Saturday, July 28, 2012

मेरा दोस्त जिसने हर क़दम पर जीत के निशान छोड़े हैं



शेष नारायण सिंह 
आज एक दोस्त के बारे में लिख रहा हूँ . २८ जुलाई उसका जन्मदिन है .सुल्तानपुर  जिले के एक गाँव से मुंबई जाकर इस लड़के ने उद्यमिता की जो बुलंदियां तय की हैं वह निश्चित रूप से गैरमामूली हैं . हालांकि हम एक ही जिले एक रहने वाले हैं लेकिन हमारी मुलाक़ात १९६७ में  हुई जब हमने ग्यारहवीं और बारहवीं की पढाई के लिए जौनपुर के टी डी कालेज में  नाम लिखाया. बाद में वह इलाहाबाद चला गया . जहां से वह अपनी रिसर्च के सिलसिले में बम्बई ( अब मुंबई ) गया  और वहीं का होकर रह गया. 
आजकल मेरा यह दोस्त ३-डी लेंटीकुलर प्रिंटिंग का सबसे बड़ा जानकार है . कुछ नौकरियों के बाद उसने मुंबई में अपनी प्रिंटिंग प्रेस लगा ली है और छपाई की दुनिया में उसका  खुद का बहुत बड़ा नाम है.  है . सुलतानपुर जिले में  गोमती नदी के किनारे  पर  स्थित धोपाप 
महातीर्थ के उत्तर तरफ उसका गाँव है और दक्षिण तरफ मेरा .जब यह मुंबई गए थे तो किसी  
फ़िल्मी पत्रिका में नौकरी की ,बाद में उस दौर की सबसे मशहूर पत्रिका स्टारडस्ट में चले 
गए. विख्यात  पत्रकार शोभा डे   उनकी संपादक थीं.उन दिनों हेमा मालिनी और रेखा जैसी 
अभिनेत्रियों का ज़माना था .हमारे दोस्त आदरणीय  टी पी पाण्डेय ने भी उन्हीं हवाओं में सांस 
ली जहां इन देवियों की हुकूमत थी . बाद में इन अभिनेत्रियों से ज्यादा खूबसूरत एक लडकी को 
दिल दे बैठे  .आजकल वही लडकी इनकी थानेदार है .  शादी के बाद पाण्डेय जी इसी  लडकी के 
सामने अपनी दुम हिलाया करते थे  . लेकिन पिछले कुछ वर्षों से लगता है कि दुम भी गायब हो 
गयी है क्योंकि वह कभी नज़र  नहीं आती  . 
 पाण्डेय को यह तरक्की किसी इनाम में नहीं मिली है  हर क़दम पर शमशीरें चली हैं लेकिन हर 
क़दम पर उसने फतह हासिल की है . आज उसका जन्मदिन है . मेरी इच्छा थी कि उसके 
जन्मदिन पर उसको वहीं उसकी मांद में घुसकर  मुबारकवादी पेश करता लेकिन मुंबई जा नहीं 
पाया. बहरहाल  मेरे बिना भी उम्मीद करता हूँ कि उनका सोलहवां जन्मदिन हंसी खुशी बीत 
जाएगा.

 मुझे अक्सर अपने वे दिन याद आते रहते हैं जो हमने टी पी पाण्डेय के साथ टी डी  कालेज 
जौनपुर के राजपूत हास्टल में बिताये थे. वे सपने जो  हमने साथ साथ  देखे थे . उनका अब 
कोई पता नहीं है लेकिन हम दोनों ने ही जो कुछ हासिल किया उसी को मुक़द्दर समझ कर  खुश 
हैं .अपना टी पी पाण्डेय शिर्डी के फकीर का भक्त है. हर साल वहां के मशहूर कैलेण्डर को 
छापता है जिसे शिर्डी संस्थान की ओर से पूरी दुनिया में बांटा जाता है . पांडे जो भी करता है  
उसी फ़कीर के नाम को समर्पित करता है . जो कुछ अपने लिए रखता है उसे  साईं बाबा का 
प्रसाद मानता है . अब वह सफल है . टैको विज़न नाम की अपनी कंपनी का वह प्रबंध निदेशक 
है .  मुंबई के धीरू भाई अम्बानी अस्पताल में एक बहुत बड़ी होर्डिंग भी इसी ने छापी है 
जिसकी वजह से उसका नाम लिम्का बुक आफ रिकार्ड्स में दर्ज है .मेरे दोस्त, मेरी दुआ है कि 
तुम अभी पचास साल और जन्मदिन मनाते रहो लेकिन यह भी दुआ है कि तुम हमेशा सोलह 
साल के ही बने रहो.

Wednesday, July 25, 2012

पाकिस्तानी फौज की अफगान गाँवों पर गोलीबारी से शान्ति को ख़तरा



शेष नारायण सिंह 
नई दिल्ली, २४ जुलाई. भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति की तलाश कर रहे लोगों को पाकिस्तानी हुकूमत से और निराशा हुई है . खबर है कि पाकिस्तान की ओर से पश्चिमी अफगानिस्तान के इलाकों में लगातार आर्टिलरी की गोलीबारी चल रही है. अभी एक दिन पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने काबुल स्थिति पाकिस्तानी राजदूत को बुलाकर समझाया था कि इस तरह की घटनाओं से  दोनों देशों के बीच रिश्ते और भी खराब होंगें . नई दिल्ली में मौजूद भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती का अभियान चलाने वाले कार्यकर्ताओं को इस बात की चिंता है कि अगर पाकिस्तानी फौज देश में  युद्ध का माहौल बनाने में सफल हो जाती है तो आस पास के सभी देशों के बीच तनाव बढेगा.
बीती रात पाकिस्तानी सीमा से अफगान गाँवों पर तोप के गोले  दागे गए . सुकून की बात यह है कि जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन अफगान राज्य कोनार के दंगम जिले के कुछ  गाँवों  में रात में  गोले गिरते रहे.कोनार  के गवर्नर वसीफुल्ला वसीफी ने बताया कि जहां गोलीबारी हुई है उन इलाकों में लोगों के बीच दहशत है .कोनार पुलिस के बड़े अफसर एवाज़ मुहम्मद नजीरी ने कहा है कि  पिछले एक महीने में  पाकिस्तान की तरफ से करीब  २००० गोले दागे गए  जिस से भारी नुकसान हुआ है लेकिन पाकिस्तान की ओर से कहा गया है कि ऐसी कोई बात नहीं है.
अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री  राजा परवेज़ अशरफ ने काबुल में अफगान  राष्ट्रपति हामिद करज़ई को भरोसा दिलाया था  कि उनकी तरफ से शान्ति भंग की कोई भी घटना नहीं होगी . दोनों नेता तालिबान को यह समझाने के लिए मिले थे कि वे सीमा के दोनों ओर से गोलीबारी बंद कर दें .लेकिन  गोलीबारी जारी है . यह इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान की सेना पर उनके सिविलियन शासकों का कोई असर नहीं है.इसी रविवार के दिन अफगानिस्तान के उप विदेश मंत्री  जावेद लुदिन ने पाकिस्तान के अफगानिस्तान में तैनात राजदूत, मुहम्मद सादिक को बुलाकर फटकार लगाई थी कि अगर गोलीबारी इसी तरह से जारी रही तो दोनों देशों के बीच के रिश्ते और भी खराब हो जायेगें. ऐसा लगता है अमरीका से नार्जा पाकिस्तानी फौज बड़े देश का तो कुछ नहीं बिगाड़  पा रही है लेकिन अमरीका के दोस्त अफ्गान्सितान को परेशान कर रही है. पाकिस्तानी मामलों के जानकारे बता रहे हैं कि यह पाकिस्तानी सेना और आई एस आई की पुरानी चाल  है .

Monday, July 23, 2012

महिलाओं की अस्मिता का निगहबान बन चुके मीडिया का सम्मान किया जाना चाहिए



शेष नारायण सिंह 

गुवाहाटी में एक लड़की के साथ जो हुआ वह बहुत बुरा  हुआ. आज सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से अपने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपमानित किया  जाता है .  टेलिविज़न और अखबारों में खबर के आ जाने के बाद ऐसा माहौल बना कि गुवाहाटी की घटना  के बारे में सबको मालूम  हो गया . लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस तरह की घटनाएं देश के हर कोने में होती रहती हैं . ज्यादातर मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती.  चर्चा तब होती है जब यह घटनाएं मीडिया में चर्चा का विषय बन जाती हैं . गुवाहाटी की घटना के साथ बिलकुल यही हुआ. देश के  लगभग सभी महत्वपूर्ण टेलिविज़न समाचार चैनलों ने  इस खबर को न केवल चलाया बल्कि कुछ प्रभावशाली चैनलों ने तो इस  विषय पर घंटों की चर्चा का कार्यक्रम भी प्रसारित किया . नतीजा सामने है . अब सबको मालूम है कि किस तरह से   एक समाज के रूप में हम असंवेदनशील हैं . घटना की जांच करने गयी महिला आयोग की एक प्रतिनधि और कभी दिल्ली विश्वविद्यालय की  नेता रही महिला ने तो वहां जाकर अपनी छवि मांजने की कोशिश की . इस चक्कर में पीड़ित लडकी का नाम भी उन्होंने  सार्वजनिक कर दिया . ऐसा नहीं करना चाहिए  था. महिलाओं के प्रति एक समाज के रूप में हमारा दृष्टिकोण आज पब्लिक डोमेन में है और इसके लिए सबसे ज्यादा  सम्मान का पात्र  मीडिया ही है .
आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभा भी रहा है . उसकी वजह से ही देश में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को जनता के सामने लाया जा  रहा है और सरकार में भी किसी स्तर पर ज़िम्मेदारी का भाव जग रहा है  . लेकिन एक बात स्वीकार करने में मीडिया कर्मी के रूप में हमें संकोच नहीं होना चाहिए . अक्सर देखा जा रहा है कि जब एक बात किसी मीडिया कंपनी या किसी मेहनती पत्रकार की कोशिश से  खबरों की दुनिया में आ जाती है तो बहुत सारे पत्रकार उसी खबर को आधार बनाकर खबरें लिखना शुरू कर देते हैं . पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है कि जब भी कोई खबर किसी भी रिपोर्टर की जानकारी में आती है तो वह उस व्यक्ति का पक्ष ज़रूर लेगा जिसके बारे में खबर है . कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति के बारे में खबर है उस तक पंहुचना ही बहुत मुश्किल होता है .  उस हालत में उस व्यक्ति से सम्बंधित जो लोग या जो भी संगठन हों उनसे जानकारी ली  जा सकती है .लेकिन इस काम में एक दिक्कत है . अगर वह  व्यक्ति प्रभावशाली हुआ  और  खबर उसके खिलाफ जा रही हो तो वह खबर को रोकने की कोशिश करवा सकता है . ज़ाहिर है कि उस से बात करने पर खबर दब सकती है .इस हालत में रिपोर्टर के पास इतने सबूत होने चाहिए कि वह ज़रुरत पड़ने पर अपनी खबर की सत्यता को साबित कर सके . उसके पास कोई दस्तावेज़ होना चाहिए, कोई टेप या कोई वीडियो  भी बतौर सबूत हो तो काफी है . लेकिन अगर किसी के  बयान के आधार पर कोई खबर लिखी जा रही है  तो उसके बयान की लिखित प्रति, उसका टेप किया बयान  या कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी में दिया गया उसका बयान होना ज़रूरी है . अगर ऐसा न किया गया तो पत्रकारिता के पेशे का अपमान होता है और आने वाले समय में पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल  उठ खड़े होते हैं . पत्रकार को किसी भी हालत में सुनी सुनायी बातों को  आधार बनाकर खबर नहीं लिखना चाहिए . दुर्भाग्य की बात यह है कि गुवाहाटी की घटना के बारे में इस तरह की पत्रकारिता हो गयी है . 
अभी एक दिन पहले एक बड़े अखबार में खबर छपी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष , ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे अगर छेड़खानी जैसे अपराधों से बचना चाहती हैं तो उन्हें ठीक से कपडे पहनना  चाहिए .  बात बहुत ही अजीब थी . मैंने तय किया कि इन देवी जी के इस बयान के  आधार पर ही इस बार  अपने इस कालम में महिलाओं की दुर्दशा की चर्चा की जायेगी . बड़े अखबार की खबर के हवाले से जब उनसे बात करने की कोशिश की गयी तो वे गुवाहाटी में थीं लेकिन  थोड़ी कोशिश के बाद उनसे संपर्क हो गया . जब उनसे बताया कि आप के ठीक से कपडे पहनने वाले बयान के बारे में बात करना है तो उन्होंने जो कहा  वह बिलकुल उल्टी बात थी. उन्होंने कहा कि कभी भी उन्होंने वह बयान नहीं दिया है जो एक अंग्रेज़ी अखबार में छपा है. उन्होंने सूचित किया कि वे  दिल्ली के अपने  दफ्तर को हिदायत दे चुकी हैं कि वे  के बयान जारी करके यह कहें कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने सम्बंधित अखबार या उसके रिपोर्टर से कोई बात नहीं की है और बयान पूरी तरह  से फर्जी है. उनके इस बयान के बाद भारत सरकार की एक  बड़ी अधिकारी को कटघरे में लेने की अपनी इच्छा पर घड़ों पानी पड़ गया लेकिन यह सुकून ज़रूर हुआ कि एक गलत खबर को आधार बनाकर अपनी बात कहने से बच गए . लेकिन आज सुबह के अखबारों को देखने से अपने पत्रकारिता पेशे में लगे हुए लोगों की कार्यप्रणाली से निराशा जरूर हुई . राष्ट्रीय महिला आयोग के दफतर ने शायद बयान जारी किया होगा क्योंकि उस बड़े अखबार में आज उस खबर का फालो अप नहीं है . लेकिन आज एक अन्य बड़े अखबार में उस खबर का फालो अप छपा है . जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष की लानत मलानत की गयी है.  दिल्ली में रहने वाली कुछ महिला नेताओं से बातचीत की गयी है और उनके बयान में महिला आयोग की कारस्तानी की निंदा की गयी है .जिन महिला नेताओं के बयान छपे हैं उनमें से कोई भी महिला आयोग की अध्यक्ष या उस से भी बड़े पद पर विराजने लायक हैं . इसलिए उनकी  बात समझ  में आती है .उन्हें चाहिए कि वे राष्टीय महिला आयोग की  मौजूदा  अध्यक्ष को बिलकुल बेकार की अधिकारी साबित करती रहें जिससे जब अगली बार उस पद पर नियुक्ति की बात  आये तो अन्य लोगों के साथ इनका नाम भी आये . लेकिन क्या  हमको भी यह शोभा देता है कि एक गलत खबर का फालो अप चलायें . पत्रकारिता की नैतिकता के पहले  अध्याय में ही लिखा  है कि खबर ऐसी हो जिसकी सत्यता की पूरी तरह से जांच की जा सके और जब सम्बंधित व्यक्ति या उसका दफ्तर ऐलानियाँ बयान दे रहा है कि वह बयान उनका नहीं है तो उस बयान के आधार पर खबरों का  पूरा  ताम झाम बनाना अनैतिक है .बहर हाल नतीजा यह हुआ कि यह कालम जो राष्ट्रीय माहिला आयोग की अध्यक्ष के खिलाफ एक सख्त टिप्पणी के रूप में सोचा गया था , औंधे मुंह गिर  पडा . अब उनके खिलाफ कभी फिर टिप्पणी  लिखी जायेगी लेकिन आज तो अपने पेशे की ज़िम्मेदारी पर ही कुछ बात करना ठीक रहेगा.
 गुवाहाटी की खबर के हवाले से मीडिया की भूमिका पर बात करना बहुत ही ज़रूरी है . धीरे धीरे खबर आ रही है कि उस घटना के लिए जो अपराधी छेड़खानी कर रहे थे , उनको सेट करने का काम एक टी वी पत्रकार ने ही  किया था.उस टी वी चैनल के मुख्य संपादक के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है. ज़ाहिर है  कि फर्जी तरीके से खबर बनाने के लिए  उस टी वी चैनल  ने इस तरह का आयोजन किया . इस प्रवृत्ति की निंदा की जानी चाहिए  लेकिन उस टी वी  चैनल की मिलीभगत साबित हो जाने के बाद गुवाहाटी की घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती .बल्कि यह ज़रूरी हो जाता है कि छेड़खानी कर रहे अपराधियों के साथ साथ उन पत्रकारों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाए जिन्होंने इस तरह का आयोजन करके एक लडकी की अस्मिता की धज्जियां उड़ाईं.इस बात की पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पार्टी गुवाहाटी के उस गैरजिम्मेदार  पत्रकार के हवाले से सभी खबरों की सत्यता को सवालों के घेरे में लेने  की कोशिश करेगें . लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए .  महिलाओं सहित अपने सभी नागरिकों के सम्मान की  रक्षा करना  सरकार का कर्तव्य  है और सरकार को उसे करते ही रहना चाहिए . देखा यह गया है कि  सरकार में बैठे लोग खबर की सच्चाई पर सवाल उठाने का मामूली सा मौक़ा हाथ आते ही खबर के  विषय को भूल जाते हैं . सत्ताधारी पार्टी के नेता बयानों की झड़ी लगा देते हैं और मुद्दा कहीं दफ़न हो जाता है . मीडिया को कोशिश करना चाहिए कि गुवाहाटी की घटना के साथ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के बारे में जो राष्ट्रीय बहस चल पड़ी है ,उसे उसके  अंजाम  तक पंहुचाएं.  

गुवाहाटी की घटना के साथ ही उत्तर प्रदेश के बागपत की बातें भी हो रही हैं . वहां के पुरुषों ने एक पंचायत करके अपने घरों की महिलाओं को सलाह दिया है कि वे दिन ढले घरों से बाहर न निकलें, सेल फोन का इस्तेमाल न करें और प्रेम  विवाह न करें . यानी उस पंचायत ने अब तक हुए विकास को उल्टी दिशा में दौडाने की कोशिश है . जहां की यह घटना है  वह देश की राजधानी से लगा हुआ इलाका है .  दिल्ली के इतने करीब हो कर भी महिलाओं के प्रति इतना आदिम रवैया बहुत ही अजीब  है . उस से भी अजीब है कि कई पार्टियों के राजनीतिक नेता महिलाओं के खिलाफ इस तरह का रुख रखने वालों के साथ खड़े पाए जा  रहे हैं . ज़ाहिर है एक समाज के रूप में हम कहीं फेल  हो रहे हैं . बागपत वाले मामले में मीडिया का रुख शानदार है और हर वह नेता तो मध्यकालीन सामंती सोच  के प्रभाव में आकर बयान दे रहा है  उसकी पोल लगातार खुल रही है .आज से करीब ३५ साल पहले भी इसी बागपत में माया त्यागी नाम की एक महिला के साथ पुरुष प्रधान मर्दवादी  सोच वालों ने अत्याचार किया था . उस वक़्त भी मीडिया के चलते ही वह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था. इतने वर्षों बाद भी आज बागपत और दिल्ली के आस पास के अन्य इलाकों में महिलाओं के प्रति जो रवैया है वह क्यों नहीं बदल रहा है , यह चिंता की बात  है और इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए . लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो  इस बात पर तब तक ध्यान नहीं देगें जब तक कि उनकी असफलताओं को मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक न किया  जाए.   पिछले कई वर्षों में यही हुआ है . जब १४ फरवरी के आस पास लड़कियों की अस्मिता पर बंगलोर में हमला हुआ था , उस वक़्त भी मीडिया के हस्तक्षेप से ही  अपराधी पकडे  गए थे . इसलिए साफ़ लगने लगा है कि इस देश में महिलाओं  के सम्मान की रक्षा  के काम में सबसे अहम भूमिका मीडिया की ही रहेगी .

Friday, July 20, 2012

क्या राहुल गांधी को उनकी असफलता के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है ?





शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली, १९ जुलाई. राष्ट्रपति चुनाव के मतदान में वोट डालने आये राहुल गाँधी ने आज यह कह कर सत्ता के गलियारों में तूफ़ान खड़ा कर दिया कि वे सरकार या पार्टी में बड़ी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हैं . इस से ज्यादा राहुल गांधी ने कुछ नहीं  कहा है . कांग्रेस पार्टी य यूं कहें के १० जनपथ के सबसे महत्वपूर्ण प्रवक्ता, जनार्दन  द्विवेदी  ने केवल यह कहा है कि हमें बहुत खुशी होगी अगर राहुल गांधी सरकार या पार्टी में और कोई  पद  स्वीकार करते हैं . लेकिन यह उनको तय करना है कि वे  कब और क्या पद स्वीकार करते हैं . आधिकारिक तौर पर इससे ज्यादा कुछ नहीं मालूम है  लेकिन सभी टी वी चैनलों और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में तरह तरह के अनुमान लगाए जा  रहे हैं . कुछ चैनलों पर बैठे राजनीतिक विश्लेषक मंत्रिपरिषद में राहुल गांधी के संभावित   विभागों की विवेचना भी कर रहे हैं . कोई उन्हें ग्रामीण विकास दे रहा है तो कोई शिक्षा मंत्रालय का चार्ज दे रहा  है . कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह भी अपनी पीठ ठोंक रहे हैं कि उन्होंने तो दो साल पहले ही कह दिया था.  

सही बात यह है कि किसी को नहीं मालूम है  कि अगले दो तीन दिनों में राष्ट्रीय राजनीति, खासकर कांग्रेस के राजनीति क्या शक्ल अख्तियार करेगी  लेकिन इतना पक्का है कि अब सत्ता के समीकरण निश्चित रूप से बदल जायेगें. हालांकि दिल्ली में अभी किसी ने खुलकर नहीं कहा है  लेकिन एक बहुत ही भरोसेमंद सूत्र ने बताया है कि  इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गांधी सरकार में बहुत ऊंचे पद पर ही बैठा  दिए जाएँ. लेकिन यह सब केवल राहुल गांधी और उनके  परिवार के अलावा किसी को पता नहीं है . 

अब जब यह पक्का हो गया है कि राहुल गांधी को मौजूदा राजनीतिक जिम्मेदारियों से बड़ा काम मिलें वाला  है . यह देखना दिलचस्प होगा कि उन्होंने  अपने पिछले करीब १० साल के राजनीतिक जीवन में क्या ख़ास हासिल किया है .  उत्तर प्रदेश विधान सभा के  पिछले चुनाव में राहुल गांधी ने बहुत  मेहनत की लेकिन नतीजा सबके सामने है . उनके हवाले पूरी कांग्रेस पार्टी थी , सारे संसाधन थे, हेलीकाप्टर , और  विमान थे  लेकिन अपनी सीटों की संख्या में वे कोई वृद्धि नहीं कर पाए. उनकी  राजनीतिक सूझ बूझ  पर भी सवाल उठे जब उन्होंने बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता के हवाले पार्टी के विधान सभा के टिकटों का एक बहुत  बड़ा हिस्सा कर दिया . बेनी प्रसाद वर्मा ने जितने लोगों को टिकट दिया था वे सभी हार गए . जबकि उनसे कम संसाधनों के सहारे काम कर रहे समाजवादी पार्टी के   नेता अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को बहुमत दिला दिया . इसके पहले राहुल गांधी ने बिहार में अपनी  पार्टी के दुर्दशा  का  सुपरविजन  किया था.  हुछ साल पहले  उनकी राजनीति का लाभ नरेंद्र मोदी ने गुजरात में लिया था और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष के भाषण  लेखक के उस वाक्य का पूरे देश में मजाक उड़ाया गया था जब उनके मुंह से  नरेंद्र  मोदी को मौत का सौदागर कहलवा दिया गया था .  
 इसके अलावा अभी राहुल गांधी और उनके साथियों के खाते में मुंबई सहित महाराष्ट्र  के नगर पालिका चुनावों में कांग्रेस की खस्ता हालत भी दर्ज है . आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की मौजूदा हालत के लिए भी राष्ट्रीय नेतृत्व  ही ज़िम्मेदार  है . इस सबसे ऐसा लगता है कि राहुल इतिहास के इकलौते ऐसे नेता हैं जो हर मोर्चे पर फेल होने के बाद भी और बड़ी ज़िम्मेदारी के  हक़दार माने जा रहे हैं . बहर हाल  जो भी हो अब  यह पक्का है कि राहुल गांधी के हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित करने की तैयारी कांग्रेस ने पूरी कर ली है .

Saturday, July 14, 2012

बराक ओबामा भारत में कैंसर की महंगी दवा बेचने के लिए सरकार पर दबाव डाल रहे हैं


  
शेष नारायण सिंह 
 अमरीका की कोशिश है कि वह भारत के कैंसर  के रोगियों से बहुत भारी मुनाफा कमाए और उसके लिए उसे भारत सरकार की मदद चाहिए . अमरीकी कम्पनियां कैंसर की जो दवा भारत में बेचती हैं उनकी  कीमत कैंसर के  रोगी को करीब ढाई लाख  रूपया प्रति महीना पड़ता है . जब कि वही दवा भारत की कंपनियों ने बना लिया है और उसकी कीमत केवल साढ़े सात हज़ार रूपये महीने है . अपने  पूंजीपतियों को बेजा लाभ पंहुचाने के लिए अमरीकी प्रशासन भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह भारतीय कंपनी को दवा बेचने से रोक दे और अमरीकी दवा पर ही भारत के कैंसर के रोगी निर्भर बने रहें. अमरीकी सरकार की एक बड़ी अधिकारी ने दावा  किया है कि वह भारत सरकार में उच्च पदों पर बैठे कुछ लोगों से इस काम को करवाने के लिए संपर्क में है . ज़रुरत  इस बात की है  यह पता  लगाया जाए कि उच्च पदों पर बैठे यह कौन लोग हैं . पता लगने के बाद उन्हें कानून के  हिसाब से दण्डित किया  जाना चाहिए  . संतोष की बात यह  है अभी तो भारत सरकार ने अमरीका को  साफ़ मना कर दिया है  कि वह अपने देश के कैंसर के मरीजों के खून से अमरीकी व्यापार को फलने फूलने नहीं देगें लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार में अमरीका परस्त लोगों का बोलबाला है , लगता है कि देर सवेर भारत सरकार अमरीकी दबाव के सामने झुक जायेगी .
अमरीका और पाकिस्तानमें एक समानता है . दोनों ही देशों में राजनीतिक शमशीर चमकाने के लिए भारत के खिलाफ ज़हर उगलने का फैशन है . अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा वैसे तो भले आदमी माने जाती हैं  लेकिन अमरीकी कट्टरपंथियों को साथ लेने के  लिए वे भी भारत के खिलाफ गैरजिम्मेदार अभियान चलाने की पूरी कोशिश करते हैं .अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे कमज़ोर देशों में तो वे  गोली बारूद से सीधा हमला करते हैं , ड्रोन चलाते हैं और आतंकवादियों के साथ साथ निर्दोष लोगों की भी जान ले लेते हैं . लेकिन भारत की बढ़ती आर्थिक ताक़त और हैसियत के मद्दे नज़र भारत से कुछ आर्थिक लाभ झटक लेने के चक्कर में रहते हैं .
ताज़ा मामला कैंसर की दवा की मनमानी  कीमत वसूलने का है . जर्मनी की बड़ी दवा कम्पनी बायर कैंसर की दवा बनाती है . इस दवा से कैंसर का इलाज भारत में भी होता है .अभी तक इस दवा के सहारे इलाज कराने में करीब ढाई लाख रूपये प्रति महीने का खर्च आता है . एक भारतीय दवा कंपनी ने वहीं दवा अपने देश में बना दिया और उसकी मदद से कैंसर के इलाज की कीमत करीब साढ़े सात हज़ार रूपये  प्रति माह पड़ रही है . यह दवा बनाने वाली कंपनी ने भारत सरकार से बाकायदा अनुमति लेकर इस दवा को बेचना शुरू कर दिया  है, सारा काम अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के हिसाब से  कानूनी है और भारतीय कंपनी जर्मन/अमरीकी कंपनी को साढ़े छः प्रतिशत की रायल्टी दे रही है . लेकिन इस दवा के बन जाने से अमरीका में बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रही बायर को भारी घाटा हो रहा है और अब ओबामाअमरीकी /जर्मन कंपनी को लाभ पंहुचाने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं. 
अमरीकी पेटेंट और ट्रेडमार्क आफिस की एक  डिप्टी डाइरेक्टर  ने अमरीकी सेनेट से अपील की है कि वह भारत सरकार पर दबाव बनाए कि वह अपनी ताकत का इस्तेमाल करके भारत सरकार को मजबूर कर दे कि वह भारतीय कम्पनी  को कम कीमत वाली लेकिन बहुत अच्छी दवा बेचने से रोकें. सेनेट से उन्होंने अपनी पेशी के दौरान अपील कि   कि वह भारत सरकार को फटकार लगाए कि उसने क्यों किसी भारतीय कंपनी को दवा बेचने की अनुमति दे दी. उन्होंने यह भी कुबूल किया कि वे निजी तौर पर भी भारत सरकार की एजेंसियों से  संपर्क  बनाए हुए हैं और पूरी कोशिश कर  रही  हैं कि अमरीकी /जर्मन दवा कम्पनी  को होने वाला मुनाफ़ा  कम न  होने पाए . ज़रुरत इस बात की है कि भारत सरकार की सी बी आई या अन्य  कोई सक्षम संस्था इस बात की  जांच करे कि अमरीकी पेटेंट और ट्रेड आफिस भारत सरकार में किन लोगों के साथ संपर्क बनाए हुए है और वे क्यों भारत के राष्ट्रीय  और सार्वजनिक  हित के खिलाफ काम कर रहे हैं .

Friday, July 13, 2012

मेरे गाँव की अपनैती , पता नहीं कहाँ गायब हो गयी है


 

शेष नारायण सिंह 


इस बार दस दिन अपने गाँव में रहा .मेरे बचपन के साथी ठाकुर बद्दू सिंह के साथ दस  दिन हंसी खुशी बीत गए. मेरी दोनों बहनें और भाई भी लगभग पूरे वक़्त साथ साथ ही रहे. मेरी माँ की  सबसे छोटी पौत्री की शादी पूरे सम्मान के साथ संपन्न हो गयी. हम अपनी माँ को माई कहते थे.अगर वे जीवित होतीं तो निश्चित रूप से खुश होतीं.  मेरी माँ का जीवन सपनों का जीवन था, अधूरे सपनों का जीवन.उनके सभी सपने अधूरे ही रह गए .अपनी दोनों ही बेटियों को वे पढ़ाना चाहती थीं. बड़ी बेटी तो  खैर स्कूल ही नहीं जा सकी, छोटी वाली बिटिया , मुन्नी ,जो पढने में बहुत अच्छी थी, भी प्राइमरी के बाद पढने नहीं जा सकी. सामंती सोच की दीवार मुन्नी की शिक्षा के बीच में खडी हो गयी थी. यह अलग बात है कि बाद में मुन्नी ने अपनी पढाई पूरी की.हमारे छोटे भाई ने उसमें बहुत मेहनत की. लेकिन माई के बच्चों ने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जो भी हो सका , क़दम उठाया .आज माई के सभी पोते पोतियों के पास उच्च शिक्षा का  हथियार है . शायद इसी वजह से लगता है कि मृत्यु के बाद ही सही माई के कुछ सपने तो पूरे हो ही गए.
लेकिन मेरे गाँव में लड़कियों की इज्ज़त नहीं है . उन्हें घर के किसी भी फैसले से दूर रखा जाता है. जबकि मेरे बचपन में  मेरी बड़ी बहन की सहेलियां घर के फैसलों में शामिल होती थीं. उनके माता पिता उनसे पूछते थे . हालांकि शादी ब्याह जल्दी हो जाते थे लेकिन लडकियां अपने घर के फैसलों में शामिल होती थीं. मेरी बड़ी बहन तो मेरी शिक्षा दीक्षा में भी माई के साथ हमारे पिता जी से लड़ाई करती थीं. अब तो  सब कुछ बदल गया है 
इस बार जो दस दिन मैंने अपने गाँव में बिताया उसमें मुझे अपने भाई बहनों और दोस्त बद्दू सिंह के अलावा सब कुछ विदेशी जैसा लग रहा था .  लगता था कि अपने  गाँव में नहीं ,कहीं और आ गया हूँ. मेरे आस्था के सारे केंद्र ढह गए हैं .  लोग शादी ब्याह में केवल कुछ रूपये देने के लिए शामिल होते हैं .कहीं कोई चाहत नहीं , कोई अपनापन नहीं . ज़्यादातर परिवारों के नौजवान किसी बड़े शहर में चले गए हैं . कुछ लड़कों ने पढ़ाई कर ली है लेकिन खेती में काम करना नहीं चाहते और बेरोजगार हैं . मेरे गाँव की तहसील पहले कादीपुर हुआ करती थी , नदी पार कर के जाना होता था . लेकिन अब तहसील ३ किलोमीटर दूर लम्भुआ बाज़ार में है.  मेरे गाँव के कुछ लडके अब तहसील में दलाली कारते हैं . कुछ नौजवानों का थाने की दलाली का अच्छा कारोबार चल रहा है  . वह गाँव  जिसमें मेरी माँ का रोल सबसे ज्यादा स्थायी है ,अब कहीं खो गया है . मेरी माँ ने गरीबी को खूब करीब से उलट पुलट कर देखा था, उसे झेला था . एक संपन्न किसान की बेटी थीं वह लेकिन ज़मींदारों के परिवार  में ब्याह दी  गयी थीं . ज़मींदार  भी ऐसे जो नाम के ही ज़मींदार  थे . घर में भोजन  की भी  तकलीफ  रहा करती थी.   मेरी माँ का मायका जौनपुर सिटी  रेलवे स्टेशन से लगे हुए एक गाँव में था .मेरे नाना वहां के  संपन्न किसान थे . मेरे पिता के परिवार में शिक्षा को कायथ कारिन्दा का काम माना जाता था और जब मेरे माता- पिता की शादी के १४ साल बाद ज़मींदारी का उन्मूलन हो गया तब ज़मींदारों को लगा कि सब कुछ लुट गया .
और इस बार जब मैं अपने गाँव में दस दिन तक बैठा रहा तो मुझे लगा कि छिट पुट सम्पन्नता तो आई है लेकिन मेरे गाँव की अपनैती पता नहीं कहाँ लुट गयी है .. 

Sunday, July 8, 2012

चन्द्रशेखर ने कहा था --जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.


शेष नारायण सिंह 


८ जुलाई को चन्द्रशेखर जी को गए पांच साल हो गए. अगर होते तो ८५ साल के हो गए होते. उनको लोग बहुत अच्छा संसदविद कहते हैं . वे संसद में थे इसलिए संसदविद भी थे लेकिन लेकिन सच्चाई यह है कि वे जहां भी रहे धमक के साथ रहे और कभी भी नक़ली ज़िंदगी नहीं जिया. मैं चन्द्रशेखर जी  को एक ऐसे इंसान के रूप में याद करता हूँ जो राजनेता भी थे नहीं , लेकिन वे सही  अर्थ में स्टेट्समैन थे . जो दूरद्रष्टा थे और राष्ट्र और समाज के हित को सर्वोपरि मानते थे. आज चन्द्रशेखर की विरासत को संभालने वाला कोई नहीं है क्योंकि उनकी राजनीति को आगे ले जाने वाली कोई पार्टी ही कहीं नहीं है . जिस पार्टी को उन्होंने अपनी बनाया था उसके वे आख़िरी कार्यकर्ता साबित हुए . पचास के दशक में आचार्य नरेंद्रदेव के सान्निध्य में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की राजनीति में हिस्सा लेना शुरू किया लेकिन १९६४ आते आते उनको लग गया कि उनकी और आचार्य जी की राजनीति की सबसे बड़ी वाहक जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस पार्टी ही रह गयी थी. शायद इसीलिये उन्होंने अपनी पार्टी के एक अन्य बड़े नेता, अशोक मेहता के साथ कांग्रेस की सदस्यता ले ली. लेकिन उनका और शायद देश के दुर्भाग्य था कि उसके बाद ही से कांग्रेस में जो राजनीतिक शक्तियां उभरने लगीं , वे पूंजीवादी राजनीति को समर्थन करने वाली थीं. कांग्रेसी सिंडिकेट ने कांग्रेस की राजनीति को पूरी तरह से काबू में कर लिया . सिंडिकेट से इंदिरा गाँधी ने बगावत तो किया लेकिन वह पुत्रमोह में फंस गयीं और उन्होंने ने भी तानाशाही का रास्ता अपना लिया . नतीजा यह हुआ  कि चन्द्र शेखर जी को जय प्रकाश नारायण के  नेतृत्व में चल रहे तानाशाही विरोधी आन्दोलन का साथ देना पड़ा. यह भी अजीब इत्तेफाक है कि जिस साम्प्रदायिक राजनीति का चन्द्रशेखर जी  ने हमेशा ही विरोध किया था , उसी राजनीति के पोषक लोग जेपी के आन्दोलन में चौधरी बने बैठे थे. हालांकि समाजवादी लोग सबसे आगे आगे  नज़र आते थे लेकिन सबको मालूम था कि गुजरात से लेकर बिहार तक आर एस एस वाले ही वहां हालत को कंट्रोल कर रहे थे . बाद में जो सरकार बनी उसमें भी आर एस एस की सहायक पार्टी जनसंघ वाले ही हावी थे. चन्द्रशेखर और मधु  लिमये ने आर एस एस को एक राजनीतिक पार्टी बताया और कोशिश की कि जनता पार्टी के सदस्य किसी और पार्टी के सदस्य न रहें . लेकिन आर एस एस ने जनता पार्टी ही तोड़ दी और अलग भारतीय जनता पार्टी बना ली. लेकिन चन्द्र शेखर ने अपने  उसूलों से कभी समझौता नहीं किया 

उनके जाने के पांच साल बाद यह साफ़ समझ में आता है  कि उनकी विरासत को जिंदा रखने के लिए किसी संस्था की ज़रुरत नहीं है . उनकी ज़िंदगी ही एक ऐसी संस्था का रूप ले चुकी थी जिसमें बहुत सारी सकारात्मक शक्तियां एकजुट हो गयी थीं.उनकी ज़िंदगी ने देश की राजनीति को हर मुकाम पर प्रभावित किया.  इंदिरा गाँधी ने जब सिंडिकेट के चंगुल से निकल कर राष्ट्र की संपत्ति को जनता की हिफाज़त में रखने के लिए बैंकों का  राष्ट्रीयकरण किया तो चन्द्रशेखर ने उनको पूरा समर्थन दिया और सिंडिकेट वालों के लिए राजनीतिक मुश्किल पैदा की. लेकिन वही इंदिरा गाँधी जब पुत्रमोह में तानाशाही और गैर ज़िम्मेदार राजनीतिक परंपरा की स्थापना करने लगीं तो चन्द्रशेखर ने उनको चेतावनी दी और  बाद में तानाशाही प्रवृत्तियों को ख़त्म करने के आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई. 
आज चन्द्रशेखर जी के जीवन की बहुत सारी घटनाएं याद आती हैं . लेकिन उनके जीवन की जिस घटना ने मुझे हमेशा ही प्रभावित किया है वह भारत की लोकसभा में ७ नवम्बर १९९० में घटी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हटाने के लिए  लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां एकजुट थीं. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने ग्यारह महीने के राज में बहुत सारे  गैरज़िम्मेदार फैसले किये थे और उनका प्रधान मंत्री पद  से हटना बहुत ज़रूरी माना जा रहा  रहा. जब चन्द्रशेखर जी  को अध्यक्ष ने भाषण करने के लिए बुलाया तो सदन में बिलकुल सन्नाटा छा गया था . और जब  चन्द्रशेखर ( बलिया ) ने कहा कि मुझे  अत्यंत दुःख के साथ इस बहस में हिस्सा  लेना पड़  रहा है तो सदन में बैठे लोगों ने उस स्टेट्समैन के दर्द  का अनुभव किया था. गैलरी  में बैठे लोगों ने भी सांस खींच कर उनके भाषण को सुना. उन्होंने कहा कि जब ग्यारह महीने पहले हमने देश को बचाने के लिए बीजेपी से समझौता किया था .उस समय सोचा था कि  देश संकट में है ,कठिनाई में है और उस कठिनाई से निकलने के लिए सबको साथ मिलकर चलना चाहिए .उन्होंने अफ़सोस जताया कि  ग्यारह महीने पहले देश की जो दुर्दशा  थी , ग्यारह महीने बाद उस से बदतर हो गयी थी. उन्होंने पूछा कि क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में आतंक  बढा है , क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में विषमता बढ़ी है , क्या यह सही नहीं है कि बेकारी , बेरोजगारी,मंहगाई बढ़ी है ,,क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में सामाजिक तनाव बढ़ा है .क्या यह सही नहीं है कि पंजाब पीड़ा से कराह रहा है ,क्या यह सही नहीं है कश्मीर में आज वेदना है.क्या यह सही नहीं है कि असम में आतंक बढ़ रहा है ,क्या यह सही नहीं है कि देश के गाँव गाँव में धर्म और जाति के नाम पर आदमी ही आदमी के खून का प्यासा हो रहा  है . उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री से कहा कि संसद और देश को चलाना कोई ड्रामा नहींहै इसलिए गंभीरता  हर राजनीतिक काम के बुनियाद में होनी  चाहिए . 

लोकसभा के उसी  सत्र के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हटा दिया गया था .चन्द्रशेखर जी ने साफ़  कहा कि सिद्धांतों की बात करने वाले  विश्वनाथ प्रताप सिंह धर्मनिरपेक्षता का सवाल क्यों नहीं उठाते.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि धर्म निरपेक्षता मानव संवेदना की पहली परख है .  जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.इसी भाषण में चन्द्र शेखर जी ने बीजेपी की राजनीति को आड़े हाथों लिया था .  उन्होंने कहा कि मैं आडवाणी जी से ग्यारह महीनों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि   बाबरी मज्सिद के बारे में सुझाव देने  के लिए एक समिति बनायी गयी, उस समिति से भारत के गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को हटा दिया जाता है . बताते चलें  कि  उस वक़्त गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव थे. चन्द्र शेखर जी ने आरोप लगाया कि इन लोगों को इस लिए हटाया गया क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद् के कुछ नेता उनकी सूरत नहीं देखना चाहते.क्या इस  तरह से देश को चलाना है . उन्होंने सरकार सहित बीजेपी -आर एस एस की राजनीति को भी घेरे में ले लिया और बुलंद आवाज़ में पूछा कि क्यों हटाये गए मुलायम सिंह , क्यों हटाये गए मुफ्ती मुहम्मद सईद ,उस दिन किसने समझौता किया था ? चाहे वह समझौता विश्व हिन्दू परिषद् से हो ,चाहे बाबरी मस्जिद के सवाल पर किसी इमाम से बैठकर समझौता करो ,यह समझौते देश की हालत को  रसातल में ले जाने के लिए ज़िम्मेदार हैं .उन्होंने प्रधान मंत्री को चेतावनी दी कि आपकी सरकार जा सकती है ,ज उस से कुछ नहीं बिगड़ेगा .लेकिन याद रखिये कि जो संस्थाएं बनी हुई हैं ,उनका अपमान आप मत कीजिये . क्या यही परंपरा है कि बातचीत को चलाने के लिए राष्ट्रपति के पद का इस्तेमाल किया  जाय .शायद दुनिया के इतिहास में ऐसा कहीं भी नहीं हुआ होगा.कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यादेश लगाए जाएँ और २४ घंटों के अंदर उसको वापस ले लिया  जाए..उन्होंने कहा  कि यह तुगलकी मिजाज़ इस  देश को रसातल  तक पंहुचाएगा और देश को बचाने के लिए मैं तुगलकी मिजाज़ का विरोध करना अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानता हूँ.
इसी भाषण के  दौरान किस्मत के मारे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने  बीच में टिप्पणी कर दी और कहा कि सिद्धांत के चर्चे सरकारी पदों के गलियारों के नहीं गुज़रते हैं.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि , चलिए मुझे मालूम है .सिद्धांत संघर्षों से पलते हैं और संघर्ष करना जिसका  इतिहास नहीं है वह सिद्धांतों की बात करता है . मैं उन लोगोंमें से  नहीं हूँ जो कि अपनी गलती को स्वीकार ही न करें . उन्होंने  प्रधान मंत्री से कहा कि जिस समय आप कुर्सियों से चिपके रहने के लिए हर प्रकार के घिनौने समझौते  कर रहे थे , उस समय संघर्ष के रास्ते चल कर मैं हर  मुसीबत  का मुकाबला कर रहा था. आप सिद्धांतों की चर्चा हमसे मत करें .

चन्द्रशेखर जी ने इस भाषण में और भी बहुत सारी बातें कहीं जो कि भारत के राजनीतिक  भविष्य के लिए दिशा निर्देश का प्रकाश स्तम्भ हो सकती  हैं . आज उन्हीं चन्द्र शेखर की पुण्य तिथि है जिन्होंने  स्वार्थ के सामने कभी भी सर नहीं झुकाया  . भारत के एक नागरिक के रूप में उन्हें आज सम्मान से याद करने में मुझे गर्व है .

Saturday, July 7, 2012

बातचीत जारी रहेगी और कभी न कभी फैसला हो ही जाएगा.



शेष नारायण सिंह 

भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की कोशिश जारी है .इसी सिलसिले में इस हफ्ते नई दिल्ली में दोनों देशों के विदेश सचिवों की अहम बैठक हुई. दोनों ही देशों पर अब दबाव है कि वे आपस में दोस्ती करें. हालांकि दोनों ही देशों की आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग दुश्मनी  पक्ष में कभी नहीं रहा है लेकिन भारत की दुश्मनी के नाम पर राजनीति  करने वालों ने हमेशा ही पाकिस्तान की राजनीति में अपना दबदबा बना रखा था. पाकिस्तान में रहकर भारत की मुखालिफत करने वालों को अमरीकी मदद भी बहुत बड़े पैमाने पर मिलती रही है . लेकिन अब हालात बदल रहे हैं . अब पाकिस्तान में और भारत में उन लोगों को हाशिये पर धकेलने का काम शुरू हो गया है जो दोनों देशों के बीच दुश्मनी के बल पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं . अमरीका भी अब समझने  लगा अहै कि भारत और पाकिस्तान के बीच   दोस्ती बढ़ाना उसके राष्ट्रीय हित में है नतीजा यह है कि अब  दोनों ही सरकारें दोस्ती की बात  कर रही हैं . इसी कड़ी का नतीजा है कि  दोनों ही देशों के कूटनीतिक विभागों के सबसे बड़े अफसरों की एक बैठक दिल्ली में आयोजित की गयी. . शान्ति और सुरक्षा के नाम पर बातचीत करने के नाम पर बुलाये गए इस सम्मलेन में  जम्मू कश्मीर पर भी बात हुई. हालांकि यह सभी जानते हैं कि दोनों देशों के राजनेताओं के बस की बात नहीं है कि कश्मीर के मसले पर कोई भी रियायत दे सकें लेकिन इस बातचीत का योगदान यह है कि दोनों देशों के  भले आदमियों की आवाजाही को  प्रोत्साहन दिया जाएगा  और एक दूसरे पर भरोसा करने लायक माहौल  बनाने में सरकारी तौर पर योगदान किया जाएगा  

किसी को उम्मीद नहीं थी कि इस हफ्ते हुई बात चीत के बाद कोई बहुत बड़ा फैसला हो जाएगा . क्योंकि दोनों ही देशों के बीच तल्खियां इतनी ज़्यादा हैं कि  अपनी घोषित नीति  से आगे कोई भी बढ़ने को तैयार नहीं है .  अगर एक पक्ष ज़रा सा भी रियायत देता नज़र आयेगा तो उसके  देश के धार्मिक कट्टरपंथी उस सरकार का जीना दूभर कर देगें . इसलिए कूटनीतिक बातचीत का सबसे  बड़ा लाभ यह होता है  कि अगली बातचीत के लिए कार्यक्रम तय हो जाता है . इस बार भी वही हुआ. दोनों विदेश मंत्रियों ने तय किया कि बातचीत का सिलसिला  आगे भी जारी रखा जाएगा. हर बार की तरह इस बार भी दोनों  ही पक्षों ने उम्मीद जताई कि आगे की बातचीत से सकारात्मक नतीजे निकलेगें . . हर बार की तरह इस बार भी भरोसा पैदा करने वाले तरीकों यानी सी बी एम को जारी  रखने की बात की गयी. .इसके पहले की बैठक में  तय किया गया था कि परमाणु हथियारों के बारे में भी भरोसा पैदा करने वाले तरीकों पर काम किया जाएगा. इस बार की बैठक  में उन पर अब तक की प्रगति  का लेखा जोखा  लिया गया. परमाणु मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई और तय किया गया कि इस दिशा में बातचीत को आगे बढाने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनायी जायेगी. वही समिति यह सुझाव देगी कि और क्या किया जाए जिस से इस महत्वपूर्ण समस्या पर विचारों का आदान प्रदान नियमित रूप से होता रहे और कूटनीतिक माहौल बनाया जा सके. विदेश सचिवों ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों ही देशों के सामने आतंक का ख़तरा बना हुआ है . लेकिन आतंक के बारे में कोई ख़ास क़दम नहीं  उठाया जा सका और कूटनीतिक भाषा के जाल में ही सारी बात फंस कर रह गयी. दोनों ही देशों में आतंक से लड़ने के अपने संकल्प को हर बार  की तरह फिर से दोहराया और कहा कि  हर तरह के आतंक को खत्म करने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाये जायेगें.जम्मू-कश्मीर पर भी बात की गयी लेकिन हर बार  की तरह किसी भी मुद्दे पर समझौता नहीं हुआ. सही बात यह है कि जम्मू-कश्मीर का मामला इतना पेचीदा हो गया  है कि अब दोनों देशों की किसी सरकार की हैसियत नहीं है कि उस  पर कोई समझौता  कर सके. इस बात चीत में भी यही हुआ . दोनों ही देशों के आला अफसर इस बात पर सहमत हो गए कि जम्मू-कश्मीर  के बारे में आगे भी बात चीत की जायेगी और शान्ति पूर्ण तरीकों से समस्या  का हल निकाला जाएगा. यह भी तय किया गया कि आने वाले दिनों में कुछ ऐसा किया  जाये़या जिसके  बाद कश्मीर के बारे में दोनों देशों के मतभेद कम किये जा सकें. जानकार बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर के बारे में इस से ज्यादा कोई सहमति पैदा कर सकना फिलहाल असंभव है . 

 नियंत्रण रेखा के  रास्ते सीमा पार के व्यापार को बढ़ावा देने के बारे में भी बातचीत हुई और तय पाया गया कि इस दिशा में  क़दम उठाये जा  सकते हैं . इस काम के लिए सम्बंधित  अफसरों की बैठक  भी इसी साल १९ जुलाई को करने का फैसला कर लिया गया . इस रास्ते  व्यापार और लोगों की यात्रा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर दोनों ही देशों एक बीच अधिकतम सहमति है . ज़ाहिर है कि आने वाले दिनों में भी इस दिशा में कुछ अहम ऐलान हो सकते हैं .दोनों देशों के मीडियाकर्मियों , पत्रकारों और खिलाड़ियों आवाजाही  को भी प्रोत्साहित करने का फैसला किया गया है. दोनों देशों  की जनता के बीच आवाजाही को बढ़ावा देने के फैसला भी किया गया . मुझे लगता है यह एक ऐसा फैसला है जिसके बाद भारत और पाकिस्तान की सरकारों पर इस  बात का दबाव बढेगा कि वे दुश्मनी को कम करें. दोनों ही देशों की जनता जब दोस्ती के लिए तैयार होगी  तो दुश्मनी की तिजारत करने वालों के  लिए बहुत ही मुश्किल हो जायेगी. दोनों  ही विदेश सचिव  जल्दी ही इस्लामाबाद  में मिलेगें जहां सितम्बर में  प्रस्तावित विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात की तैयारियों का जायजा लिया जाएगा और उनकी बातचीत के बाद घोषित किये जाने वाले फैसलों को अंतिम रूप देने की  दिशा में आगे का काम होगा.

भारत और  पाकिस्तान के बीच दोस्ती  हालांकि बहुत ज़रूरी है लेकिन आज के माहौल में यह बहुत ही मुश्किल काम लगता है . लेकिन  फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत होते रहने का फायदा यह है उम्मीद कभी भी ख़त्म नहीं होगी. विदेश सचिव स्तर की बातचीत  का सबसे बड़ा यही लाभ हुआ है कि बातचीत आगे भी जारी रहेगी और और अगर सब ठीकठाक रहा तो दूर भविष्य में कभी न कभी फैसला  हो ही जाएगा.

Sunday, June 17, 2012

1972 में बलराज साहनी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दीक्षांत भाषण दिया था . यह है वह भाषण अपने मूल रूप में





About 20 years ago, the Calcutta Film Journalists’ Association decided to honour the late Bimal Roy, the maker ofDo Bigha Zameen, and us, his colleagues. It was a simple but tasteful ceremony. Many good speeches were made, but the listeners were waiting anxiously to hear Bimal Roy. We were all sitting on the floor, and I was next to Bimal Da. I could see that as his turn approached he became increasingly nervous and restless. And when his turn came he got up, folded his hands and said, “Whatever I have to say, I say it in my films. I have nothing more to say,” and sat down.
There is a lot in what Bimal Da did, and at this moment my greatest temptation is to follow his example. The fact that I am not doing so is due solely to the profound regard I have for the name which this august institution bears; and the regard I have for yet another person, Shri P.C. Joshi, who is associated with your university. I owe to him some of the greatest moments of my life, a debt which I can never repay. That is why when I received an invitation to speak on this occasion, I found it impossible to refuse. If you had invited me to sweep your doorstep I would have felt equally happy and honoured. Perhaps that service would have been more equal to my merit.
Please do not misunderstand me. I am not trying to be modest. Whatever I said was from my heart and whatever I shall say further on will also be from my heart, whether you find it agreeable and in accordance with the tradition and spirit of such occasions or otherwise. As you may know, I have been out of touch with the academic world for more than a quarter of a century. I have never addressed a University Convocation before.
It would not be out of place to mention that the severance of my contact with your world has not been voluntary. It has been due to the special conditions of film making in our country. Our little film world either offers the actor too little work, forcing him to eat his heart out in idleness; or gives him too much —so much that he gets cut off from all other currents of life. Not only does he sacrifice the pleasures of normal family life, but he also has to ignore his intellectual and spiritual needs. In the last 25 years I have worked in more than one 125 films. In the same period a contemporary European or American actor would have done 30 or 35. From this you can imagine what a large part of my life lies buried in strips of celluloid. A vast number of books which I should have read, I have not been able to read. So many events I should have taken part in, have passed me by. Sometimes I feel terribly left behind. And the frustration increases when I ask myself: How many of these 125 films had anything significant in them? How many have any claim to be remembered? Perhaps a few. They could be counted on the fingers of one hand. And even they have either been forgotten already or will be, quite soon.
That is why I said I was not being modest. I was only giving a warning, so that in the event of my disappointing you, you should be able to forgive me. Bimal Roy was right. The artist’s domain is his work. So, since I must speak, I must confine myself to my own experience to what I have observed and felt, and wish to communicate. To go outside that would be pompous and foolish.
I’d like to tell you about an incident which took place in my college days and which I have never been able to forget. It has left a permanent impression on my mind.
I was going by bus from Rawalpindi to Kashmir with my family to enjoy the summer vacation. Half-way through, we were halted because a big chunk of the road had been swept away by a landslide caused by rain the previous night. We joined the long queues of buses and cars on either side of the landside. Impatiently, we waited for the road to clear. It was a difficult job for the PWD and it took some days before they could cut a passage through. During all this time, the passengers and the drivers of vehicles made a difficult situation even more difficult by their impatience and constant demonstration. Even the villagers nearby got fed up with the high-handed behaviour of the city-walas.
One morning, the overseer declared the road open. The green- flag was waved to the drivers. But we saw a strange sight. No driver was willing to be the first to cross. They just stood and stared at each other from either side. No doubt the road was a make-shift one and even dangerous. A mountain on one side, and a deep gorge and the river below. Both were forbidding. The overseer had made a careful inspection and had opened the road with a full sense of responsibility. But nobody was prepared to trust his judgment, although these very people had, till the day before, accused him and his department of laziness and incompetence. Half an hour passed by in dumb silence. Nobody moved. Suddenly, we saw a small green sports car approaching. An Englishman was driving it; sitting all by himself. He was a bit surprised to see so many parked vehicles and the crowd there. I was rather conspicuous, wearing my smart jacket and trousers. “What’s happened?” he asked me.
I told him the whole story. He laughed loudly, blew the horn and went straight ahead, crossing the dangerous portion without the least hesitation.
And now the pendulum swung the other way. Every body was so eager to cross that they got into each other’s way and created a new confusion for some time. The noise of hundreds of engines and hundreds of horns was unbearable.
That day I saw with my own eyes the difference in attitudes between a man brought up in a free country and a man brought up in an enslaved one. A free man has the power to think, decide, and act for himself. But the slave loses that power. He always borrows his thinking from others, wavers in his decisions, and more often than not only takes the trodden path.
I learnt a lesson from this incident, which has been valuable to me. I made it a test for my own life. In the course of my life, whenever I have been able to make my own crucial decisions, I have been happy. I have felt the breath of freedom on my face. I have called myself a free man. My spirit has soared high and I have enjoyed life because I have felt there is meaning to life.
But, to be frank, such occasions have been too few. More often than not I had lost courage at the crucial moment, and taken shelter under the wisdom of other people. I had taken the safer path. I made decisions which were expected of me by my family, by the bourgeois class to which I belonged, and the set of values upheld by them. I thought one way but acted in another. For this reason, afterwards I have felt rotten. Some decisions have proved ruinous in terms of human happiness. Whenever I lost courage, my life became a meaningless burden.
I told you about an Englishman. I think that in itself is symptomatic of the sense of inferiority that I felt at that time. I could have given you the example of Sardar Bhagat Singh who went to the gallows the same year. I could have given you the example of Mahatma Gandhi who always had the courage to decide for himself. I remember how my college professors and the wise respectable people of my home town shook their heads over the folly of Mahatma Gandhi, who thought he could defeat the most powerful empire on earth with his utopian principles of truth and non-violence. I think less than one per cent of the people of my city dreamt that they would see India free in their lifetime. But Mahatma Gandhi had faith in himself, in his country, and his people. Some of you may have seen a painting of Gandhiji done by Nandlal Bose. It is the picture of a man who has the courage to think and act for himself.
During my college days I was not influenced by Bhagat Singh or Mahatma Gandhi. I was doing my MA in English literature from the most magnificent educational institution in the Punjab— the Government College in Lahore. Only the very best students were admitted to that college. After independence my fellow students have achieved the highest positions in India and Pakistan, both in the government and society. But, to gain admission to this college we had to give a written undertaking that we would take no interest in any political movement—which at that time meant the freedom movement.
This year we are celebrating the twenty-fifth anniversary of our independence. But can we honestly say that we have got rid of our slavish mentality—our inferiority complex?
Can we claim that at the personal, social, or institutional level, our thinking, our decisions, or even our actions are our own and not borrowed? Are we really free in the spiritual sense? Can we dare to think and act for ourselves, or do we merely pretend to do so—merely make a superficial show of independence?
I should like to draw your attention to the film industry to which I belong. I know a great many of our films are such that the very mention of them would raise a laugh among you. In the eyes of educated intelligent people, Hindi films are nothing but a tamasha. Their stories are childish, unreal, and illogical. But their worst fault, you will agree with me, is that their plots, their technique, their songs and dances, betray blind, unimaginative, and unabashed copying of films from the west. There have been Hindi films which have been copied in every detail from some foreign film. No wonder that you young people laugh at us, even though some of you may dream of becoming stars yourselves.
It is not easy for me to laugh at Hindi films. I earn my bread from them. They have brought me plenty of fame and wealth. To some extent at least, I owe to Hindi films the high honour which you have given me today.
When I was a student like you, our teachers, both English and Non-English, tried to convince us in diverse ways that the fine arts were a prerogative of white people. Great films, great drama, great acting, great painting, etc., were only possible in Europe and America. The Indian people, their language and culture, were as yet too crude and backward for real artistic expression. We used to feel bitter about this and we resented it outwardly: but inwardly we could not help accepting this judgment.

Even from the aspect of social responsibility, our Indian films have not yet degenerated to the low level to which some of the western countries have descended. The film producer in India has not yet exploited sex and crime for the sake of profit to the extent that his American counterpart has been doing for years and years-thus creating a serious social problem for that country.
The picture has changed vastly since then. After independence India has made a tremendous recovery in every branch of the arts. In the field of film making, names like Satyajit Ray and Bimal Roy stand out as international personalities. Many of our artistes, cameramen and technicians compare with the best anywhere in the world. Before independence we hardly made ten or fifteen films worth the name. Today we are the biggest film producing country in the world. Not only are our films immensely popular with the masses in our own country, but also in Pakistan, Afghanistan, Iran, the Eastern Republics of the Soviet Union; Egypt, and other Arab countries in the Far East and many African countries. We have broken the monopoly of Hollywood in this field.
But all these assets are negated by our one overwhelming fault—that we are imitators and copyists. This one fault makes us the laughing stock of intelligent people everywhere. We make films according to borrowed, outdated formulas. We do not have the courage to strike out on our own, to get to grips with the reality of our own country, to present it convincingly and according to our own genius.
I say this not only in relation to the usual Hindi or Tamil box office films. I make this complaint against our so-called progressive and experimental films also, whether they be in Bengali, Hindi, or Malayalam. I do not lag behind anyone else in admiring the work of Satyajit Ray, Mrinal Sen, Sukhdev, Basu Bhattacharjee, or Rajinder Singh Bedi. I know they are highly and deservingly respected; but even then I cannot help saying that the winds of fashion in Italy, France, Sweden, Poland, or Czechoslovakia have an immediate effect on their work. They do break new ground, but only after someone else has broken it.
In the literary world, in which I have considerable interest, I see the same picture. Our novelists, story writers, and poets are carried away with the greatest of ease by the currents of fashion in Europe, although Europe, with the exception of the Soviet Union perhaps, is not yet even aware of Indian writing. For example, in my own province of the Punjab there is a wave of protest among young poets against the existing social order. Their poetry exhorts the people to rebel against it, to shatter it and build a better world free from corruption, injustice, and exploitation. One cannot but endorse that spirit wholeheartedly, because, without question, the present social order needs changing.
The content of this poetry is most admirable, but the form is not indigenous. It is borrowed from the west. The west has discarded meter and rhyme, so our Punjabi poet must also discard it. He must also use involved and ultra-radical imagery. The result is that the sound and fury remains only on paper, confined to small, mutually admiring literary circles. The people, the workers and the peasants who are being exhorted to revolution, cannot make head or tail of this kind of poetry. It just leaves them cold and per The content of this poetry is most admirable, but the form is not indigenous. It is borrowed from the west. The west has discarded meter and rhyme, so our Punjabi poet must also discard it. He must also use involved and ultra-radical imagery. The result is that the sound and fury remains only on paper, confined to small, mutually admiring literary circles. The people, the workers and the peasants who are being exhorted to revolution, cannot make head or tail of this kind of poetry. It just leaves them cold and perplexed. I don’t think I am wrong if I say that other Indian languages too are in the grip of “new wave” poetry.
I know next to nothing about painting. I can’t judge a good one from a bad one. But I have noticed that in this sphere also our painters conform to current fashions abroad. Very few have the courage to swim against the tide.
And what about the academic world? I invite you to I look into the mirror. If you laugh at Hindi films, maybe you are tempted to laugh at yourselves.
This year my own province honoured me by nominating me to the senate of Guru Nanak university. When the invitation to attend the first meeting came, I happened to be in the Punjab, wandering around in some villages near Preet Nagar—the cultural centre founded by our great writer S. Gurbakhsh Singh. During the evening’s gossip I told my villager friends that I was to go to Amritsar to attend this meeting and if anyone wanted a lift in my car he was welcome. At this one of the company said, “Here among us you go about dressed in tehmat-kurta, peasant fashion; but tomorrow you will put on your suit and become Sahib Bahadur again.” “Why,” I said laughingly, “if you want I will go dressed just like this.” “You will never dare,” another one said. “Our sarpanch Sahib here removes his tehmat and puts on a pyjama whenever he has to go to the city on official work. He has to do it, otherwise, he says, he is not respected. How can yon go peasant-fashion to such a big university?” A jawan who had come home on leave for the rice sowing added, “Our sarpanch is a coward. In cities even girls go about wearing lungis these days. Why should he not be respected?”
The gossip went on, and, as if to accept their challenge, I did make my appearance in the Senate meeting in tehmat-kurta. The sensation I created was beyond my expectation. The officer—perhaps, professor—who was handing out the gowns in the vestibule could not recognize me at first. When he did he could not hide his amusement, “Mr Sahni, with the tehmat you should have worn khosas—not shoes,” he said, while putting the gown over my shoulders. “I shall be careful next time,” I said apologetically and moved on. But a moment later I asked myself, was it not bad manners for the professor to notice or comment on my dress? Why did I not point this out to him? I felt peeved over my slow-wittedness.
After the meeting we went over to meet the students. Their amusement was even greater and more eloquent. Many of them could not help laughing at the fact that I was wearing shoes with a tehmat. That they were wearing chappals with trousers seemed nothing extraordinary to them.
You must wonder why I am wasting your time narrating such trivial incidents. But look at it from the point of view of the Punjabi peasant. We are all full of admiration for his contribution to the green revolution. He is the backbone of our armed forces. How must he feel when his dress or his way of life is treated as a matter of amusement?
It is well-known in the Punjab that as soon as a village lad receives college education, he becomes indifferent to the village. He begins to consider himself superior and different, as if belonging to a separate world altogether. His one ambition is to somehow leave the village and run to a city. Is this not a slur on the academic world?
I agree that all places are not alike. I know perfectly well that no complex against the native dress exists in Tamil Nadu or Bengal. Anyone from a peasant to a professor can go about in a dhoti on any occasion. But I submit that the habit of borrowed and idealized thinking is present over there too. It is present everywhere, in some form or degree. Even 25 years after independence we are blissfully carrying on with the same system of education which was designed by Macaulay and Co. to breed clerks and mental slaves. Slaves who would be incapable of thinking independently of their British masters; slaves who would admire everything about the masters, even while hating them; slaves who would consider it an honour to be standing by the side, of the masters, to speak the language of the masters, to dress like the masters, to sing and dance like the masters; slaves, who would hate their own people and would be available to preach the gospel of hatred among their own people. Can we then be surprised if the large majority of students in universities are losing faith in this system of education?
Let me go back to trivialities again. Ten years ago, if you asked a fashionable student in Delhi to wear a kurta with trousers he would have laughed at you. Today, by the grace of the hippies and the Hare Rama Hare Krishna cult, not only has the kurta-trousers combination become legitimate, but even the word kurta has changed to guru-shirt. The sitar became a star instrument with us only after the Americans gave a big welcome to Ravi Shankar, just as 50 years ago Tagore became Gurudev all over India only after he received the Nobel Prize from Sweden.
Can you dare to ask a college student to shave his head, moustache, and beard when the fashion is to put the barbers out of business? But if tomorrow under the influence of Yoga the students of Europe begin to shave their heads arid faces, I can assure you that you will begin to see a crop of shaven skulls all over Connaught Circus the next day. Yoga has to get a certificate from Europe before it can influence the home of its birth.
Let me give another example—a less trivial one.
I work in Hindi films, but it is an open secret that the songs and dialogues of these Hindi films are mostly written in Urdu. Eminent Urdu writers and poets-Krishan Chandar, Rajinder Singh Bedi, K. A. Abbas, Gulshan Nanda, Sahir Ludhianwi, Majrooh Sultanpuri, and Kaifi Azmi are associated with this work.
Now, if a film written in Urdu can be called a Hindi film, it is logical to conclude that Hindi and Urdu are one and, the same language. But no, our British masters declared them two separate languages in their time. Therefore, even 25 years after independence, our government, our universities, and our intellectuals insist on treating them as two separate and independent languages. Pakistan radio goes on ruining the beauty of this language by thrusting into it as many Persian and Arabic words as possible; and All India Radio knocks it out of all shape by pouring the entire Sanskrit dictionary into it. In this way they carry out the wish of the Master, to separate the inseparable. Can anything be more absurd than that? If the British told us that white was black, would we go on calling white black for ever and ever? My film colleague Johnny Walker remarked the other day, “They should not announce ‘Ab Hindi mein samachar suniye‘ [Now listen to the news in Hindi] they should say, ‘Ab Samachar mein Hindi suniye‘ [Now listen to Hindi in the News]
I have discussed this funny situation with many Hindi and Urdu writers—the so-called progressive as well as non progressive; I have tried to convince them of the urgency to do some fresh thinking on the subject. But so far it has been like striking one’s head against a stone wall. We film people call it the “ignorance of the learned”. Are we wrong?
Lastly, I would like to tell you about a hunch I have, even at the risk of boring you. A hunch is something you can’t help having. It just comes. Ultimately it may prove right or wrong. May be mine is wrong. But there it is. It may even prove right—who knows?
Pandit Jawaharlal Nehru has admitted in his autobiography that our freedom movement, led by the Indian National Congress, was always dominated by the propertied classes—the capitalists and landlords. It was logical, therefore, that these very classes should hold the reigns of power even after independence. Today it is obvious to everyone that in the last 25 years the rich have been growing ‘richer’ and the poor have been growing poorer. Pandit Nehru wanted to change this state of affairs, but he couldn’t. I don’t blame him, because he had to face very heavy odds all along. Today our Prime Minister, Indira Gandhi, pledges herself to take the country towards the goal of socialism. How far she will be successful, I can’t say. Politics is not my line. For our present purposes it is enough if you agree with me that in today’s India the propertied classes dominate the government as well as society.
I think you will also agree that the British used the English language with remarkable success for strengthening their imperial hold on our country.
Now, which language in your opinion would their successors, the present rulers of India, choose to strengthen their own domination? Rashtrabhasha Hindi? By heavens, no. My hunch is that their interests too are served by English and English alone. But since they have to keep up a show of patriotism they make a lot of noise about Rashtrabhasha Hindi so that the mind of the public remains diverted.
Men of property may believe in a thousand different gods, but they worship only one—the God of profit. From the point of view of profit the advantages of retaining English to the capitalist class in this period of rapid industrialization and technological revolution are obvious. But the social advantages are even greater. From that point of view English is a God-sent gift to our ruling classes.
Why? For the simple reason that the English language is beyond the reach of the toiling millions of our country. In olden times Sanskrit and Persian were beyond the reach of the toiling masses. That is why the rulers of those times had given them the status of state language. Through Sanskrit and Persian the masses were made to feel ignorant, inferior, uncivilized, and unfit to rule themselves. Sanskrit and Persian helped to enslave their minds, and when the mind is enslaved bondage is eternal.
It suits our present ruling classes to preserve and maintain the social order that they have inherited from the British. They have a privileged position; but they cannot admit it openly. That is why a lot of hoo-haw is made about Hindi as the Rashtrabhasha. They know very well that this Sanskrit-laden, artificial language, deprived of all modern scientific and technical terms, is too weak and insipid to challenge the supremacy of English. It will always remain a show piece, and what is more, a convenient tool to keep the masses fighting among themselves. We film people get a regular flow of fan mail from young people studying in schools and colleges. I get my share of it and these letters reveal quite clearly what a storehouse of torture the English language is to the vast majority of Indian students. How abysmally low the levels of teaching and learning have reached! That is why, I am told preferential treatment is being given to boys and girls who come from public schools i.e. schools to which only the children of privileged classes can go.

My friend listened to me carefully and largely agreed with me.
This was my hunch and I confided it one day to a friend of mine who is a labour leader. I told him that if we are serious about doing away with capitalism and bringing in socialism, we have to help the working class to consolidate itself on an all-India scale with the same energy as the capitalist class is doing. We have to help the working class achieve a leading role in society. And that can only be done by breaking the domination of English and replacing it with a people’s language.
“You have analyzed the situation very well,” he said, “but what is the remedy?”
“The remedy is to retain the English script and kick out the English language,” I replied.
“But how?”
“A rough and ready type of Hindustani is used by the working masses all over India. They make practical use of it by discarding all academic and grammatical flourishes. In this type of Hindustani, “Larka bhi jata hei” and “Larki bhi jata hei“. There is an atmosphere of rare freedom in this patois and even the intellectuals indulge in it when they want to relax. And actually this is in the best tradition of Hindustani. This is how it was born, made progress, and acquired currency all over India. In the old days it was contemptuously called Urdu—or the language of the camps or bazaars.
Today in this bazaari Hindustani the word ‘university’ becomes univrasti—a much better word than vishwa vidyalaya, ‘lantern’ becomes laltain, the ‘chasis’ of a car becomes chesi, ‘spanner’ becomes pana, i.e. anything and everything is possible. The string with which the soldier cleans his rifle is called ‘pullthrough’ in English. In Roman Hindustani it becomes fultroo—a beautiful word. ‘Barn-door’ is the term the Hollywood lights man uses for a particular type of two blade cover. The Bombay film worker has changed it to bandar, an excellent transformation. This Hindustani has untold and unlimited possibilities. It can absorb the international scientific and technological vocabulary with the greatest of ease. It can take words from every source and enrich itself. One has no need to run only to the Sanskrit dictionary.”
“But why the Roman script?” my friend asked.
“Because no one has any prejudice against it,” I said. “It is the only script which has already gained all-India currency. In north, south, east and west, you can see shop signs and film poster in this script. We use this script for writing addresses on envelopes and post cards. The army has been using it for the last thirty years at least.”
My friend, the labour leader, kept silent for some time. Then he smiled indulgently and said, “Comrade, Europe also experimented with Esperanto. A great intellectual like Bernard Shaw tried his best to popularize the Basic English. But all these schemes failed miserably, for the simple reason that languages cannot be evolved mechanically; they grow spontaneously.”
I was deeply shocked. I said, “Comrade, Esperanto is just that Rashtrabhasha which the Hindi Pandits are manufacturing in their studies, from the pages of some Sanskrit dictionary. I am talking of the language which is growing all round you, through the action of the people.”
But I couldn’t convince him. I gave more arguments, including the one that Netaji Subhash Bose and Jawaharlal Nehru were both strong advocates of Roman Hindustani, but that too failed to convince him. The question is not whether the comrade or I was right. Perhaps, I was wrong. Perhaps, my thinking was utopian, or “mechanical” —as he called it. As I said before, you can never say whether a hunch is going to be right or wrong. But the fun lies in having it, because to have a hunch is a sign of independent thinking. The comrade should have been able to appreciate that, but he couldn’t, because it was difficult for him to get out of the grooves of orthodox thinking.
No country can progress unless it becomes conscious of its being—its mind and body. It has to learn to exercise its own muscles. It has to learn to find out and solve its own problems in its own way. But whichever way I turn I find that even after twenty-five years of independence, we are like a bird which has been let out of its cage after a prolonged imprisonment-unable to know what to do with its freedom. It has wings, but is afraid to fly into the open air. It longs to remain within defined limits, as in the cage.
Individually and collectively, we resemble Walter Mitty. Our inner lives are different from our outer lives. Our thoughts and actions are poles apart. We want to change this state of affairs, but we lack the courage to do anything different from what we have been doing all along, or different from what others expect us to do.
I am sure there must be some police officers in this country who in their hearts want to be regarded as friends rather than enemies of the public. They must be aware that in England the behaviour of the police towards the public is polite and helpful. But the tradition in which they have been trained is not the one which the British set for their own country but the one which they set for their colonies. So, the policeman is helpless. According to this colonial tradition, it is his duty to strike terror into anyone who enters his office, to be as obstructive and unhelpful as possible. This is the tradition which pervades every government office, from the chaparasi to the minister.
One of our young and enterprising producers made an experimental film and approached the government for tax exemption. The minister concerned was being sworn into office the next day. He invited the producer to attend the ceremony, after which he would meet him and discuss the matter. The producer went, impressed by the informality with which the minister had treated him. As the minister was being sworn in, promising to serve the people truly, faithfully, and honestly, his secretary started explaining to the young producer how much he would have to pay in black money to the minister and how much to the others if he wanted the tax exemption.
The producer got so shocked and angry that he wanted to put this scene in his next film. But his financiers had already suffered a loss with the first one. They told him categorically not to make an ass of himself. In any case, if he had insisted in making an ass of himself the censors would never have passed the film, because it is an unwritten law that no policeman or minister is corrupt in our country.
But there is something which strikes me as being even funnier. Those same people who scream against ministers every day cannot themselves hold a single function without some minister inaugurating it, or presiding over it, or being the chief guest. Sometimes the minister is the chief guest and a film star is the president, or else the film star is the chief guest and the minister is the president. Some big personality has to be there, because it is the age old colonial tradition.
During the last war, I spent four years in England as a Hindustani announcer at the BBC. During those four years of extreme crisis I never even once set my eyes on a member of the British cabinet, including Prime Minister Churchill. But since independence I have seen nothing else but ministers in India, all over the place.
Perhaps, today we need a messiah to give us the courage to abandon our slavishness and to create values befitting the human beings of a free and independent country so that we may have the courage to link our destinies to the ones being ruled, and not the rulers — to the exploited and not to the exploiters.When Gandhiji went to the Round Table Conference in 1930, he remarked to British journalists that the Indian people regarded the guns and bullets of their empire in the same way as their children regarded the crackers andphataakaas on Diwali day. He could make that claim because he had driven the fear of the British out of Indian minds. He had taught them to ignore and boycott the British officers instead of kowtowing to them. Similarly, if we want socialism in our country, we have firstly to drive out the fear of money, position, and power from the minds of our people. Are we doing anything in that direction? In our society today, who is respected most — the man with talent or the man with money? Who is admired most—the man with talent or the man with power? Can we ever hope to usher in socialism under such conditions? Before socialism can come, we have to create an atmosphere in which possession of wealth and riches should invite disrespect rather than respect. We have to create an atmosphere in which the highest respect is given to labour whether it be physical or mental; to talent, to skill, to art, and to inventiveness. This requires new thinking, and the courage to discard old ways of thinking. Are we anywhere near this revolution of the mind?
A great saint of the Punjab, Guru Arjun Dev, said,
jan ki tehl sanbhakhan jan sio uuthan baithan jan kai sanga
jan char raj mukh mathai laagi aasa puuran anant tharanga
[I serve His humble servants, and speak with them, and abide with them.
I apply the dust of the feet of His humble servants to my face and forehead;
my hopes, and the many waves of desire, are fulfilled]
It is my earnest hope and prayer that you, graduates of Jawaharlal Nehru University, may succeed where I and so many others of my generation have failed.