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Saturday, October 9, 2010

जनरल मुशर्रफ ने माना ,कश्मीर के आतंकवाद में पाकिस्तान का हाथ

शेष नारायण सिंह

( मूल लेख दैनिक जागरण में छप चुका है )

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति ,जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक जर्मन अखबार के साथ बातचीत में कहा है कि कश्मीर में आतंक का राज कायम करने की कोशिश में लगे आतंकवादियों को पाकिस्तान सरकार ने ही ट्रेनिंग दी है और उनकी देख-भाल भी पाकिस्तानी सरकार ही कर रही है . परवेज़ मुशर्रफ के इस इकबालिया बयान के बाद दिल्ली दरबार सकते में है . भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के करता धरता समझ नहीं पा रहे हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में शीर्ष पर रह चुके एक फौजी जनरल की बात को कूटनीतिक भाषा में कैसे फिट करें.हालांकि भारत समेत पूरी दुनिया को मालूम है कि कश्मीर में आतंकवाद पूरी तरह से पाकिस्तान की कृपा से ही फल फूल रहा है लेकिन अभी तक पाकिस्तानी इस्टेब्लिशमेंट ने इस बात को कभी नहीं स्वीकार किया था . पाकिस्तान का राष्ट्रपति रहते हुए जनरल मुशर्रफ ने हमेशा यही कहा कि कश्मीर में जो भी हो रहा है वह कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई है और पाकिस्तान की सरकार कश्मीर में लड़ रहे लोगों को केवल नैतिक समर्थन दे रही है . भारत के विदेश मंत्रालय के लिए भी आसान था कि वह कूटनीतिक स्तर पर अपनी बात कहता रहे और कोई मज़बूत एक्शन न लेना पड़े . लेकिन अब बात बदल गयी है . अब तो कश्मीर में आतंकवाद को इस्तेमाल करने वाले एक बड़े फौजी और कई वर्षों तक सत्ता पर काबिज़ रहे जनरल ने साफ़ साफ़ कह दिया है कि हाँ हम कश्मीर में आतंकवाद फैला रहे हैं , जो करना हो कर लो. यह भारत के लिए मुश्किल है . इस तरह की साफगोई के बाद तो भारत को पाकिस्तान के साथ वही करना चाहिए जो अल-कायदा का मददगार साबित हो जाने के बाद ,तालिबान के खिलाफ अमरीका ने किया था या १९६५ में कश्मीर में घुसपैठ करा रही पाकिस्तान की जनरल अयूब सरकार को औकात बताने के लिए लाल बहादुर शास्त्री ने किया था . लेकिन अब ज़माना बदल गया है . शरारत पर आमादा पाकिस्तान को अब सैनिक भाषा में जवाब नहीं दिया जा सकता क्योंकि अभी पाकिस्तान की सरकार औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं कर रही है कि कश्मीर में आतंकवाद उनकी तरफ से करवाया जा रहा है . पाकिस्तान की हालत तो मुशर्रफ के खुलासे के बाद बहुत ही खराब है . पाकिस्तान सरकार के मालिक सन्न हैं .औपचारिक रूप से पाकिस्तानी सरकार के प्रवक्ता ने कह दिया है कि मुशर्रफ के बयान बेबुनियाद हैं लेकिन सबको मालूम है कि मुशर्रफ को नकार पाना पाकिस्तानी फौज और सिविलियन सरकार ,दोनों के लिए असंभव है . पाकिस्तानी सरकार के प्रवक्ता ने कहा है कि उसे नहीं मालूम कि मुशर्रफ ने यह बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही वैसे अंतर राष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव के डर से पाकिस्तानी सरकार कह रही है कि सरकार इन बेबुनियाद आरोपों का खंडन करती है यह अलग बात है कि पाकिस्तान कश्मीरी लोगों के संघर्ष का समर्थन करता है.

मुशर्रफ आजकल पाकिस्तान की राजनीति में वापसी के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं . उन्हें मालूम है कि अमरीका की मर्जी के बिना पाकिस्तान में राज नहीं किया जा सकता. आजकल पाकिस्तान में अमरीका की रूचि केवल इतनी है कि वह उसे अल-कायदा को ख़त्म करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है . पाकिस्तान की राजनीति का स्थायी भाव भारत का विरोध करने की राजनीतिक रणनीति है . .अमरीका अब भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा चुका है . ज़ाहिर है वह भारत से दुश्मनी करने वाले को पाकिस्तान का चार्ज देने में संकोच करेगा . उसे ऐसे किसी बन्दे की तलाश है जो भारत को दुश्मन नंबर एक न माने. इस पृष्ठभूमि में जनरल मुशर्रफ से बढ़िया कोई आदमी हो ही नहीं सकता क्योंकि मुशर्रफ अमरीका की इच्छा का आदर करने के लिए भारत के खिलाफ दुश्मने में कमी लाने में कोई संकोच नहीं करेगें . उन्होंने अमरीका को खुश रखने के लिए पाकिस्तान की अफगान नीति को एक दिन में बदल दिया था . तालिबान की सरकार को पाकिस्तान ने ही बनवाया था लेकिन जब अमरीका ने कहा कि उन्हें तालिबान के खिलाफ काम करना है , मुशर्रफ बिना पलक झपके तैयार हो गए थे. उन्हें उम्मीद है कि भारत के साथ दुश्मनी करने वाले को अब अमरीका पाकिस्तान के तख़्त पर नहीं बैठाना चाहता . उन्हें यह भी मालूम है कि मौजूदा ज़रदारी-गीलानी सरकार से भी अमरीका पिंड छुडाना चाहता है . फौज के मौजूदा मुखिया के दिलो-दिमाग पर भारत के खिलाफ नफरत कूट कूट कर भरी हुई है . ऐसी हालत में पाकिस्तान पर राज करने के लिए जिस पाकिस्तानी की तलाश अमरीका को है , जनरल मुशर्रफ अपने आप को उसी सांचे में फिट काना चाहते हैं . अमरीका और भारत की पसंद की बातें करके जनरल मुशर्रफ अपने प्रति सही माहौल बनाने के चक्कर में हैं और उनका यह इकबालिया बयान इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए . जब यह लगभग पक्का हो चुका है कि पाकिस्तान की सिविलियन सरकार के दिन गिने चुने रह गए हैं, भारत के लिए भी पाकिस्तान में जनरल कयानी से बेहतर मुशर्रफ ही रहेगें क्योंकि वे अमरीकी हुक्म को मानने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं .दुनिया जानती है कि अमरीका भारत को खुश रखने की विदेश नीति का गंभीरता से पालन कर रहा है

Friday, October 8, 2010

पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन की अफवाह , मुशर्रफ की वापसी की चर्चा

शेष नारायण सिंह

पाकिस्तान पर अमरीकी शिकंजा कसता जा रहा है. गुरुवार को फिर पाकिस्तान में ५० ट्रकों को आग के हवाले कर दिया गया जो अमरीकी सेना के लिए पेट्रोल ,डीज़ल आदि लेकर अफगानिस्तान जा रहे थे. कल भी कुछ ट्रकों को आग के हवाले कर दिया गया था. खबर है कि अमरीका ने तय किया है कि अब नैटो की अफगानिस्तान में तैनात सेनाओं के लिए सारा सामान रूस के रास्ते भेजा जायेगा . पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों के बारे में अमरीका किसी बड़ी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है. अब अमरीका पाकिस्तान को कोई भी स्पेस देने को तैयार नहीं है . पाकिस्तान की सिविलियन सरकार और सेना प्रमुख जनरल कयानी को अब अमरीकी बहुत दिनों तक बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दीखते.पाकिस्तान की तरफ से अमरीका में काम कर रही कुछ लाबी कंपनियों ने बहुत ही सोच विचार कर एक अफवाह फैलाई थी कि नवम्बर में भारत की यात्रा पर जा रहे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत से कहने वाले हैं कि कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के साथ सुलह सफाई कर लो तो भारत को सुरक्षा परिषद् में शामिल करने पर विचार किया जाएगा . पाकिस्तान की आतंरिक राजनीति में इस अफवाह के ज़रिये बहुत काम हो सकता था . आम तौर पर इस तरह की अफवाहों का खंडन नहीं किया जाता . और मित्र देश को इस अफवाह के सहारे कुछ राजनीतिक माइलेज लेने दिया जाता है . लेकिन अब अमरीकी प्रशासन पाकिस्तान के साथ थोड़ी सख्ती बरत रहा है शायद इसी योजना के तहत एक अंग्रेज़ी टेलीविज़न चैनेल से बातचीत में भारत में अमरीकी राजदूत , रोमर ने साफ़ कह दिया कि कश्मीर में अमरीका किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगा क्योंकि अमरीका मानता है कि कश्मीर का मामला शुद्ध रूप से भारत का आन्तरिक मामला है . इस खंडन के बाद पाकिस्तानी हुक्मरान को खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है . इस बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि अमरीका पाकिस्तानी फौज़ और सिविलियन सरकार दोनों के आला हाकिम बदलना चाहता है . अफवाहों का बाज़ार गर्म है और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ को झाड़ पोंछ कर तैयार किया जा रहा है . दक्षिण एशिया की नयी भू-राजनैतिक साच्चाई के मद्दे नज़र अब अमरीका पाकिस्तान में ऐसा राजा तैनात करना चाहता है जो भारत के साथ दुश्मनी को थोडा कम करे . अमरीका ने जनरल मुशर्रफ को बैपरा हुआ है. उसे मालूम है कि जनरल मुशर्रफ को अपना रुख बदलने में कोई टाइम नहीं लगता . इस पृष्ठभूमि में जनरल मुशर्रफ से बढ़िया कोई आदमी हो ही नहीं सकता क्योंकि मुशर्रफ अमरीका की इच्छा का आदर करने के लिए भारत के खिलाफ दुश्मनी में कमी लाने में कोई संकोच नहीं करेगें . उन्होंने अमरीका को खुश रखने के लिए पाकिस्तान की अफगान नीति को एक दिन में बदल दिया था . तालिबान की सरकार को पाकिस्तान ने ही बनवाया था लेकिन जब अमरीका ने कहा कि उन्हें तालिबान के खिलाफ काम करना है , मुशर्रफ बिना पलक झपके तैयार हो गए थे. उन्हें उम्मीद है कि भारत के साथ दुश्मनी करने वाले को अब अमरीका पाकिस्तान के तख़्त पर नहीं बैठाना चाहता . उन्हें यह भी मालूम है कि मौजूदा ज़रदारी-गीलानी सरकार से भी अमरीका पिंड छुडाना चाहता है . फौज के मौजूदा मुखिया के दिलो-दिमाग पर भारत के खिलाफ नफरत कूट कूट कर भरी हुई है . ऐसी हालत में पाकिस्तान पर राज करने के लिए जिस पाकिस्तानी की तलाश अमरीका को है , जनरल मुशर्रफ अपने आप को उसी सांचे में फिट काना चाहते हैं . अमरीका और भारत की पसंद की बातें करके जनरल मुशर्रफ अपने प्रति सही माहौल बनाने के चक्कर में हैं .
जनरल परवेज़ मुशर्रफ का एक जर्मन अखबार को दिया गया बयान इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि कश्मीर में आतंक का राज कायम करने की कोशिश में लगे आतंकवादियों को पाकिस्तान सरकार ने ही ट्रेनिंग दी है और उनकी देख-भाल भी पाकिस्तानी सरकार ही कर रही है . परवेज़ मुशर्रफ के इस इकबालिया बयान के बाद दुनिया भर के कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गयी है कि जनरल मुशर्रफ अमरीकियों के पसंद की बात कह कर उनके करीब आने की कोशिश कर रहे हैं . पाकिस्तान का राष्ट्रपति रहते हुए जनरल मुशर्रफ ने हमेशा यही कहा कि कश्मीर में जो भी हो रहा है वह कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई है और पाकिस्तान की सरकार कश्मीर में लड़ रहे लोगों को केवल नैतिक समर्थन दे रही है . लेकिन अब उनकी बोली बदल रही है . पाकिस्तान में अमरीका की रूचि केवल इतनी है कि वह उसे अल-कायदा को ख़त्म करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है . .अमरीका अब भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा चुका है . ज़ाहिर है वह भारत से दुश्मनी करने वाले को पाकिस्तान का चार्ज देने में संकोच करेगा . उसे ऐसे किसी बन्दे की तलाश है जो भारत को दुश्मन नंबर एक न माने. और मुशर्रफ के बयान को कूटनीतिक हलकों में इसी पृष्ठभूमि के साथ समझा जा रहा है .

Friday, June 4, 2010

पाकिस्तान को ख़त्म कर सकता है आतंकवाद

शेष नारायण सिंह


पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय लोगों की दो मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज़ के वक़्त जो हमला हुआ वह पाकिस्तानी समाज में व्याप्त असहिष्णुता को एक बार भी फिर रेखांकित कर देता है .. अहमदिया समुदाय के लोग अपने आप को मुसलमान कहते हैं लेकिन पाकिस्तानी सरकार उन्हें मुसलमान नहीं मानती. वे वहां के सरकारी रिकॉर्ड में गैर-मुस्लिम जमात के रूप में दर्ज हैं . शायद इसीलिए जब शुक्रवार के दिन मस्जिद में हुए हमलों में मारे गए अहमदिया समुदाय के लोगों का अंतिम संस्कार किया गया तो कोई भी सरकारी नेता या अधिकारी वहां नहीं गया . राजनीतिक पार्टियों ने तो दो मस्जिदों में हुए इस नरसंहार के खिलाफ बयान दे दिए लेकिन कोई नेता सार्वजनिक रूप से सहानुभूति व्यक्त करने की हिम्मत नहीं जुटा सका.दरअसल पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों के खिलाफ बहुत असहिष्णुता है . पाकिस्तानी हुकूमत का दावा है कि अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों की आबादी उनके देश में चौथाई प्रतिशत से भी कम है . पाकिस्तान की स्थापना के बाद से ही जब जमाते-इस्लामी के नेता , मौलाना मौदूदी ने नए देश को इस्लामी राज्य के रूप में स्थापित करने की मुहिम शुरू की , तो लोगों को लगने लगा था कि पाकिस्तान के संस्थापक , मुहम्मद अली जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान तो कभी नहीं बन पायेगा. इसका कारण यह था कि पाकिस्तान की बुनियादी मांग ही धार्मिक आधार पर की गयी थी. जिन्ना ने अंग्रेजों से पाकिस्तान हासिल ही इसलिए किया था कि उन्हें शक़ था कि आज़ादी के बाद जब अँगरेज़ चले जायेंगे तो हिन्दू बहुमत की सरकारें मुसलमानों को परेशान करेंगीं . जिन्ना की यह सोच गलत थी क्योंकि आज भी मुसलमान भारत में गर्व से रहते हैं और मुस्लिम विरोधी आर एस एस के खिलाफ लगभग पूरे देश के धर्मनिरपेक्ष हिन्दू लामबंद हैं.. जिन्ना की वफादारी और भारत के टुकड़े करने की अपनी नीति के तहत अंग्रेजों ने मुल्क का बँटवारा कर दिया . शायद इसीलिए जमाते इस्लामी की अगुवाई में मुल्लाओं ने इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए कोशिश शुरू कर दी लेकिन जिन्ना के दिमाग में कुछ और था . वे धार्मिक मामलों को राजकाज का हिस्सा नहीं बनाना चाहते थे. इसीलिए पाकिस्तान के बँटवारे के बाद उन्होंने जो सबसे चर्चित भाषण दिया था उसमें उन्होंने साफ़ कह दिया था कि नया मुल्क एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा. उनका वह भाषण बार बार उद्धृत किया जाता है . उस पर गौर करने की ज़रुरत है क्योंकि उसकी रोशनी में ही समझ में आयेगा कि पाकिस्तान के संस्थापक के असली सपने कितने नीचे दफन कर दिए गए हैं .
जिन्ना ने अपने उस विख्यात भाषण में कहा था कि ' मेरी समझ से भारत के विकास में धार्मिक मतभेद की समस्या सबसे बड़ी बाधा रही है . इसलिए हमें इस से एक सबक सीखना चाहिए . इस नए पाकिस्तान में आप मंदिर में जाने के लिए स्वतंत्र हैं .आप अपनी मस्जिदों में जा सकते हैं या किसी और पूजा स्थल पर जा सकते हैं . आप किसी भी धर्म, जाति या मत से ताल्लुक रख सकते हैं , उस से राज्य का कोई लेना देना नहीं है .' जिन्ना का यह भाषण साफ़ कर देता है कि पाकिस्तान हथियाने के लिए उन्होंने चाहे जो कुछ भी किया हो लेकिन नए देश को वे भी धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर चलाना चाहते थे . लेकिन उनकी बात को सुनने वाला कोई नहीं था . उनके मरने के कुछ बाद ही उनके चहेते और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली को मार डाला गया , पंजाबी साम्राज्यवाद की शुरुआत हो गयी शुरू में तो जिन्ना की सोच को इज्ज़त देने का ड्रामा होता रहा लेकिन बाद में अपने आप को बहुत सेकुलर और आधुनिक कहलाने के शौकीन , ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने सत्ता पर काबिज़ होने के बाद सरकारी स्तर पर मुल्लाओं की बात को स्वीकार करना शुरू कर दिया . ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने ही अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों को गैर-मुस्लिम घोषित किया था . बाद में उनके हत्यारे और पाकिस्तान के फौजी तानाशाह ,जिया उल हक ने उसे बहुत ही मज़बूत कर दिया .

बहरहाल यह पक्का है कि मुहम्मद अली जिन्ना वाला पाकिस्तान आज कहीं दूर दूर तक नहीं है . यह हाल शुरू से ही है . पाकिस्तान में सत्तर के दशक में लोग कहते पाए जाते थे कि यहाँ सिन्धी हैं , पंजाबी हैं , पख्तून हैं और बलूच हैं लेकिन पाकिस्तानी कोई नहीं . आज हालात उस से भी बदतर हैं . जिस तरह से पूरे पाकिस्तान में खून खराबा हो रहा है, उसे देखकर कई बार शक़ होने लगता है आज के पाकिस्तान में इंसान की इज्ज़त करने वाली जमातें भी कहीं छुप गयी हैं . मुहम्मद अली जिन्ना मूल रूप से धर्मनिरपेक्षता की राजनीति के पैरोकार थे ..१९१९ के पहले की कांग्रेस में उनकी हैसियत एक बड़े नेता की थी लेकिन अपने चिडचिडे और दूसरों की राय की इज्ज़त न करने के स्वभाव कारण उन्हें कांग्रेस से अलग होना पड़ा . बाद में लियाक़त अली के साथ मिलकर वे मुल्क के बँटवारे के अभियान के नेता बने. लेकिन आज़ादी के बाद वे पाकिस्तान में वैज्ञानिक सोच के आधार पर हुकूमत के पक्षधर थे. जो हो न सका .उनका सपना पूरा नहीं हुआ .. पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना के सपने अब कहीं नहीं हैं. पूर्व तानाशाह जिया उल हक ने जिस तरह से हर पाकिस्तानी के दिमाग में भारत से दुश्मनी का ज़हर भर दिया था , वह अब रंग दिखाने लगा है . भारत को तबाह करने के लिए जिया ने आतंकवाद को अपनी सरकार की प्राथमिकता में शामिल किया था और आई एस आई का इस्तेमाल करके आतंकवाद का एक बड़ा तामझाम तैयार किया था . भारत ने तो अपने आप को सुरक्षित कर लिया लेकिन वही आतंकवाद आज पाकिस्तान की तबाही का कारण बनता नज़र आ रहा है. और लगता है कि जिया से शुरू होकर बेनजीर ,नवाज़ शरीफ और मुशर्रफ के शासन काल में जिस आतंकवाद को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश की गयी थी ,वह पाकिस्तान को तबाह करके ही दम लेगा.

Friday, June 26, 2009

पाकिस्तान तबाही की ओर

पाकिस्तान में हालात सुधरने के बजाय बिगड़ रहे हैं, इसका एक और प्रमाण है लाहौर में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र पर आतंकियों का हमला। इस हमले के जरिये पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे कहीं अधिक दुस्साहसी हो गए हैं और कभी भी कहीं पर भी हमला करने में समर्थ हैं।

इस स्थिति के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो पाकिस्तान का सत्ता तंत्र। जब कभी पाकिस्तान पर उंगलियां उठती हैं तो सरकार के स्तर पर इस तरह के बहादुरी भरे बयान देने की होड़ मच जाती है कि हम एक जिम्मेदार देश हैं, हमारे यहां कानून का शासन है और किसी को हमारे आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं दी जा सकती, लेकिन जब आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का सवाल उठता है तो यह प्रतीति कराई जाती है कि उन पर किसी का जोर नहीं-यहां तक कि उस तथाकथित शक्तिशाली सेना का भी नहीं जो खुद को आदर्श सैन्य बल के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रहती है।

स्पष्ट है कि या तो पाकिस्तान में आतंकवाद से लडऩे का इरादा नहीं या फिर वह आतंकी संगठनों को नियंत्रित करने के नाम पर दुनिया की आंखों में धूल झोंक रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकारी स्तर पर आतंकी संगठनों का बचाव नहीं किया जाता और न ही उन्हें नाम बदलकर सक्रिय होने की सुविधा प्रदान की जाती। क्या यह एक तथ्य नहीं कि पिछले कुछ वर्षो में पाकिस्तान ने हर उस आतंकी संगठन पर लगाम लगाने के बजाय उसे नए नाम से सक्रिय होने की छूट दी जिस पर विश्व समुदाय और विशेष रूप से अमेरिका ने नजर टेढ़ी की?

वैसे तो इस तथ्य से अमेरिका भी परिचित है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसे पाकिस्तान के बहाने सुनने में विशेष सुख मिलता है। अभी तक बुश प्रशासन पाकिस्तान के बहाने सुन रहा था। अब यही काम ओबामा प्रशासन कर रहा है और वह भी तब जब एक के बाद एक अमेरिकी अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अभी भी अलकायदा, तालिबान आदि आतंकी संगठनों के साथ है। यदि पाकिस्तान तबाही के रास्ते पर जा रहा है तो इसमें जितना हाथ उसके अपने नेताओं का है उतना ही अमेरिकी नेताओं का भी है।

जिस तरह मुशर्रफ अमेरिका को धोखा देने में समर्थ थे उसी तरह आसिफ अली जरदारी भी हैं। जरदारी पर भरोसा करने का मतलब है, खुद को धोखा देना। वह अपनी कुर्सी मजबूत करने के लिए उन आतंकियों को भी गले लगा सकते हैं जिन पर बेनजीर भुंट्टो की हत्या का संदेह है। यह संभव है कि अमेरिका को पाकिस्तान के मौजूदा सत्ता तंत्र की असलियत समझने में देर लगे, लेकिन आखिर भारत को अब क्या समझना शेष है? जब इसके कहीं कोई संकेत भी नहीं हैं कि पाकिस्तान अपने यहां के आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई कदम उठाएगा तब फिर उसे ऐसा करने की नसीहत देते रहने और हाथ पर हाथ रखकर बैठने का क्या मतलब?

समझदारी का तकाजा यह है कि भारत एक ऐसे पाकिस्तान का सामना करने के लिए तैयार रहे जो विफल होने की कगार पर है। भारत को और अधिक सतर्कता इसलिए भी दिखानी चाहिए, क्योंकि उसकी सीमा के निकट आतंकियों की गतिविधियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं।