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Saturday, October 13, 2012

अगर ३० जनवरी '४८ को महात्मा गांधी की हत्या न हुयी होती तो लोहिया उनकी विरासत के वारिस होते



शेष नारायण  सिंह 

30 जनवरी के दिन दिल्ली के बिडला  हाउस में महात्मा गांधी की  हत्या करके  नाथूराम  गोडसे ने केवल  महात्मा गाँधी की ही हत्या नहीं की थी .उसने एक आज़ाद देश के सपने के भविष्य को भी मार डाला था.  शासक वर्गो के शोषण के दर्शनशास्त्र के  प्रतिनिधि नाथूराम ने उसी हत्या के साथ अन्य बहुत सी विचारधाराओं की हत्या कर दी थी। महात्मा गाँधी को पढने वाला कोई भी आदमी बता देगा की महात्मा जी ने कांग्रेस के आर्थिक  विकास के उस माडल को नहीं स्वीकार किया था जिसे स्वतन्त्र भारत के लिए जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार वाले लागू करना  चाहते थे। महात्मा गाँधी ने साफ़ बता दिया था की वे गाँव  को विकास की इकाई बनाने के पक्षधर थे लेकिन  जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई को वाली कांग्रेस के नेताओं के दिमाग में औद्योगीकरण के रास्ते देश के आर्थिक विकास करने के सपने पल रहे थे . गांधी जी ने इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा है . उनकी मूल किताब हिंद स्वराज में तो यह बात साफ़ साफ़ लिखी ही है बाद के ग्रंथोंमें भी गाँव को  विकास की यूनिट बनाने की बात बार बार कही गयी है . आज़ादी की  लड़ाई तक यानी 1946 तक महात्मा गांधी की हर बात मानने वाले जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा जी की आर्थिक विकास की सोच को नकारना शुरू कर दिया था। भारत के आख़िरी आदमी के विकास की पक्ष धर गांधी की राजनीति से इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी। कांग्रेस का प्रभावशाली तबका  भी इस मामले में नेहरू के साथ था . गांधी जी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस को खत्म करके बाकी राजनीतिक जमातों को चुनावी मैदान में बराबरी देना चाहते थे  . लेकिन उस वक़्त तक कांग्रेस में सबसे अधिक प्रभाव शाली हो चुके सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया था। आर्थिक विकास  की उनकी सोच को भी सही ठहराने  वाला कोई भी आदमी जवाहर लाल की पहली मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं था।  गांधी जी इस बात से संतुष्ट नहीं थे। उधर  मुहम्मद अली जिन्नाह की जिद के चलते   मुसलमानों के  ज़मींदारों ने पूरे देश में दंगे भड़काने की साज़िश पर अमल करना शुरू कर दिया था। . 1946 के बाद से ही हर उस मूल्य को दफ़न किया जा रहा था जिसको  आधार बनाकर आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। आज़ादी के आन्दोलन के इथोस को कांग्रेस को लोग भूल चुके थे और अगर भूले नहीं थे तो उसे इतिहास के कूड़ेदान के हवाले करने की पूरी तैयारी कर चुके थे। 
इस पृष्ठभूमि में जिन लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी ,महात्मा गांधी उन लोगों पर बहुत भरोसा कर रहे थे .इनमें से एक डॉ राम मनोहर लोहिया थे  . अगस्त क्रान्ति के दौरान डॉ. लोहिया के काम से महात्मा गांधी अत्यंत प्रभावित हुए थे। उसके पहले  डॉ. लोहिया के कई लेख, महात्मा गांधी के अखबार 'हरिजन' में प्रकाशित भी हो चुके थे। गोवा के मामले पर उनका साथ महात्मा गांधी को छोड़कर और किसी बड़े नेता ने नहीं दिया।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार की नीतियां गांधी के विचारों से प्रतिकूल थीं। डॉ. लोहिया का समाजवाद गांधी की विचारधारा के अत्यन्त निकट था। नेहरू सरकार की दशा-दिशा के कारण महात्मा गांधी का नेहरू से मोहभंग हो रहा था और लोहिया की तरफ रूझान बढ़ रहा था। आज़ादी के बाद देश साम्प्रदायिकता के संकट में फंस गया तो शांति और सद्भाव कायम करने में डॉ. लोहिया ने गांधी का सहयोग किया। इस प्रकार वे  गांधीजी के करीब  क़रीब आ गये थे। इतने क़रीब की गांधी ने जब लोहिया से कहा कि जो चीज़ आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं उसका उपभोग तुम्हें भी नहीं करना चाहिए और सिगरेट त्याग देना चाहिए तो लोहिया ने तुरन्त उनकी बात मान ली।   महात्मा जी से लोहिया के विचार इतने मिल रहे थे कि लगता था कि आज़ादी के बाद लोहिया ही गांधी की राजनीति के वारिस बनेगें .ऐसा सन्दर्भ देखने को मिला लगता है कि आज़ादी के  बाद की भारत की  राजनीति पर  फिर से विचार की ज़रूरत  जितनी आज है उतनी कभी नहीं थी    .भारतीय पक्ष नाम के एक कोष में    लिखा  है  की 28 जनवरी1948 को गांधी ने लोहिया से कहा, मुझे तुमसे कुछ विषयों पर विस्तार में बात करनी है। इसलिये आज तुम मेरे शयनकक्ष में सो जाओ। सुबह तड़के हम लोग बातचीत करेंगे। लोहिया गांधी के बगल में सो गये। उन्होंने सोचा कि जब बापू जागेंगे, तब वे जगा लेंगे और बातचीत हो जाएगी। लेकिन जब लोहिया की आँख खुली तो गाँधी जी बिस्तर पर नहीं थे। बाद में जब डॉ. लोहिया गांधी से मिले तब गांधी ने कहा, "तुम गहरी नींद में थे। मैंने तुम्हें जगाना ठीक नहीं समझा। खैर कोई बात नहीं। कल शाम तुम मुझसे मिलो। कल निश्चित रूप से मैं कांग्रेस और तुम्हारी पार्टी के बारे में बात करूँगा। कल आख़िरी फैसला होगा।" यानी २९  जनवरी के दिन डॉ लोहिया उन्हें वादा करके आये कि 30 तारीख को बात करने के  लिए आ जायेगें  .
लोहिया 30 जनवरी1948 को गांधी से बातचीत करने के लिए टैक्सी से बिड़ला भवन की तरफ बढ़े ही थे कि तभी उन्हें गांधी की शहादत की खबर मिली। एक ठोस योजना की भ्रूण हत्या हो गयी। बापू अपनी शहादत से पहले अपने आख़िरी वसीयतनामे में कांग्रेस को भंग करने की अनिवार्यता सिद्ध कर चुके थे। उस समय उन्होंनें ऐसा स्पष्ट संकेत दिया था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान अनेकानेक उद्देश्यों के निमित्त गठित विविध रचनात्मक कार्य संस्थाओं को एकसूत्र में पिरोकर शीघ्र ही एक नया राष्ट्रव्यापी लोक संगठन खड़ा किया जायेगा। डॉ. लोहिया की उसमें विशेष भूमिका होगी। इस प्रकार बनने वाले शक्तिपुंज से बापू आज़ादी की अधूरी जंग के निर्णायक बिन्दु तक पहुंचाना चाहते थे।
डॉ लोहिया  के जीवन इस पक्ष  के बारे में जानकारी की  कमी है . ज़ाहिर है की अब इस विषय पर भी सोचविचार  की  जानी चाहिए कि अगर महात्मा जी और लोहिया की वह  मुलाक़ात हो गयी होती तो हमारे देश का इतिहास बिलकुल अलग होता.इस बात की पूरी संभावना है कि महात्मा गांधी की राजनीति और उसमें होने वाले संघर्ष के असली वाहक डॉ राम मनोहर लोहिया  ही होते.लेकिन वह मुलाक़ात नहीं हो सकी और कांग्रेस से अलग होकर डॉ लोहिया और उनके साथियों ने जो राजनीतिक रास्ता चुना वह समाजवाद का था. आज़ादी के बाद  के लोहिया के सारे काम पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि उनकी मान्यताएं भी लगभग  वही थीं जिनके लिए महात्मा गाँधी ने आजीवन संघर्ष किया . जब कांग्रेस के सत्ताधीशों से महात्मा गांधी निराश हो गए थे तो उनको लगा था कि डॉ राम मनोहर लोहिया ही उनकी राजनीतिक सोच के हिसाब से आज़ाद भारत के भविष्य को डिजाइन कर सकते हैं .लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था.
१९४७ के बाद की जो कांग्रेस है उसमें महात्मा गांधी की राजनीति का कोई पुछत्तर नहीं नज़र आता .महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने के लिए आज़ादी के आंदोलन को एक  हथियार माना था लेकिन १९४७ के बाद हम साफ़ देखते हैं कि  डॉ बी आर आंबेडकर की दलितों के लिए आरक्षण की योजना  को संविधान में डालने के अलावा कुछ नहीं हुआ. हाँ यह भी सच है कि जवाहरलाल नेहरू ने आंबेडकर की संवैधानिक सोच का समर्थन किया .लेकिन इस सीन से कांग्रेसी नदारद थे .  सरकारी तौर पर  जाति आधारित छुआछूत को मिटाने और सामाजिक समरसता की स्थापना का  कोई प्रयास नज़र नहीं आता. गांधी के नाम पर अपना कारोबार चलाने वाली कुछ संस्थाओं ने मंदिर आदि में प्रवेश जैसी कुछ सांकेतिक कार्यवाही की लेकिन कहीं भी गंभीर राजनीतिक क़दम नहीं उठाये गए. 
महात्मा गांधी ने साफ कहा था कि कल कारखानों के मालिक उद्योगपति का रोल एक  ट्रस्टी का होगा लेकिन जिस तरह की औद्योगिक नीति बनी , सार्वजनिक संपत्ति की मिलकियत के जो नियम बने उसमें महात्मा गांधी कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आते.सारा का सारा कंट्रोल पूंजीपति के हाथ में दे दिया गया . मजदूरों के कल्याण के लिए जो नीतियां बनीं उसमें भी उद्योगपति का पलड़ा भारी कर दिया गया.अपने देश की श्रम नीतियां मजदूरों के शोषण का हथियार बनीं .महात्मा जी  का सबसे प्रिय विषय था , ग्रामीण भारत का समुचित विकास लेकिन कृषि नीतियां ऐसी बनायी गयीं जिसमें कहीं भी गाँव में रहने वाले किसान की भलाई का कोई स्थान नहीं था. इस देश में शुरू से  ही खेती को  उस रास्ते पर विकसित किया गया जिसके बाद किसान का रोल राष्ट्रीय विकास में केवल मतदाता का होकर रह गया . इस देश में नेहरू के वारिसों ने जिस तरह की कृषि नीति को महत्व दिया उसमें किसान को केवल उतना ही सुविधा दी जाती है जिक्से बाद वह शहरी आबादी के लिए भोजन का इंतज़ाम करता रहे , और सत्ताधारी पार्टी को वोट देता रहे. 
महात्मा गांधी ने कहा था कि पंचायतों का रोल भारत के ग्रामीण जीवन में सबसे ज्यादा होना चाहिए . लेकिन सरकार ने ऐसी नीतियों बनाईं कि आज देश में वकीलों और उनके दलालों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार हो गया  है . ग्रामीण भारत में ऐसा कोई  परिवार नहीं बचा है जिसने कोर्ट के फेरी न लगायी हो . ज़ाहिर है कि महात्मा गांधी एक हार सपने को सत्ताधारी दलों ने नाकाम किया है .
ऐसा लगता है कि अगर २९ जनवरी १९४८ की सुबह  डॉ लोहिया और महात्मा गांधी की बातचीत  हो गयी होती तो शायद डॉ लोहिया कुजात गांधीवादी न होते। वे ही महात्मा गांधी के असली वारिस होते . बहुत बाद में उन्होंने सरकारी और मठी गांधीवादियों से परेशान होकर अपने आपको और अपने साथियों को कुजात गांधीवादी कह दिया था लेकिन अगर गांधी जी ने उनको कांग्रेस से अपनी निराशा से विधिवत परिचित करा दिया  होता तो इस बात में दो राय नहीं होनी चाहिए कि  डॉ राम मनोहर लोहिया ने  महात्मा जी  की  इच्छा को पूरा किया होता और महात्मा गांधी की विरासत को कांग्रेस और कांग्रेसी सत्ता की फाइलों में गुम होने से बचा लिया होता

Sunday, May 16, 2010

हमारी आज़ादी की विरासत का केंद्र है देवबंद

शेष नारायण सिंह


दारुल उलूम, देवबंद को दुश्मन की तरह पेश करने वाले सांप्रदायिक हिंदुओं को भी यह बता देने की जरूरत है कि जब भी अंग्रेजों के खि़लाफ बगावत हुई, देवबंद के छात्र और शिक्षक हमेशा सबसे आगे थे। इन लोगों को यह भी बता देने की ज़रूरत है कि देवबंद के स्कूल की स्थापना भी उन लोगों ने की थी जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के हीरो थे।

हाल में ही देवबंद के मौलाना नूरुल हुदा को दिल्ली हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर दफा 341 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई और उन्हें दिल्ली की एक अदालत से जमानत लेनी पड़ी। वे जेल से तो बाहर आ गए हैं लेकिन अभी केस खत्म नहीं हुआ है। उन पर अभी मुकदमा चलेगा और अदालत ने अगर उन्हें निर्दोष पाया तो उनको बरी कर दिया जायेगा वरना उन्हें जेल की सजा भी हो सकती है। उनके भाई का आरोप है कि 'यह सब दाढ़ी, कुर्ता और पायजामे की वजह से हुआ है, यानी मुसलमान होने की वजह से उनको परेशान किया जा रहा है।

हुआ यह कि मौलाना नूरुल हुदा दिल्ली से लंदन जा रहे थे। जब वे जहाज़ में बैठ गए तो किसी रिश्तेदार का फोन आया और उन्होंने अपनी खैरियत बताई और और कहा कि 'जहाज उडऩे वाला है और हम भी उडऩे वाले है।' किसी महिला यात्री ने शोरगुल मचाया और कहा कि यह मौलाना जहाज़ को उड़ा देने की बात कर रहे हैं। जहाज़ रोका गया और मौलाना नूरुल हुदा को गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ हुई और पुलिस ने स्वीकार किया कि बात समझने में महिला यात्री ने गलती की थी। सवाल यह है कि अगर पुलिस ने यह पता लगा लिया था कि महिला की बेवकूफी की वजह से मौलान नूरुल हुदा को हिरासत में लिया गया था तो केस खत्म क्यों नहीं कर दिया गया। उन पर चार्जशीट दाखिल करके पुलिस ने उनके नागरिक अधिकारों का हनन किया है और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का अपमान किया है। इसके लिए पुलिस को माफी मांगनी चाहिए। अगर माफी न मांगे तो सभ्य समाज को चाहिए कि वह पुलिस पर इस्तगासा दायर करे और उसे अदालत के जरिए दंडित करवाए। पुलिस को जब मालूम हो गया था कि महिला का आरोप गलत है तो मौलाना के खिलाफ दफा 341 के तहत मुकदमा चलाने की प्रक्रिया क्यों शुरू की? इस दफा में अगर आरोप साबित हो जाय तो तीन साल की सज़ा बामशक्कत का प्रावधान है। इतनी कठोर सजा की पैरवी करने वालों के खि़लाफ सख्त से सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। मामला और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि जांच के दौरान ही पुलिस को मालूम चल गया था कि आरोप लगाने वाली महिला झूठ बोल रही थी। इस मामले में मौलाना नूरुल हुदा, उनके परिवार वालों और मित्रों को जो मानसिक प्रताडऩा झेलनी पड़ी है, सरकार को चाहिए कि उसके लिए संबंधित एअरलाइन, झूठ बोलनी वाली महिला, दिल्ली पुलिस और जांच करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मु$कदमा चलाए और मौलाना को मुआवज़ा दिलवाए। इस मामले में मौलाना नूरुल हुदा को मानसिक क्लेश पहुंचा कर सभी संबंधित पक्षों ने उनका अपमान किया है।

वास्तव में देवबंद का दारुल उलूम विश्व प्रसिद्घ धार्मिक केंद्र होने के साथ-साथ हमारी आज़ादी की लड़ाई की भी सबसे महत्वपूर्ण विरासत भी है। हिंदू-मुस्लिम एकता का जो संदेश महात्मा गांधी ने दिया था, दारुल उलूम से उसके समर्थन में सबसे ज़बरदस्त आवाज़ उठी थी। 1930 में जब इलाहाबाद में संपन्न हुए मुस्लिम लीग के सम्मेलन में डा. मुहम्मद इकबाल ने अलग मुस्ल्मि राज्य की बात की तो दारुल उलूम के विख्यात कानूनविद मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने उसकी मुखालिफत की थी। उनकी प्रेरणा से ही बड़ी संख्या में मुसलमानों ने महात्मा गांधी की अगुवाई में नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 12 हज़ार मुसलमानों ने नमक सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तारी दी थी। दारुल उलूम के विद्वानों की अगुवाई में चलने वाला संगठन जमीयतुल उलेमा-ए-हिंद आज़ादी की लड़ाई के सबसे अगले दस्ते का नेतृत्व कर रहा था।

आजकल देवबंद शब्द का उल्लेख आते ही कुछ अज्ञानी प्रगतिशील लोग ऊल जलूल बयान देने लगते हैं और ऐसा माहौल बनाते हैं गोया देवबंद से संबंधित हर व्यक्ति बहुत ही खतरनाक होता है और बात बात पर बम चला देता है। पिछले कुछ दिनों से वहां के फतवों पर भी मीडिया की टेढ़ी नज़र है। देवबंद के दारुल उलूम के रोज़मर्रा के कामकाज को अर्धशिक्षित पत्रकार, सांप्रदायिक चश्मे से पेश करने की कोशिश करते हैं जिसका विरोध किया जाना चाहिए।1857 में आज़ादी की लड़ाई में $कौम, हाजी इमादुल्ला के नेतृत्व में इकट्ठा हुई थी। वे 1857 में मक्का चले गए थे। उनके दो प्रमुख अनुयायियों मौलाना मुहम्मद कासिम नानौतवी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने देवबंद में दारुल उलूम की स्थापना करने वालों की अगुवाई की थी। यही वह दौर था जब यूरोपीय साम्राज्यवाद एशिया में अपनी जड़े मज़बूत कर रहा था। अफगानिस्तान में यूरोपी साम्राज्यवाद का विरोध सैय्यद जमालुद्दीन कर रहे थे। जब वे भारत आए तो देवबंद के मदरसे में उनका जबरदस्त स्वागत हुआ और अंग्रेजों की सत्ता को उखाड़ फैंकने की कोशिश को और ताकत मिली। जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई तो दारुल उलूम के प्रमुख मौलाना रशीद अहमद गंगोही थे। आपने फतवा दिया कि शाह अब्दुल अज़ीज़ का फतवा है कि भारत दारुल हर्ब है। इसलिए मुसलमानों का फर्ज है कि अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर करें। उन्होंने कहा कि आजादी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिन्दुओं को साथ लेकर संघर्ष करना शरियत के लिहाज से भी बिल्कुल दुरुस्त है। वें भारत की पूरी आजाद के हिमायती थे। इसलिए उन्होंने कांग्रेस में शामिल न होने का फैसला किया। क्योंकि कांग्रेस 1885 में पूरी आजादी की बात नहीं कर रही थी। लेकिन उनकी प्रेरणा से बड़ी संख्या में मुसलमानों ने कांग्रेस की सदस्यता ली और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये।

इतिहास गवाह है कि देवबंद के उलेमा दंगों के दौरान भी भारत की आजादी और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े पक्षधर के रूप में खड़े रहते थे। देवबंद के बड़े समर्थकों में मौलाना शिबली नोमानी का नाम भी लिया जा सकता है। उनके कुछ मतभेद भी थे। लेकिन आजादी की लड़ाई के मसले पर उन्होंने देवबंद का पूरी तरह से समर्थन किया। सर सैय्यद अहमद खां की मृत्यु तक वे अलीगढ़ में शिक्षक रहे लेकिन अंग्रेजी राज के मामले में वे सर सैय्यद से अलग राय रखते थे। प्रोफेसर ताराचंद ने अपनी किताब 'भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास' में साफ लिखा है कि देवबंद के दारुल उलूम ने हर उस आंदोलन का समर्थन किया जो भारत से अंग्रेजों को खदेडऩे के लिए चलाया गया था। 1857 के जिन बागियों ने देवबंद में धार्मिक मदरसे की स्थापना की उनके प्रमुख उद्देश्यों में भारत की सरजमीन से मुहब्बत भी थी। कलामे पाक और हदीस की शिक्षा तो स्कूल का मुख्य काम था लेकिन उनके बुनियादी सिद्घांतों में यह भी था कि विदेशी सत्ता खत्म करने के लिए जिहाद की भावना को हमेंशा जिंदा रखा जाए। आज कल जिहाद शब्द के भी अजीबो गरीब अर्थ बताये जा रहे हैं। यहां इतना ही कह देना काफी होगा कि 1857 में जिन बागी सैनिकों ने अंग्रेजों के खि़लाफ सब कुछ दांव पर लगा दिया था वे सभी अपने आपको जिहादी ही कहते थे। यह जिहादी हिन्दू भी थे और मुसलमान भी और सबका मकसद एक ही था विदेशी शासक को पराजित करना।

मौलाना रशीद अहमद गंगोही के बाद दारुल उलूम के प्रमुख मौलाना महमूद उल हसन बने। उनकी जिंदगी का मकसद ही भारत की आजादी था। यहां तक कि कांग्रेस ने बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरी स्वतंत्रता का नारा दिया। लेकिन मौलाना महमूद उल हसन ने 1905 में ही पूर्ण स्वतंत्रता की अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत से अंगे्रजों को भगा देने के लिए एक मिशन की स्थापना की जिसका मुख्यालय देवबंद में बनाया गया। मिशन की शाखाएं दिल्ली, दीनापुर, अमरोट, करंजी खेड़ा और यागिस्तान में बनाई गयीं। इसमें बड़ी संख्या में मुसलमान शामिल हुए। लेकिन यह सभी धर्मों के लिए खुला था। पंजाब के सिख और बंगाल की क्रांतिकारी पार्टी के सदस्य भी इसमें शामिल हुए। मौलाना महमूद उल हसन के बाद देवबंद का नेतृत्व मौलाना हुसैन अहमद मदनी के कंधों पर पड़ा। उन्होंने भी कांग्रेस, महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद के साथ मिलकर मुल्क की आजादी के लिए संघर्ष किया। उन्होंने 1920 में कांग्रेस के असहयोग आंदोलन का समर्थन करने का फै सला किया और उसे अंत तक समर्थन देते रहे। उन्होंने कहा कि धार्मिक मतभेद के बावजूद सभी भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की स्थापना भौगोलिक तरीके से की जानी चाहिए। धार्मिक आधार पर नहीं। अपने इस विचार की वजह से उनको बहुत सारे लोगों, खासकर पाकिस्तान के समर्थकों का विरोध झेलना पड़ा लेकिन मौलाना साहब अडिग रहे। डा. मुहम्मद इकबाल ने उनके खि़ला$फ बहुत ही जहरीला अभियान शुरू किया तो मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने फारसी में एक शेर लिखकर उनको जवाब दिया कि अरब के रेगिस्तानों में घूमने वाले इंसान जिस रास्ते पर आप चल पड़े हैं वह आपको काबा शरीफ तो नहीं ले जाएगा अलबत्ता आप इंगलिस्तान पहुंच जाएंगे। मौलाना हुसैन अहमद मदनी 1957 तक रहे और भारत के संविधान में भी बड़े पैमाने पर उनके सुझावों को शामिल किया गया है।

जाहिर है पिछले 150 वर्षों के भारत के इतिहास में देवबंद का एक अहम मुकाम है। भारत की शान के लिए यहां के शिक्षकों और छात्रों ने हमेशा कुर्बानियां दी हैं। अफसोस की बात है कि आज देवबंद शब्द आते ही सांप्रदायिक ताकतों के प्रतिनिधि ऊल-जलूल बातें करने लगते हैं। जरूरत इस बात की है कि धार्मिक मामलों में दुनिया भर में विख्यात देवबंद को भारत की आजादी में उनके सबसे महत्वपूर्ण रोल के लिए भी याद किया जाए और उनके रोजमर्रा के कामकाज को सांप्रदायिकता के चश्मे से न देखा जाए