Tuesday, October 16, 2012

लोकतंत्र बचाना है तो विधायिका और कार्यपालिका को अलग करना होगा



(यानी विधायकों और सांसदों को मंत्री न बनाया जाए) 

शेष नारायण सिंह 

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक मंत्री ने  जिले के सबसे बड़े मेडिकल अफसर को इसलिए बंधक बना लिया क्योंकि अफसर ने उस मंत्री  का गैरकानूनी हुक्म मानने से इनकार कर दिया था. सूचना  क्रान्ति के निजाम के चलते मंत्री की कारस्तानी दुनिया के सामने आयी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तुरंत कार्रवाई की और मंत्री को पद छोडना पड़ा . आम  तौर पर माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जिस तपाक से मंत्री को पद से हटाया ,वह अन्य मंत्रियों के लिया सबक रहेगा . लेकिन सवाल यह  है कि क्या इस  मंत्री की कारगुजारी मीडिया ने उजागर न किया होता तब भी उसको हटाया जाता .सरकारों में मुख्यमंत्रियों को साफ़ सुथरा प्रशासन रखने के लिए अपने मंत्रियों के काम काज पर नज़र रखने के लिए मीडिया के अलावा भी कुछ तरीकों की ईजाद  करना चाहिए जिस से बात के मीडिया में पंहुचने के पहले ही उन पर एक्शन हो जाए.इस से सरकारों की कार्यक्षमता  के बारे में अच्छा माहौल बनेगा .हटाये गए  मंत्री जी के बारे में  जो  जानकारी मिली है उसके आधार पर बहुत आराम से कहा जा सकता है कि वे ऐसे धर्मात्मा नहीं थे  जिसके लिए आंसू बहाए जाएँ . उनका अपना इतिहास ऐसा है कि कोई भी सभ्य समाज उनको अपना साथी नहीं मानना चाहेगा . तो प्रश्न यह  है कि उन महोदय को मंत्री बनाया  ही क्यों गया . बताते हैं कि अपने इलाके में उनकी ऐसी दहशत है कि उनके  खिलाफ कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता . जिस पार्टी में भी जाते हैं उसे जिता देते हैं . यानी वे विधायिका की ताकत मज़बूत करते हैं इसलिए  उन्हें कार्यपालिका में मनमानी करने की अनुमति दी जाती है.ऐसा लगता है कि कार्यपालिका और विधायिका के रोल आपस में इतने घुल मिल गए हैं कि देश के राजनीतिक फैसलों को लागू करने की ताकत हासिल कर लेने वाले विधायिका के प्रतिनिधि सरकारी फैसलों में मनमानी करने की खुली छूट पा जाते हैं और इसलिए  अपने आर्थिक लाभ के लिए देश की सम्पदा को अपना समझने लगते हैं . यह गलत है . इसका  हर स्तर पर प्रतिकार किया जाना चाहिए .

हमारे लोकतंत्र के तीन स्तंभ बताए गए हैं . न्याय पालिका ,  विधायिका और कार्यपालिका . न्याय पालिका तो  सर्वोच्च स्तर पर अपना काम बहुत ही खूबसूरती से कर रही  है लेकिन कार्यपालिका और  विधायिका अपने फ़र्ज़ को सही  तरीके से नहीं कर पा रही हैं . हमने पिछले कई  वर्षों से देखा है कि संसद का काम इसलिए नहीं हो  पाता कि  विपक्षी पार्टियां सरकार यानी कार्यपालिका के कुछ फैसलों से खुश नहीं रहती. कार्यपालिका के गलत काम के लिए वह विधायिका को अपना काम  नहीं करने देती. इसलिए इस सारी मुसीबात को खत्म करने का एक बाहुत सही तरीका  यह  है कि विधायिका और कार्यपालिका का काम अलग अलग लोग करें . यानी जो लोग विधायिका में हैं वे कार्यपालिका  से अलग रहें . वे कार्यपालिका के काम की निगरानी  रखें उन पर नज़र रखें और संसद की सर्वोच्चता को स्थापित करने में योगदान दें. अभी यह हो रहा है कि जो लोग संसद के सदस्य है , संसद की सर्वोच्चता के संरक्षक हैं वे ही सरकार में शामिल हो जाते हैं और कार्यपालिका भी बन जाते  हैं . गौर  करने की बात यह है कि पिछले १८ साल में जब भी संसद की  कार्यवाही  को हल्ला गुल्ला करके रोका गया है वह विरोध कार्यपालिका के किसी फैसले के बारे में था . यानी संसद का जो विधायिका के रूप में काम करने का मुख्य काम है  उसकी वजह से संसद में  हल्ला गुल्ला कभी नहीं हुआ. हल्ला गुल्ला इसलिए हुआ कि संसद के सदस्यों का जो अतिरिक्त काम है , कार्यपालिका वाला, उसकी वजह से संसद को काम करने का मौका नहीं मिला. इसलिए अब इस बात पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है कि कार्य पालिका और विधायिका का काम अलग अलग लोगों को दिया जाए. यानी ऐसे नियम बना दिए जाएँ  जिसके बाद कोई भी संसद सदस्य या कोई भी विधायक मंत्री न बन सके. संसद या  विधानमंडलों के सदस्य के रूप में नेता लोग अपना काम करें , यानी कानून बनायें और उन कानून को लागू करने वाली कार्यपालिका के काम की निगरानी करें . मंत्री ऐसे लोग बने जो संसद या विधानमंडलों के सदस्य न हों . यहाँ यह गौर करने की बात है कि  नौकरशाही को काबू में रखना भी ज़रूरी है वर्ना वे तो ब्रिटिश नजराना संस्कृति के वारिस हैं, वे तो सब कुछ लूटकर रख देगें. अगर संसद या विधान सभा का सदस्य बनकर केवल क़ानून बनाने का काम मिलने की बात होगी तो इन सदनों में बाहुबली बिलकुल नहीं आयेगें.उसके दो कारण हैं . एक तो उन्हें मालूम है कि कानून बनाने के लिए संविधान और कानून और राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए . दूसरी बात यह है कि जब उन्हें मालूम हो जाएगा कि संसद के सदस्य बनकर कार्यपालिका पर उनका डाइरेक्ट नियंत्रण नहीं रहेगा तो उनकी रूचि खत्म हो जायेगी. क्योंकि रिश्वत की मलाई तो कार्यपालिका पर कंट्रोल करने से  ही मिलती है .

इस तरह हम देखते हैं कि अगर विधायिका को कार्यपालिका से अलग कर दिया जाए तो देश का बहुत भला हो जाएगा. यह कोई  अजूबा आइडिया नहीं है . अमरीका में ऐसी  ही व्यवस्था है . अपने संसदीय लोकतंत्र को जारी रखते हुए यह किया जा सकता है कि बहुमत दल का नेता मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री बन जाए और वह संसद या विधान मंडलों के बाहर से अपना राजनीतिक मंत्रिमंडल बनाये. एक शंका उठ सकती है कि वही  बाहुबली और भ्रष्ट नेता चुनाव नहीं लड़ेगें और मंत्री बनने के  चक्कर में पड़ जायेगें और वही काम शुरू कर देगें जो अभी करते हैं . लेकिन यह शंका निर्मूल है . क्योंकि कोई मनमोहन सिंह , या नीतीश कुमार या अखिलेश  यादव  या नवीन पटनायक किसी बदमाश को अपने मंत्रिमंडल में नहीं लेगा. संसद का काम यह रहे कि  मंत्रिमंडल के काम की निगरानी रखे . यह मंत्रिमंडल राजनीतिक फैसले ले और मौजूदा नौकरशाही को ईमानदारी से काम करने के लिए मजबूर करे. यह संभव है और इसके लिए कोशिश की जानी चाहिए . कार्यपालिका और नौकरशाही पर अभी  भी संसद की स्टैंडिंग कमेटी कंट्रोल रखती है और वह हमारी लोक शाही का एक बहुत ही मज़बूत पक्ष है . स्टैंडिंग कमेटी की मजबूती का  एक कारण यह भी है कि उसमें कोई भी मंत्री सदस्य के रूप में शामिल नहीं हो सकता . स्टैंडिंग कमेटी मंत्रिमंडल के काम पर निगरानी भरी नज़र रखती है . आज जो काम स्टैंडिंग  कमेटी कर रही है वही काम पूरी संसद का हो जाए तो चुनाव सुधार का बहुत पुराना एजेंडा भी लागू हो जाएगा और अमरीका की तरह विधायिका की सर्वोच्चता भी स्थापित हो जायेगी.  

भारत में भ्रष्टाचार के समकालीन इतिहास पर नज़र डालें तो साफ़ समझ में आ जाता है कि इस काम में राजनीतिक बिरादरी नंबर एक पर है. राजनेता, एम पी या एम एल ए का चुनाव जीतता है और केन्द्र या राज्य में मंत्री बन जाता है . मंत्री बनते ही कार्यपालिका के राजनीतिक फैसलों का मालिक बन बैठता है . और उन्हीं फैसलों की कीमत के रूप में घूस स्वीकार करना शुरू कर देता है. जब राजनेता भ्रष्ट हो जाता है तो उसके मातहत काम करने  वाली नौकरशाही को भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस मिल जाता है और वह पूरी मेहनत और बेईमानी के साथ घूस वसूलने  में जुट जाता है. फिर तो नीचे तक भ्रष्टाचार का राज कायम हो जाता है. भ्रष्टाचार के तत्व निरूपण में जाने की ज़रूरत इसलिए नहीं है कि भ्रष्टाचार हमारे सामाजिक राजनीतिक जीवन  का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन  चुका है कि उसके बारे में किसी भी भारतीय को कुछ बताना बिकुल बेकार की कवायद होगी. इस देश में जो भी जिंदा इंसान अहै वह भ्रष्टाचार की  चारों तरफ की मौजूदगी को अच्छी तरह जानता है . 

 उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार को अंदर से देख और झेल  रहे मेरे एक अफसर मित्र से चर्चा के दौरान भ्रष्टाचार को खत्म करने के कुछ  दिलचस्प  तर्क सामने आये. उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में अफसरों का एक वर्ग ऐसा भी है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ है लेकिन जल में रहकर मगर से  वैर नहीं करता और नियम कानून की सीमाओं में रहकर  अपना काम करता रहता है .मेरे अफसर मित्र उसी वर्ग के हैं . उन्होंने भ्रष्टाचार  को खत्म करने के कई गुर बताए लेकिन सिद्धांत के स्तर पर जो कुछ उन्होंने बताया ,वह फील्ड में काम करने वाले उस योद्धा के तर्क हैं जो भ्रष्टाचार की मार का सोते जागते मुकाबला करता रहता है . जब तक एक कलक्टर या एस डी एम जाग रहा होता है उसे को न कोई नेता या मंत्री या उसका बड़ा अफसर भ्रष्टाचार के तहत कोई न कोई काम करने की सिफारिश करने को कहता रहता है . उन्होंने बताया कि जिलों में सबसे ज्यादा भ्रष्ट राजनीतिक नेता होते हैं . जो लोग मंत्री हो जाते हैं वे तो हर काम को अपनी मर्जी से करवाने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार  मानते हैं . उसके बाद मंत्री जी के चमचों का नंबर  आता है. यह चमचा वाली संस्था तो बनी ही भ्रष्टाचार का निजाम कायम रखने के लिए है. उसके बाद वे नेता आते हैं जो विधायक या सांसद हो चुके होते हैं लेकन मंत्री नहीं बन पाते . यह सरकारी पक्ष के ही होते हैं . सरकारी पक्ष के नेताओं के बाद विपक्ष की पार्टियों के विधायकों और सांसदों का नंबर आता है जिनके चमचे भी  सक्रिय रहते हैं .  इस वर्ग के नेता भी कम ताक़त्वर  नहीं होते और उनका भी खर्चा पानी घूस की गिजा पर ही चलता है . उसके बाद उन नेताओं  का नंबर  आता है जो भूतपूर्व हो चुके होते हैं . भूतपूर्व के बाद वे नेता आते हैं जिनको अभी चुनावी सफलता नहीं मिली है  या कि मिलने वाली है .

कुल मिलाकर यह देखा गया है कि सरकारी फैसलों को घूस की चाभी से अपने पक्ष में करने वाले लोगों में सबसे आगे वही लोग  होते हैं जो राजनीति के क्षेत्र से आते हैं .  अगर चुनाव जीतने  वालों को स्पष्ट रूप से विधायिका का काम दे दिया जाए और उनको कार्यपालिका में शामिल होने  से रोक दिया जाए यानी उन्हें मंत्री बनने के लिए अयोग्य करार कर दिया जाए और उन्हें मंत्रियों और अफसरों के काम  पर निगरानी रखने का काम  सौंप दिया जाए और उनकी घूस लेने की क्षमता को खत्म कर दिया जाए तो देश में राजनीतिक सुधार का जो माहौल बनेगा वह बेईमानी और भ्रष्टाचार के निजाम को खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण होगा .

Saturday, October 13, 2012

अगर ३० जनवरी '४८ को महात्मा गांधी की हत्या न हुयी होती तो लोहिया उनकी विरासत के वारिस होते



शेष नारायण  सिंह 

30 जनवरी के दिन दिल्ली के बिडला  हाउस में महात्मा गांधी की  हत्या करके  नाथूराम  गोडसे ने केवल  महात्मा गाँधी की ही हत्या नहीं की थी .उसने एक आज़ाद देश के सपने के भविष्य को भी मार डाला था.  शासक वर्गो के शोषण के दर्शनशास्त्र के  प्रतिनिधि नाथूराम ने उसी हत्या के साथ अन्य बहुत सी विचारधाराओं की हत्या कर दी थी। महात्मा गाँधी को पढने वाला कोई भी आदमी बता देगा की महात्मा जी ने कांग्रेस के आर्थिक  विकास के उस माडल को नहीं स्वीकार किया था जिसे स्वतन्त्र भारत के लिए जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार वाले लागू करना  चाहते थे। महात्मा गाँधी ने साफ़ बता दिया था की वे गाँव  को विकास की इकाई बनाने के पक्षधर थे लेकिन  जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई को वाली कांग्रेस के नेताओं के दिमाग में औद्योगीकरण के रास्ते देश के आर्थिक विकास करने के सपने पल रहे थे . गांधी जी ने इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा है . उनकी मूल किताब हिंद स्वराज में तो यह बात साफ़ साफ़ लिखी ही है बाद के ग्रंथोंमें भी गाँव को  विकास की यूनिट बनाने की बात बार बार कही गयी है . आज़ादी की  लड़ाई तक यानी 1946 तक महात्मा गांधी की हर बात मानने वाले जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा जी की आर्थिक विकास की सोच को नकारना शुरू कर दिया था। भारत के आख़िरी आदमी के विकास की पक्ष धर गांधी की राजनीति से इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी। कांग्रेस का प्रभावशाली तबका  भी इस मामले में नेहरू के साथ था . गांधी जी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस को खत्म करके बाकी राजनीतिक जमातों को चुनावी मैदान में बराबरी देना चाहते थे  . लेकिन उस वक़्त तक कांग्रेस में सबसे अधिक प्रभाव शाली हो चुके सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया था। आर्थिक विकास  की उनकी सोच को भी सही ठहराने  वाला कोई भी आदमी जवाहर लाल की पहली मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं था।  गांधी जी इस बात से संतुष्ट नहीं थे। उधर  मुहम्मद अली जिन्नाह की जिद के चलते   मुसलमानों के  ज़मींदारों ने पूरे देश में दंगे भड़काने की साज़िश पर अमल करना शुरू कर दिया था। . 1946 के बाद से ही हर उस मूल्य को दफ़न किया जा रहा था जिसको  आधार बनाकर आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। आज़ादी के आन्दोलन के इथोस को कांग्रेस को लोग भूल चुके थे और अगर भूले नहीं थे तो उसे इतिहास के कूड़ेदान के हवाले करने की पूरी तैयारी कर चुके थे। 
इस पृष्ठभूमि में जिन लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी ,महात्मा गांधी उन लोगों पर बहुत भरोसा कर रहे थे .इनमें से एक डॉ राम मनोहर लोहिया थे  . अगस्त क्रान्ति के दौरान डॉ. लोहिया के काम से महात्मा गांधी अत्यंत प्रभावित हुए थे। उसके पहले  डॉ. लोहिया के कई लेख, महात्मा गांधी के अखबार 'हरिजन' में प्रकाशित भी हो चुके थे। गोवा के मामले पर उनका साथ महात्मा गांधी को छोड़कर और किसी बड़े नेता ने नहीं दिया।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार की नीतियां गांधी के विचारों से प्रतिकूल थीं। डॉ. लोहिया का समाजवाद गांधी की विचारधारा के अत्यन्त निकट था। नेहरू सरकार की दशा-दिशा के कारण महात्मा गांधी का नेहरू से मोहभंग हो रहा था और लोहिया की तरफ रूझान बढ़ रहा था। आज़ादी के बाद देश साम्प्रदायिकता के संकट में फंस गया तो शांति और सद्भाव कायम करने में डॉ. लोहिया ने गांधी का सहयोग किया। इस प्रकार वे  गांधीजी के करीब  क़रीब आ गये थे। इतने क़रीब की गांधी ने जब लोहिया से कहा कि जो चीज़ आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं उसका उपभोग तुम्हें भी नहीं करना चाहिए और सिगरेट त्याग देना चाहिए तो लोहिया ने तुरन्त उनकी बात मान ली।   महात्मा जी से लोहिया के विचार इतने मिल रहे थे कि लगता था कि आज़ादी के बाद लोहिया ही गांधी की राजनीति के वारिस बनेगें .ऐसा सन्दर्भ देखने को मिला लगता है कि आज़ादी के  बाद की भारत की  राजनीति पर  फिर से विचार की ज़रूरत  जितनी आज है उतनी कभी नहीं थी    .भारतीय पक्ष नाम के एक कोष में    लिखा  है  की 28 जनवरी1948 को गांधी ने लोहिया से कहा, मुझे तुमसे कुछ विषयों पर विस्तार में बात करनी है। इसलिये आज तुम मेरे शयनकक्ष में सो जाओ। सुबह तड़के हम लोग बातचीत करेंगे। लोहिया गांधी के बगल में सो गये। उन्होंने सोचा कि जब बापू जागेंगे, तब वे जगा लेंगे और बातचीत हो जाएगी। लेकिन जब लोहिया की आँख खुली तो गाँधी जी बिस्तर पर नहीं थे। बाद में जब डॉ. लोहिया गांधी से मिले तब गांधी ने कहा, "तुम गहरी नींद में थे। मैंने तुम्हें जगाना ठीक नहीं समझा। खैर कोई बात नहीं। कल शाम तुम मुझसे मिलो। कल निश्चित रूप से मैं कांग्रेस और तुम्हारी पार्टी के बारे में बात करूँगा। कल आख़िरी फैसला होगा।" यानी २९  जनवरी के दिन डॉ लोहिया उन्हें वादा करके आये कि 30 तारीख को बात करने के  लिए आ जायेगें  .
लोहिया 30 जनवरी1948 को गांधी से बातचीत करने के लिए टैक्सी से बिड़ला भवन की तरफ बढ़े ही थे कि तभी उन्हें गांधी की शहादत की खबर मिली। एक ठोस योजना की भ्रूण हत्या हो गयी। बापू अपनी शहादत से पहले अपने आख़िरी वसीयतनामे में कांग्रेस को भंग करने की अनिवार्यता सिद्ध कर चुके थे। उस समय उन्होंनें ऐसा स्पष्ट संकेत दिया था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान अनेकानेक उद्देश्यों के निमित्त गठित विविध रचनात्मक कार्य संस्थाओं को एकसूत्र में पिरोकर शीघ्र ही एक नया राष्ट्रव्यापी लोक संगठन खड़ा किया जायेगा। डॉ. लोहिया की उसमें विशेष भूमिका होगी। इस प्रकार बनने वाले शक्तिपुंज से बापू आज़ादी की अधूरी जंग के निर्णायक बिन्दु तक पहुंचाना चाहते थे।
डॉ लोहिया  के जीवन इस पक्ष  के बारे में जानकारी की  कमी है . ज़ाहिर है की अब इस विषय पर भी सोचविचार  की  जानी चाहिए कि अगर महात्मा जी और लोहिया की वह  मुलाक़ात हो गयी होती तो हमारे देश का इतिहास बिलकुल अलग होता.इस बात की पूरी संभावना है कि महात्मा गांधी की राजनीति और उसमें होने वाले संघर्ष के असली वाहक डॉ राम मनोहर लोहिया  ही होते.लेकिन वह मुलाक़ात नहीं हो सकी और कांग्रेस से अलग होकर डॉ लोहिया और उनके साथियों ने जो राजनीतिक रास्ता चुना वह समाजवाद का था. आज़ादी के बाद  के लोहिया के सारे काम पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि उनकी मान्यताएं भी लगभग  वही थीं जिनके लिए महात्मा गाँधी ने आजीवन संघर्ष किया . जब कांग्रेस के सत्ताधीशों से महात्मा गांधी निराश हो गए थे तो उनको लगा था कि डॉ राम मनोहर लोहिया ही उनकी राजनीतिक सोच के हिसाब से आज़ाद भारत के भविष्य को डिजाइन कर सकते हैं .लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था.
१९४७ के बाद की जो कांग्रेस है उसमें महात्मा गांधी की राजनीति का कोई पुछत्तर नहीं नज़र आता .महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने के लिए आज़ादी के आंदोलन को एक  हथियार माना था लेकिन १९४७ के बाद हम साफ़ देखते हैं कि  डॉ बी आर आंबेडकर की दलितों के लिए आरक्षण की योजना  को संविधान में डालने के अलावा कुछ नहीं हुआ. हाँ यह भी सच है कि जवाहरलाल नेहरू ने आंबेडकर की संवैधानिक सोच का समर्थन किया .लेकिन इस सीन से कांग्रेसी नदारद थे .  सरकारी तौर पर  जाति आधारित छुआछूत को मिटाने और सामाजिक समरसता की स्थापना का  कोई प्रयास नज़र नहीं आता. गांधी के नाम पर अपना कारोबार चलाने वाली कुछ संस्थाओं ने मंदिर आदि में प्रवेश जैसी कुछ सांकेतिक कार्यवाही की लेकिन कहीं भी गंभीर राजनीतिक क़दम नहीं उठाये गए. 
महात्मा गांधी ने साफ कहा था कि कल कारखानों के मालिक उद्योगपति का रोल एक  ट्रस्टी का होगा लेकिन जिस तरह की औद्योगिक नीति बनी , सार्वजनिक संपत्ति की मिलकियत के जो नियम बने उसमें महात्मा गांधी कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आते.सारा का सारा कंट्रोल पूंजीपति के हाथ में दे दिया गया . मजदूरों के कल्याण के लिए जो नीतियां बनीं उसमें भी उद्योगपति का पलड़ा भारी कर दिया गया.अपने देश की श्रम नीतियां मजदूरों के शोषण का हथियार बनीं .महात्मा जी  का सबसे प्रिय विषय था , ग्रामीण भारत का समुचित विकास लेकिन कृषि नीतियां ऐसी बनायी गयीं जिसमें कहीं भी गाँव में रहने वाले किसान की भलाई का कोई स्थान नहीं था. इस देश में शुरू से  ही खेती को  उस रास्ते पर विकसित किया गया जिसके बाद किसान का रोल राष्ट्रीय विकास में केवल मतदाता का होकर रह गया . इस देश में नेहरू के वारिसों ने जिस तरह की कृषि नीति को महत्व दिया उसमें किसान को केवल उतना ही सुविधा दी जाती है जिक्से बाद वह शहरी आबादी के लिए भोजन का इंतज़ाम करता रहे , और सत्ताधारी पार्टी को वोट देता रहे. 
महात्मा गांधी ने कहा था कि पंचायतों का रोल भारत के ग्रामीण जीवन में सबसे ज्यादा होना चाहिए . लेकिन सरकार ने ऐसी नीतियों बनाईं कि आज देश में वकीलों और उनके दलालों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार हो गया  है . ग्रामीण भारत में ऐसा कोई  परिवार नहीं बचा है जिसने कोर्ट के फेरी न लगायी हो . ज़ाहिर है कि महात्मा गांधी एक हार सपने को सत्ताधारी दलों ने नाकाम किया है .
ऐसा लगता है कि अगर २९ जनवरी १९४८ की सुबह  डॉ लोहिया और महात्मा गांधी की बातचीत  हो गयी होती तो शायद डॉ लोहिया कुजात गांधीवादी न होते। वे ही महात्मा गांधी के असली वारिस होते . बहुत बाद में उन्होंने सरकारी और मठी गांधीवादियों से परेशान होकर अपने आपको और अपने साथियों को कुजात गांधीवादी कह दिया था लेकिन अगर गांधी जी ने उनको कांग्रेस से अपनी निराशा से विधिवत परिचित करा दिया  होता तो इस बात में दो राय नहीं होनी चाहिए कि  डॉ राम मनोहर लोहिया ने  महात्मा जी  की  इच्छा को पूरा किया होता और महात्मा गांधी की विरासत को कांग्रेस और कांग्रेसी सत्ता की फाइलों में गुम होने से बचा लिया होता

Friday, October 5, 2012

किस्सा सब्ज़ बाग़ और अरविंद केजरीवाल की नई पार्टी




शेष नारायण सिंह 

अन्ना हजारे के पूर्व शिष्य अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी की शुरुआत कर दी . नई दिल्ली के वी पी हाउस में अपने समर्थकों के साथ आये और राजनीतिक पार्टी लांच करने की घोषणा कर दी. उन्होंने बताया कि २६ नवम्बर को पार्टी का नाम और उसका घोषणापत्र जारी कर दिया जाएगा.अरविंद केजरीवाल के साथ कुछ ऐसे लोग भी आये जिनके बारे में माना जाता है कि वे गंभीर लोग हैं . इसलिए उम्मीद की जा रही है कि २६ नवम्बर को जब उनकी पार्टी का ऐलान होगा तो कुछ नया ज़रूर होगा.
इस वी पी हाउस में बार बार राजनीतिक इतिहास लिखा गया है .यहाँ कई बार राजनीतिक परिवर्तन की इबारत लिखी गयी है . हो सकता है कि गांधी जयन्ती के दिन अरविंद केजरीवाल के जिन मित्रों का जमावड़ा हुआ था वे किसी नई राजनीतिक शक्ति की शुरुआत के कारण बनें.इस सम्मलेन में कुछ कागज़ पत्र भी जारी किये गए जिनके आधार पर करीब डेढ़ महीने तक बहस  होगी और उसके बाद राजनीतिक पार्टी के गठन की विधिवत घोषणा की जायेगी.  किसी भी पार्टी की घोषणा के पहले उसके बारे में कुछ कहना बहुत ही मुश्किल काम होता है . इसलिए आज अरविंद केजरीवाल और  वी पी हाउस में इकठ्ठा हुए उनके साथियों के सपनों के बारे में बात की जायेगी. देश भर के बड़े अखबारों ने केजरीवाल की पार्टी की शुरुआत को बहुत महत्व दिया है और देश के  सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी की खबर को प्राथमिकता दी है . ज़ाहिर है  आज से ही हिन्दी क्षेत्रों में इस पार्टी के बारे में बहस शुरू हो चुकी है अखबार ने लिखा है कि अन्ना की जगह महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री के पोस्टर लगे मंच से केजरीवाल ने कहा, 'सभी दलों ने मिलकर जन लोकपाल आंदोलन को बार-बार धोखा दिया। हमें चुनौती दी गई कि खुद चुनाव लड़कर बनवा लो। आज हम इस मंच से एलान करते हैं कि हम चुनावी राजनीति में कूद रहे हैं। जनता राजनीति में कूद रही है'. उनके साथ मंच पर राजनीतिक चिन्तक  योगेंद्र यादव भी मौजूद थे .उन्होंने कहा कि आज के ज़माने में राजनीति ज़रूरी है , इससे अलग नहीं रहा जा सकता .

केजरीवाल ने पार्टी के विज़न डाकुमेंट , एजेंडा और उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया का मसौदा पेश किया. अभी कल तक अन्ना हजारे की जयजयकार कर  रहे अरविंद केजरीवाल ने उनके एक अहम सवाल का जवाब  भी दिया और अपने भाषण में ऐलान किया कि  , 'बार-बार सवाल पूछा जा रहा है कि पैसा कहां से आएगा? लेकिन, ईमानदारी से चुनाव लड़ने के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती। मौजूदा नेताओं ने ऐसा माहौल बना दिया है कि राजनीति सिर्फ गुंडों का काम बनकर रह गई है। हमें साबित करना है कि यह देशभक्तों का काम है।'
जानकार बताते हैं कि उनकी नई पार्टी में केजरीवाल के अलावा  प्रशांत भूषण ,योगेंद्र यादव ,गोपाल राय, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को आलाकमान का रुतबा हासिल होगा . जो कागजपत्र पेश किये गए उनपर नज़र डालने से साफ़ समझ में आ जाता है कि अगर यह राजनीतिक पार्टी सत्ता में आ गयी तो बहुत जल्द एक ऐसी व्यवस्था कायम हो जायेगी जो हर तरह से आदर्श होगी.चुनाव में टिकट देने के मामले में इस पार्टी का बहुत ही साफ़ रुख होगा . एक परिवार के एक ही सदस्य चुनाव लड़ने दिया जाएगा.  पार्टी का कोई भी सांसद,विधायक लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं करेगा .सांसद और विधायक  सुरक्षा और सरकारी बंगला नहीं लेंगे . हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज पार्टी पदाधिकारियों पर लगने वाले आरोप की जांच किया करेगें .पार्टी को मिलने वाले सभी चन्दों का हिसाब पार्टी की वेबसाइट पर डाला जाएगा. दिल्ली की मुख्य मंत्री से नाराज़ और बिजली के बिल में हो रही अनाप शनाप वृद्धि के खिलाफ दिल्ली में आन्दोलन छेड़ा जाएगा.
अरविंद केजरीवाल की पार्टी के बारे में जो कुछ भी अब तक पता चला है  उसके आधार पर उनकी प्रस्तावित पार्टी से बहुत उम्मीदें नहीं बनतीं. आम आदमी का नाम लेकर शुरू की जा रही पार्टी के शुरुआती कार्यक्रम में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बल पर बहुत उम्मीद बन सके . लेकिन पार्टी के शुरू करने वालों को बहुत उम्मीदें हैं . केजरीवाल के साथी और गंभीर राजनीतिक कार्यकर्ता गोपाल राय से बात चीत करने का मौक़ा मिला.उनका कहना है कि इस देश में जब तक गाँवसभा में बैठे हुए आम आदमी को अपने आस पास का विकास करने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक इस देश में सही मायने में लोकशाही की स्थापना नहीं की जा सकती. . उन्होंने कहा कि  अंग्रेजों की नौकरशाही को जवाहरलाल नेहरू ने अपना लिया था. वहीं बहुत बड़ी गलती हो गयी थी. नौकरशाही के  बारे में उनकी पार्टी नए सिरे से विचार करेगी. लेकिन अभी यह साफ़ नहीं   है कि नई नौकरशाही का स्वरुप क्या होगा. इस पर विचार चल रहा है . गोपाल राय से बात करके ऐसा लगता है कि केजरीवाल की पार्टी वही सब करना चाहती है जो महात्मा गाँधी के हिंद स्वराज और ग्राम स्वराज में राजनीतिक कार्य का मकसद बताया गया  है . यह अलग बात है  कि पूरी बातचीत में उन्होंने महात्मा गांधी का नाम एक बार भी नहीं लिया . .
टीम केजरीवाल का आरोप  है  कि अभी जो व्यवस्था है उसमें सरकारें शुद्ध रूप से वी आई पी का काम करती हैं . लेकिन यह ज़रूरी है  कि उनको इस तरह से ढाला जाए कि वे आम आदमी का काम के लिए अपने आपको तैयार करें .पार्टी की तैयारी के  बारे में भी अरविंद की टीम में काफी हद तक सहमति बन चुकी है . हरावल दस्ता तो वही होगा जो जनलोकपाल  के लिए अन्ना हजारे के  आन्दोलन में उनके साथ था. लेकिन इसमें उन लोगों को नहीं लिया जाएगा जो अब अलग हो चुके हैं . इस वर्ग में किरण बेदी जैसे लोगों का नाम है . रामदेव से भी अब इन लोगों का कोई लेना देना नहीं है . यह बात तो तीन दिन पहले ही साफ़ हो चुकी है जब टाइम्स नाउ चैनल  पर रामदेव के ख़ास साथी वेद प्रताप वैदिक ने अरविंद  और उनके  साथियों का मजाक उड़ाया था. दूसरा  वर्ग उन लोगों का होगा अ किसी भी तरह के जनांदोलनों  में काम कर रहे हैं वे भी पार्टी में कार्यकर्ता के रूप में शामिल किये जायेगें . तीसरा वर्ग उन लोगों का होगा जो भ्रष्टाचार से ऊब चुके हैं और जो  नई पार्टी एके साथ रहेगें लेकिन बहुत सक्रिय नहीं रहेगें. वास्तव में यही वर्ग पार्टी का जनाधार होगा.
अभी तक के अरविंद केजरीवाल की जो सोच  है उसके लागू होने पर देश में एक बहुत बड़ा आन्दोलन शुरू हो सकता है . लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि  भारत का मध्यवर्ग इस पार्टी को कितनी गंभीरता से लेता है . भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आन्दोलन चला था  उसमें तो यह लोग सफल नहीं रहे थे. इनके ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि इन्होने जनता के भ्रष्टाचार विरोधी  गुस्से को शासक वर्गों के हित के लिए तबाह कर दिया था .और  आम आदमी  में निराशा भर दी थी. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से देश के मध्य वर्ग में बहुत ही ज्यादा उत्साह जगा था और लगने लगा था कि भ्रष्टाचार पर आम आदमी की नज़र है , वह ऊब चुका है और अब निर्णायक प्रहार की मुद्रा में है . आम आदमी जब तक मैदान नहीं लेता , न तो उसका भविष्य बदलता है और न ही उसके देश या राष्ट्र का कल्याण होता है .शायद इसीलिए जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे ने आवाज़ बुलंद की तो पूरे देश में लोग उनकी हाँ में हां मिला बैठे. लगभग पूरा मध्यवर्ग अन्ना और अरविंद केजरीवाल के साथ था . भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में केंद्र की कांग्रेस की सरकार को घेर कर जनमत की ताक़त हमले बोल रही थी . लेकिन इसी बीच अन्ना हजारे के आन्दोलन की परतें खुलना शुरू हो गईं
यह भी शक़ हुआ था कि कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ उबल रहे जन आक्रोश को दिशा भ्रमित करने के लिए धन्नासेठों ने अन्ना हजारे और उनकी टीम के ज़रिये हस्तक्षेप किया हो . यह डर बेबुनियाद नहीं है क्योंकि ऐसा बार बार हुआ है . आम आदमी को अरविंद केजरीवाल की टीम से बहुत उम्मीदें हैं . भविष्य ही बताएगा कि उनकी उम्मीदों का क्या नतीजा निकलता है .

Thursday, October 4, 2012

दक्षिण एशिया का सबसे परेशान राजनेता----आसिफ अली ज़रदारी



शेष नारायण सिंह 

दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा परेशान राजनेताओं की अगर लिस्ट बनायी जाए तो उसमें सबसे ऊपर पाकिस्तान के राष्ट्रपति ,आसिफ अली ज़रदारी का नाम आयेगा. पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने उनके जीवन के पुराने किस्सों की पोल खोलने का  फैसला कर लिया है . यह वह किस्से  हैं जिसमें सदर-ए-पाकिस्तान एक अलग तरह की शख्सियत के मालिक के रूप में पहचाने जाते हैं . उस दौर में वे खुद हुकूमत में नहीं थे और देश की सबसे ताक़तवर राजनेता के पति के रूप में रहते थे. उनके ऊपर सत्ता का गैर वाजिब इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं .पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट को भरोसा है कि उन्होंने बहुत बड़ी रक़म स्विस बैंकों में जमा कर रखी है और सरकार को चाहिए कि स्विटज़रलैंड की सरकार से बात करके वह सारी रक़म वापस लायें . सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह का एक आदेश भी जारी कर रखा है . पूर्व प्रधान मंत्री यूसुफ़ रज़ा गीलानी को सुप्रीम कोर्ट ने हुक्म दिया था कि  एक चिट्ठी स्विटज़रलैंड की सरकार के पास लिख भेजें जिसके बाद सारा पैसा वापस आ जाएगा. लेकिन प्रधान मंत्री गीलानी ने चिट्ठी वैसी नहीं  लिखी जैसी सुप्रीम कोर्ट चाहता था . इसी चक्कर में उनको गद्दी गंवानी पड़ी. अब नए प्रधान मंत्री आये हैं उन्होंने भी शुरू में तो बहुत जोर शोर से चिट्ठी लिखने की बात की थी लेकिन लगता है कि अब ढीले पड़ गए हैं . क्योंकि २६ सितम्बर  को जिस चिट्ठी का ड्राफ्ट लेकर उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट गयी थी वह नाकाफी पाया गया और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आसिफ सईद खोसा ने सरकार की तरफ से पेश हुए कानून मंत्री फारूक नायक को चेताया कि आप इस चिट्ठी में ज़रूरी बदलाव करके ५ अक्टूबर तक लेकर आइये वरना सरकार के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुक़दमा चलाया जाएगा .सरकार का तर्क है कि आसिफ अली ज़रदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति हैं इसलिए उन्हें इस तरह के मुक़दमों में नहीं घसीटा कजा सकता . इसी तर्क के चलते पूर्व  प्रधान मंत्री यूसुफ़ रज़ा  गीलानी पर तौहीने अदालत का मुक़दमा चला था और उन्हें हटना पडा था. मौजूदा सरकार भी यही  तर्क दे रही थी लेकिन पिछले हफ्ते नए प्रधान मंत्री की समझ में मामले की गंभीरता आ गयी . लेकिन जो चिट्ठी लेकर उनके मंत्री महोदय पंहुचे थे  सुप्रीम कोट ने उसे बेकार की चिट्ठी बताया और कहा  कि अगर  यही रवैया रहा तो मौजूदा प्रधान मंत्री पर भी तौहीने अदालत का मुक़दमा चलेगा . जिस केस में  आसिफ अली ज़रदारी को घेरा गया है वह नब्बे के दशक का है जब उनकी  पत्नी स्व बेनजीर भुट्टो प्रधान मंत्री थीं और ज़रदारी साहब मिस्टर टेन परसेंट के रूप में जाने जाते थे. . उनके ऊपर आरोप है कि उन्होंने कस्टम ड्यूटी के निरीक्षण का ठेका किसी कारोबारी को दिलवाने के लिए सवा करोड़ डालर की रिश्वत ली थी. पाकिस्तान की सरकार के लिए ज़रदारी को बचाने का प्रोजेक्ट बहुत भारी पड़ रहा है . सुप्रीम कोर्ट की तरफ से किसी मुरव्वत की उम्मीद किसी भी हालत में  नहीं है . २६ सितम्बर की सुनवाई में भी मौजूदा प्रधान मंत्री राजा परवेज़ अशरफ की ओर से पेश हुए कानून मंत्री ने जब गुजारिश की कि सुनवाई बंद कमरे में की जाय तो अदालत ने  कानून मंत्री की अर्जी को मंज़ूर तो कर लिया लेकिन उन्हें सख्त हिदायत दी कि ५ अक्टूबर  को जब वे तशरीफ़ लाईं तो टालने की गरज से नहीं अदालत की इच्छा का सम्मान करने के लिए आयें.
उधर अंतर राष्ट्रीय दुनिया का दबाव भी पाकिस्तान पर लगातार बढ़  रहा है . पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बहुत ही खस्ता हालत में है .. उसे अमरीकी और सउदी अरब की मदद की ज़रुरत हर दम ही रहती है . लेकिन अमरीकी मदद  के बंद होने के खतरे हमेशा ही सर पर मंडराते रहते हैं . अमरीका सहित बाकी  दुनिया को लगता है कि पाकिस्तान की हुकूमत फौज और आई एस आई के दबाव में आकर काम करती है और आतंकवाद को बढ़ावा देती है . इस बात में सच्चाई भी हो सकती है  लेकिन पाकिस्तान की सिविलियन हुकूमत की यह औकात नहीं है कि वह फौज  या आई एस आई के काम में दखल दे सके. पाकिस्तान में आतंक के निजाम को नकारने का ज़िम्मा भी  ज़रदारी के काम में शामिल कर दिया गया है . २५ सितम्बर को उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देने का मौक़ा मिला जहां वे पाकिस्तान की समस्याओं का ज़िक्र तक नहीं कर पाए. लगभग पूरे  वक़्त उन्होंने अंतर राष्ट्रीय बिरादरी से  यही अपील की कि उनके देश को आतंकवाद का स्पांसर न माना जाए . उन्होंने कहा कि हकीकत यह है  कि पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है .अब वहां सवाल जवाब तो होता नहीं वरना कोई पत्रकार पूछ सकता था कि आतंकवाद के ज़रिये अपने पड़ोसी देशों , भारत और अफगानिस्तान में अपनी ताक़त बढाने का फैसला करते वक़्त इस बारे में विचार कर लेना चाहिए था .  आसिफ ज़रदारी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने लगभग गिडगिडाते हुए कहा कि उनके देश ने आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए बहुत काम कर लिया है और अब उनकी हिम्मत  नहीं है कि वे एक देश के रूप में और भी कुछ कर सकें . उन्होंने कहा कि उनका देश आतंकवाद से परेशान है और बाकी दुनिया उनके ऊपर ही दबाव  बना रही है कि  आतंकवाद  ख़त्म करो.उन्होंने  अपने भाषण में कहा कि जितना पाकिस्तान ने झेला है उतना दुनिया के किसी देश ने आतंकवाद के मार को नहीं झेला है . उन्होंने  अपील किया कि  उनके देश के उन लोगों की याद को अपमानित न किया जाए इन्होने आतंकवाद के खिलाफ  लड़ते हुए अपनी जिंदगियां तबाह की हैं . उन्होंने अपने आपको भी आतंकवाद का पीड़ित बताया और कहा कि उनकी पत्नी जो  पाकिस्तान की  बहुत बड़ी नेता थीं, आतंकवादियों के कायराना हमले का शिकार हो गयी थीं . उन्होंने कहा कि उनके देश पर लगातार अमरीकी ड्रोन हमले होते रहते हैं इसलिए उन्हें अमरीकी नेतृत्व में भरोसा करने के लिए पाकिस्तानी अवाम को तैयार करने में बहुत परेशानी  का सामना करना पड़ता है . वे पाकिस्तान के बारे में किसी भी सवाल का जवाब नहीं देगें . उन्होंने बुलंद आवाज़ में कहा कि उनके देश के ७ हज़ार सैनिक और ३७ हज़ार लोग आतंकवाद के  शिकार हो चुके हैं . उन्होंने अपने आपको भी बेनजीर भुट्टो का शौहर होने के नाते आतंकवाद का शिकार बताया . . अब कोई इन ज़रदारी साहेब से पूछे के भाई आपके देश से आने वाले आतंक के चलते  पिछले ३० वर्षों में भारत के पंजाब , कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में  जो तबाही हुई है उसको भी जोड़ लीजिये तो तस्वीर बिलकुल अलग नज़र आयेगी.संयुक्त राष्ट्र की अपनी तक़रीर में आसिफ ज़रदारी अपने देश के उन तानाशाहों पर भी खासे नाराज़ नज़र आये जिनके लिए संयुक्त राष्ट्र में पलकें  बिछा दी जाती थीं . उन्हीं तानाशाहों ओर फौजी हुक्मरानों की वजह से उनके देश में आतंक भी बढ़ा है और आर्थिक हालात भी बिगड़े हैं . उन्होंने अन्तर राष्ट्रीय बिरादरी से अपील की कि पाकिस्तान की सिविलियन हुकूमत को इज्ज़त देगें  तो पाकिस्तानी अवाम का भला होगा.. उन्होंने शिकायत की  जिन फौजी तानाशाहों के कारण उनके देश का सब कुछ तबाह  हो गया है आप लोगों ने उन्हें तो सम्मान दिया और एक सिविलियन राष्ट्रपति से तरह तरह के सवाल पूछ रहे  हैं 
घरेलू मोर्चे पर भी  आसिफ अली ज़रदारी परेशान हैं . उनके बेटे बिलावल ज़रदारी भुट्टो के बारे में खबर है कि वे पाकिस्तान की मौजूदा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार  से प्रेम करते हैं और उनसे शादी करना चाहते हैं . राष्ट्रपति ज़रदारी की परेशानी यह है कि वे अपने बेटे को उसकी उम्र से  ग्यारह साल बड़ी किसी महिला से शादी  नहीं करने देना चाहते ,खासकर अगर वह महिला शादीशुदा हो और दो बच्चियों की माँ हो. इसके अलावा वह महिला पाकिस्तान में बहुत ही प्रभावशाली परिवार की हैं और आसिफ  अली ज़रदारी को  डर है कि कहीं उनके बेटे के इस मुहब्बत भरे फैसले से उसका राजनीतिक भविष्य न चौपट हो जाए. बहर हाल जो भी हो , हालात ऐसे हैं कि आसिफ ज़रदारी को चैन से रहने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं .

Saturday, September 22, 2012

उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने वालों की नज़र कहीं चुनाव पर तो नहीं



 शेष नारायण सिंह 

ममता बनर्जी ने  यू पी ए की सरकार से समर्थन वापस लेकर लोकसभा चुनाव की तारीख को निश्चित रूप से २०१३ में डाल दिया है .आम तौर पर  जनता जल्दी चुनावों के पक्ष में नहीं रहती. राजनीतिक पार्टियों में भी चुनाव के लिए बहुत उतावलापन नहीं देखा जाता  लेकिन जब से कामनवेल्थ ,२ जी और कोयला घोटाला में कांग्रेस सरकार बुरी तरह से घिरी है ,लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल को सत्ता करीब नज़र आने लगी है . लोकतंत्र में यह सभी पार्टियों का अधिकार है कि वे चुनाव के ज़रिये सत्ता में आने की कोशिश करें.लेकिन इस कोशिश में यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक नियमों का विधिवत पालन हो और लोकतंत्र की संस्थाओं का सम्मान हो .उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी दल को भी चुनावों के समय से पहले होने में बहुत लाभ की उम्मीद है . समाजवादी पार्टी ने अभी ६ महीने पहले स्पष्ट  बहुमत हासिल करके सरकार बनायी है . जिसके बाद लोक सभा क्षेत्रों के चुनावी आकलन के बाद साफ़ हो गया है कि लोकसभा की कम से कम ५० सीटों पर उनको बहुमत मिल सकता है . पिछले चुनाव के बाद एक और राजनीतिक घटना हुई है  जिसके बाद समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव की स्वीकार्यता राज्य की अगड़ी जातियों में भी बढ़ी है . सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सवाल पर समाजवादी पार्टी के रुख से राज्य की राजनीति के संतुलन में भारी बदलाव के संकेत नज़र आ रहे हैं. मुलायम सिंह यादव राज्य की गैर दलित जातियों के सबसे बड़े शुभचिंतक के रूप में देखे जा रहे हैं . ज़ाहिर है कि अगर जल्दी चुनाव हुआ तो उनको चुनावी फायदा निश्चित रूप से होगा .

इसके साथ साथ ही एक और कोशिश चल रही है . राज्य की एक राजनीतिक पार्टी की कोशिश है कि वह मुलायम सिंह यादव के खिलाफ ऐसा माहौल  बनाए कि वे शुद्ध रूप से मुसलमानों के शुभचिंतक के रूप में  देखे जाएँ और धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए . पिछले ६ महीनों में उत्तर प्रदेश में एक अजीब ट्रेंड नज़र आ रहा है .  राज्य में साम्प्रदायिक तनाव की कई घटनाएं हो चुकी हैं . मथुरा, बरेली और अब गाज़ियाबाद जिले की घटनाओं में अजीब तरह की समानता है . इन घटनाओं के साथ साथ ही यह प्रचार भी चलता रहता है कि मायावती के राज में इस तरह की कोई घटना नहीं हुई .  यानी यह साबित करने की कोशिश होती है कि मायावती के कार्यकाल में कानून  व्यवस्था की हालत  बेहतर थी . उसके साथ की एक नया राजनीतिक सोच के अलंबरदार कहने लगते हैं कि मुलायम सिंह की पार्टी की सत्ता आने के बाद मुसलमान बहुत ही मनबढ़ हो जाते हैं और वे  मौक़ा पाते ही तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं . बीजेपी के राज्य स्तर के नेता मुस्लिम तुष्टीकरण की बात करना शुरू कर चुके हैं . उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी की सत्ता आने के बाद मुसलमानों में अराजकता बढ़ गयी है .यह बातें आंशिक रूप से सच हो सकती हैं .लेकिन पूरी सच्चाई कुछ और है . गाज़ियाबाद  जिले के मसूरी -डासना इलाके में पिछले दिनों हुई साम्प्रदायिक तनाव की घटना के बाद कुछ नौजवानों की जान  गयी जिसको कि बचाया जा सकता था. कहीं से अफवाह फैलाई गयी कि मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ ,कलामे-पाक का अपमान हुआ है . ज़ाहिर है इस तरह की घटना के बाद लोगों में नाराज़गी होगी . जिन लोगों ने गाज़ियाबाद जिले के इस इलाके का दौरा वारदात के बाद किया है  उनको पता है कि इस घटना में कई तरह की  गड़बड़ियां हुई हैं सबसे बड़ी गलती तो  उस इलाके के थानेदार की है जिसने घटना की जानकारी मिलने के कई घंटे बाद कोई कार्रवाई की. इस बीच शरारती तत्व और राजनीतिक लाभ के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को बदनाम करने वाली राजनीतिक पार्टियों के लोग सक्रिय रहे . कुछ लड़कों को ललकार कर निहित स्वार्थ के लोगों ने पुलिस पर हमले करवाए . आत्म रक्षा  के नाम पर पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की लेकिन सबको मालूम है कि पुलिस ने जवाबी कार्रवाई के नाम पर मुसलमानों को घेरकर मारा और इलाके में आतंक फैलाने की कोशिश की. इस बीच राजनीतिक लाभ लेने वाले भी सक्रिय हो गए. मौजूदा सरकार को सत्ता दिलवाने का दावा करने वाले एक नेता ने तो  यहाँ तक कह दिया कि  समाजवादियों को देना होगा मुसलमानों के खून का हिसाब . इसी शीर्षक से यह खबर उर्दू अख्बारों में भी छपवाई गयी. उधर बीजेपी ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाते हुए समाजवादी पार्टी को घेरना शुरू कर दिया . लेकिन गाज़ियाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सम्मानित  रिपोर्टर,अशोक निर्वाण ने जब इलाके का दौरा किया तो बिलकुल अलग तस्वीर सामने आई  . वहां से लौटकर उन्होंने जो रिपोर्ट दी उसके मुताबिक मसूरी -डासना  की वारदात में इस इलाके में चल रहे कमेलों के मालिकों का हाथ है . मेरठ में इस तरह के कमेले  बहुत हैं लेकिन वहां इनका विरोध हो रहा है जिसके बाद अन्य इलाकों भी इस तरह का काम शुरू हो गया है . मसूरी-डासना के आस पास इस तरह के कमेले बहुत बड़े संख्या में बन गए हैं . गैर कानूनी तरीके से बूचडखाना चलाया जाता  है तो उसे यहाँ की स्थानीय भाषा में कमेला कहते हैं . पता चला है कि बहुजन समाज पार्टी के एक पुराने नेता और उनके  रिश्तेदारों  के बहुत सारे कमेले मेरठ में हैं .  

सवाल यह  है कि मसूरी थाने के इलाके में हुई घटना जिसमें पुलिस की गोली लगभग आधा दर्जन लोगों की मौत हो गयी ,उसके पीछे किसका हाथ है . वहां जो सवाल सबकी ज़बान पर है  वह यह कि क्या इसमें अवैध रूप से मीट व मांस का व्यापार करने वाले वधशाला माफिया का हाथ है। इस सवाल का जबाब ढूंढने के लिए प्रशासन तथा खुफिया विभाग के आला अधिकारी लगे हुए हैं। मसूरी में इस समय जानवरों के  मीट व मांस का अवैध कारोबार करने वाले मीट माफिया ने बड़े पैमाने पर कमेले खोले हुए हैं। इस इलाके से रोजाना करोड़ों का डिब्बाबंद मीट सप्लाई होता है. इस इलाके के लोग यहां होने वाले प्रदूषण का विरोध करने के लिए आन्दोलन की राह पर चल चुके हैं . लोगों ने गाज़ियाबाद के कलेक्टर के दफ्तर के सामने  धरना भी दिया था। पता चला है कि जिला प्रशासन ने मीट का अवैध कारोबार करने वालों पर  कार्रवाई करने की योजना बना ली थी जिसकी भनक  मीट माफिया को लग गई थी। प्रशासन का ध्यान अपनी तरफ से हटाने के लिए मीट माफिया ने सुनियोजित तरीके से साज़िश  करके  मसूरी में धर्म के नाम पर दंगे का रूप दे दिया। उधर प्रशासन ने इस मामले में लगभग पांच हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ  रिर्पोट दर्ज कराई है। पुलिस ने बड़ी संख्या में  संदिग्ध लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है।  आरोप यह भी है कि पुलिस लगातार मुसलमानों के घरों पर छापे मार रही है और लोगों को उठा कर अज्ञात स्थान पर ले जा रही है.हिंसा भड़कने के कारणों की व्यापक छानबीन के बाद पता चला है कि वारदात के दिन  दोपहर 12 बजे थाना मसूरी के  थानेदार पी के सिंह को कुछ लोगों ने बताया था कि रेलवे लाइन के पास पवित्र कुरान के कुछ पन्ने पड़े हुए है। इस पर थानेदार ने कुछ ध्यान नहीं दिया और देखते ही देखते इलाके में शाम 7 बजे हिंसा शुरू हो गयी .अगर मसूरी का यह थानेदार सजग हो जाता तो यह हादसा न होता। मसूरी के नागरिकों का कहना है मसूरी में जो भी थानेदार आता है उसे कमेले चलाने वाले रिश्वत देते  हैं. और इसी रिश्वत की लालच में वहां का थानेदार इस तरह के काम में शामिल हो जाता है 

इस इलाके में चल रहे कमेलों के प्रदूषण से बहुत परेशानियां पैदा हो गयी हैं .अवैध वधशाला से निकलने वाले खून को बोरिंग के ज़रिये सीधे जमीन में डाला जा रहा है जिसके चलते पानी बदबूदार तथा लाल हो गया है। यह मामला बहुत दिनों से उठाया जा रहा था लेकिन जिले के अधिकारी कुछ नहीं कर रहे थे . मामला जब मीडिया में आया तो प्रशासन ने कार्रवाई करने के मन बना लिया और कमेला माफिया की उल्टी गिनती शुरू हो गई .सरकारी  कार्रवाई की भनक लगते ही माफिया ने साज़िश के तहत धार्मिक भावनाएं भड़काकर हिंसा करा दी ताकि उसके खिलाफ  कार्रवाई न हो सके तथा प्रशासन अपना ध्यान उसकी तरफ  से हटा ले।  इस इलाके में कभी भी हिंदू - मुस्लिम फसाद नहीं हुआ। मसूरी के गांव देहरा में मंदिर-मस्जिद की दीवारे मिली हुई है।  हिंदू-मुस्लिम मिलकर एक साथ इबादत करते है। मीडिया के कैमरों में जिन असामाजिक तत्वों के चेहरे सामने आए हैं वे बाहरी लोग हैं । जाहिर है कि कुछ लोगों की मंशा इस इलाके की  फिजा को खराब करना था, जिसमें वो एक हद तक कामयाब भी हो गए.

बहर हाल अब यह राज्य सरकार की ड्यूटी है कि वह साम्प्रदायिक आधार पर समाज में बंटवारा करने वालों की शिनाख्त करे और उनके साथ सख्ती से पेश आये. इस तरह के लोग हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी . सरकार को इस तरह  के लोगों को इतनी सज़ा देनी चाहिए कि  भविष्य में किसी की हिम्मत भी न पड़े कि वह साम्प्रदायिक माहौल को खराब करने के बारे में सोचे. इस बात की संभावना भी है कि मौजूदा मुख्यमंत्री की पार्टी के कुछ शुभचिंतक या उनकी पार्टी के सदस्य भी इस घिनौने खेल में शामिल हों . यह हुकूमत का फ़र्ज़ है कि इस तरह के लोगों को कानून की ताक़त से वाकिफ कराये और इलाके में शान्ति का निजाम कायम करे . 

Tuesday, September 18, 2012

दिल्ली के छात्रों ने साम्प्रदायिक ताक़तों को ठुकराया


शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली। 16 सितंबर .दिल्ली के दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों से जो संकेत आ रहे हैं उन्हें नज़र अंदाज़ कर पाना लगभग असंभव है .दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में  हुए छात्र संघ चुनावों के नतीजों से साफ़ है कि दोनों ही विश्वविद्यालयों के छात्रों ने साम्प्रदायिक ताक़तों को नकार दिया है . दिल्ली में छात्र संघों के चुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं होते . पूरे शहर में बाकायदा प्रचार होता है और इन विश्वविद्यालयों में पूरे देश से छात्र आते हैं . 
यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि चुनाव में जीत किसकी हुई है . दिल्ली विश्वविद्यालय में कांग्रेस का छात्र संगठन एन एस यू आई बीजेपी के छात्र संगठन के मुक़ाबिल था  तो छात्रों ने उसे जिता दिया जबकि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संगठन मज़बूत था तो उन्हें जिता दिया.गौर तलब यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय तो ए बी वी पी का गढ़ माना जाता है जबकि  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी एकाधिक बार ए बी वी पी काफी मजबूती के साथ चुनाव लड़ चुकी है .और अध्यक्ष की सीट पर भी क़ब्ज़ा कर चुकी है . 
अक्सर ऐसा होता रहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों  को बीजेपी अपनी पार्टी के बढ़ते क़दम के रूप में पेश करती रही है . आज बातचीत में एक बड़े कांग्रेसी नेता ने बताया कि अगर दिल्ली विश्वविद्यालय यूनियन के चुनाव में बीजेपी समर्थित विश्‍वविद्यालय जीत गए होते तो बीजेपी एक प्रवक्ता गण प्रधान मंत्री सहित पूरी सरकार का इस्तीफ़ा और ज्यादा जोर से मांग रहे होते . लेकिन अब सारे लोग सन्न हैं . चुनाव हारने के  बाद बीजेपी समर्थित छात्रों ने जो हंगामा किया उस पर भी बीजेपी के किसी बड़े नेता की  कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है .दूसरी तरफ छात्रसंघ के चुनाव में अपने छात्र संगठन के उम्मीदवारों की भारी जीत से कांग्रेस के नेता  बहुत उत्साहित हैं .वैसे तो छात्रसंघ चुनावों और उनके नतीजों की राष्ट्रीय राजनीति में खास अहमियत नहीं होती लेकिन भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे-केजरीवाल और बाबा रामदेव के आंदोलनों का केंद्र दिल्ली ही थी. कोयला खंडों के आवंटन पर संसद को जाम करने, डीज़ल की मूल्यवृद्धि और खुदरा क्षेत्र में  विदेशी निवेश के विरोध में भी हमलावर रही  बीजेपी कैम्प में चिंता की  लकीरें  साफ़ नज़र आ रही हैं .. 
भाजपा सर्मथित, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इस चुनाव में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया था. लेकिन उसके उम्मीदवार हार गए. कांग्रेस के छात्र नेताओं की इस जीत को कांग्रेस के नेता भावी राजनीति का संकेत बता रहे हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार यह बताता है कि मध्यमवर्ग के लोग और खासतौर से युवा किस दिशा में सोच रहे हैं. दिल्ली विश्‍वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव विशुद्ध रूप से राजनीतिक आधार पर लडे. जाते हैं.
बीजेपी के नेता अरुण जेटली, विजय गोयल,  और विजेंद्र गुप्ता  और कांग्रेस के  कपिल सिब्ब्ल, अजय माकन, अलका लांबा आदि दिल्ली विश्वविद्यालय के एचात्र राजनीति से आये हैं जबकि प्रकाश करात , सीताराम येचुरी, और डी पी त्रिपाठी 
 जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं .ज़ाहिर है  कि यह चुनाव कुछ न कुछ बड़े संकेत तो दे  ई रहा है . दिल्ली में मौजूद के एपार्टियों के नेताओं ने इन चुनावों को देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के  खिलाफ बन रहे माहौल का संकेत बताया.

हंगामा कर रहे विपक्ष ने संसदीय समितियां भी नहीं बनाने दीं

शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली,१७ सितम्बर . संसद में मानसून सत्र के हंगामे  के कारण लोक सभा और राज्य सभा में  कोई बहस नहीं हो सकी है लेकिन वे काम भी नहीं  हुए जिनपर कोई विवाद नहीं था. पता चला है कि मंत्रालयों से सम्बंधित संसद की कमेटियों का गठन भी नहीं हो सका है .संसद में काम बहुत होता है और ज़ाहिर है कि सारा काम सदनों में बहस के ज़रिये ही नहीं निपटाया जा सकता .संसद के पास इस कार्य को नि‍पटाने के लि‍ए सीमित समय होता है। इसलिए संसद उन सभी विधायी तथा अन्‍य मामलों पर, जो उसके समक्ष आते हैं, गहराई के साथ विचार नहीं कर सकती। अत: संसद का बहुत सा काम सभा की समितियों द्वारा निपटाया जाता है, जिन्‍हें संसदीय समितियां कहते हैं। संसदीय समिति से तात्‍पर्य उस समिति से है, जो सभा द्वारा नियुक्‍त या निर्वाचित की जाती है अथवा अध्‍यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित की जाती है और अध्‍यक्ष के निदेशानुसार कार्य करती है तथा अपना प्रतिवेदन सभा को या अध्‍यक्ष को प्रस्‍तुत करती है और समिति का सचिवालय लोक सभा सचिवालय द्वारा उपलब्‍घ कराया जाता है।    अपनी प्रकृति के अनुसार संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं: स्‍थायी समितियां और तदर्थ समितियां। स्‍थायी समितियां स्‍थायी एवं नियमित समितियां हैं जिनका गठन समय-समय पर संसद के अधिनियम के उपबंधों अथवा लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम के अनुसरण में किया जाता है। 

 मंत्रालयों की सलाहकार समितियों का कार्य काल  २१ अगस्त को पूरा हो गया है . हालांकि पीठासीन अधिकारी ही समितियों  का गठन करती हैं लेकिन सभी पार्टियों को अपने सदस्यों का नाम भेजना ज़रूरी होता है . इस बार कोयले की हलचल में सबंधित  कमेटियों का गठन इसलिए नहीं हो सका क्योंकि राजनीतिक पार्टियों ने नाम ही नहीं भेजा. परम्परा यह है कि मानसून सत्र के दौरान ही नई कमेटियों का गठन हो जाता है  लेकिन अभी तक इन कमेटियों का गठन नहीं हो सका है . कमेटियों का कार्यकाल २१ अगस्त को पूरा हो चुका है . आम तौर पर १ सितम्बर तक कमेटियों का गठन हो जाता है लेकिन इस  बार अभी तक यह काम नहीं हो सका है.

Sunday, September 16, 2012

पाकिस्तान ने जिन्नाह की विरासत को तबाह कर दिया


  

शेष नारायण सिंह 

सितम्बर १९४८ में मुहम्मद अली जिन्नाह का इंतकाल हो गया था. आज ६४ साल बाद जिन्नाह की विरासत को एक बार पाकिस्तान में भी नए सिरे से समझने की कोशिश की जा रही है . ज़रुरत इस बात की है कि भारत और पाकिस्तान  के संबंधों में हो रहे विकास के मद्दे नज़र भारत में भी जिन्नाह की विरासत को समझा जाये  इस बात में दो राय नहीं है जिन्नाह भारत की आज़ादी के सबसे बड़े सूत्रधारों में गिने जाते थे. कांग्रेस के संस्थापकों दादाभाई नौरोजी और फीरोज़ शाह मेहता के तो वे बहुत बड़े प्रशंसक थे , गोपाल कृष्ण गोखले का भी अपार स्नेह मुहम्मद अली जिन्नाह को हासिल था. आज़ादी की लड़ाई  के बहुत शुरुआती वर्षों में ही उन्होंने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बुनियाद रख दी थी. जो महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू  के युग में इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक  पार्टी का आधार बना रहा . बाद के वर्षों में साफ्ट हिंदुत्व के चक्कर में कांग्रेस की राजनीति का दार्शनिक आधार बहुत उलटे सीधे रास्तों से  गुज़रा  लेकिन जिन्नाह ने  जिस देश की स्थापना की थी वहां तो धर्मनिरपेक्ष राजनीति पता नहीं कब की ख़त्म हो चुकी है .  हालांकि इस बात में भी दो राय नहीं है कि पाकिस्तान में मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा सेकुलर है और वह भारत से दुश्मनी  को पाकिस्तान के विकास में सबसे  बडी बाधा मानता है .जिन्नाह को जब पाकिस्तान की संविधान सभा का सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था तो उस पद  को स्वीकार करने के लिए उन्होंने जो भाषण दिया था , आम तौर पर माना जाता है कि वही भाषण पाकिस्तान की भविष्य की राजनीति का  आदर्श बनने वाला था . ११ अगस्त १९४७ का उनका भाषण इतिहास की एक अहम धरोहर है.नए जन्म ले रहे पाकिस्तान के राष्ट्र के भविष्य का नुस्खा था उस भाषण में था  . लेकिन पाकिस्तान, भारत और इस इलाके में रहने वाले लोगों  का दुर्भाग्य है कि उनके उस भाषण में कही गयी गयी हर बात को आज़ाद पाकिस्तान के शासकों ने तबाह कर दिया . अपने नए मुल्क के लोगों से मुखातिब  पाकिस्तान के संस्थापक, मुहम्मद अली जिन्नाह ने उस  मशहूर भाषण में कहा कि , " अब आप आज़ाद हैं .पाकिस्तान में आप अपने मंदिरों ,अपनी मस्जिदों और अन्य पूजा के स्थलों पर जाने के लिए स्वतन्त्र हैं . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो सकती है  लेकिन पाकिस्तान के नए राज्य का उस से कोई लेना देना नहीं हैं .. हम एक ऐसा देश शुरू करने जा रहे हैं  जिसमें धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा . हम यह मानते हैं कि हम सभी एक स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं जिसमें हर नागरिक एक दूसरे के बराबर हैं . " इसी भाषण में जिन्नाह ने कहा था कि " हमें अपना आदर्श याद रखना चाहिए कि कि कुछ समय बाद पाकिस्तान में न कोई हिन्दू रहेगा ,न कोई मुसलमान  सभी लोग पाकिस्तान के स्वतन्त्र नागरिक के रूप में रहेगें  . हालांकि व्यक्तिगत रूप से सब अपने धर्म का अनुसरण करेगें लेकिन राष्ट्र के रूप में कोई धर्म नहीं रहेगा, "
मुहम्मद अली जिनाह के  इस रूप से इतिहास का हर विद्यार्थी वाकिफ है .१९२० के पहले जब जिन्नाह कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे उन्होंने हमेशा ही धर्म निरपेक्ष राजनीति का समर्थन किया . उन्होंने तो महात्मा गांधी की खिलाफत को बचाने के लिए चल रही मुहिम का भी विरोध किया था लेकिन बाद में वे धार्मिक आधार पर बन रहे एक राष्ट्र के संस्थापक बने . लेकिन जिन्नाह के दिमाग में तस्वीर बहुत ही स्पष्ट थी. उन्होंने  १४ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान की विधिवत स्थापना  होने के तीन दिन पहले ११ अगस्त को ही साफ़ कह दिया था कि पाकिस्तान एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनेगा. 
हम सभी जानते हैं कि जिन्नाह का वह सपना धूल में मिल चुका है . विभाजन के तुरंत बाद से ही पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथियों ने स्वतंत्र देश  की राजनीति पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश शुरू कर दी थी और आज पाकिस्तान में उनका ही  पूरी तरह से क़ब्ज़ा है . पाकिस्तान की फौज भी पूरी तरह से धार्मिक कट्टरपंथियों की मर्जी से चलती है . सही बात यह है कि पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करवाने के लिए तो जिन्नाह ने १९३६ के बाद से लगातार कोशिश की और केवल १० साल की मेहनत के बाद अंग्रेजों और कांग्रेस को मजबूर कर दिया कि भारत का बंटवारा हो गया लेकिन जिन्नाह मूल रूप से सेकुलर इंसान थे जो उन्होंने  अपने ११ अगस्त के भाषण में साफ़ कह दिया था. पाकिस्तान में भी जिन्नाह की  विरासत को लेकर ज़बरदस्त बहस चल रही है . लेकिन वहां आम तौर पर यही चर्चा होती है कि जिन्नाह ने धार्मिक आधार पर राज्य स्थापित करने की बात की थी या धर्म को निजी जीवन का आदर्श बताकर राज्य को सेकुलर बनाने की बात की थी . . पाकिस्तान के पहले प्रधान मंत्री और कायद-ए-आज़म के सबसे करीबी  शिष्य लियाक़त अली के क़त्ल के बाद यह साफ़ हो गया था कि  जिन्नाह ने जिन मान्याताओं को ध्यान में रख कर पाकिस्तान के भविष्य को डिजाइन करने के सपने देखे थे  वे नहीं चलने वाले थे . पाकिस्तान की आजादी के करीब १५ साल बाद या यूं कहिये कि जनरल अयूब की हुकूमत के खात्मे के बाद  से ही पाकिस्तान में जिन्ना की विरासत को तोड़ने मरोड़ने का काम पूरी शिद्दत से चल रहा  है . उसमें सभी ने अपनी तरह से  योगदान किया है . ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने इस्लामिक सोशलिज्म का आयाम भी जोड़ने की कोशिश की .हालांकि १९४८ में चिटगांव के किसी भाषण में जिन्नाह ने एक बाद इस शब्द का इस्तेमाल कर दिया था ,बाकी कहीं कोई  ज़िक्र नहीं है . लेकिन भुट्टो को शेख मुजीब से जो दहशत मिल रही थी उसके चलते उन्होंने  पाकिस्तान की राजनीति में तरह तरह के विरोधाभासों को जन्म दिया, उसी में से एक यह भी हो सकता. है. जब भुट्टो को जिया उल हक ने बेदखल किया उसके बाद तो  जिनाह के धर्म निरपेक्ष पाकिस्तान के सपने की कोई भी बात चर्चा में नहीं आने नहीं दी गयी , लागू करना तो अलग बात है . 
मुहम्मद अली जिन्नाह के ११ अगस्त १९४७ के प्रसिद्द भाषण में कहे गए धर्म निरपेक्षता वाले विचारों को तो उनके  उत्तराधिकारियों  ने दफ़न कर ही दिया  , उस भाषण में कहीं गयी हर बात को आज़ाद पाकिस्तान के नेताओं ने तबाह करने में कोई कसर नहीं छोडी है . जब उनको कराची में उस ११ अगस्त की सुबह पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया था तो उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि उनकी संविधान सभा दुनिया के लिए मिसाल बनेगी. उन्होंने कहा था कि किसी भी सरकार का पहला कर्तव्य होता है कि वह कानून -व्यवस्था को  दुरुस्त करे जिस से देश में रहने वाले लोग भय मुक्त रह  सकें. लेकिन दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में कभी कोई भी भयमुक्त नहीं रह सका. जहां तक हिन्दू और मुसलमानों के बराबर अधिकार का सवाल है वह तो पाकिस्तान में कभी था ही नहीं . अजीब बात यह है कि मुसलमानों के अलग अलग सम्प्रदायों के लोगों के बीच भी लगातार झगडे होते रहे हैं और खून खराबा होता रहा है .अपने उस भाषण में जिन्नाह ने घूसखोरी और आर्थिक भ्रष्टाचार के बारे में चिंता जताई थी.  उन्होंने कहा था कि यह ब्रिटिश भारत की जड़ों को खोखला कर रहा था. लेकिन उनके उत्तराधिकारियों  ने घूस और भ्रष्टाचार को इतना महत्व दिया कि बाद के पाकिस्तान में यह सर्वोच्च स्तर  भी चलता रहा  और आज भी पाकिस्तानी  जीवन का स्थायी भाव है. उन्होंने कालाबाजारी के खिलाफ मजबूती से काम करने की भी बात की थी लेकिन आज तो पाकिस्तान एक राष्ट्र के रूप में राशनिंग और कालाबाजारी का शिकार है . यह काम १९४७ से अब तक कभी नहीं रुका . ज़ाहिर है कि कायद-ए-एअज़म की वह बात भी नहीं मानी गयी. . उन्होंने उसी भाषण में  कहा था कि बहुत ही मजबूती से पाकिस्तान को भाई भतीजावाद को ख़त्म कर देना चाहिए . जिसको पाकिस्तानी हुक्मरान ने पूरी तरह से नज़र अंदाज़ किया .
 सही बात यह है कि पाकिस्तान के शासक वर्ग ने पहले दिन से ही अपने संस्थापक की हर बात को नज़र अंदाज़  किया और कई मामलों में तो उल्टा किया. अगर उनके धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान के सपने को पूरा करने की कोशिश पाकिस्तान के शासकों ने की होती तो न आज तालिबान होता ,न हक्कानी होता , न जिया उल हक की सत्ता आती , न ही हुदूद का कानून बनता और न ही एक  गरीब देश की संपत्ति को पाकिस्तानी फौज के आला अफसर आतंकवादियों की मदद  के लिए इस्तेमाल कार पाते . उनकी मौत की ६४ साल बाद आज पाकिस्तान उस  मुकाम पर खड़ा है जब उसका सबसे बड़ा दानदाता अमरीका इस बात पर बहस कर रहा है कि  पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित होने से कैसे बचाया जाए. ज़ाहिर है पाकिस्तान के संस्थापक की हर बात को पाकिस्तानी सत्ताधीश भूल चुके हैं और मौजूदा हालात में यह मुश्किल है कि जिन्नाह के आदर्शों पर पाकिस्तान को चलाया जा सकेगा.

उत्तर प्रदेश की राजनीति तय करेगी देश की आगामी राजनीति की दिशा


( 10 सितम्बर को लिखा था )

शेष नारायण सिंह 

संसद के मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया . पूरे सत्र में केवल में दोनों सदनों से केवल चार विधेयक पास हो सके .जिसमें तीन तो  संस्थाओं के बिल हैं और एक रासायनिक हथियारों  को रोकने  से सम्बंधित कानून बनाने  के बारे में है ..इसके अलावा कुछ बिल केवल एक सदन से पास हुए . हल्ला गुल्ला के बीच ४ ज़रूरी बिल पास करा लिए गए.कुछ बिल केवल पेश किये जा सके इनमें संविधान के ११७ वें संशोधन का विवादास्पद बिल भी है जिसको पास करवा कर  सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस  फैसले को बे असर करना चाहती है जिसमें अनुसूचित जातियों को आरक्षण में प्रमोशन देने पर रोक लगा दी गयी है . यह बिल राज्य सभा में पेश कर दिया गया है . यानी अब यह महिला आरक्षण बिल की तरह संसद की संपत्ति बना रहेगा. अगर लोक सभा में पेश किया गया होता तो १५ वीं  लोक सभा का कार्यकाल ख़त्म होने पर वह बिल समाप्त मान लिया जाता . मानसून सत्र के दौरान संसद का बाकी समय २०१४ के लोक सभा चुनावों का एजेंडा तय करने में लग गया.बीजेपी ने कांग्रेस को भ्रष्ट साबित करने में कोई कसर नहीं छोडी . कोयले के ब्लाकों के आवंटन में हुई हेराफेरी  के बारे में नई दिल्ली में रहने वाले हर पत्रकार को पता था .जब सी ए जी ने उस हेराफेरी को एक शक्ल दे दी तो बीजेपी वाले सी ए जी की रिपोर्ट के बहाने कांग्रेस को घेरने की अपनी योजना में जुट गए. इसके लिए उन्होंने संसद में काम काज ठप्प करने की रण नीति अपनाई. यह रणनीति आम तौर पर सच्चाई को छुपाने के लिए अपनाई  जाती है . ऐसा लगता था कि दोनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियां, कांग्रेस और बीजेपी , कोयले के घोटाले के मामले पर  बहस नहीं चाहते थे. अगर बहस होती तो सारी बातें परत दर परत खुल जातीं और जैसा कि अब सभी जानते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी ,दोनों के ही नेता कोयले की हेरा फेरी में शामिल थे.  समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने जब तीसरे मोर्चे की शुरुआत के संकेत दिए तो उसी प्रेस वार्ता में उन्होंने साफ़ कह दिया था कि यह कांग्रेस और बीजेपी के बीच नूरा कुश्ती है .मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बासुदेव आचार्य ने भी उसी प्रेस संवाद में कहा था कि इस केस में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बहस से भाग रहे हैं . सीताराम येचुरी  ने भी कहा  है कि दोनों पार्टियों के बीच समझौता जैसा  कुछ हो गया था और इस बार संसद में शुद्ध रूप से मैच फिक्सिंग चल रही थी.  अब तो पता चल रहा है कि बहुत ही आदरणीय अखबारों के मालिक भी कोयले के लाभ हथियाने में लगे हुए थे. कुल मिलाकर संसद का मानसून सत्र विधायी कार्य के लिहाज़ से तो उपयोगी नहीं रहा लेकिन भविष्य की राजनीति का एजेंडा तय करने में इस सत्र की  महत्वपूर्ण भूमिका रही. 
इस सत्र में उत्तर प्रदेश की राजनीति के अंतर  कलह भी सामने आये तो वहां की राजनीति की वह ताकत  भी नज़र आई जिसके हिसाब से वह देश की राजनीति को प्रभावित करता है . करीब दो हफ्ते तक संसद के काम में बाधा डाल कर कोयले पर बहस न होने देने की बीजेपी और कांग्रेस की संयुक्त रणनीति से जब परदे लगभग हट गए  तो लेफ्ट फ्रंट के पुराने साथी मुलायम सिंह यादव ने मोर्चा संभाला और वामपंथी पार्टियों के  साथ अखबार वालों को संबोधित किया . उस दिन तो ऐसा लगा कि तीसरे मोर्चे के गठन की शुरुआत हो गयी है. बात अगले दिन भी चली जब मुलायम सिंह यादव ने संसद के मुख्य प्रवेश द्वार पर तीसरे मोर्चे के संभावित साथियों के साथ धरना दिया . लेकिन उसके बाद ही कांग्रेस ने  उनके हाथ एक ऐसा अवसर थमा दिया जिसके बाद उत्तर प्रदेश में लोक सभा चुनावों में उनकी जीत की संभावना बहुत बढ़ गयी है . कांग्रेस ने तय किया कि वह सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति वालों प्रमोशन देने के बारे में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभाव हीन  साबित करने के लिए राज्य सभा में एक बिल लायेगी.उत्तर प्रदेश में मायावती की राजनीति के चलते दलित बिरादरी के लोग मुलायम सिंह को वोट नहीं देते . ज़ाहिर है इस बिल का समर्थन करने से उनको कोई चुनावी फायदा नहीं होने वाला था . लेकिन विरोध करने से उत्तर प्रदेश के ओ बी सी ,ब्राह्मणों, कायस्थों और ठाकुरों का वोट एकमुश्त मिलने की संभावना थी. मुलायम सिंह यादव ने अवसर को फ़ौरन भांप लिया और दलितों के लिए प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता को प्रमोशन के आधार के रूप में मान्यता देने वाले बिल का विरोध करने का फैसला किया . भाग्य भी साथ दे रहा था . जब राज्य सभा में  हल्ला गुल्ला के बीच सरकार ने इस बिल को पेश करने की कोशिश की तो समाजवादी पार्टी के  सदस्य वेल  में जाने के लिए आगे बढे . लेकिन बहुजन समाज पार्टी के एक सदस्य ने सपा के नरेश अग्रवाल को  घेरकर रोकने की कोशिश की. नरेश अग्रवाल ने उसको धकेल दिया और आगे चले गए लेकिन इस प्रक्रिया में धक्का मुक्की हुई जिसको  टेलिविज़न पर पूरे देश ने देखा. सन्देश साफ़ था कि मुलायम सिंह यादव की पार्टी  उत्तर प्रदेश की ८० फीसदी आबादी के कल्याण के लिए किसी भी हद तक जा सकती  है . जहां मायावती बाकी देश में अपनी  बिरादरी के  वोटरों को खींचने में कुछ हद तक सफल रहीं वहीं मुलायम सिंह यादव ने यह लगभग तय कर दिया कि उत्तर प्रदेश में अब सभी सीटों पर मायावती के  साथ ब्राहमण नहीं खड़ा होगा. सरकारी नौकरियों में अगड़ी जातियों में सबसे  ज्यादा  संख्या  ब्राह्मणों की  ही  है . मायावती की प्रमोशन में आरक्षण की नीति से सबसे  ज्यादा ब्राह्मण ही परेशान हैं . कुछ  ब्राह्मणों  को राजनीतिक संरक्षण देकर मायावती ने अपनी छवि ब्राह्मणों की शुभचिंतक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी लेकिन जब आरक्षण में प्रमोशन की सबसे बड़ी समर्थक के रूप में उन्होंने अपने आप को स्थापित  कर दिया है तो उन्हें ब्राह्मण नेता, दलाल  या ठेकेदार तो समर्थन देते रहेगें लेकिन मध्यवर्ग का ब्राह्मण अब मायावती को किसी भी हाल में समर्थन नहीं देगा. राज्यसभा में इस बिल को पेश करने की प्रक्रिया में कांग्रेस ने जिस  उतावली का परिचय दिया है उसके बाद उसे भी उत्तर प्रदेश में अगड़ी जाति के सरकारी कर्मचारियों के शत्रु के रूप में ही राजनीति करनी पड़ेगी. इस सारी प्रक्रिया में मुलायम सिंह यादव ही एक ऐसे नेता हैं जो उत्तर प्रदेश की गैर दलित आबादी के सबसे प्रिय नेता के रूप में उभरे हैं .
जो  लोग मुलायम सिंह यादव को जानते हैं उन्हें मालूम है कि एक बार जो उनके साथ आ जाता है उसे वे भागने का मौक़ा बिलकुल नहीं देते. मुसलमानों के भी वे हमेशा से नेता नहीं थे लेकिन जब बाबरी मस्जिद की  हिफाज़त के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया तो मुसलमान  उनके  साथ  हो  गए . कल्याण  सिंह  को  साथ  लेने के हादसे  के बाद  थोडा दूर  गए  थे लेकिन जैसे  ही  उन्होंने कल्याण  सिंह  से किनारा किया  मुसलमानों ने उन्हें  फिर अपना लिया . आज मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के सबसे बड़े नेता हैं . ऐसा  इसलिए संभव हुआ कि उन्होंने जब मुसलमानों का विश्वास  जीता तो उनकी तरक्की के लिए बहुत काम भी किया. आज मुसलमान  उनके ऊपर  भरोसा करता है . अभी तक बीजेपी और कांग्रेस के प्रचार की मुख्य धारा यही रही है कि हर हाल में  अगड़ी जातियों को मुलायम सिंह यादव से दूर रखा  जाए, इसके लिए बीजेपी ने उन्हें मुल्ला मुलायम सिंह तक कह डाला था. लेकिन आज जब सरकारी नौकरियों में उनकी राजनीति के कारण अगड़ी जातियों के लोग उनके साथ जुड़ जाते हैं तो  वे भी कभी साथ नहीं छोड़ेगें. मुलायम सिंह यादव अपने साथ रहने वालों के लिए चिंतित रहते हैं, उसमें दो राय नहीं है.
इस तरह से बहुत ही भरोसे के साथ कहा जा  सकता है कि  संसद का मानसून सत्र विधायी कार्य के लिहाज़ से तो शायद बेकार साबित हुआ लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह निश्चित रूप से उफान लाएगा. इस बात की संभावना बहुत बढ़ गयी  है कि उत्तर प्रदेश से आने वाला कोई नेता देश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाला है . यह काम चौ.चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बाद उत्तर प्रदेश के किसी नेता ने नहीं किया . राजीव   गांधी को इस श्रेणी में नहीं रखा जाएगा क्योंकि उन्होंने अपनी माँ की मौत से पैदा हुई सहानुभूति के बाद सत्ता पायी थी . मुलायम सिंह यादव की मौजूदा राजनीति उन्हें देश भर  में ओ बी सी और सवर्ण जातियों का नेता बनाने की क्षमता रखती है . हालांकि यह देखना भी दिलचस्प होगा कि  उत्तर प्रदेश का यह नेता साथ छोड़कर जाने वाले अपने विरोधियों से साथ किस तरह से व्यवहार करता है . अब तक के संकेत से तो यही लगता है कि  बेनी प्रसाद वर्मा की तरह उन्होंने राजनीतिक विरोधियों को हमेशा शून्य तक पंहुचाया है . इस बार भी लगभग पक्का है कि नए राजनीतिक व्याकरण की रचना कर रहे मुलायम सिंह यादव के नए साथियों के आने के बाद उनका साथ छोड़ने वालों की खासी संख्या  होगी .  देखना यह है कि राज्य में सत्ता के नए समीकरण क्या रूप लेते हैं . 

राजनीतिक चंदा देने वाले ही घोटालों में भी पाए जाते हैं



(10सितम्बर को लिखा था )

शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली,१० सितम्बर.लोक प्रतिनधित्व कानून २०५१ में साफ़ लिखा है कि अगर कोई राजनीतिक पार्टी किसी से २० हज़ार रूपये से ज्यादा चंदा लेती है तो उसके बारे में चुनाव आयोग को सूचित करना अनिवार्य है . राजनीतिक पार्टियां किसी विदेशी कंपनी ,संस्था या व्यक्ति से राजनीतिक काम के लिए चंदा नहीं ले सकतीं.चुनाव सुधारों के लिए काम कर रही संस्था, ए डी आर ने २००३ से २०११ तक  राष्ट्रीय पार्टियों और कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को मिले चंदे  की जानकारी हासिल की है जिससे पता चलता है कि बड़ी पार्टियों ने खूब झूमकर चंदा लिया है . एक दिलचस्प बात यह है कि दान दाता कंपनियों में बड़ी संख्या  उन कारपोरेट घरानों की है जो दूरसंचार और खनिज सम्पदा के घपलों में नाम कमा चुके हैं 
पिछले सात वर्षों में सबसे ज्यादा आमदनी कांग्रेस को हुई  है . उसे २००८ करोड़ रूपये का चंदा मिला है . दूसरे नंबर पर बीजेपी है  इसी कालखंड में जिसकी आमदनी ९९४ करोड़ रूपये की है. इसके बाद उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी है जिसकी आमदनी ४८४ करोड़ रूपये  हैं ,मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को ४१७  करोड़ रूपये मिले हैं जबकि समाजवादी पार्टी ओ २७९ करोड़ रूपये की आमदनी हुई है.दिलचस्प बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी ने दावा किय है कि २००९ और २०११ के बीच में उसे एक भी स्रोत से २० हज़ार से ज़्यादा चंदा नहीं मिला है लेकिन इसी  काल खंड में उसे १७२ करोड़ रूपये का चंदा नंबर  एक  में मिला है .यानी इतनी बड़ी रक़म २० हज़ार से कम के दान दाताओं ने दी है . यह वही काल खंड है जब उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी.

इस काल खंड में जिन कंपनियों ने राजनीतिक दलों को खूब  प्रेम से दान दिया है  उनमें कई कम्पनियां ऐसी हैं जो या तो कोयला घोटाले से सम्बंधित हैं या अन्य किसी घोटाले में उनका नाम है . नरेंद्र मोदी के विवादित  वाइव्रेंट गुजरात प्रोजेक्ट के समर्थक सेठ भी राजनीतिक चंदे के दान दाताओं में प्रमुख रूप से पाए जा रहे हैं . सबसे बड़े दान दाताओं में  टोरेंट पावर , एशियानेट  टीवी  होल्डिंग ,स्टरलाईट , आई टी सी ,वीडियोकान ,लार्सेन  & टुब्रो  आदि हैं . बहुत सारी  कम्पनियाँ ऐसी  हैं जिन्होंने सभी सत्ताधारी पार्टियों को चंदा दिया है . कारपोरेट घरानों ने चंदा देने के लिए एक नया तरीका निकाला  है . कई बड़े घरानों ने इलेक्टोरल ट्रस्ट बना रखा है .इनमें से कुछ के नाम से तो  उसकी प्रमोटर कंपनी को पहचाना जा सकता है लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनके नाम से आसानी से उसके सेठ के बारे में जानकारी हासिल कर पाना बहुत  ही मुश्किल है . ट्रस्टों के नाम बड़े ही सम्माननीय हैं . जनरल एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ,पब्लिक एंड पालिटिकल अवेयरनेस ट्रस्ट ,भारती एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ,एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट,हार्मनी एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ,सत्या  एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ,चौगले  एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट और कारपोरेट एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट. जिस एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट  ने सबसे ज़्यादा चंदा दिया है उसका  नाम है, जनरल एलेक्ट्रोरल ट्रस्ट . इसने कांग्रेस और बीजेपी को खूब खुल कर चंदा दिया है .  यह वेदान्त ग्रुप का ट्रस्ट बताया जाता है . एयरटेल वाली कंपनी का भी एक  ट्रस्ट है और उसने भी खूब दान किया है .

पूरी ताक़त प्रधानमंत्री की छवि संवारने में लगी लेकिन राज्यों में कांग्रेस ने हार स्वीकार कर ली है .


 ( 5 सितम्बर को लिखा था)

शेष नारायण सिंह  

लोकसभा २०१४ की  तैयारियां ज़ोरों पर हैं .बीजेपी ने अब प्रधानमंत्री को भी निशाने पर ले लिया है . यह अलग बात है कि  पिछले आठ साल तक मुख्य विपक्षी दल ने कभी भी प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाए थे . कुछ बहुत ही नख दन्त विहीन आरोप लगाए जाते थे.. जैसे बीजेपी की तरफ से कहा जाता था कि प्रधान मंत्री बहुत कमज़ोर हैं, या बहुत  सीधे  हैं या खुद तो ईमानदार हैं लेकिन बे ईमानों की सरकार के अगुआ हैं . लेकिन अब बीजेपी को प्रधान मंत्री भ्रष्ट नज़र आने लगे हैं . प्रधानमंत्री ने भी बीजेपी को राजनीतिक रूप से घेरने के लिए सोनिया गांधी की मंजूरी ले ली है और उनके ताज़ा बयानों से लगता है कि वे बीजेपी को भी ईमानदारी के सांचे से बाहर लाने के लिए कटिबद्ध हैं .
अब कोयला भी एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिसमें कांग्रेस का भ्रष्टाचार उजागर होता है तो बीजेपी भी उस से कम भ्रष्ट नहीं है . संसद में बहस न करवाकर बीजेपी ने जो अपनी पोल खुलने से बचाने की कोशिश की थी , मनमोहन सिंह की सरकार के कुछ अफसरों ने वह काम फाइलें मीडिया को लीक करके पूरी कर दी हैं .. देश के सबसे महत्वपूर्ण अंग्रेज़ी चैनल के पास रोज़ ही कोई  ऐसी  फ़ाइल ज़रूर होती है  जिस से कांग्रेस के साथ साथ बीजेपी की भी किरकिरी हो रही है . संसद में जारी गतिरोध को राजनीतिक रूप से बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने की मुहिम में प्रधान मंत्री ने खुद मोर्चा संभाल लिया है . कोयला आवंटन के तकनीकी पक्ष की  बात तो उनके मंत्री और कांग्रेस के प्रवक्ता  लोग कर रहे हैं लेकिन बीजेपी  को राजनीतिक रूप से कमज़ोर साबित करने का ज़िम्मा खुद प्रधान मंत्री ने  संभाल लिया है .  खबर है कि बीजेपी के साथ साथ कांग्रेस के भी उन संसद सदस्यों को बेनकाब किया जाएगा जिन्होंने कोयले के ब्लाक ले रखे हैं . इस काम में सी बी आई का इस्तेमाल भी शुरू हो गया है .४ सितम्बर को सी बी आई ने जिन पांच कंपनियों के दफ्तरों पर छापे मारे हैं उनमें से कई दफ्तर कांग्रेसी सांसदों के बताये जा रहे हैं  . यह लगभग पक्का माना जा रहा है कि अब सी बी आई बीजेपी नेताओं के दोस्तों के ठिकानों पर छापेमारी करेगी जो कोयले के ब्लाक के लाभार्थी हैं .

प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था ९ प्रतिशत के आर्थिक विकास दर को  हासिल नहीं कर पा रही है  इसका मुख्य कारण यह है अपने देश में राजनीतिक माहौल विकास के पक्ष में नहीं है . उन्होंने गुड्स और सर्विसेज़ टैक्स को लागू न कर पाने के लिए भी विपक्ष को ही ज़िम्मेदार ठहराया . उन्होंने दावा किया कि अगर यह टैक्स लागू हो जाए तो आर्थिक विकास की दर कम से कम २ प्रतिशत बढ़ जायेगी.और टैक्स न देने वालों पर काबू किया जा सकेगा.उन्होंने विपक्ष पर सीधा हमला किया और कहा कि गरीबी,भूख और बीमारी जैसी समस्याओं को हल करने में भी विपक्ष बाधा डाल रहा है . उनका दावा है कि अगर विपक्ष सरकार को ठीक से काम करने दे तो इन समस्याओं  को हल करना आसान हो जाएगा. देश एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ रहा है और बीजेपी वाले संसद की कार्यवाही में लगातार बाधा डाल रहे हैं .यह मुख्य समस्याओं से आम आदमी का ध्यान हटाने की कोशिश है .काम के लिए  केवल २४ घंटे मिलते है और उसमें अगर बड़ा वक़्त बीजेपी की ध्यान बांटने वाली कारस्तानियों को संभालने में लग जायेगें  तो काम कैसे हो पायेगा.इस चक्कर में सरकार अपना बुनियादी काम भी नहीं कर पाती . इस से सरकार के काम कर सकने की क्षमता पर असर पड़ता है .डॉ मनमोहन सिंह का कहना है कि उनकी सरकार का मुख्य काम गरीबी , बीमारी और अशिक्षा से मुकाबला करना है.अगर उनकी सरकार यह काम करने में सफल होती है तो देश के करोड़ों लोगों को लाभ पंहुचेगा. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बीजेपी इस काम को करने नहीं दे रही है .
लेकिन इसका मतलब यह  नहीं है कि कांग्रेस चुनाव के लिए तैयार है, जिन राज्यों में  जल्द ही चुनाव होने हैं वहां कांग्रेस ने अपनी हार का सही इंतज़ाम  कर रखा है . गुजरात में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन वहां कांग्रेस का कोई अभियान नहीं है . वाइब्रेंट गुजरात के ज़रिये नरेंद्र मोदी ने मीडिया में अपनी छवि को चमकाने  का कार्यक्रम नियमित रूप से चला रखा है . गुजरात में  कांग्रेसी पूरी तरह से हतप्रभ हैं  और नरेंद्र मोदी के तय किये हुए एजेंडा पर केवल प्रतिक्रिया देने का काम कर रहे हैं . हिमाचल प्रदेश  में काग्रेस की कमान वीरभद्र सिंह के हाथ में दे दी गयी है . समझ में नहीं आता कि जो आदमी केंद्र सरकार से इसलिए निकाल दिया गया हो कि वह अपना काम ठीक से नहीं कर रहा  था, उसे सत्ताधारी  बीजेपी को चुनौती देने का काम क्यों सौंपा गया. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी विधान सभा  के चुनाव जल्द होने हैं . छत्तीस गढ़ में तो कांग्रेस की तरफ  से लगभग वाकओवर देने की तैयारी हो चुकी है .  रमन सिंह को वहां का कांग्रेसी आगामी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहा है जबकि मध्य प्रदेश में राहुल उर्फ़ अजय सिंह के अलावा कोई भी कद्दावर  कांग्रेसी मध्य प्रदेश की राजनीति में रूचि नहीं  ले  रहा है . राहुल गाँधी के कृपा पात्र सिंधिया जी के परिवार की ग्वालियर राज में थोड़ी बहुत हैसियत है. बाकी राज्य तो खाली ही पड़ा है . छिंदवाडा में कमलनाथ जीत जायेगें लेकिन उसके बाहर उनकी कोई राजनीति  नहीं है. दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश के अलावा बाकी भारत में  अपना साम्राज्य फैला रखा है और राम देव से लेकर अन्ना  हजारे तक को औकातबोध करा रहे हैं . मध्य प्रदेश  में वे २०१३ में जाने वाले हैं लेकिन फिलहाल तो वहां भी शिवराज सिंह का डंका बज रहा है . 

राजस्थान में भी चुनाव होने हैं . वहां कांग्रेस का राज है लेकिन सबका कहना है कि मौजूदा मुख्य मंत्री की अगुवाई में तो कांग्रेस की वर्तमान सीटों की आधी संख्या भी नहीं बचेगीं.कांग्रेस आलाकमान तय भी कर चुका है कि मुख्य मंत्री बदलना है. बताते हैं कि राहुल गांधी के एक प्रिय शिष्य  राजस्थान की किसी  रियासत के राजा के परिवार के कोई श्रीमानजी उनके मुख्य सलाहकार हैं , वे खुद ठाकुर हैं और  ठाकुरों के नेता बनने के सपने पाल चुके हैं इसलिए ब वहां किसी ठाकुर को आगे नहीं आने दे रहे हैं . राहुल गांधी उनकी नज़र से  ही देख रहे हैं इसलिए उनके मरजी चल रही है . बताया जा रहा है कि किसी ठाकुर मुख्य मंत्री के नेतृत्व  में चुनाव लड़ा जाने वाला है . राहुल गांधी के यह शिष्य नेता अपने आपको ही मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने के चक्कर में हैं .शायद इसी लिए इन्होने राजस्थान में ठाकुरों को कांग्रेस में किसी भी महत्वपूर्ण पद पर नहीं बैठने  दिया है . अजीब लगता है जब ठाकुर प्रभाव वाले राज्य में कांग्रेस के किसी भी संगठन का मुखिया ठाकुर नहीं है.  राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष  जाट है जिसके ऊपर किसी ब्राह्मण के क़त्ल  का आरोप है . यह व्यक्ति जब भी चुनाव लड़ता है,हार जाता है . युवक कांग्रेस का अध्यक्ष भी जाट है . सेवा दल भी जाटों के कब्जे में है एन एस यू आई ,इंटक और महिला कांग्रेस के अध्यक्ष  भी जाट हैं . जाटों के इस दबदबे का कोई कारण समझ में नहीं आता क्योंकि इसकी वजह से ब्राहमण , और ठाकुर जो कांग्रेस की तरफ खिंच रहे थे अब दूर भाग रहे हैं . इस तरह से एक महत्वपूर्ण राज्य जहां कांग्रेस मज़बूत हो सकती थी ,वहां  एक नौजवान राजपूत कांग्रेसी नेता की महत्वाकांक्षा  के चलते  कांग्रेस की हार की तैयारी हो चुकी है .
हालांकि अभी दूर है लेकिन लोक सभा चुनाव 2014 में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में भी   हार मान ली है . वहां  फैजाबाद के सांसद निर्मल खत्री को पार्टी की कमान सौंप दी गयी है . निर्मल खत्री बहुत भले आदमी हैं लेकिन इस से ज्यादा कुछ नहीं  . फैजाबाद जिले में कभी कभार चुनाव जीतने के अलावा उन्होंने कभी कोई बड़ी सफलता नहीं हासिल ही है . उनको  उनके समकालीनों में कोई भी  नेता नहीं मानता . लगता है कि राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश का मैदान पूरी तरह से सपा बनाम बसपा की लड़ाई के लिए छोड़ दिया है .ऐसी हालत में लगता है कि अपने वफादार लोगों को स्थापित करने के चक्कर  में  कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल  होने की योजना पर काम कर रही है . दिल्ली में तो मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत छवि को ठीक करने के लिए सारी ताकतें एकजुट हो गयी हैं लेकिन राज्यों में  कांग्रेस आलाकमान हार की इबारत लिख रहा है .

Monday, August 20, 2012

भ्रष्टाचार की आग में जल रही जनता का गुस्सा जिन्न की तरह बोतल में बंद किया जा चुका है




शेष नारायण सिंह 

अन्ना हजारे के आन्दोलन को तहस नहस कर दिया गया. शासक वर्गों को इसमें मज़ा आ गया. पूरे देश में भ्रष्टाचार से त्राहि त्राहि कर रही जनता के लिए अन्ना हजारे एक ऐसे मसीहा के रूप में उभरे थे जो उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आने वाली भ्रष्टाचार की परेशानी से मुक्ति दिला सकता था. अन्ना हजारे के साथ गोपाल राय जैसा क्रांतिकारी भी था जो साम्राज्यवादी सत्ता प्रतिष्टानों के खिलाफ संघर्ष करता रहा है . गोपाल और उनके जैसे बहुत सारे सही क्रांतिकारियों को उम्मीद हो गयी थी कि  अन्ना हजारे के साथ भारत की जनता को एकजुट किया जा सकेगा और सत्ता प्रतिष्टान के खिलाफ लामबंद किया जा सकेगा . लेकिन ऐसा न  हो सका.  अपने ब्लॉग पर 4 नवम्बर २०११ को प्रकाशित एक लेख से कुछ अंश आज याद आते हैं . उस दिन  भी मेरे मन में   यह डर था कि कहीं सत्ता प्रतिष्ठानों के मालिक अन्ना के साथ मिलकर आम आदमी के गुस्से को बोतल में न बंद कर दें . आखिर में वही हुआ और  अन्ना हजारे के आन्दोलन से पैदा हुआ जागरण योग गुरु रामदेव के ज़रिये शासक वर्गों की गोद में जा बैठा. अन्ना हजारे के आन्दोलन की विफलता के कारणों की बाद में जांच होती रहेगी लेकिन फिलहाल आम आदमी पस्त है और उसे मालूम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने की उसके क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं .

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से देश के मध्य वर्ग में बहुत ही ज्यादा उत्साह जगा था और लगने लगा था कि भ्रष्टाचार पर आम आदमी की नज़र है , वह ऊब चुका है और अब निर्णायक प्रहार की मुद्रा में है . आम आदमी जब तक मैदान नहीं लेता , न तो उसका भविष्य बदलता है और न ही उसके देश या राष्ट्र का कल्याण होता है .१८५७ में इस देश के आम आदमी ने अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ लड़ने के मन बनाया था. उस लड़ाई में सभी तो नहीं शामिल हुए थे लेकिन मानसिक रूप से देश की अवाम अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार थी. सही लीडरशिप नहीं थी इसलिए उस दौर के आम आदमी का आज़ाद होने का सपना बिखर गया. दोबारा यह मौक़ा तुरंत नहीं आया. साठ साल के इंतज़ार के बाद यह मौक़ा फिर मिला जब अंग्रेजों का अत्याचार सभी सीमाएं लांघ चुका था .जलियाँवाला बाग़ में हुए अंग्रेज़ी सत्ता के बेशर्म प्रदर्शन के बाद पूरे देश में सत्ता के खिलाफ गुस्सा था. ठीक इसी वक़्त महात्मा गाँधी ने आम आदमी के गुस्से को एक दिशा दे दी.आम आदमी का वही गुस्सा बाद में आज़ादी की लड़ाई की शक्ल अख्तियार करने में कामयाब हुआ . महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चले २५ साल के संघर्ष के बार अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद ने हार मान ली और देश आज़ाद हो गया . उस राजनीतिक घटना के साठ साल बाद आज फिर इस देश का आम आदमी आर्थिक भ्रष्टाचार के आतंक के नीचे दब गया है . वह आर्थिक भ्रष्टाचार के निरंकुश तंत्र से आज़ादी चाहता है . आज देश में भ्रष्टाचार का आतंक ऐसा है कि चारों तरफ त्राहि त्राहि मची हुई है , देश के गाँवों में और शहरों के गली कूचों में लोग भ्रष्टाचार की गर्मी में झुलस रहे हैं . शायद इसीलिए जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे ने आवाज़ बुलंद की तो पूरे देश में लोग उनकी हाँ में हां मिला बैठे. सूचना क्रान्ति के चलते पूरे देश में अन्ना की मुहिम का सन्देश पंहुच गया. भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मसीहा मिल गया था . लगभग पूरा मध्यवर्ग अन्ना के साथ था . भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में केंद्र की कांग्रेस की सरकार को घेर कर जनमत की ताक़त हमले बोल रही थी . लेकिन इसी बीच अन्ना हजारे के आन्दोलन की परतें खुलना शुरू हो गईं .अब यह शंका पैदा होने लगी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई शायद अब आगे नहीं चल पायेगी. 


अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों की व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल उठने के बाद भी अन्ना का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में जिस पारदर्शिता के साथ भ्रष्टाचार के किलों को ढहाया है उसके चलते उनकी ख्याति ऐसी है कि उनको कोई भी बेईमान नहीं कह सकता . उनके ऊपर उनके विरोधी भी धन की उगाही का आरोप नहीं लगा सकते . उनके साथियों के तथाकथित भ्रष्ट आचरण से भी आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है . आम आदमी की चिंता यह है कि क्या अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने की जो लड़ाई शुरू की थी वह भ्रष्टाचार को वास्तव में मिटा पायेगी ? अन्ना के आन्दोलन से भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता को बहुत उम्मीदें हैं . लेकिन अब तक टकटकी लगाए बैठे लोगों की उम्मीदें अब टूटने लगी हैं .पिछले दिनों  ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिसके बाद भरोसा टूटना जायज़ है. भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे इस आन्दोलन में कारपोरेट सेक्टर के भ्रष्टाचार के बारे में कुछ नहीं कहा गया है . जबकि सच्चाई यह है कि अब सरकारी अफसर के साथ साथ निजी कम्पनियां भी ऐसे भ्रष्टाचार में लिप्त पायी जा रही हैं जिसकी वजह से आम आदमी परेशान होता है .एक उदाहरण से बात को साफ़ करने की कोशिश की जा सकती है . दिल्ली में घरेलू बिजली सप्लाई का ज़िम्मा निजी कंपनियों के पास है . अगर यह कम्पनियां या इनके अधिकारी भ्रष्टाचार में शामिल होते हैं तो उसका सीधा नुकसान आम आदमी को होगा. ऐसी ही और भी बहुत सी सेवाएं हैं . बैंकिंग और इंश्योरेंस भी उसी श्रेणी में आता है . इसलिए वह सवाल जो अब बहुत लोगों के दिमाग में घूम फिर कर चक्कर काट रहा है, उसका जवाब भी तलाशा जाना चाहिए . कहीं ऐसा तो नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उबल रहे जन आक्रोश को दिशा भ्रमित करने के लिए धन्नासेठों ने अन्ना हजारे के ज़रिये हस्तक्षेप किया हो . यह डर बेबुनियाद नहीं है क्योंकि आज से करीब सवा सौ वर्ष पहले ऐसा हो चुका है . १८५७ में जब पूरे देश में अंग्रेजों के प्रति गुस्सा फूटा था तो अंग्रेजों ने ईस्ट इण्डिया कंपनी की हुकूमत को हटाकर ब्रिटिश सामाज्य की हुकूमत कायम कर दी थी. उस से भी लोग नाराज़ हो रहे थे . साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत ने इसे भांप लिया और ब्रिटिश इम्पायर के चाकर एक अधिकारी को आगे करके १८८५ में कांग्रेस बनवा दी . इतिहास के कई विद्वानों का कहना है कि १८८५ में कांग्रेस की स्थापना आज़ादी की लड़ाई में इम्पीरियल हस्तक्षेप था , भारतीय जनता के गुस्से को अंग्रेजों के हित की दिशा में ले जाने की एक कोशिश था. उसके बाद कांग्रेस के अधिवेशनो में जागरूक मध्य वर्ग के लोग बिटिश सम्राट की जय जय कार करते रहे . कांग्रेस के स्थापना के ३५ साल बाद वह संगठन आम आदमी का संगठन बन सका जब गाँधी ने देश की जनता का नेतृत्व संभाला. तब जाकर कहीं ब्रिटिश साम्राज्यवाद को प्रभावी चुनौती दी जा सकी. आज भी समकालीन इतिहास के जानकार पूछना शुरू कर चुके हैं कि कहीं अन्ना हजारे का आन्दोलन वर्तमान शासक वर्गों और धन्नासेठों के आशीर्वाद से अवाम के गुस्से को भोथरा करने के लिए तो नहीं चलाया गया था. क्योंकि अगर भ्रष्टाचार ख़त्म होगा तो नेताओं, अफसरों और पूंजीपतियों की आमदनी निश्चित रूप से घटेगी. इस सवाल का जवाब इतिहास की कोख में है लेकिन फिलहाल ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार की आग में जल रही जनता का गुस्सा जिन्न की तरह बोतल में बंद किया जा चुका है