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Friday, May 13, 2011

सुप्रीम कोर्ट के इंसाफ़ के बाद मुल्क मज़बूत होगा

शेष नारायण सिंह

बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक के बारे में ३० सितम्बर २०१० के इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद संघी बिरादरी के लोग बहुत खुश हुए थे. . उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली थी.वे बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के आपराधिक मुक़दमे को भी उसी फैसले में लपेट कर पेश करने की कोशिश कर रहे थे. जब गृहमंत्री ने कहा कि आपराधिक मुक़दमा और अयोध्या की ज़मीन के मालिकाना हक का मुक़दमा अलग अलग विषय हैं तो आर एस एस वाले लाल पीले होने लगे और उसकी राजनीतिक शाखा के लोग गुस्से में आ गए और उल जलूल बयान देने लगे. आर एस एस के संगठनों के लोग हर उस लेखक के लिए गालियाँ बकने लगे जो फैसले पर किसी तरह का सवाल उठा रहा था . आर एस एस वालों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के उन तीनों जजों को भारत रत्न देने की बात करना शुरू कर दिया . लेकिन सच्चाई यह है कि उन तीनों जजों के एक फैसले ने भारत के आम मुसलमान को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया . इस फैसले के बाद इंसाफ़ पसंद लोगों में चारों तरफ निराशा का माहौल था और लगता था कि आम आदमी को कहीं से भी न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. सबसे अजीब बात यह थी कि उस फैसले को कानून की कसौटी पर कसने की कोई कोशिश ही नहीं की जा रही थी . शान्ति की बात को फोकस में रख कर सारी चर्चा की जा रही थी . इस बात पर कहीं चर्चा नहीं की जा रही थी कि आस्था को नापने का कोई वैज्ञानिक तरीका है क्या? या ज्यूरिसप्रूडेंस की बारीकियां अगर आस्था के आधार पर तय की जायेगीं तो हमारे संविधान का क्या होगा? यह सवाल भी उठाये जाने चाहिए थे कि उस फैसले के बाद संविधान के धर्म निरपेक्ष चरित्र का क्या होता . यह फैसला कोई मामूली फैसला नहीं था . यह एक हाई कोर्ट का फैसला था जिसको बाकी अदालतों में नज़ीर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता था . ख़तरा यह था कि उसके बाद निचली अदालतों से इस तरह के फैसले थोक में आने लगते .

संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले को खारिज कर दिया है और उसे अजीब कहा है . सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उल जलूल फैसले पर कड़ा एतराज़ जताया और ताज्जुब व्यक्त किया . सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान की लाज रख ली वरना हाई कोर्ट का फैसला तो पूरी तरह से मध्यकालीन न्यायपद्धति का उदाहरण था. उसमें कानून कहीं नहीं था, बस आस्था के मुद्दे को केन्द्र में रख कर एक पंचायती फैसला कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट का ९ मई २०११ का फैसला देश में न्याय बहाल करने की दिशा में बहुत दूर तलक जाएगा .इस फैसले में यह सन्देश है कि इंसाफ हमेशा कानून की सही व्याख्या कर के ही किया जा सकता है , आस्था को केंद्र में रख कर नहीं. .बाबरी मस्जिद के मामले से अब लोग ऊब चुके हैं लेकिन यह ठीक बात नहीं है . अगर ऐसा हुआ तो देश को तोड़ने की कोशिश कर रही ताक़तें कुछ भी कहर बरपा कर सकती हैं .अब उम्मीद की जानी चाहिये कि बाबरी मस्जिद की ज़मीन के बारे में सुप्रीम कोर्ट सारे तथ्यों पर गौर करके एक सही फैसला करेगी . सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आर एस एस और उसके मातहत संगठनों में हडकंप है . बीजेपी के प्रवक्ता गण कहने लगे हैं कि मुसलमानों को दरियादिली दिखानी चाहिए और उन्हें सारी ज़मीन राम मंदिर के लिए दे देनी चाहिए . अगर यह मान भी लिया जाए कि मुसलमानों में आम राय बनती है कि सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा जीतने के बाद ज़मीन राममंदिर के लिए दे दी जाए तो वे आर एस एस वालों को तो कभी नहीं देगें . जिस आर एस एस ने बाबरी मस्जिद का विरोध करते हुए पूरे देश के मुसलमानों और ९८ प्रतिशत हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पंहुचाया है . लेकिन अभी इन बातों का वक़्त बिलकुल नहीं है . अभी तो देश की एकता के रास्ते में आर एस एस और ३० सितम्बर के फैसलें ने जो रुकावटें पैदा कीथीं उसे दुरुस्त करने का वक़्त है . खुशी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को फटकार करके पहला क़दम उठा लिया है .

Sunday, October 3, 2010

चली है रस्म जहां के कोई न सर उठा के चले

शेष नारायण सिंह

बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक के फैसले के बाद संघी बिरादरी खुश है . उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है और अब वे बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के आपराधिक मुक़दमे को भी इसी में लपेट कर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. शायद इसीलिए जब गृहमंत्री ने कहा कि आपराधिक मुक़दमा अपनी जगह है और यह फैसला अपनी जगह तो संघ की राजनीतिक शाखा के लोग गुस्से में आ गए और बयान देने लगे. टेलेविज़न की कृपा से पत्रकार बने कुछ लोग अखबारों में लेख लिखने लगे कि देश की जनता ने शान्ति को बनाए रखने की दिशा में जो काम किया है वह बहुत ही अहम है. आर एस एस के संगठनों के लोग हर उस लेखक के लिए गालियाँ बक रहे हैं जो फैसले पर किसी तरह का सवाल उठा रहा है. लेकिन सवाल तो उठ रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिये कि अगले कुछ दिनों में अयोध्या की विवादित ज़मीन के फैसले में जो सूराख हैं वह सारी दुनिया के सामने आ जायेगें . इस बीच धर्मनिरपेक्ष ताक़तों में भी कमजोरी नज़र आ रही है . आम तौर पर सही सोच वाले बहुत सारे लोग अब अजीब बात करने लगे हैं . वह कह रहें हैं कि कितना संयम बरत रहा है हिंदुस्तान . कोई हिंसा नहीं . आम मुसलमान उन्हें याद आ गया है जो सिर्फ रोज़ी रोटी चाहता है . कह रहे हैं कि वह बहुत खुश है फैसले से . सरकार की तारीफ़ कर रहे हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के उन तीनों जजों को भारत रत्न देने की बात कर रहे हैं जिन्होंने यह फैसला सुनाया आज भारत के आम मुसलमान को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है और उस से उम्मीद की जा रही है की वह खुश रहे . पिछले दो महीने से इस फैसले के आने की खबर को इतनी हवा दी गयी है की आम मुसलमान डरा हुआ है कि पता नहीं क्या होगा. ऐसे में सवाल यह उठता है की अगर फैसला कानून के आधार पर हुआ होता और आस्था के आधार पर न हुआ होता ,तो भी क्या इतना ही संयम रहता . सब को मालूम है की संघी बिरादारी बहुत पहले से कहती आ रही थी कि अगर फैसला सुन्नी वक्फ बोर्ड के पक्ष में गया तो वे इस फैसले को नहीं मानेगें. ज़ाहिर है कि फैसला आर एस एस का पसंद का आया है ,इसलिए वे संयम की बात कर रहे हैं . इस तथाकथित संयम के अलम्बरदार यह भी कह रहे हैं की मुसलमान ने संयम दिखा कर बहुत अच्छा किया . इसका अर्थ यह हुआ कि पहले जो भी दंगे होते थे वह मुसलमान की करवाता था. इस फैसले के बाद लगता है कि अब आम आदमी को कहीं से भी न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. सबसे अजीब बात यह है कि इस फैसले को कानून की कसौटी पर कसने की कोई कोशिश ही नहीं की जा रही है . शान्ति की बात को फोकस में रख कर सारी चर्चा की जा रही है . इस बात पर कहीं चर्चा नहीं की जा रही है कि आस्था को नापने का कोई वैज्ञानिक तरीका है क्या? या ज्यूरिसप्रूडेंस की बारीकियां अगर आस्था के आधार पर तय की जायेगीं तो हमारे संविधान का क्या होगा? यह सवाल भी उठाये जाने चाहिए कि कि इस फैसले के बाद संविधान के धर्म निरपेक्ष चरित्र का क्या होगा. यह फैसला कोई मामूली फैसला नहीं है. यह एक हाई कोर्ट का फैसला है ज्सिको कि बाकी अदालतों में नज़ीर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है . जिसके बाद निचली अदालतों से इस तरह के फैसले थोक में आने लगेगें.
इस बीच खबर है कि दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवियों ने इस फैसले से पैदा होने वाले नतीजों के बारे में विचार किया है और तय किया गया है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर यह आदेश लेने की कोशिश करेगें कि क्या आस्था के सवाल पर अदालत को फैसला देने की आज़ादी है . यह भी सवाल पूछा जाएगा कि क्या कानून को दरकिनार करके किसी विवाद पर आया फैसला मानने के लिए जनता को बाध्य किया जा सकता है . कुछ जागरूक वर्गों की कोशिश है कि सभी राजनीतिक दलों को भी इस फैसले पर अपनी राय बनाने को मजबूर किया जाए, उनसे सार्वजनिक मंचों से सवाल किये जाएँ और भारत के संविधान को बचाने की कोशिश में ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल किया जाये.
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Friday, April 2, 2010

दंगें फैलाने वालों को नाकाम करो

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले के एक बहुत छोटे से कस्बे खतौली में भी दंगा हो गया है .इसके पहले बरेली में हुआ था. ह्यद४एरबद में दंगा चल ही रहा है . इसी तरह से और भी इलाकों में छिटपुट घटनाएं हो रही हैं . अगर कहीं मामला थोडा और गरम हो जाए तो छोटी मोटी घटनाओं को दंगा बनने में देर नहीं लगती. .अब उत्तर भारत में मौसम भी गरम हो रहा है .ऐसे मौसम में मामूली विवाद भी बढ़ जाता है और अगर झगडा अलग अलग सम्प्रदाय के लोगों के बीच हो तो निहित स्वार्थ वाले उसे दंगे में बदल देते हैं .जब दंगा होता है तो चारों तरफ पागलपन का माहौल बन जाता है और सब अंधे हो जाते हैं . ज़ाहिर है कि समझदारी की बात कोई नहीं करता. दंगा वास्तव में सभ्य समाज पर कलंक है . सवाल यह पैदा होता है कि दंगे होते क्यों हैं .सीधा सा जवाब यह है कि राजनीति में सक्रिय लोग लोगों को बेचारा साबित करने के लिए दंगा करवाते हैं .अंग्रेजों ने जब 19२० के महात्मा गाँधी के आन्दोलन में देखा कि पूरा मुल्क गाँधी के साथ खड़ा है . हिन्दू मुसलमान एक दूसरे के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रहे है तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रबंधकों को लगा कि अगर पूरा देश एक हो गया तो मुट्ठी भर अँगरेज़ भारत में राज नहीं कर सकेंगें . अंग्रेजों ने तय किया कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फर्क डाले बिना भारत को गुलाम नहीं बनाया जा सकता. १९२० के बाद के भारत की राजनीति पर गौर करें तो साफ़ नज़र आ जाएगा कि अंग्रेजों ने हर स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम विभेद की योजना बना दी थी. मुस्लिम लीग को फिर से महात्मा गाँधी से अलग किया, आर एस एस की स्थापना करवाई और वी डी सावरकर को खुला छोड़ दिया. सावरकार को ड्यूटी दी गयी कि वे हिन्दू मात्र को गाँधी से दूर ले जाएँ. इसी दौर में सावरकार ने अपनी किताब हिन्दुत्व लिखी जिसमें हिन्दू धर्म को राजनीति के लिए इस्तेमाल करने की बात की गयी. अंग्रेजों के आशीर्वाद से पहला संगठित दंगा १९२७ में नागपुर में आयोजित किया गया जिसमें आर एस एस वालों ने प्रमुख भूमिका निभाई. सावरकार पूरी तरह से अंग्रेजों के सेवक बन ही चुके थे . जेल में वी. डी .सावरकर सजायाफ्ता कैदी नम्बर ३२७७८ के रूप में जाने जाते थे . उन्होंने अपने माफीनामे में साफ़ लिखा था कि अगर उन्हें रिहा कर दिया गया तो वे आगे से अंग्रेजों के हुक्म को मानकर ही काम करेंगें . सावरकर के भक्तों को लगता है कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी नहीं माँगी होगी. ऐसे शंकालु लोगों को चाहिए कि वे नैशनल आर्काइव्ज़ चले जाएँ, वहांसावरकर का माफीनामा बहुत ही संभाल कर रखा हुआ है और इतिहास के किसी भी शोधकर्ता के लिए वह उपलब्ध है . बहरहाल सच्चाई यह है कि आर एस एस उसके सहयोगी संगठन और मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति के झंडाबरदार ही दंगे करवाते हैं .


सवाल यह उठता है कि सभ्य समाज के लोग दंगा रोकने के लिए क्या काम करें . क्योंकि अब दंगे तो बार बार होंगें क्योंकि बी जे पी के नए अध्यक्ष ने तय कर लिया है कि हिन्दुत्व की बिसात पर ही अब उतर भारत में चुनाव लड़े जाने हैं . १९८४ में दो सीटें जीतने के बाद कोलकता में जब आर एस एस के आला नेताओं की बैठक हुई तो उसमें अटल बिहारी वाजपेयी को फटकार दिया गया था और उन्हें बता दिया गया था कि राग हिन्दुत्व ही चलेगा, गांधियन समाजवाद से सीटें बढ़ने वाली नहीं है . दुनिया जानती है कि उसके बाद आर एस एस ने बाबरी मस्जिद के मुद्दे को हवा दी. शहाबुद्दीन टाइप कुछ गैर ज़िम्मेदार मुसलमान उनके हाथों में खेलने लगे.. आडवानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा की. गाँव गाँव से नौजवानों को भगवान राम के नाम पर इकट्ठा किया गया और माहौल पूरी तरह से साम्प्रदायिक बना दिया गया. उधर बाबरी मस्जिद के नाम पर मुनाफा कमा रहे कुछ गैर ज़िम्मेदार मुसलमानों ने वही किया जिस से आर एस एस को फायदा हुआ. हद तो तब हो गयी जब मुसलमानों के नाम पर सियासत कर रहे लोगों ने २६ जनवरी के बहिष्कार की घोषणा कर दी. बी जे पी को इस से बढ़िया गिफ्ट दिया ही नहीं जा सकता था. उन लोगों ने इन गैर ज़िम्मेदार मुसलमानों के काम को पूरे मुस्लिम समाज के मत्थे मढ़ने की कोशिश की .

सवाल यह उठता है कि दंगों को रोकने के लिएय धर्म निरपेक्ष बिरादरी को क्या करना चाहिए . संघ वाले तो अब दंगों के बाद के ध्रुवीकरण के सहारे वोट बटोरने की योजना बना चुके हैं . दंगों को रोकने के लिए ज़रूरी यह है कि लोगों को जानकारी डी जाए कि दंगें होते कैसे हैं . जिन लोगों ने भीष्म साहनी की किताब तमस पढी है या उस पर बना सीरियल देखा है . उन्हें मालूम है १९४७ के बंटवारे के पहले आर एस एस वालों ने किस तरह से एक गरीब आदमी को पैसा देकर मस्जिद में सूअर फेंकवाया था. भीष्म जी ने बताया था कि वह एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी थी. या १९८० के मुरादाबाद दंगों की योजना बनाने वालों ईद की नमाज़ के वक़्त मस्जिद में सूअर हांक दिया था . दंगा करवाने वाले इसी तरह के काम कर सकते हैं . हो सकता है कि कुछ नए तरीके भी ईजाद करें . कोशिश की जानी चाहिए कि मुसलमान इस तरह के किसी भी भड़काऊ काम को नज़र अंदाज़ करें . क्योंक दंगों में सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमान का ही होता है . जहां तक फायदे की बात है वह बी जे पी का होगा क्योंकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद वोटों की खेती आर एस एस की ही लहलहाती है .इस लिए दंगों को रोकने के लिए संघ की किसी भी योजना को नाकाम करना आज की राष्ट्रीय प्राथमिकता है . बरेली, हैदराबाद और खतौली में तो दंगें हो गए अब आगे न होने पायें यही कोशिश करनी चाहिय .

Sunday, March 28, 2010

झूठ बोलने वालों को अब काला कौव्वा नहीं काटता

शेष नारायण सिंह

कहावत है कि जो झूठ बोलता है उसे कौव्वा काट लेता है .. लगता है यह बात बहुत पुरानी हो गयी.क्योंकि आजकल तो बहुत सारे नेता दिन रात झूठ बोलते हैं और उन्हें कोई कौवा नहीं काटता.. बी जे पी के नेता .लाल कृष्ण आडवानी ने बार बार दावा किया है कि वे कभी झूठ नहीं बोलते .. जानकार कहते हैं कि उनके बयानों में कई कई अर्थों को आत्मसात कर लेने की क्षमता होती है , लगता है कि अपने इस कौशल की वजह से ही माननीय आडवानी जी इस बार झूठ बोलते पकड़ लिए गए हैं .. ६ दिसंबर ,१९९२ के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उन्होंने सार्वजनिक बयान दिया था कि वह उनके जीवन का सबसे दुःख भरा दिन था. आज तक माना जा रहा था कि यह पूरी तरह से सच है . लेकिन अब एक बार फिर आडवाणी की गलतबयानी के पुख्ता सबूत सार्वजनिक मंच पर फेंक दिए गए हैं. ६ दिसंबर १९९२ के दिन आडवाणी की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए तैनात आई पी एस अफसर अंजू गुप्ता ने सी बी आई कोर्ट में बयान दिया है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले और बाद में आडवाणी बहुत खुश थे .. ज़ाहिर हैं एक आई पी एस अफसर की बात को गंभीरता से लेना पड़ेगा क्योंकि उसने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के और अपनी ड्यूटी निभाने के लिए ही कोर्ट में बयान दिया है . उसने शपथ ली है कि वह झूठ नहीं बोलेगी तो उसकी बात का विश्वास किया जाना चाहिए.. इस अफसर के बयान ने एक बार फिर आडवाणी को झूठ बोलने वाला नेता साबित कर दिया है . क्योंकि ६ दिसंबर १९९२२ के दिन आडवाणी के पास दुखी होने की फुर्सत ही नहीं थी, वह तो उनके जीवन का खुशी से भरा एक दिन था.

अंजू गुप्ता ने अपने बयान में बताया कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले आडवाणी ने एक भड़काऊ भाषण दिया . बयान में है कि आडवाणी बहुत उत्साहित थे . उन्होंने कारसेवकों को उत्साह से भर दिया , उन्होंने कहा कि भव्य राम मंदिर उसी २.७७ एकड़ ज़मीन पर बनेगा जहां बाबरी मस्जिद मौजूद थी. आडवाणी ने उस दिन फैजाबाद जिले के पुलिस कप्तान और जिलाधिकारी को तलब किया और उनसे भी बात चीत की. जिस मंच पर आडवाणी के साथ मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा आदि नेता मौजूद थे ,उस पर भी हर्ष और उल्लास का माहौल था. जब बाबरी मस्जिद के गुम्बद गिरने लगे तो मंच पर मौजूद नेता एक दूसरे को बधाई दे रहे थे. उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा गले मिलीं और खुशी का इज़हार किया.इन लोगों ने आडवाणी , जोशी और पूर्व पुलिस महानिदेशक , श्रीश चंद दीक्षित को भी गले मिलकर बधाई दी. श्रीश चंद दीक्षित ने वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को धन्यवाद दिया कि उन लोगों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस में कोई अड़चन नहीं डाली.

बी जे पी के वे नेता जो बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने वाले केस में पकडे गए हैं ,वे पिछले १८ वर्षों से कह रहे हैं कि मस्जिद की तबाही में उनका कोई योगदान नहीं है ,अब झूठ बोलते पकड़ लिए गए हैं. मस्जिद के खिलाफ चले आन्दोलन में और उसके बाद राजनीतिक लाभ के लिए तो यह नेता शेखी बघारते रहे हैं लेकिन कानूनी मंचों पर तैयार किया गया बयान देते रहे हैं . अंजू गुप्ता की गवाही के बाद इन नेताओं के लिए मुश्किल पैदा हो गयी है . क्योंकि आपराधिक काम में अगर इन लोगों की साज़िश साबित हो जायेगी तो सबको इतने वर्षों की सज़ा होगी तो यह लोग चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिए जायेंगें . इस वक़्त बाबरी मस्जिद विध्वंस केस के अभियुक्त बी जे पी नेताओं को जो डर है वह इसी संभावना की गंभीरता को लेकर है..एक वक़्त था जब इन्हीं बी जे पी नेताओं के साथ बड़ी संख्या में लोग थे . आज आलम यह है कि आम जनता का तो सवाल ही नहीं, इनकी अपनी पार्टी के नेता चाहते हैं कि यह लोग चुनाव के मैदान से बाहर हों तो आसानी होगी. ज़ाहिर है कि चुनाव की राजनीति से बाहर होने पर हर नेता को तकलीफ होगी. क्योंकि ज़्यादातर नेता चुनाव के ज़रिये ही अपने आप को सम्मान दिला सकते हैं .
मीडिया की सजगता की वजह से इन लोगों को सज़ा से बचने की संभावना बहुत कम है . यह ठीक भी है .. . बाबरी मस्जिद को सिम्बल बनाकार मुसलमानों के खिलाफ ज़हर घोलने के आन्दोलन के पीछे और कोई इरादा नहीं था. इरादा था तो सिर्फ लगातार पिछड़ रही बी जे पी को चुनावी सफलता दिलाना . लेकिन अब वह सब ख़त्म हो चुका है .बी जे पी चुनाव में सफल भी हुई, सरकार भी बनाया . इसके नेता भी उसी तरह से घूस के कारोबार में लग गए जैसे इनके पहले कांग्रेसी और समाजवादी लगते रहे हैं . आज बी जे पी फिर असमंजस में है .कहीं कोई मुद्दा नहीं है जिसके खिलाफ बी जे पी वाले ऐलानियाँ मैदान ले सकें . घूस खोरी के बहुत सारे मामलों में बी जे पी के के नेताओं के नाम आ जाने के बाद अब उनकी बात में वह दम नहीं जो सत्ता में आने के पहले तक होता था. सत्ता पाते ही उन लोगों ने साबित कर दिया के अपने पूर्वज कांग्रेसी नेताओं से बेहतर तरीके से बे-ईमानी कर सकते हैं . इसलिए बाबरी मस्जिद के विध्वंस के अभियुक्तों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलने के लिए माहौल बिलकुल दुरस्त है . इस लिए अदालत को चाहिए कि इन लोगों को सख्त से सख्त सज़ा दें . ताकि आने वाले वक़्त में कोई भी पार्टी चन्द सीटों के लिए देश में दंगे न फैलाए. दुनिया जानती है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले और बाद में आर एस एस के मातहत संगठनों ने जिस तरह से खून खराबा किया था. उसकी सज़ा भी कोई मामूली नहीं होनी चाहिए . सभ्य समाज को उम्मीद है कि राय बरेली की विशेष अदालत में सही न्याय होगा .

Monday, March 15, 2010

बरेली के दंगे और नरेंद्र मोदी की ताजपोशी की तैयारी

शेष नारायण सिंह

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के संभावित दावेदार के रूप में पेश करके बी जे पी अध्यक्ष,नितिन गडकरी ने एक साथ कई निशानों पर तीर मारा है .पार्टी के आडवाणी गुट से मिल रही चुनौती को उन्होंने बिलकुल भोथरा कर दिया है .इस गुट के बाकी नेताओं की यह हैसियत तो है नहीं कि अपने ही गुट के अन्नदाता नरेन्द्र मोदी से पंगा लें. इस लिए अब दिल्ली में रहकर सियासी शतरंज खेलने वाले नेता लोग राग मजबूरी में काम करने लगेंगें. जानकार बताते हैं कि गडकरी के बयान के बाद आर एस एस के दंगाई सक्रिय हो जायेंगें और देश के अलग अलग इलाकों में दंगें शुरू हो जायेंगें क्यंकि बी जे पी की राजनीति को धार दंगों के बाद ही मिलती है . उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में करीब २ हफ्ते से चल रहे कर्फ्यू को इसी सच्चाई की रोशनी में देखा जाना चाहिए.बरेली के दंगें में सियासत की कई परते हैं .सबसे अहम तो यह है कि १९९१ से ही बी जे पी ने बरेली की लोकसभा सीट को अपनी सीट मान रखा है .बाबरी मस्जिद के खिलाफ बी जे पी के अभियान के दौरान यहाँ से पहली बार बी जे पी का उम्मीदवार जीता था. जो २००४ तक जीतता रहा लेकिन लोकसभा -२००९ में यहाँ से कांग्रेस जीत गयी. कांग्रेस के नेता लोग भी अब बरेली को अपनी सीट मानने लगे हैं . उनके कुछ नेता बरेली जाते रहते हैं और वहां की सबसे पवित्र दरगाह, पर अपनी श्रद्धा दिखाते रहते हैं .यानी कांग्रेस अब बरेली को अपनी सीट के रूप में पक्का करने की कोशिश कर रही है . यह बात बी जे पी को बिलकुल पसंद नहीं है . बी एस पी भी इस राजनीतिक घटनाक्रम से बहुत नाराज़ है . वैसे भी उत्तरप्रदेश में कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी बी एस पी के प्रभाव वाले इलाकों में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाकर बी एस पी लीडरशिप को डराते रहते हैं . बरेली में कांग्रेस की मजबूती को कमज़ोर करने की चिंता बी एस पी के एजेंडे में भी है. जहां तक बी जे पी की बात है उसकी तो जांची परखी नीति है कि दंगे के बाद जो राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है , उस से पार्टी का फायदा होता है . इस तरह से कई तरह के राजनीतिक सोच के माहौल के बीच २ मार्च को बारावफात के जुलूस से सम्बंधित एक मामूली विवाद के बीच पुलिस ने एक धार्मिक नेता को गिरफ्तार कर लिया. काफी जाच पड़ताल के बाद पुलिस को पता लगा कि उस धार्र्मिक नेता का कोई कुसूर नहीं था लिहाज़ा उसे छोड़ दिया गया . बी जे पी के हाथ एक भड़काऊ मुद्दा लग गया और उसके नेता मुस्लिम धार्मिक नेता की रिहाई का विरोध करने लगे . अफवाहें फैलने लगीं, आगज़नी और तोड़ फोड़ की घटनाएं शुरू हो गयीं. एक मित्र ने कहा कि बी एस पी तो मुसलमानों की हमदर्द जमात है , वह दंगें को क्यों भड़का रही है . जवाब साफ़ है कि बरेली में अगर किसी वजह से उनका अपना फायदा नहीं होता तो वे कांग्रेस का नुकसान करने की गरज से बी जे पी को ही फायदा पंहुचा देगें क्योंकि बी एस पी की नज़र में अब बी जे पी मायावती की ताक़त को किसी इतरह से चुनौती नहीं दे सकती. . दूसरी बात यह है कि नौकरशाही आजकल बहुत ही साम्प्रदायिक हो गयी है ,उसे मुसलमान को परेशान होते देख कर मज़ा आने लगा है . लेकिन एक हकीकत से और भी ध्यान नहीं हटाना चाहिए कि बरेली का दंगा आर एस एस और बी जे पी की पूरी गेम में एक बहुत मामूली चाल है . हालांकि बी जे पी नेतृत्व ने इस मामले को प्रहसन बनाने की पूरी कोशिश की है और बहुत ही मामूली टाइप के नेताओं को वहां भेज कर मामले को साधारण साबित करने में जुट गए हैं . भला बताइये, साम्प्रदायिक दंगें की जांच करने वाले सांसदों के दल में ,गोरखपुर के योगी आदित्य नाथ बतौर सदस्य नामित किये गए हैं. कोई गडकरी से पूछे के आप वहां दंगा भड़काना चाहते हैं या वहां कुछ शान्ति करना चाहते हैं . क्योंकि आदित्य नाथ की ख्याति एक खूंखार मुस्लिम विरोधी की है और उनका नाम सुन कर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भड़क सकते हैं ..

बहरहाल सच्चाई यह है कि बी जे पी ने अपनी उसी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है जो उसने १९८६ में अपनाई थी. देश भर के शहरों में दंगें हए, बाबरी मस्जिद के खिलाफ आन्दोलन चला , आडवानी की रथयात्रा हुई और जहां जहां से रथ गुज़रा ,वह इलाका दंगों की चपेट में आया . बहुत सारे दंगाई लोग राष्ट्रीय नेता बन गए , बाबरी मस्जिद ढहाई गयी , फिर दंगें हुए और बी जे पी की ताजपोशी हुई . उसी तरह से २००२ के विधान सभा चुनावों के पहले पूरी तरह से हाशिये पर पंहुच चुकी बी जे पी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात नरसंहार की योजना पर काम किया और मोदी दुबारा सत्ता में आ गए.. इन्हीं मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर पूरे देश में गोधरा टाइप हालात पैदा करने की संघ की योजना में बरेली को पहली कड़ी माना जा सकता है . ऐसी हालत में देश की सभी धर्मनिरपेक्ष जमातों को चाहिए कि बी जे पी और संघ की इस साज़िश को बेनकाब करें और मोदी को प्रधानमंत्री पद पर बैठाने के आर एस एस के सपने पर ब्रेक लगाएं . मौजूदा परिस्थितियों में मुसलमानों की भी ज़िम्मेदारी कम नहीं है . उन्हें चाहिए कि एक राजनीतिक नेतृत्व का विकास करें और धार्मिक नेताओं से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें कि वे दीनी मामलों तक ही अपने आप को सीमित कर के रखें . राजनीतिक मामले राजनीति के सहारे हल होने चाहिए और उसमें धार्मिक नेताओं की भूमिका से नुकसान ज्यादा होता है . एक बात पर और भी गौर करना पड़ेगा कि बाबरी मस्जिद के खिलाफ चले आर एस एस के अभियान के वक़्त जिस तरह से कुछ स्वार्थी मुसलमान नेता बन कर डोलने लगे थे उन्हें भी कौम का नेता बनने का मौक़ा न दें . अगर सेकुलर जमातें और मुसलमान संभल न गए तो गडकरी-भागवत-मोदी की टोली देश में भयानक साम्प्रदायिक हालात पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी.

Thursday, December 10, 2009

हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को एक बताने की राजनीति

शेष नारायण सिंह

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के सत्रह साल पूरे हो गए. . इन सत्रह वर्षो में अपनी योजना के अनुसार हिन्दुववादी राजनीतिक ताक़तों ने सत्ता के हर तरह के सुख का आनंद ले लिया. पहले वी पी सिंह की कठपुतली सरकार बनवाई, फिर पी वी नरसिंह राव को सत्ता में बने रहने दिया, हालांकि संघ की इतनी ताक़त थी कि जब चाहते उसे ज़मींदोज़ कर सकते थे लेकिन नरसिंह राव, संघ का ही कम कर रहे थे इसलिए उन्हें बना रहने दिया.. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी को गद्दी पर बैठाकर आर एस एस ने भारतीय गणतंत्र की संस्थाओं को ढहाने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया. शिक्षा के भगवाकरण का काम मुरली मनोहर जोशी को सौंपा और अन्य भरोसे के बन्दों को सही जगह पर लगा दिया . योजना यह थी कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और भ्रष्टाचार से मुक्ति जैसे कार्यों के ज़रिये जनता को अपने पक्ष में रखा जाएगा जिससे वह बार बार वोट देकर आर एस एस की पार्टी को सत्तासीन करती रहे . इसी सोच के तहत गुजरात की राज्य सरकार चलाने का मंसूबा बनाया गया था जो लगभग योजना के अनुसार चल रही है और किसी भी बहस में जब नरेन्द्र मोदी की साम्प्रादायिक राजनीति का सवाल उठाने की कोशिश की जाती है तो संघी चिन्तक और पत्रकार साफ़ कह देते हैं कि जनता ने मोदी को वोट देकर जिताया है और उन्हें अपनी राजनीतिक यानी हिन्दुत्ववादी योजना को लागू करने का अधिकार दिया है . आर एस एस वालों ने केंद्र सरकार के लिये भी ऐसा ही कुछ सोचा था लेकिन बात उलट गयी. केंद्र सरकार में सक्रिय बी जे पी वाले भ्रष्टाचार की उन बुलंदियों पर पंहुच गए जहां तक उनके पहले के कांग्रेसियों की जाने की हिम्मत नहीं पडी थी . बी जे पी अध्यक्ष , को टी वी के परदे पर घूस के रूपये झटकते पूरे देश ने देखा, मुंबई के एक धन्धेबाज़ भाजपाई ने तो ऐसे रिकॉर्ड बनाए जिसमें बोफोर्स की ६५ करोड़ की घूस की रक़म होटल के बैरे को दी जाने वाली टिप जैसी लगने लगी. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में अक्सर चर्चा सुनी जाती थी कि तत्कालीन प्रधान मंत्री के एक दामादनुमा रिश्तेदार ने तो २० करोड़ के नीचे की रक़म कभी बतौर बयाना भी नहीं पकड़ी.मतलब यह कि बी जे पी की अगुवाई वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भ्रष्टाचार की उदाहरण बन गयी और उसकी रिश्वत खोरी की कथाएं इतनी चलीं कि कांग्रेस के भ्रष्ट नेतागण महात्मा लगने लगे. कुल मिलाकर स्वच्छ और कुशल प्रशासन की आड़ में में संघी एजेंडा लागू करने के सपने हमेशा के लिए दफन हो गए. जैसा कि प्रकृति का नियम है कि काठ की हांडी एक बार से ज्यादा नहीं चढ़ सकती, इसलिए अब हिन्दुत्व को हिन्दू धर्मं बताकर सत्ता हड़पने की कोशिश ख़त्म हो चुकी है लेकिन किसी और राजनीतिक कार्यक्रम के अभाव में फिर से हिंदुत्व को जिंदा करने की कोशिश शुरू हो गयी है . नागपुर के सर्वाच्च अधिकारी ने इस आशय का नारा दे दिया है लेकिन इस बार खेल थोडा बदला हुआ है . अबकी मुसलमानों को भी साथ लेने की बात की जा रही है . मुसलमानों के धार्मिक नेताओं के दरवाज़े पर फेरी लगाई जा रही है और बताया जा रहा है कि भारत में रहने वाले सभी मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे... बाबरी मस्जिद की राजनीति के बाद अवाम की ऑंखें बहुत सारे मामलों में खुल गयी थीं . एक तो यही कि धर्म के नाम पर पैसा बटोरने वाला कभी भी ईमानदार नहीं रह सकता. आर एस एस का तो बहुत नुकसान हुआ, क्योंकि लोगों को समझ में आ गया कि राममंदिर के नाम पर किये गए आन्दोलन का इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिए करने वाले लोग धोखेबाज़ होते हैं . मुसलमानों में भी कुछ महत्वाकांक्षी लोग आगे आ गए थे . बाबरी मस्जिद की हिफाज़त के आन्दोलन में शामिल बहुत सारे मुस्लिम नेता ३-४ साल के अन्दर ही बहुत मालदार हो गए थे. कुछ लोग केंद्र और राज्यों में मंत्री बने और कुछ लोग राजदूत वगैरह बन गए. गरज यह कि जनता को अब सब कुछ मालूम पड़ चुका है और ऐसा लगता है कि धर्म के नाम पर राजनीति करके धोखा देने वालों को वह बख्शने वाली नहीं है .. पिछले २३ वर्षों की राजनीति का यह एक बड़ा सबक रहेगा अगर जनता यह मान ले धर्म की बात करने वालों से धर्म की बात तो की जायेगी लेकिन अगर वे राजनीति की बात करने लगेंगें तो उनसे उसी तरह का बर्ताव किया जाएगा जिस तरह उत्तर प्रदेश की जनता ने बी जे पी से करना शुरू कर दिया है . अगर धर्मनिरपेक्षता की बहस को कुछ देर के लिए भूल भी जाएँ तो बाबरी मस्जिद के नाम पर धंधा करने वालों का जो हस्र हुआ उसे देख कर शायद भविष्य में शातिर से शातिर ठग भी धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने की हिम्मत नहीं करेगा. उस राजनीति में शामिल नेताओं ने पैसा-कौड़ी तो चाहे जितना बना लिया हो लेकिन उनकी विश्वसनीयता शून्य के आसपास ही मंडराती रहती है . शायद इसीलिए इस बार आर एस एस के मुखिया के बयानों में कुछ ट्विस्ट है . आजकल वे कहते पाए जा रहे हैं कि राममंदिर के लिए संतसमाज के आन्दोलन को वे समर्थन देंगें..यानी उन्हें भी इस बात का अंदाज़ लग गया है कि धर्म के नाम पर राजनीति करके सत्ता नहीं मिलने वाली है .बाबरी मस्जिद के खिलाफ जब आर एस एस ने आन्दोलन शुरू किया था तो सूचना की क्रान्ति नहीं आई थी . बहुत सारी बातें ऐसी भी लोगों ने सच मान ली थीं जो कि वास्तव में झूठ थीं लेकिन किसी मकसद को हासिल करने के लिए निहित स्वार्थ के लोग फैला रहे थे .अब ऐसा नहीं है . किसी भी नेता के लिए झूठ बोलकर पार पाना मुश्किल है क्योंकि चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल ऐसा नहीं होने देंगें . इसलिए ऐसा लगता है कि अब धार्मिक आधार पर राजनीतिक लाभ के लिए, आम आदमी को उकसाना उतना आसान नहीं होगा, जितना बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले था

Thursday, November 26, 2009

भागलपुर में दंगा पीड़ितों को मदद----एक ऐतिहासिक क़दम

शेषनारायण सिंह


बीस साल पहले जब भागलपुर में दंगे हुए थे तो पूरे देश में आतंक फ़ैल गया था. मुसलमानों को चुन चुन कर मारा गया था. आर एस एस ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि उनकी मनमानी को कोई नहीं रोक सकता. बाबरी मस्जिद के खिलाफ फासिस्ट ताक़तें लामबंद हो रही थीं.. शिलापूजन का ज़माना था और बोफोर्स के चक्कर में केंद्र सरकार बैकफुट पर थी. इस पृष्ठभूमि में भागलपुर में मुसलमानों का क़त्ले-आम हुआ और १९८९ के चुनाव के बाद बी जे पी की मदद से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए. जैसा कि हर बार होता रहा है, दंगे में मारे गए लोगों के परिवार वालों के घाव रिसते रहे, केंद्र सरकार में किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि उनपर मरहम लगा सकता क्योंकि १९८९ में गैर कांग्रेसी सत्ता पर चारों तरफ से नागपुर की नकेल लगी हुई थी. १९८४ में सिखों के सामूहिक संहार के बाद के माहौल में कुछ हलकों से पीड़ित परिवारों के पुनर्वास की बात उठ रही थी लेकिन कोई भी इसे गंभीरता से नहीं ले रहा था. . उसके पहले देश में सैकड़ों दंगे हो चुके थे और कहीं भी किसी आर्थिक सहायता की बात नहीं हुई थी . लोग मान चुके थे कि दंगे के बाद अगर मुसलमान को शान्ति से पड़े रहने की आज़ादी मिल जाए तो वही बहुत है .

आज खबर आई है कि भागलपुर दंगों के पीड़ित परिवारों को कुछ आर्थिक सहायता मिलने वाली है. लगता है कि इस फैसले में बिहार की वर्तमान सरकार का योगदान है और उसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को श्रेय दिया जाना चाहिए... हालांकि किसी भी आर्थिक सहायता से दंगों से हुए जान माल के नुक्सान की भरपाई नहीं हो सकती लेकिन नीतीश कुमार का यह कदम सभ्य समाज में एक उम्मीद ज़रूर जगायेगा. १९८९ का भागलपुर दंगा , फासिस्ट ताक़तों की नयी तकनीक की शुरुआत माना जाता है. राम शिलापूजन के जुलूस पर किसी ने कथित रूप से बम से हमला कर दिया था . हिंदुत्व की नयी तर्ज़ पर राजनीति कर रही बी जे पी के सहयोगी संगठनों को दंगे का बहाना मिल गया और शायद पहली बार इस इलाके में दंगाई गावों में घुस कर लूटपाट करने लगे . दंगा गावों में बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका था और संघ भावना से प्रेरित लोग खुशियाँ मना रहे थे . उनका मानना है कि अगर दंगा फैलता है तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और उसका फायेदा चुनाव में बी जे पी को ही होता है. १९८९ के चुनाव में भी ऐसा ही हुआ. . वी पी सिंह की सरकार बनने के बाद लाल कृष्ण अडवाणी की रथयात्रा निकली . वी पी सिंह की कोर दबी हुई थी और जहां जहां अडवाणी का रथ गया , वहां वहां दंगे हुए. आज समाज के हर वर्ग में जो साम्प्रदायिकता का आलम है उसका ज़िम्मा अडवाणी की उस रथयात्रा पर काफी हद तक है. बहरहाल दंगे फैले और आर एस एस ने उसका लाभ उठाया . अब हालात बदल रहे हैं . सूचना की क्रान्ति के चलते मीडिया की पंहुच दूर दूर तक हो चुकी है . नेताओं को भी समझ में आने लगा है कि जनमत की दिशा तय करने में मीडिया की भूमिका है . हो सकता है कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को इसी सोच के तहत मदद करने का फैसला किया गया हो. जो भी हो यह क़दम महत्वपूर्ण है और इसके लिए बिहार सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए. हालांकि यह भी सच है कि नीतेश कुमार बिहार की गद्दी पर बी जे पी की कृपा से ही विद्यमान हैं लेकिन ऐसा लगता है कि बी जे पी वाले नीतीश कुमार की समाजवादी सोच को दबा नहीं पा रहे हैं .

अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि बिहार सरकार के इस क़दम से सबक लें और अपने राज्यों के दंगा पीड़ितों को मदद करें. . अगर एक बात शुरू हुई है तो इसका असर दूर दूर तक जाएगा. सभ्य समाज को कोशिश करना चाहिए कि आने वाले वक़्त में दंगा करने वालों की पहचान करके उनके संगठनों को ही पीड़ितों को सहायता देने का अभियान चलायें.. अगर ऐसा हो सका तो साम्प्रदायिक संगठनों के ऊपर सज़ा का दबाव पड़ेगा और भविष्य में दंगा शुरू करने से पहले लुम्पन लोगों को कई बार सोचना पड़ेगा. अगर दगाइयों को सज़ा देने की परंपरा भी शुरू हो गयी, जैसी सिख दंगों में ह़ा है तो राजनेताओं के लिए दंगों को अंजाम देने के लिए गरीब गुंडों को इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल होगा.

Friday, July 31, 2009

बाबरी मस्जिद, सियासत और गुमनाम नेताबाबरी

बाबरी मस्जिद की शहादत के करीब साढ़े सोलह साल बाद मस्जिद के विध्वंस की साजिश रचने वालों के रोल की जांच करने के लिए बनाए गए लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट आई है। लिब्राहन आयोग को तीन महीने के अंदर अपनी जांच पूरी करने का आदेश हुआ था। उन्हें केवल साजिश के बारे में जांच करना था लेकिन मामला बढ़ता गया, और कमीशन के कार्यकाल में 48 बार बढ़ोतरी की गई। करीब 400 बार सुनवाई हुई और एक रिपोर्ट सामने आ गई।

रिपोर्ट के अंदर क्या है, यह अभी सार्वजनिक डोमेन में नहीं आया है लेकिन लाल बुझक्कड़ टाइप नेताओं और पत्रकारों ने रिपोर्ट के बारे में अंदर खाने की जानकारी पर बात करना शुरू कर दिया है। ऐसा नहीं लगता कि इस रिपोर्ट में ऐसा कोई रहस्य होगा जो जनता को नहीं मालूम है। समकालीन राजनीतिक इतिहास के मामूली से मामूली जानकार को भी मालूम होगा कि बाबरी मस्जिद की शहादत की साजिश में आर.एस.एस. और उसके बड़े कार्यकर्ताओं का हाथ था। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार जैसे बहुत सारे संघी वफादार मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे और मस्जिद ढहाने वालों की हौसला अफजाई कर रहे थे।

जिस वक्त मस्जिद जमींदोज हुई उमा भारती की खुशियों का ठिकाना नहीं था और वे कूद कर मुरली मनोहर जोशी की गोद में बैठ गई थीं और हनुमान चालीसा पढऩे लगी थीं। ऐसी बहुत ही जानकारियां हैं जो पब्लिक को मालूम हैं। मसलन कल्याण सिंह और पी.वी. नरसिम्हाराव भी साजिश में शामिल थे, यह जानकारी जनता को है। पूरी उम्मीद है कि लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में यह सब कुछ होगा लेकिन बहुत सारी ऐसी बातें भी हैं जो कि लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट में कहीं नहीं होंगी। संविधान में पूजा स्थल को नुकसान पहुंचाने को अपराध माना गया है और भारतीय दंड संहिता में इस अपराध की सजा है।

अदालत में मुकदमा चल रहा है और शायद अपराधियों को माकूल सजा मिलेगी। लेकिन बाबरी मस्जिद के नाम पर राजनीति करने वालों ने बहुत सारे ऐसे अपराध किए हैं जिनकी सजा इंसानी अदालतें नहीं दे सकतीं। बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों ने परवरदिगार की शान में गुस्ताखी की है, उसके बंदों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। आर.एस.एस. से जुड़े जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को शहीद करने की साजिश रची, उनको न तो इतिहास कभी माफ करेगा और न ही राम उन्हें माफी देंगे। देश की हिंदू जनता की भावनाओं को भड़काने के लिए संघियों ने भगवान राम के नाम का इस्तेमाल किया। उन्हीं राम का जो सनातनधर्मी हिंदुओं के आराध्य देव हैं जिन्होंने कहा है कि 'पर पीड़ा सम नहिं अधमाईÓ। यानी दूसरे को तकलीफ देने से नीच कोई काम नहीं होता। राम के नाम पर रथ यात्रा निकालकर सीधे सादे हिंदू जनमानस को गुमराह करने का जो काम आडवाणी ने किया था जिसकी वजह से देश दंगों की आग में झोंक दिया गया था उसकी सजा आडवाणी को अब मिल रही है।

प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के उद्देश्य से आडवाणी ने पिछले बीस वर्षों में जो दुश्मनी का माहौल बनाया उसकी सजा उनको अब मिली है, जब प्रधानमंत्री पद का सपना एक खौ$फनाक ख्वाब बन गया है। बाबरी मस्जिद के खिलाफ चले आंदोलन में विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी रितंभरा, नृत्य गोपाल दास, अशोक सिंहल जैसे लोगों ने बार-बार आम आदमी को भड़काने का काम किया था। इन लोगों की सबसे बड़ी सजा यही है कि आज इनकी किसी बात पर कोई भी हिंदू विश्वास नहीं करता। कांग्रेस में भी वीर बहादुर सिंह, अरुण नेहरू, बूटा सिंह आदि ने बढ़ चढ़कर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की थी। यह सारे लोग या तो हाशिए पर हैं या कहीं नहीं हैं। पी.वी. नरसिम्हाराव के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे साजिश में शामिल थे और जिस गुमनामी में उन्होंने बाकी जिंदगी काटी, वह उस नीली छतरी वाले की बे आवाज़ लाठी की मार का ही नतीजा था।

दुनिया के मालिक और उसके घर को सियासत का हिस्सा बनाने वालों को भी उसी बे आवाज लाठी की मार पड़ चुकी है। कहां हैं शहाबुद्दीन और उनके वे साथी जो अवामी और धार्मिक मसलों पर तानाशाही रवैय्या रखते थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के ज्यादातर नेता आज गुमनामी की जिंदगी बिता रहे हैं हालांकि उन्होंने सियासी बुलंदी हासिल करने के लिए एक ऐतिहासिक मस्जिद के इर्द-गिर्द अपने तिकड़म का ताना बना बुना था। मुसलमानों के स्वयंभू नेता बनने के चक्कर में इन तथाकथित नेताओं ने उन हिंदुओं को भी नाराज करने की कोशिश की थी जो मुसलमानों के दोस्त हैं। शुक्र है उस पाक परवरदिगार का जिसने इस देश के धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को यह तौफीक दी कि वे आर.एस.एस. के जाल बट्टïे में नहीं फंसे वरना शहाबुद्दीन टाइप लोगों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए जिम्मेदार हर राजनेता को उसी मालिक की लाठी ने ठिकाने लगा दिया है जिसमें कोई आवाज नहीं होती। जहां तक लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट का सवाल है, राजनीतिक समीकरणों पर उसका असर पड़ेगा। बीजेपी वाले चिल्ला रहे हैं कि ऐसे वक्त पर रिपोर्ट आई है जिसका उनकी अंदरूनी लड़ाई पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

आरोप लगाए जा रहे है कि कांग्रेस लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट की टाइमिंग को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। कोई इन हिंदुत्वबाज़ों से पूछे कि आपने भी तो बाबरी मस्जिद के नाम पर सियासत की थी, हिंदुओं के आराध्य देवता, भगवान राम को चुनाव में वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल किया था, वोट हासिल करने के नाम पर हर शहर में दंगे फैलाए थे, अयोध्या से लौट रहे रामभक्तों को गोधरा में रेलगाड़ी के डिब्बे में साजिश का शिकार बनाकर, गुजरात में दुश्मनी का ज़हर बोया था और गुजरात भर में मुसलमानों को मोदी की सरकार के हमलों का शिकार बनाया था। सच्चाई यह है कि बाबरी मस्जिद अयोध्या में चार सौ साल से मौजूद थी, लेकिन उसके नाम पर सियासत का सिलसिला 1948 से शुरू हुआ जो मस्जिद की शहादत के बाद भी जारी है। आज बीजेपी को शिकायत है कि कांग्रेस सियासत कर रही है, जबकि बीजेपी भी लगातार सियासत करती रही है।

1984 में लोकसभा की मात्र दो सीटें हासिल करने वाली बीजेपी ने केन्द्र की सत्ता तक पहुंचने की जो भी ऊर्जा हासिल की, वो बाबरी मस्जिद की सियासत से ही हासिल की थी। अब बीजेपी तबाही की तरफ बढ़ रही है जो उसके पुराने पापों का फल है। वैसे भी काठ की हांडी और धोखेबाजी की राजनीति बार-बार नहीं सफल होती, इसे बीजेपी से बेहतर कोई नहीं जानता।

Thursday, July 30, 2009

धर्मनिरपेक्षता के शहंशाह की शान सलामत रहेगी

उदयन शर्मा होते तो आज 61 वर्ष के होते। कई साल पहले वे यह दुनिया छोड़कर चले गए थे। जल्दी चले गए। होते तो खुश होते, देखते कि सांप्रदायिक ताकतें चौतरफा मुंह की खा रही हैं। इनके खिलाफ उदयन ने हर मोर्चे पर लड़ाइयां लड़ी थीं, और हर बार जीत हासिल की थी। उनको भरोसा था कि हिटलर हो या अमरीकी क्लू क्लाक्स क्लान हो, फ्रांका हो या कोई भी घमंडी तानाशाह हो हारता जरूर है। लेकिन क्या संयोग कि जब पंडित जी ने यह दुनिया छोड़ी तो इस देश में सांप्रदायिक ताकतों की हैसियत बहुत बढ़ी हुई थी, दिल्ली के तख्त के फैसले नागपुर से हो रहे थे।

यह उदयन के दम की ही बात थी कि पूरे विश्वास के साथ बताते थे कि यह टेंपरेरी दौर है, खतम हो जायेगा। खत्म हो गयी सांप्रदायिक ताकतों के फैसला लेने की सियाह रात लेकिन वह आदमी जिंदा नहीं है जिसने इसकी भविष्यवाणी की थी। उदयन शर्मा बेजोड़ इंसान थे, उनकी तरह का दूसरा कोई नहीं। आज कई साल बाद उनकी याद में कलम उठी है इस गरीब की। अब तक हिम्मत नहीं पड़ती थी। पंडितजी के बारे में उनके जाने के बाद बहुत कुछ पढ़ता और सुनता रहा हूं। इतने चाहने वाले हैं उस आदमी के। सोचकर अच्छा लगता है। आलोक तोमर भी है और सलीम अख्तर सिद्घीकी भी। उदयन शंकर भी हैं तो ननकऊ मल्लाह भी। बड़े से बड़ा आदमी और मामूली से मामूली आदमी, हर वर्ग में उदयन के चाहने वाले हैं। सबके अपने अनुभव हैं। मैं उदयन के चाहने वालों में सबसे ज्यादा आलोक तोमर को पसंद करता हूं।

आलोक ने बचपन में अपने आदर्श के रूप में उदयन को चुन लिया था, गांव में शायद मिडिल स्कूल के छात्र के रूप में। बड़े होने पर जब लिखना शुरू किया तो भाषाई खनक वही उदयन शर्मा वाली थी। उदयन शंकर की दीवानगी का आलम यह था कि मां बाप के दिए गए नाम को बदल दिया और उदयन बन गए। संतोष नायर भी हैं। अगर आज पंडित जी जिंदा होते तो मैं उनको बताता कि जन्म जन्मांतर का संबंध होता है क्योंकि संतोष पता नहीं कितने जन्मों से उनका बेटा है। नाम बहुत हैं उदयन शर्मा को चाहने वालों के, चाहूं तो गिनाता रहूं और धार नहीं टूटेगी।उदयन शर्मा के बारे में कई जगह पढ़ा है कि वे पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं मानते थे, मिशन मानते थे। हो सकता है सही हो, बस मेरी गुजारिश यह है कि उदयन शर्मा के व्यक्तित्व की विवेचना करने के लिए पुराने व्याकरण से काम नहीं चलेगा। उनको समझने के लिए जीवनी लिखने के नए व्याकरण की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि उदयन का जीवन किसी भी सांचे में फिट नहीं होता।

उदयन शर्मा की पहचान एक धर्मनिरपेक्ष पत्रकार के रूप में की जाती है। बात सच भी है लेकिन उनके घनिष्ठतम सहयोगी और मित्र ने उनको एक बार बताया था कि वे धर्मनिरपेक्ष नहीं, प्रो-मुस्लिम पत्रकार हैं। इतने करीबी ने कहा है तो ठीक ही होगा। उदयन शर्मा एक ऐसे इंसान थे जो अपनी लड़ाई हमेशा लड़ते रहते थे, कोई भी मौका चूकते नहीं थे। धर्मनिरपेक्षता उनकी सोच का बुनियादी आधार था, जिससे वे कभी हिले नहीं। जब भी मौका लगा सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त देने की कोशिश की। रविवार के संपादक का पद संभाला तो चुनौतियां बहुत बड़ी थीं। उनके मित्र और बड़े पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने वह जगह खाली की थी।

ज़ाहिर है कि पाठकों की उम्मीदें बड़ी थीं। उदयन ने उसे हासिल किया रविवार को बुलंदियों पर पहुंचाया। उनकी चुनौती को और भी कठिन कर दिया संघ परिवार के नेताओं ने। 1984 के चुनाव में शून्य पर पहुंच गई पार्टी, बीज़ेपी ने हिन्दुत्व का नारा बुलंद किया। केंद्र और लखनऊ में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन लीडरशिप ऐसी नहीं थी जोकि संघ के चक्रव्यूह की बारीकियां समझ सके। आर.एस.एस., विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, बीजेपी आदि संगठन धर्मनिरपेक्ष राजनीति और जीवन मूल्यों पर चौतरफा हमला बोल रहे थे। कांग्रेस में अरुण नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे भाजपाई सोच वाले लोग थे और राजीव गांधी से वही करवा रहे थे जो नागपुर की फरमाइश होती थी।

उदयन शर्मा की धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई राजनीति की इस दगाबाजी की वजह से और मुश्किल हो गयी थी। जब रविवार छोड़कर उन्होंने हिंदी संडे ऑबज़र्वर का काम शुरू किया तो विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे, उनको बीजेपी का समर्थन हासिल था और उदयन शर्मा पर तरह तरह के दबाव पड़ रहे थे। लेकिन उदयन शर्मा कभी हारते नहीं थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की संयुक्त ताकत से लोहा लिया और वित्त मंत्रालय के बड़े अफसरों की गिड़गिड़ाहट की परवाह न करते हुए विश्व हिंदू परिषद के इनकम टैक्स मामले पर खबर छापी।

जब आडवाणी ने सोमनाथ से रथ लेकर अयोध्या की तरफ कूच किया तो लोगों को लगने लगा था कि अब आर.एस.एस. को रोका नहीं जा सकता। दंगों का सिलसिला शुरू हो चुका था पंडित जी के संडे आब्ज़र्वर में लगातार खबरें छपती रहीं और जब ज्यादातर लोग आडवाणी की जय जयकार कर रहे थे तो उदयन के अखबार में सुर्खी लगी 'रावण रथी विरथ रघुबीराÓ। और इसी विरथ रघुबीर के सनातन धर्मी भक्तों के पक्षधर उदयन शर्मा ने $कलम को आराम नहीं दिया। हमेशा कहते रहे कि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू धर्मनिरपेक्ष है, और संघप्रेमी हिंदू बहुत कम हैं। उनको विश्वास था कि यह देश दंगाइयों की राजनीति को मुंहतोड़ जवाब देगा।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन उदयन शर्मा बहुत निराश थे, दुखी थे। पी.वी. नरसिंहराव को गरिया रहे थे। उनको शिकायत थी कि नरसिंह राव ने आर.एस.एस. की मदद की थी। अर्जुन सिंह, मानव संसाधन विकास मंत्री थे, उदयन की कोशिश थी कि अर्जुन सिंह इस्तीफा दें और नरसिंहराव को पैदल करें, क्योंकि उनको तुरंत सजा दी जानी चाहिए। यह नहीं हो सका। लेकिन उदयन शर्मा रुके नहीं। फिर चल पड़े अपने लक्ष्य की ओर। बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद आर.एस.एस. वालों ने मुसलमानों को अपमानित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया था।

पंडित जी ने महात्मा गांधी की समाधि पर रामधुन का आयोजन करवा कर सांप्रदायिकता का जवाब दिया। देश का बड़ा से बड़ा आदमी आया और मदर टेरेसा आईं। शबनम हाशमी ने सहमत की ओर से वहीं राजघाट पर नौजवानों को शपथ दिलाई कि सांप्रदायिकता के खिलाफ जंग जारी रहेगी। इसके बाद पत्रकारिता, नौकरशाही और राजनीति में बैठे आर.एस.एस. के कारिंदों ने पंडित जी पर चौतरफा हमला बोला और उनको हाशिए पर लाने की कोशिश करते रहे। नफरत के सौदागरों के खिलाफ उदयन की लड़ाई कभी कमजोर नहीं पड़ी। अभिमन्यु को घेरकर मारने के बाद कौरव सेना विजयी नहीं होती, उसके बाद जयद्रथ वध होता है। आज जब सांप्रदायिकता के जयद्रथ का वध हो चुका है, कौरव सेना अपने घाव चाट रही है, उदयन शर्मा की बहुत याद आती है।

उदयन शर्मा ने पत्रकारिता की दुनियां में बुलंदियों पर झंडे गाड़े थे। डाकू फूलनदेवी का आतंक चंबल के बीहड़ों में फैल चुका था, अखबार वाले हिंदी फिल्मों की महिला डाकुओं की तर्ज पर फूलनदेवी को दस्यु सुंदरी लिखना शुरू कर चुके थे। उदयन शर्मा और फोटो पत्रकार जगदीश यादव ने बीहड़ों में फूलनदेवी को ढूंढ निकाला और उसकी तस्वीर रविवार में छाप दी। उसके बाद से फूलनदेवी के बारे में सही रिपोर्टिंग का सिलसिला शुरू हुआ। मुसलमानों के खिलाफ जब भी दंगाइयों के हमले हुए उदयन शर्मा हमेशा उनके पक्ष में खड़े रहे। दलितों के खिलाफ सवर्णों के आतंक की रिपोर्ट पाठ्यपुस्तकों का विषय बन चुकी है।

रिपोर्ट में ईमानदारी उदयन शर्मा का स्थाई भाव था।पत्रकारिता के टैलेंट की गजब की पहचान थी उदयन को। गली कूचों से लोगों को पकड़कर लाते थे और पत्रकार बना देते थे। किसी बैंक क्लर्क को तो किसी ट्यूटर को, किसी टाइपिस्ट को तो किसी मैनेजर को, सबको पत्रकार बना दिया। मेरे जैसे मामूली आदमी को संपादकीय लिखने वाला पत्रकार बना दिया। इस जमात के ज्यादातर लोग बाद में उनसे नाराज भी हुए लेकिन उस भले आदमी ने कभी किसी की मुखालिफत नहीं की। मैं भी नाराज हुआ था लेकिन मुझे पहले से भी अच्छी नौकरी दिलवा दी। मुझे पता ही नहीं था, 2005 में पता लगा कि उदयन की सिफारिश पर ही मुझे ब्यूरो चीफ बनाया गया था।

एक बार मुझसे कहा कि आर.एस.एस. के खिलाफ लिखने वाले हर आदमी को अपना दोस्त मानो उससे भाई की तरह व्यवहार करो क्योंकि असल में वही तुम्हारा हमसफर होगा। 1991 में कांग्रेस के टिकट पर वे लोकसभा का चुनाव लड़ गए थे, मध्यप्रदेश के भिंड चुनाव क्षेत्र से। सत्यदेव कटारे और रमाशंकर सिंह उनके सहयोगी थे लेकिन तमाम ऐसे लोग भी थे जो अंदर ही अंदर उनका विरोध कर रहे थे, उदयन शर्मा को सब कुछ मालूम था लेकिन किसी के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं जाहिर की। राजीव गांधी खुद उनके चुनाव प्रचार में आए थे। पंडित जी चुनाव हार गए लेकिन भिंड नहीं हारे। जिन लोगों ने उनकी मुखालिफत की थी, वे भी दिल्ली आते थे तो वे खुद और उनकी पत्नी नीलिमा शर्मा, जो भी हो सकती थी, मदद करते थे। यह सिलसिला आज तक जारी है। उदयन शर्मा को एक मुहब्बत करने वाले इंसान के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

उनकी पत्नी नीलिमा जी, दोनों बेटे डेनिस और छोटू उनके सबसे करीबी दोस्त थे, इन लोगों से वे आदतन मुहब्बत करते थे। इसी भावना को बढ़ाते जाते थे जिसमें परिवार मित्र-मंडली, मुसलमान और धर्मनिरपेक्ष सोच का हर इंसान शामिल हो जाता था उनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं कर्तव्य था और उसको उन्होंने बहुत ही बहादुरी से निभाया। पंडित जी धार्मिक नहीं थे लेकिन परिवार के बड़ों के आगे उनका सिर झुकता था।

इस महापुरुष के आगे मेरे जैसे मामूली आदमी का सिर हमेशा झुका रहेगा। अपनी बात को बे लौस और साफ साफ कहना उनकी फितरत थी। अगर आज जिंदा होते तो बहुत खुश होते क्योंकि बीजेपी की मौजूदा हार में उनकी शुरू की गई उस लड़ाई का भी योगदान है जो उन्होंने लगभग निहत्थे लड़ा था। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उनके दिल से जो कराह निकली थी, उसी का नतीजा है बीजेपी चुनाव तो हार ही गई है, विघटन के कगार पर भी खड़ी है।

Monday, July 27, 2009

बाबरी मस्जिद, सियासत और गुमनाम नेता

बाबरी मस्जिद की शहादत के करीब साढ़े सोलह साल बाद मस्जिद के विध्वंस की साजिश रचने वालों के रोल की जांच करने के लिए बनाए गए लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट आई है। लिब्राहन आयोग को तीन महीने के अंदर अपनी जांच पूरी करने का आदेश हुआ था। उन्हें केवल साजिश के बारे में जांच करना था लेकिन मामला बढ़ता गया, और कमीशन के कार्यकाल में 48 बार बढ़ोतरी की गई। करीब 400 बार सुनवाई हुई और एक रिपोर्ट सामने आ गई।
रिपोर्ट के अंदर क्या है, यह अभी सार्वजनिक डोमेन में नहीं आया है लेकिन लाल बुझक्कड़ टाइप नेताओं और पत्रकारों ने रिपोर्ट के बारे में अंदर खाने की जानकारी पर बात करना शुरू कर दिया है। ऐसा नहीं लगता कि इस रिपोर्ट में ऐसा कोई रहस्य होगा जो जनता को नहीं मालूम है। समकालीन राजनीतिक इतिहास के मामूली से मामूली जानकार को भी मालूम होगा कि बाबरी मस्जिद की शहादत की साजिश में आर.एस.एस. और उसके बड़े कार्यकर्ताओं का हाथ था।
लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार जैसे बहुत सारे संघी वफादार मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे और मस्जिद ढहाने वालों की हौसला अफजाई कर रहे थे। जिस वक्त मस्जिद जमींदोज हुई उमा भारती की खुशियों का ठिकाना नहीं था और वे कूद कर मुरली मनोहर जोशी की गोद में बैठ गई थीं और हनुमान चालीसा पढऩे लगी थीं। ऐसी बहुत ही जानकारियां हैं जो पब्लिक को मालूम हैं। मसलन कल्याण सिंह और पी.वी. नरसिम्हाराव भी साजिश में शामिल थे, यह जानकारी जनता को है। पूरी उम्मीद है कि लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में यह सब कुछ होगा लेकिन बहुत सारी ऐसी बातें भी हैं जो कि लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट में कहीं नहीं होंगी।
संविधान में पूजा स्थल को नुकसान पहुंचाने को अपराध माना गया है और भारतीय दंड संहिता में इस अपराध की सजा है। अदालत में मुकदमा चल रहा है और शायद अपराधियों को माकूल सजा मिलेगी। लेकिन बाबरी मस्जिद के नाम पर राजनीति करने वालों ने बहुत सारे ऐसे अपराध किए हैं जिनकी सजा इंसानी अदालतें नहीं दे सकतीं। बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों ने परवरदिगार की शान में गुस्ताखी की है, उसके बंदों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। आर.एस.एस. से जुड़े जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को शहीद करने की साजिश रची, उनको न तो इतिहास कभी माफ करेगा और न ही राम उन्हें माफी देंगे।
देश की हिंदू जनता की भावनाओं को भड़काने के लिए संघियों ने भगवान राम के नाम का इस्तेमाल किया। उन्हीं राम का जो सनातनधर्मी हिंदुओं के आराध्य देव हैं जिन्होंने कहा है कि 'पर पीड़ा सम नहिं अधमाईÓ। यानी दूसरे को तकलीफ देने से नीच कोई काम नहीं होता। राम के नाम पर रथ यात्रा निकालकर सीधे सादे हिंदू जनमानस को गुमराह करने का जो काम आडवाणी ने किया था जिसकी वजह से देश दंगों की आग में झोंक दिया गया था उसकी सजा आडवाणी को अब मिल रही है। प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के उद्देश्य से आडवाणी ने पिछले बीस वर्षों में जो दुश्मनी का माहौल बनाया उसकी सजा उनको अब मिली है, जब प्रधानमंत्री पद का सपना एक खौफनाक ख्वाब बन गया है।
बाबरी मस्जिद के खिलाफ चले आंदोलन में विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी रितंभरा, नृत्य गोपाल दास, अशोक सिंहल जैसे लोगों ने बार-बार आम आदमी को भड़काने का काम किया था। इन लोगों की सबसे बड़ी सजा यही है कि आज इनकी किसी बात पर कोई भी हिंदू विश्वास नहीं करता। कांग्रेस में भी वीर बहादुर सिंह, अरुण नेहरू, बूटा सिंह आदि ने बढ़ चढ़कर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की थी। यह सारे लोग या तो हाशिए पर हैं या कहीं नहीं हैं। पी.वी. नरसिम्हाराव के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे साजिश में शामिल थे और जिस गुमनामी में उन्होंने बाकी जिंदगी काटी, वह उस नीली छतरी वाले की बे आवाज़ लाठी की मार का ही नतीजा था। दुनिया के मालिक और उसके घर को सियासत का हिस्सा बनाने वालों को भी उसी बे आवाज लाठी की मार पड़ चुकी है। कहां हैं शहाबुद्दीन और उनके वे साथी जो अवामी और धार्मिक मसलों पर तानाशाही रवैय्या रखते थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के ज्यादातर नेता आज गुमनामी की जिंदगी बिता रहे हैं हालांकि उन्होंने सियासी बुलंदी हासिल करने के लिए एक ऐतिहासिक मस्जिद के इर्द-गिर्द अपने तिकड़म का ताना बना बुना था।
मुसलमानों के स्वयंभू नेता बनने के चक्कर में इन तथाकथित नेताओं ने उन हिंदुओं को भी नाराज करने की कोशिश की थी जो मुसलमानों के दोस्त हैं। शुक्र है उस पाक परवरदिगार का जिसने इस देश के धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को यह तौफीक दी कि वे आर.एस.एस. के जाल बट्टे में नहीं फंसे वरना शहाबुद्दीन टाइप लोगों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए जिम्मेदार हर राजनेता को उसी मालिक की लाठी ने ठिकाने लगा दिया है जिसमें कोई आवाज नहीं होती। जहां तक लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट का सवाल है, राजनीतिक समीकरणों पर उसका असर पड़ेगा। बीजेपी वाले चिल्ला रहे हैं कि ऐसे वक्त पर रिपोर्ट आई है जिसका उनकी अंदरूनी लड़ाई पर नकारात्मक असर पड़ेगा। आरोप लगाए जा रहे है कि कांग्रेस लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट की टाइमिंग को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। कोई इन हिंदुत्वबाज़ों से पूछे कि आपने भी तो बाबरी मस्जिद के नाम पर सियासत की थी, हिंदुओं के आराध्य देवता, भगवान राम को चुनाव में वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल किया था, वोट हासिल करने के नाम पर हर शहर में दंगे फैलाए थे, अयोध्या से लौट रहे रामभक्तों को गोधरा में रेलगाड़ी के डिब्बे में साजिश का शिकार बनाकर, गुजरात में दुश्मनी का ज़हर बोया था और गुजरात भर में मुसलमानों को मोदी की सरकार के हमलों का शिकार बनाया था।
सच्चाई यह है कि बाबरी मस्जिद अयोध्या में चार सौ साल से मौजूद थी, लेकिन उसके नाम पर सियासत का सिलसिला 1948 से शुरू हुआ जो मस्जिद की शहादत के बाद भी जारी है। आज बीजेपी को शिकायत है कि कांग्रेस सियासत कर रही है, जबकि बीजेपी भी लगातार सियासत करती रही है। 1984 में लोकसभा की मात्र दो सीटें हासिल करने वाली बीजेपी ने केन्द्र की सत्ता तक पहुंचने की जो भी ऊर्जा हासिल की, वो बाबरी मस्जिद की सियासत से ही हासिल की थी। अब बीजेपी तबाही की तरफ बढ़ रही है जो उसके पुराने पापों का फल है। वैसे भी काठ की हांडी और धोखेबाजी की राजनीति बार-बार नहीं सफल होती, इसे बीजेपी से बेहतर कोई नहीं जानता।