका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा से लगा रखी थी।अपने चुनाव अभियान के शुरुआती दौर से ही बराक ओबामा यह संकेत देते रहे थे कि उनकी पश्चिम एशिया नीति उतनी अरब विरोधी नहीं होती जितनी अब तक के राष्ट्रपतियों की होती रही है लेकिन अब तक के संकेतों से तो यही लगता है कि कोई खास परिवर्तन नहीं होने वाला है।

अमरीका की नीति पश्चिम एशिया में वही रहेगी जिसके हिसाब से इजरायल को धौंस देने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। दरअसल रिचर्ड ग्लैडस्टोन की रिपोर्ट के बाद बराक ओबामा की परीक्षा की घड़ी भी आ पहुंची है। जैसी कि उम्मीद थी, इजरायल ने ग्लैडस्टोन की रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण कहकर टरकाने की कोशिश की लेकिन इस दक्षिण अफ्रीकी जज ने इजरायल को फटकार दिया है और कहा कि इजरायल का यह कहना ही गैर जिम्मेदार आचरण है कि रिपोर्ट तैयार करते समय उन पर कोई दबाव डाल रहा था। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी रिपोर्ट में लिखा गया है, वह एक निष्पक्ष जांच का नतीजा है। और उन्हें इस बात का अफसोस रहेगा कि इस पूरी जांच प्रक्रिया में इजरायल का रुख सहयोग का नहीं रहा।

इस बीच इजरायली मीडिया के माध्यम से सरकार ने जज ग्लैडस्टोन पर व्यक्तिगत हमलों का अभियान शुरू कर दिया है लेकिन ग्लैडस्टोन के ऊपर इसका कुछ भी असर नहीं पड़ने वाला है। वे इस तरह की परिस्थितियों से कई बार गुजर चुके हैं। 1994 में जब रंगभेद के खात्मे के बाद दक्षिणी अफ्रीका में चुनाव हुए तो चुनावों के पहले बड़े पैमाने पर हिंसा और धौंस पट्टी की वारदातें हुई थीं। उनकी जांच का जिम्मा भी इन्हें दिया गया था और उसे उन्होंने बहुत ही सच्चाई के साथ पूरा किया था। वे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में यूगोस्लाविया और वांडा जैसे मामलों में भी संयुक्त राष्ट्र की तरफ से काम कर चुके है। अब अमरीका के राष्ट्रपति को एक मौका मिला है कि वे फिलिस्तीन और अरब राजनीति में इंसाफ के पक्षधर के रूप में अपने आपको पेश करें क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो अन्य अमरीकी राष्ट्रपतियों की तरह इतिहास उनको भी नहीं माफ करेगा।

Friday, September 18, 2009

ऐतिहासिक भूलों का मार्क्सवादी मसीहा

पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियों को एक और चुनावी नुकसान हुआ है। लोकसभा चुनाव में काफी सीटें गवां चुकी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी पार्टियों को सिलिगुड़ी नगर निगम के चुनावों में जोर का झटका बहुत ज़ोर से लगा है। पिछले 28 वर्षों से सिलीगुड़ी नगर निगम पर लाल झंडे वालों का कब्ज़ा था लेकिन इस बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी है।

अबकी तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। वामपंथी मोर्चे को केवल 17 सीटें मिली हैं। यह बड़ी हार है क्योंकि पिछले चुनावों में 36 सीटें जीतकर सिलीगुड़ी नगर पालिका पर लाल झंडा फहराया गया था। गौर करने की बात यह है कि सिलीगुड़ी किसी कस्बे की टाउन एरिया कमेटी नहीं है, यह कलकत्ता के बाद राज्य का सबसे बड़ा नगर निगम है। इसे उत्तर बंगाल में लेफ्ट का गढ़ माना जाता है।

दक्षिण बंगाल में मार्क्सवादी दलों की दुर्दशा लोकसभा चुनाव में ही हो चुकी थी अब उत्तर बंगाल में राग विदाई की भनक सुनाई पड़ने लगी है। सिलीगुड़ी नगर निगम के चुनाव का भावार्थ बहुत गहरा है। 2011 में पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव होने वाला है और तृणमूल कांग्रेस की कोशिश है कि उस चुनाव में अपनी जीत के पक्की होने के संदेश के रूप में सिलीगुड़ी की लड़ाई को पेश किया जाय। दक्षिण बंगाल में वाम मोर्चा की जो खस्ता हालत हुई है, उसको ध्यान में रखा जाय तो इस बात में बहुत वज़न नज़र आने लगता है कि ममता बनर्जी राज्य की सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभर रही है।

सवाल उठता है कि पश्चिम बंगाल में पिछले 32 वर्षों से राज करने वाले वाम मोर्चे के नेताओं के सामने यह दुर्दिन क्यों मुंह बाए खड़ा है? 1977 में वाम मोर्चे ने कई साल से चल रहे कांग्रेसी कुशासन को समाप्त करने के लिए पश्चिम बंगाल की जनता के भारी समर्थन से कलकत्ता में सरकार बनाई थी। ज्योति बसु मुख्मंत्री बने थे और राज्य में बुनियादी परिवर्तन की शुरुआत की थी। गांवों में रहने वाले गरीब से गरीब आदमी के हित को राजकाज के फैसलों का केंद्र बिंदु बनाकर ज्योति बसु ने राज किया लेकिन जब हाथ पांव चलाने में भी दिक्कत होने लगी और उम्र अपना नज़ारा दिखाने लगी तो उन्होंने अगली पीढ़ी को काम संभलवाकर वानप्रस्थ ले लिया।

लगता है कि यहीं कोई चूक हो गई क्योंकि ज्योति बसु के जाने के बाद से ही पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति ढलान पर है। पार्टी का दुर्भाग्य ही है कि ज्योति बसु के लगभग साथ-साथ ही दिल्ली के सत्ता के गलियारों का ज्ञाता एक और कम्युनिस्ट रिटायर हो गया। हरिकिशन सिंह सुरजीत के बैठक ले लेने के बाद दिल्ली में भी सत्ता परिवर्तन हुआ और नए महासचिव, प्रकाश करात ने कमान संभाली। प्रकाश करात बहुत ही पढ़े लिखे और कुशाग्र बुद्धि के माहिर नेता हैं।

चुस्त दुरुस्त लेखन के ज्ञाता हैं और मार्क्सवाद के प्रकांड पंडित हैं। उनका व्यक्तित्व कुछ-कुछ मुहम्मद अली जिनाह वाला है। जिनाह की एक खासियत थी कि वे कभी भी किसी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे लेकिन अपनी बात को सबसे ऊपर रखने की कला के माहिर थे। जिन्ना की खासियत यह थी कि वे पूरी नहीं तो आधी ही सत्ता लेकर माने लेकिन प्रकाश करात आई हुई सत्ता को दुत्कार कर भगा देने में बहुत ही निपुण हैं।

1996 में जब पूरा देश ज्योति बसु को प्रधान मंत्री देखना चाहता था, प्रकाश करात ने ही उस खेल में गाड़ी के आगे काठ रखा था। बाद में उस गलती को ऐतिहासिक भूल कहा गया और पार्टी ने गलती स्वीकार की। उसके बाद प्रकाश करात को ऐतिहासिक भूलों का विशेषज्ञ मान लिया गया। 2004 में कांग्रेस को बाहर से समर्थन देना, अभी ऐतिहासिक भूल के रूप में औपचारिक रूप से दर्ज तो नहीं है लेकिन जानकार बताते हैं कि अंदरखाने यह चर्चा हुई थी कि अगर मनमोहन सिंह सरकार में करीब 10 कम्युनिस्ट मंत्री होते तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां मनमानी न कर पातीं और सरकार परमाणु समझौता न कर पाती।

बाद में सरकार से समर्थन वापसी और तथाकथित तीसरा मोर्चा बनाने की ऐतिहासिक भूलें भी न होतीं। दक्षिणपंथी राजनेताओं और पूंजीवादी मीडिया की कृपा से आमतौर पर माना जाता है कि कम्युनिस्ट पार्टियों में लोकतांत्रिक तरीके से काम नहीं होता। लेकिन यह सच नहीं हैं, कम्युनिस्ट पार्टियों में हर प्रस्ताव गांव स्तर की कमेटी तक बहस के लिए लाया जाता है और अधिकतर संख्या के लोगों की राय को राष्ट्रीय प्रस्तावों में परिलक्षित होते देखा जा सकता है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में भी यही माहौल था। लेकिन ज्योति बसु-सुरजीत टीम के हटने के बाद लगता है, यह रिवाज खत्म हो गया। आम कार्यकर्ता अपने को अलग थलग महसूस करने लगा। जब लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाला गया तो पश्चिम बंगाल में चारों तरफ निराशा छा गई। लगता है कि भविष्य में सोमनाथ को हटाने का फैसला भी ऐतिहासिक भूल की हैसियत हासिल कर लेगा। बहरहाल भूलों के बाद भूल करती मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पश्चिम बंगाल में एक-एक करके सब कुछ गंवा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनावों में लगातार नुकसान उठा रही पार्टी अपने को संभाल पाती है या उसका भी वही हाल होता है, जो उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी का हुआ है।

Tuesday, September 15, 2009

भूख की जंग का अजेय योद्धा

डॉ. नार्मन बोरलाग नहीं रहे। अमरीका के दक्षिणी राज्य टेक्सॉस में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया और पिछली सदी के सबसे महान व्यक्तियों में से एक ने अपना पूरा जीवन मानवता को समर्पित करके विदा ले ली। उन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। डा. बोरलाग ने भूख के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दुनिया के बड़े हिस्से में भूख को पराजित किया। पूरे दक्षिण अमरीका और एशिया में उन्होंने भूख को बेदखल करने का अभियान चलाया और काफी हद तक सफल रहे।


प्रो. बोरलाग को ग्रीन रिवोल्यूशन का जनक कहा जाता है। हालांकि वे इस उपाधि को स्वीकार करने में बहुत संकोच करते थे। लेकिन सच्ची बात यह है कि 1960 के दशक में भूख के मुकाबिल खड़ी दक्षिण एशिया की जनता को डॉ. नार्मल बोरलाग ने भूख से लड़ने और बच निकलने की तमीज सिखाई। 20 वीं सदी की सबसे खतरनाक समस्या भूख को ही माना जाता है। ज्यादातर विद्वानों ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भविष्यवाणी कर दी थी कि सदी के अंत के दो दशकों में अनाज की इतनी कमी होगी कि बहुत बड़ी संख्या में लोग भूख से मर जाएंगे।

विद्वानों को समझ में नहीं आ रहा था कि किया क्या जाए। इसी दौरान दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर जब नार्मन बोरलाग, वापस आए तो उन्हें अमरीका की बहुत बड़ी रासायनिक कंपनी में नौकरी मिली लेकिन उनका मन नहीं लगा और रॉकफेलर फाउंडेशन के एक प्रोजेक्ट के तहत वे मैक्सिको चले गए। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य मैक्सिको के किसानों को अपनी फसल को सुधारने की जानकारी और ट्रेनिंग देना था। इस योजना को उस वक्त की अमरीकी सरकार का आशीर्वाद प्राप्त था। बोरलाग जब मैक्सिको पहुंचे तो सन्न रह गए, वहां हालात बहुत खराब थे। मिट्टी का पूरा दोहन हो चुका था, बहुत पुराने तरीके से खेती होती थी और किसान इतना भी नहीं पैदा कर सकते थे कि अपने परिवार को दो जून की रोटी खिला सकें।

इसी हालत में इस तपस्वी ने अपना काम शुरू किया। कई वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद गेहूं की ऐसी किस्में विकसित कीं जिनकी वजह से पैदावार कई गुना ज्यादा होने लगी। आमतौर पर गेहूं की पैदावार तीन गुना ज्यादा हो गई और कुछ मामलों में तो चार गुना तक पहुंच गई। मैक्सिको सहित कई अन्य दक्षिण अमरीकी देशों में किसानों में खुशहाली आना शुरू हो गई थी, बहुत कम लोग भूखे सो रहे थे। बाकी दुनिया में भी यही हाल था। 60 का दशक पूरी दुनिया में गरीब आदमी और किसान के लिए बहुत मुश्किल भरा माना जाता है। भारत में भी खेती के वही प्राचीन तरीके थे। पीढ़ियों से चले आ रहे बीज बोए जा रहे थे।

1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई हो चुकी थी, गरीब आदमी और किसान भुखमरी के कगार पर खड़ा था। अमरीका से पी.एल-480 के तहत सहायता में मिलने वाला गेहूं और ज्वार ही भूख मिटाने का मुख्य साधन बन चुका था और कहा जाता था कि भारत की खाद्य समस्या, "शिप इ माउथ" चलती है। यानी अमरीका से आने वाला गेहूं, फौरन भारत के गरीब आदमियों तक पहुंचाया जाता था। ऐसी विकट परिस्थिति में डॉ. बोरलाग भारत आए और हरितक्रांति का सूत्रपात किया। हरित क्रांति के अंतर्गत किसान को अच्छे औजार, सिंचाई के लिए पानी और उन्नत बीज की व्यवस्था की जानी थी जो डॉ. बोरलाग की प्रेरणा से संभव हुआ।

भारत में दो ढाई साल में ही हालात बदल गए और अमरीका से आने वाले अनाज को मना कर दिया गया। भारत एक फूड सरप्लस देश बन चुका था। भारत में हरितक्रांति के लिए तकनीकी मदद तो निश्चित रूप से नॉरमन बोरलाग की वजह से मिली लेकिन भारत के कृषिमंत्री सी. सुब्रहमण्यम ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया और हरित क्रांति के लिए जरूरी प्रशासनिक इंतजाम किया। डा. बोरलाग का अविष्कार था बौना गेहूं और धान जिसने भारत और पाकिस्तान में मुंह बाए खड़ी भुखमरी की समस्या को हमेशा के लिए बौना कर दिया। बाद में चीन ने भी इस टेक्नालोजी का फायदा उठाया।

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Friday, September 11, 2009

हैदराबाद के तख्त की लड़ाई

हैदराबाद के तख्त की लड़ाई निर्णायक मुकाम पर पहुंचने वाली है। राजशेखर रेड्डी की दु:खद मृत्यु के बाद उनके वफादरों का एक वर्ग उनके अनुभवहीन बेटे को गद्दी पर बैठाने की जुगत में है। इन लोगों का कहना है कि वाई.एस.आर. के बेटे, जगनमोहन को मुख्यमंत्री बना देने से पार्टी का बहुत फायदा होगा। दावा किया जा रहा है कि आंध्रप्रदेश के लगभग सभी विधायक और अधिसंख्य सांसद, जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनवाना चाहते हैं।

इसी तरह के और भी बहुत सारे तर्क दिए जा रहे हैं। यह सारे ही तर्क बेमतलब हैं। कोई वंशवाद की जय जयकार कर रहे इन कांग्रेसियों से पूछे कि अगर जगनमोहन रेड्डी के अलावा दिल्ली दरबार में किसी और व्यक्ति को आंध्र प्रदेश की गद्दी सौंप दी जाएगी तो क्या यह जगन ब्रिगेड नए मुख्यमंत्री का समर्थन नहीं करेगा। यह प्रश्न है जो सभी सवालों के जवाब दे देगा। आम तौर पर माना जाता है कि जयकारा लगाने वाले ए नेता सिंहासन से प्रतिबद्घ होते हैं। जो ही राजा बन जाएगा, उसी का चालीसा पढऩे लगेगे।

कांग्रेस आलाकमान के अब तक के संकेत से तो साफ है कि आंध्रप्रदेश में वंशवाद को बढ़ावा नहीं दिया जायेगा। एक तो जगन मोहन रेड्डी बिलकुल अनुभवहीन हैं, दूसरे उनकी ख्याति भी बहुत सकारात्मक नहीं है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में रिटेक नहीं होता यानी दुबारा मौका नहीं मिलता। अगर एक राजनीतिक गलती कर दी तो आंध्रप्रदेश में कांग्रेस का वह हाल भी हो सकता है जो एन.टी. रामाराव ने किया था।

इसलिए सोनिया गांधी कोई भी लूज बाल नहीं फेंकना चाहतीं क्योंकि क्रिकेट में लूज बाल फेंकने पर एक छक्का लगता है लेकिन राजनीतिक में लूज बाल पर छक्का भी लगता है और विकेट भी जाती है। इसलिए कांग्रेस को आंध्रप्रदेश में ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो उस मजबूती को संभाल सके जो राजशेखर रेड्डी की मेहनत से राज्य में मौजूद है। एक और भी तल्ख सच्चाई है जिस पर है कि कांग्रेस आलाकमान की नजर ज़रूर होगी। वह यह कि राज्य में स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी के कद का कोई नेता नहीं है।

सोनिया गांधी के सामने विकल्प बहुत कम हैं और फैसला कठिन। शायद आंध्रप्रदेश के कांग्रेस सांसद और राजशेखर रेड्डी के निजी मित्र के.वी.पी. राव को विकल्पों की कमी का एहसास सबसे ज्यादा है इसीलिए जगनमोहन की ताजपोशी न होने की हालत में वे केंद्र में अपने या जगन मोहन के लिए कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं।

वंशवाद के खिलाफ जाने के मामले पर कांगे्रेस की कोर भी थोड़ी दबी हुई है। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने अपने अनुभवहीन बेटे को उत्तराधिकारी बनाने की योजना बनाई तो एक तरह से कांग्रेस के अंदर रहकर वंशवाद के खिलाफ आवाज उठाने वालों की बोलती सदा के लिए बंद कर दी गई थी। यह परंपरा आज तक कायम है इसलिए जगनमोहन की दावेदारी, वंशवाद का तर्क देकर तो नहीं खारिज की जा सकती। इसके बावजूद भी सोनिया गांधी का अब तक का रुख ऐसा है कि वह राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देकर किसी ऐसे व्यक्ति को सत्ता सौंपना चाहती हैं जो राजनीतिक रूप से सब को स्वीकार्य हो।

यहां यह भी स्पष्ट रूप से समझ लेने की जरुरत है कि सत्तर के दशक में जो कांग्रेस पार्टी ने राज्यों के कद्दावर नेताओं को बौना बनाने का सिलसिला शुरू किया था अब वह पूरी तरह से लागू है और फल फूल रहा है अगर भूला बिसरा कोई नेता किसी राज्य में ताकतवर होता भी है तो वह आलाकमान के आशीर्वाद का मोहताज रहता है। इसलिए यह सोचना ही बेमतलब है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे दिल्ली से नामजद कर दिया जाएगा, उसे विधायक अस्वीकार कर देंगे।

इसलिए जगनमोहन रेड्डी का सारा समर्थन काफूर हो जायेगा जब आलाकमान किसी और को मुख्यमंत्री बना देगा। सारे विधायक उसी के समर्थक हो जाएंगे। इस मामले ने एक बार फिर हमारे लोकतंत्र की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। साठ के दशक तक ज्यादातर राज्यों में कांग्रेसी शासन होता था लेकिन आम तौर पर मुख्यमंत्री के बारे में राज्य की राजधानी में ही फैसला होता था। राज्यों के मुख्यमंत्री आम तौर पर आलाकमान का हिस्सा होते थे। उनका चुनाव आम सहमति से होता था लेकिन वह आम सहमति सोच विचार और बहस के बाद हासिल की जाती थी, हड़काकर नहीं।

बहरहाल, सोनिया गांधी के सामने इस वक्त वह अवसर है कि सच्ची आम सहमति की संस्कृति को फिर से महत्व दे सकती हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने देश की राजनीतिक व्यवस्था में कुछ ऐसे प्रयोग किए हैं जो देश को सही ढर्रे पर ले जा सकते हैं। देखना यह है कि आंध्रप्रदेश में उनका फैसला राजनीतिक परिपक्वता का संदेश देता है या राजनीतिक गुटबाजी और वंशवाद को बढ़ावा देता है।
आंध्रप्रदेश में राजशेखर रेड्डी के बाद किसी को भी मुश्किल पेश आएगी। 2004 में जब राजशेखर रेड्डी ने तेलगुदेशम पार्टी को हराकर कांग्रेस को फिर से सत्ता दिलवाई थी, तो कांग्रेस की हैसियत बहुत कम थी।

पिछले पांच वर्षों में उन्होंने पार्टी को मजबूती दी और दुबारा जीतकर आए लेकिन यह कोई अटल सत्य नहीं है कि कांग्रेस हमेशा के लिए आ गई है। अगर एक फैसला गड़बड़ हुआ कि कांग्रेस फिर वहीं पहुंच जाएगी। जहां एन.टी.आर. ने पहुंचाया था इसलिए यह लोकतंत्र के हित में है कि कांग्रेस आलाकमान सही फैसला ले।

Thursday, September 10, 2009

मूर्तियां जरूरी कि सूखा राहत

मायावती सरकार के मूर्ति बनाने के अभियान पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक लग गया है। सूखे से त्राहि त्राहि कर रहे उत्तरप्रदेश की सरकार, राज्य में हजारों करोड़ रुपए खर्च करके दलित नेताओं और हाथियों की मूर्तियों लगवाने और कांशीराम का स्मारक बनवाने की इतनी हड़बड़ी में है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी अनदेखी कर रही है।

बहरहाल मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को कोई महत्व नहीं दिया और ऐसे सवाल पूछे जो सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। स्टे आर्डर तो नहीं दिया लेकिन सरकार से अंडरटेकिंग लिखवा ली कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से विचाराधीन मामले में कोई फाइनल फैसला नहीं हो जाता, मूर्ति और स्मारक का निर्माण कार्य रोक दिया जाएगा।
जस्टिस बी.एन. अग्रवाल और जस्टिस आफताब आलम की बेंच ने उत्तरप्रदेश सरकार के फैसला लेने की प्रक्रिया की भी न्यायिक समीक्षा की संभावना पर गौर करने की बात की है। बेंच ने कहा कि इस बात की जांच की जाएगी कि क्या किसी भी सरकार को इस तरह के खर्च करने की मंजूरी संविधान में दी गई है।

उत्तरप्रदेश सरकार के वकील सतीश चंद्र मिश्र ने दलील दी कि राजनीतिक कारणों से उनके मुवक्किल यानी उत्तरप्रदेश सरकार पर इस तरह के मुकदमे दायर किए जा रहे है। न्यायालय ने उन्हें तुरंत टोका कि उनका काम मामले के संवैधानिक और कानूनी पहलू पर गौर करना है, राजनीति से अदालत का कोई मतलब नहीं है। उत्तरप्रदेश सरकार के वकील के इस दावे को भी अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया कि मायावती कांशीराम और अंबेडकर की मूर्तियों और स्मारकों की स्थापना का फैसला संविधान सम्मत है, अदालत ने क्योंकि उसे मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिल चुकी है तो माननीय न्यायालय ने कहा कि मामले के इस पहलू की भी जांच की जाएगी कि किसी भी सरकार को जनता के पैसे को इस तरह की योजनाओं पर खर्च करने का संवैधानिक अधिकार है कि नहीं।

सतीश मिश्रा ने यह भी दलील दी कि नेहरू गांधी परिवार की मूर्तियों पर इतना खर्च हो चुका है तो दलितों की मूर्तियों के लिए क्यों मना किया जा रहा है। अदालत ने इस हास्यास्पद दलील पर गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा। सवाल उठता है कि मायावती ने इन मूर्तियों को बनवाने का काम युद्घ स्तर पर क्यों शुरू कर रखा है। इस वक्त उत्तरप्रदेश में किसान सूखे से तड़प रहा है, राज्य में सिंचाई के कोई भी सरकारी साधन नहीं हैं, निजी ट्यूबवेल से सिंचाई नहीं हो पा रही है क्योंकि राज्य में हफ्तों बिजली नहीं आ रही है, खरीफ की फसल तबाह हो चुकी है।

राज्य सरकार के पास कर्मचारियों की तनखाह देने के लिए पैसे भी बड़ी मुश्किल से जुट रहे हैं, कानून व्यवस्था ऐसी है कि कहीं भी, कोई भी किसी को भी झापड़ मार दे रहा है। कई जिलों में मुख्यमंत्री के खास कहे जाने वाले पुलिस वाले मनमानी कर रहे है। अपहरण और लूटमार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। अपना खर्च चलाने के लिए राज्य सरकार केंद्र से अस्सी हजार करोड़ रुपए की मांग कर रही है और मायावती इसे राज्य बनाम केंद्र का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हैं।

किसी भी समझदार मुख्यमंत्री को सूखे जैसी मुसीबत के वक्त अपने लोगों के साथ खड़े रहना चाहिए। उनकी जो भी खेती संभल सके उसमें मदद करनी चाहिए लेकिन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में इस तरह से जुटी है जैसे अब उन्हें दुबारा मौका ही नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट तो अपना संवैधानिक कर्तव्य निभा रहा है लेकिन सरकार को अपना कर्तव्य करने की प्रेरणा देने के लिए सभ्य समाज और जागरूक जनमत का भी कोई फर्ज है।

जरूरत इस बात की है कि उत्तरप्रदेश सरकार को इस बात की जानकारी दी जाये कि राज्य में हाहाकार मचा हुआ है और सरकार का काम है जनता को राहत देना। यह काम आमतौर पर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार का रवैया ऐसा है कि विधान सभा की कोई भूमिका ही नहीं रह गई है। मुख्यमंत्री की सलाहकार सभा में ऐसे लोगों की भरमार है जो राजनीतिक और सामाजिक समझ से दूर रहते हैं और जी हजूरी की कला में पारंगत है। अगर सलाहकार राजा को सही सलाह देने के बजाय चापलूसी करने लगे तो न तो राजा का भला होगा और न ही राज्य का।

उसी तरह, अगर हकीम रोगी की मर्जी से इलाज करे तो भी बहुत ही मुश्किल होगी। उत्तरप्रदेश की हालत को सुधारने के लिए कुछ ऐसे लोगों की जरूरत है जो सच्चाई बयान कर सकें। अगर फौरन ऐसा न हुआ तो बहुत देर हो जाएगी। फिर मूर्तियों को देखने वाले बहुत कम हो जाएंगे या यह भी हो सकता है कि शोषित पीडि़त जनता इन मूर्तियों का वह हाल कर दे जो बाकी तानाशाहों की मूर्तियों का होता रहा है।

इशरत को आतंकी बना देने की हसरत

मुसलमानों को फर्जी मामलों में मार डालने के गुजरात सरकार के एक और कारनामे से पर्दा उठ गया है। जून 2004 में गुजरात पुलिस के बड़े अधिकारियों ने बंबई से उठाकर एक लड़की, इशरत जहां और उसके तीन साथियों की हत्या कर दी थी और इस जघन्य हत्या को एनकाउंटर बताया था। प्रचार यह किया गया कि मारे गए चारों लोग, तश्करे-तैयबा के सदस्य थे और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने जा रहे थे। इस हत्याकांड के भी सरगना वही पुलिस अधिकारी थे जो सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्या में आजकल जेल में हैं।

अब बिलकुल स्पष्ट हो गया है कि डी.जी. वंजारा नाम का एक पुलिस का डी.आई.जी. एक गैंग बनाकर हत्या, लूट और डकैती की घटनाओं को अंजाम देता था। उसके सभी साथी पुलिस वाले ही होते थे। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़कांड में जिन पुलिस वालों को सजा हुई है, वे सभी इशरत जहां और उसके साथियों के फर्जी मुठभेड़ में शामिल थे।यह सारी जानकारी अहमदाबाद के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, एस.पी. तमांग की जांच से मिली है।

अपनी 243 पेज की हाथ से लिखी गई रिपोर्ट में मजिस्ट्रेट ने कहा है कि इन पुलिस वालों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को खुश करके नौकरी में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के चक्कर में निरीह और निहत्थे नौजवानों को मार डाला। जांच से पता चला कि बंबई के मुंब्रा इलाके से डी.जी. वंज़ारा के गिरोह ने इशरत जहां और अन्य तीन लड़कों का अपहरण 12 जून को किया था। इनका फर्जी मुठभेड़ 14 जून 2004 के दिन दिखाया गया यानी पुलिस अधिकारी होते हुए भी इन बच्चों को दो दिन तक अगवा करके रखा। मुठभेड़ के बाद गुजरात सरकार ने दावा किया था कि मारे गए लोगों में से दो पाकिस्तानी नागरिक थे।

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Wednesday, September 9, 2009

मीडिया को शर्म से सिर झुका लेना चाहिए

हत्यारी पुलिस, सांप्रदायिक सरकार, गैर-जिम्मेदार मीडिया : एक बहुत बडे़ टीवी न्यूज चैनल के न्यूज सेक्शन के कर्ताधर्ता, जो उस वक्त तक मेरे मित्र थे, ने जब इशरत जहां की हत्या को इस तरह से अपने चैनल पर पेश करना शुरू किया जैसे देश की सेना किसी दुश्मन देश पर विजय करके लौटी हो, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि खबर की सच्चाई जांच लें।

इतना सुनते ही वे बिफर पडे़ और कहने लगे कि उनके रिपोर्टर ने जांच कर ली है और उन्हें अपने रिपोर्टर पर भरोसा है। मैं न सिर्फ चुप हो गया बल्कि उनसे दोस्ती भी खत्म कर ली। वे श्रीमानजी टीवी के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं। टीवी के कारण उनकी संकुचित हो गई सोच पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ। बात सिर्फ सबसे बड़े न्यूज चैनल की ही नहीं है। उस दौर में इशरत जहां को ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों ने पाकिस्तानी जासूस बताया।

उन सभी टी.वी. चैनलों को अब चाहिए कि वे राष्ट्र से न सिर्फ माफी मांगें बल्कि शर्म से अपना सिर कुछ देर के लिए झुका भी लें। दरअसल, मुसलमानों को फर्जी मामलों में मार डालने के गुजरात सरकार के एक और कारनामे से पर्दा उठने के बाद अब मीडिया को चाहिए कि मोदी के राज में हुए सभी मुठभेड़ों की निष्पक्ष न्यायिक जांच कराने के लिए आवाज उठाए। इशरत जहां मामले में गैर-जिम्मेदारी दिखा चुकी मीडिया के लिए यही प्रायश्चित भी होगा।

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Tuesday, September 8, 2009

आरएसएस के एजेण्डे पर सरदार पटेल

जसवंत सिंह की जिनाह वाली किताब ने और कुछ किया हो या न किया हो लेकिन एक मुद्दे को हमेशा के लिए दफन कर दिया। किताब में सरदार पटेल, नेहरू और जिनाह के हवाले से मुल्क के बंटवारे की जो तसवीर, जसवंत सिंह ने प्रस्तुत की, उसमें कुछ भी नया नहीं है, इतिहासकारों ने उसका बार बार विवेचन किया है। इस किताब का महत्व केवल यह है कि भाजपा और आर.एस.एस. की उन कोशिशों को लगाम लग गई कि सरदार पटेल की सहानुभूति आर.एस.एस. के साथ थी, क्योंकि अब ऐसे सैकड़ों सबूत एक बार फिर से अखबारों में छपने लगे हैं।

जिससे फिर साबित हो गया है कि सरदार पटेल आर.एस.एस. और उसके तत्कालीन मुखिया गोलवलकर को बिलकुल नापसंद करते थे। यहां तक कि गांधी जी की हत्या के मुकदमे के बाद गिरफ्तार किए गए एम.एस. गोलवलकर को सरदार पटेल ने तब रिहा किया जब उन्होंने एक अंडरटेकिंग दी कि आगे से वे और उनका संगठन हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे।

उस अंडरटेकिंग के मुख्य बिंदु ये हैं:-आर.एस.एस. एक लिखित संविधान बनाएगा जो प्रकाशित किया जायेगा, हिंसा और रहस्यात्मकता को छोड़ना होगा, सांस्कृतिक काम तक ही सीमित रहेगा, भारत के संविधान और तिरंगे झंडे के प्रति वफादारी रखेगा और अपने संगठन का लोकतंत्रीकरण करेगा। (पटेल -ए-लाइफ पृष्ठ 497, लेखक राजमोहन गांधी प्रकाशक-नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, 2001) आर.एस.एस. वाले अब इस अंडरटेकिंग को माफीनामा नहीं मानते लेकिन उन दिनों सब यही जानते थे कि गोलवलकर की रिहाई माफी मांगने के बाद ही हुई थी।

बहरहाल हम इसे अंडरटेकिंग ही कहेंगे। इस अंडरटेकिंग को देकर सरदार पटेल से रिहाई मांगने वाले संगठन का मुखिया यह दावा नहीं कर सकता कि सरदार उसके अपने बंदे थे। सरदार पटेल को अपनाने की कोशिशों को उस वक्त भी बड़ा झटका लगा जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री बने और उन्होंने वे कागजात देखे जिसमें बहुत सारी ऐसी सूचनाएं दर्ज हैं जो अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। जब 1947 में सरदार पटेल ने गृहमंत्री के रूप में काम करना शुरू किया तो उन्होंने कुछ लोगों की पहचान अंग्रेजों के मित्र के रूप में की थी। इसमें कम्युनिस्ट थे जो कि 1942 में अंग्रेजों के खैरख्वाह बन गए थे।

पटेल इन्हें शक की निगाह से देखते थे। लिहाजा इन पर उनके विशेष आदेश पर इंटेलीजेंस ब्यूरो की ओर से सर्विलांस रखा जा रहा था। पूरे देश में बहुत सारे ऐसे लोग थे जिनकी अंग्रेज भक्ति की वजह से सरदार पटेल उन पर नजर रख रहे थे। कम्युनिस्टों के अलावा इसमें अंग्रेजों के वफादार राजे महाराजे थे। लेकिन सबसे बड़ी संख्या आर.एस.एस. वालों की थी, जो शक के घेरे में आए लोगों की कुल संख्या का 40 प्रतिशत थे। गौर करने की बात यह है कि महात्मा जी की हत्या के पहले ही, सरदार पटेल आर.एस.एस. को भरोसे लायक संगठन मानने को तैयार नहीं थे। आगे पढ़ें...

Thursday, September 3, 2009

दर्द पर न हों हमदर्द

एक मशहूर फिल्मी गीत है- तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना। भला जो दर्द दे रहा है, अगर उसे दवा देना है तो वह दर्द ही क्यों देगा? यह गीत अपने जमाने में बहुत हिट हुआ था। असल जिंदगी में भी कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो तकलीफ देता है, वह पछताता है और मरहम लगाने पहुंच जाता है लेकिन सियासत में ऐसा नहीं होता। राजनीति में जो दर्द देता है वह अगर दवा देने की कोशिश करता है तो उसे व्यंग्य माना जाता है।

इसलिए जब राजस्थान की यात्रा पर गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि बीजेपी की अस्थिरता लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है तो बात का अलग असर हुआ। उनका कहना था कि मजबूत लोकतंत्र के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों में स्थिरता होनी चाहिए। बात तो ठीक थी। कहीं कोई गलती नहीं है लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह बुरा मान गए। उन्होंन प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिख दी कि भाई, आप अपना काम देखिए देश में सूखा पड़ा है, उसको संभालिए, हमारी चिंता छोड़ दीजिए।

बीजेपी अपने गठन के बाद से सबसे कठिन दौर से गुजर रही है, उसके शीर्ष नेतृत्व में विश्वास का संकट चल रहा है, कौन किसको कब हमले की जद में ले लेगा, बता पाना मुश्किल है। तिकड़म के हर समीकरण पर मैकबेथ की मानसिकता हावी है सभी एक दूसरे पर शक कर रहे हैं। ऐसी हालत में प्रधानमंत्री की बीजेपी का शुभचिंतक बनने की कोशिश, राजनाथ सिंह को अच्छी नहीं लगी। शायद उनको लगा कि मनमोहन सिंह ताने की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं और वे नाराज हो गए।

उनकी पार्टी के प्रवक्ता ने इस घटना को अपनी रूटीन प्रेस कान्फ्रेंस में भी बताया और टीवी चैनलों ने इस को दिन भर चलाया और मजा लिया। ज़ाहिर है कि खबर में जितना रस था सब बाहर आ चुका है और बीजेपी का मीडिया चित्रण एक खिसियानी बिल्ली का हो चुका है जो कभी कभार खंबे वगैरह भी नोच लेती है। आगे पढ़ें...