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Monday, September 27, 2010

अमरीका को अफगानिस्तान में वियतनाम की हार की याद आ गयी

शेष नारायण सिंह

अमरीका की फौजें अफगानिस्तान में बुरी तरह से फंस गयी हैं . सैनिक इतिहास के जानकार बताते हैं कि अफगानिस्तान में अमरीका की जो जकड़न है, वह उसकी वियतनाम की दुर्दशा से भी भयावह है. मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति के पूर्ववर्ती ,जार्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान में सैनिक कार्रवाई शुरू की थी . पता नहीं किस मुगालते में उन्होंने यह सोच लिया था कि अफगानिस्तान के तालिबान हुक्मरान को ख़त्म करने के लिए उन्हें पाकिस्तान से मदद मिलेगी. अमरीकी नीतिकारों की अक्ल पर पड़े हुए परदे ने उन्हें यह देखने ही नहीं दिया कि पाकिस्तानी फौज की एक शाखा के रूप में काम करने वाले तालिबान के खिलाफ पाकिस्तानी सेना कैसे काम करेगी. तुर्रा यह कि उस वक़्त के अमरीकी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ खुद तालिबान के संरक्षक थे. बहरहाल अरबों अरब डालर खर्च करके अब अमरीका को लगने लगा है कि गलती हो गयी. इस बीच अमरीकी फौज की गफलत के चलते तालिबान फिर से संगठित हो गए हैं और अब अमरीकी सेना के सामने एक बड़ी चुनौती खडी है. पता चला है कि तालिबान के गढ़ , कंदहार और उसके आस पास के इलाकों में तालिबान इतने मज़बूत हो गए हैं कि उनको वहां से हटाने के लिए अमरीकी सेना ने अब तक का सबसे ज़बरदस्त सैनिक अभियान शुरू कर दिया है . पिछले कुछ दिनों में इस इलाके से सोलह अमरीकी सैनिकों के मारे जाने की खबर है . जबकि बहुत सारे सैनिक मारिजुआना के खेतों में छुपे तालिबान लड़ाकों के हमलों के शिकार हुए हैं .नैटो के प्रवक्ता, ब्रिगेडियर जनरल जोसेफ ब्लोट्ज़ बताया कि पिछले एक हफ्ते से अर्घंदाब , ज़हरी और पंजवाई जिलों में तालिबान के सफाए के प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया है .उन्हें उम्मीद है कि लड़ाई ज़बरदस्त होगी. आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि तालिबान ने अपने सबसे मज़बूत ठिकाने, कंदहार में पाँव जमा लिए हैं और उनको वहां से हटाने के बाद ही अफगानिस्तान में अमरीकी फौजों का पलड़ा भारी पडेगा. जहरी जिले के पुलिस प्रमुख बिस्मिल्ला खान ने बताया अमरीकी और अफगान फौजों का हमला पिछले एक हफ्ते से जारी है लेकिन नतीजों के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम.

अफगानिस्तान में अमरीकी मुसीबतों के कारण तालिबान ही नहीं है . वे अपने ही आदमी , राष्ट्रपति हामिद करज़ई से भी परेशान हैं . अमरीका की तरफ से अफगानिस्तान को संभाल रही खुफिया एजेंसी सी आई ए से करज़ई की पटरी नहीं बैठ रही है . सी आई ए ने आरोप लगाया है कि हामिद करज़ई अक्सर टुन्न रहते हैं और ज़्यादातर नशे का सेवन करते रहते हैं .सी आई ए का आरोप है कि जिस अफगानिस्तान में अमरीकी टैक्स का १२० अरब डालर हर साल फूंका जा रहा है ,वहां का राष्ट्रपति अगर नशेड़ी होगा तो कैसे गुज़र होगा. सी आई ए ने यह भी रिपोर्ट दी है कि करज़ई की पागलपन की बीमारी कई बार इतनी ज़बरदस्त हो गयी थी कि उनका इलाज़ करवाना पड़ा था. खबर यह भी है कि वे बहुत ही भ्रष्ट आदमी हैं और उनके कई रिश्तेदार ड्रग्स के कारोबार में लगे हुए हैं और सबको हामिद करज़ई का संरक्षण प्राप्त है . अमरीकी रक्षा विभाग ने कई बार करज़ई को यह सलाह दी है कि वे राजपाट छोड़कर दुबई में जाकर अपना घर बसायें लेकिन अभी करज़ई इसके लिए तैयार नहीं हैं .इस साल की शुरुआत में अफगानिस्तान में अमरीकी राजदूत , पीटर गालब्रेथ ने आरोप लगाया था कि करज़ई मादक दवाओं का सेवन करते हैं और उनका दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता .गालब्रेथ ने कहा था कि उनके पास राष्ट्रपति के आवास के अन्दर रहने वालों की तरफ से सूचना आई थी कि करज़ई हशीश का दम भी लगाते हैं . अपनी चिट्ठी में गालब्रेथ ने मांग की है कि करज़ई के बारे में अमरीका को अपनी नीतियों पर फिर से विचार करना पडेगा. क्योंकि उनकी नज़र में करज़ई बिकुल बेमतलब के आदमी हैं .

उधर पाकिस्तान में भी अमरीकी नीति पूरी तरह से पराजित हो गयी है . पाकिस्तान के उत्तरी इलाकों में तालिबान और अल-कायदा के ज़्यादातर आतंकवादी छुपे हुए हैं . उनके खिलाफ जब अमरीकी सेना ने हमले की योजना बनायी तो उसे पाकिस्तानी सेना को भी साथ लेना पड़ा . पाकिस्तानी सेना पर आई एस आई के असर का नतीजा है कि उस अभियान में शामिल ज़्यादातर सैनिक तालिबान के हमदर्द ही थे और अमरीकी सेना के बारे में तालिबान तक पूरी खबर पंहुचाते थे. ज़ाहिर है अमरीका का यह काम भी बट्टे खाते में ही जाएगा. ऐसी हालत में अब यह साफ़ हो गया है कि अपने अफगानिस्तान के मिशन में अमरीका बुरी तरह से फंस गया है और उसकी हालत वहां वियतनाम से भी खराब होने वाली है . राष्ट्रपति ओबामा इस सारी मुसीबत से बच निकलने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं लेकिन बच निकलने की संभावना बहुत कम है

Wednesday, September 22, 2010

अफगानिस्तान में इंसान को मारकर खुश होते थे अमरीकी सैनिक

शेष नारायण सिंह



अमरीकी फौजियों की वहशत का एक नया मामला सामने आया है . पता चला है कि अफगानिस्तान में तैनात अमरीकी सेना के दूसरे इन्फैंट्री डिवीज़न के पांचवे स्ट्राइकर कोम्बाट ब्रिगेड के कुछ सैनिकों ने एक ऐसा खेल ईजाद किया जिसमें अफगानिस्तान के निर्दोष नागरिकों को मार डालने और बच निकलने को मज़े के लिए खेले जाने वाले एक खेल का रूप दे दिया गया था . इस जालिमाना खेल का और कोई नियम नहीं था . बस कोई बहाना ढूंढ कर किसी निर्दोष अफगान नागरिक को मार डालना था . हर वारदात के लिए नंबर मिलते थे. यह खेल २००७ में १५ जनवरी को शुरू हुआ जब एक अफगान नागरिक ब्रिगेड की कैम्प के पास आया . एक सैनिक ने एक हैण्ड ग्रेनेड फेंक दिया और कहा कि वह अफगान हमला करने की गरज से आया था , बस क्या था ,बाकी लोगों ने गोलियां बरसाना शुरू कर दिया . यह खेल एक महीने तक चलता रहा और बहुत सारे अफगान नागरिक मारे गए. ज़ुल्म का आलम यह था कि इस प्लाटून के सदस्य मरे हुए नागरिकों की लाशों की फोटो खींच कर ट्राफी की तरह रखते थे. एक सैनिक के पास तो एक नरमुंड भी पकड़ा गया है . ऐसा नहीं है कि सेना के अधिकारियों को इसके बारे में मालूम नहीं था. एक अमरीकी नागरिक ने अमरीकी सेना के सर्वोच्च नेतृत्व को इस तरह की पहली ह्त्या बाद ही चेतावनी दे दी थी . उसका अपना ही बेटा इस खेल में शामिल था जिसने अपने पिता को इस सम्बन्ध में जानकारी देते हुए ,शेखी बघारी थी लेकिन सेना के बड़े अधिकारियों ने इस जानकारी को पूरी तरह से नज़रंदाज़ किया था. यहीं नहीं इस सैनिक के पिता को सेना के अधिकारियों ने डांट भी दिया था. इस जघन्य अपराध में शामिल अमरीकियों ने अफगानिस्तान के कंदहार प्रांत में और भी कई आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का काम किया है . उनके ही एक साथी ने जब इस सारे मामले को ऊपर तक पंहुचाने की कोशिश की तो उसे भी ठिकाने लगाने की कोशिश की गयी. अपराधी फौजियों के इस कारनामे की जांच अब अमरीकी सेना कर रही है लेकिन उन्हें अपराधी सैनिकों को सज़ा दिलवाने से ज्यादा चिंता इस बात की है कि कहीं बात खुल न जाए क्योंकि उस हालत में अमरीकी सेना की बहुत बदनामी होगी . अपराधी सैनिकों के घर वाले और उनके वकील अपने बन्दों को निर्दोष बता रहे हैं और औरों के ऊपर आरोप लगा रहे हैं लेकिन बात इतनी गंभीर है कि अपराध के बारे में किसी को शक़ नहीं है . जानकार बाते हैं कि बात के खुल जाने के बाद अमरीकी अधिकारी जांच इस लिए कर रहे हैं कि मामले को रफा दफा किया जा सके. लेकिन अब यह इतना आसन नहीं होगा क्योंकि चश्मदीद गवाहों ने इस मौत के अमरीकी खेल के पहले शिकार की पहचान गुलमुद्दीन नाम के अफगान के रूप में की है ,जो कंदहार प्रांत के मैवंद जिले के ला मोहम्मद काले गाँव का रहने वाला था . वह इस वहशत भरे अपराध का पहला शिकार था इसके बाद क़त्ल का यह सिलसिला चलता रहा और अमरीकी प्रशासन के बड़े फौजियों ने हस्तक्षेप करने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश की. अपराध में शरीक एक अमरीकी सैनिक के पिता ने सारे मामले को बाहर लाने में मदद की , यह अलग बात है कि अब उसकी परेशानियाँ बहुत बढ़ गयी हैं . शुरू में तो उसे अधिकारियों ने टालने की कोशिश की लेकिन बाद में उनकी कोशिश रंग लाई और अब सेना ही जांच कर रही है . बात मीडिया की नज़र में है इसलिए दब जाने की कोई संभावना नहीं है . जब अमरीका ने आज से करीब ९ साल पहले अफगानिस्तान का अभियान शुरू किया था तो जानकारों ने कहा था कि यह अमरीका के लिए वियतमान से भी ज्यादा मुश्किल सैनिक अभियान साबित होगा लेकिन उन दिनों अमरीकी राष्ट्रपति , बुश जूनियर के पास ब्रिटेन के प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर थे जो बुश की हर बात को सही साबित करने के लिए व्याकुल रहते थे. बहर हाल अमरीका ने जिस मकसद को घोषित करके अफगानिस्तान पर हमला किया था वहां तक पंहुचने की तो कोई संभावना ही नहीं है . क्योंकि अल कायदा और उसके मातहत काम करने वाले तालिबान पहले से ज्यादा मज़बूत हो गए हैं जबकि अमरीका अफगानिस्तान की लड़ाई में रोज़ ही शिकस्त झेल रहा है .अब तो मानवाधिकारों के क्षेत्र में इतनी नीच गतिविधियों में शामिल अपने फौजियों को लेकर अमरीकी सेना कहाँ मुंह छुपाएगी.

जहां तक अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले की बात है ,उसे तो अब कोई सही नहीं मानता लेकिन इस हमले से हुए अमरीकी नुकसान का आकलन कर पाना अपने आप में एक कठिन काम है . इस लड़ाई में अमरीकी सेना के बहुत ज्यादा सैनिक मारे गए हैं , बहुत ज़्यादा धन लगा है और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले एक मुल्क को बहुत बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देनी पड़ी है . लेकिन उस वक़्त के अमरीकी राष्ट्रपति बुश को आम तौर पर मंदबुद्धि इंसान मान जाता है . उन्होंने इस मूर्खता पूर्ण अभियान की शुरुआत की थी जिसे आने वाले वक़्त में अमरीकी जनता भोगेगी.

Thursday, July 22, 2010

अफगानिस्तान में भारत की विदेशनीति की धज्जियां उड़ रही हैं

शेष नारायण सिंह


प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह इस बात पर ब जिद हैं कि पाकिस्तान से रिश्ते सुधारना ज्यादा ज़रूरी है और उसके लिए वे ईमानदारी से कोशिश भी कर रहे हैं . लेकिन पाकिस्तान की सत्ता पर बैठे लोगों की प्राथमिकता कुछ और है . उनकी कोशिश है कि भारत से रिश्ते ठीक तो किये जायेगें लेकिन पहले अफगानिस्तान में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली जाए. इधर भारत की कोशिश है कि वह मुंबई पर हुए हमलों के लिए पाकिस्तान को घेर कर हाफ़िज़ मुहम्मद सईद को बेकार बना दे. क्योंकि अगर हाफ़िज़ सईद को आतंक के प्रोजेक्ट की चौधराहट से हटा दिया जाए तो पाकिस्तान में मौजूद भारत विरोधी आतंक का ढांचा बहुत ही कमज़ोर हो जाएगा. अब भारत की इच्छा को सम्मान देने के लिये तो पाकिस्तानी सेना अपने इतने महत्वपूर्ण सहयोगी की कुर्बानी तो देगी नहीं .पाकिस्तान ने देखा है कि आतंक की ब्लैकमेल के ज़रिये ही उसने अफगानिस्तान में अपना मकसद हासिल कर लिया और भारत को हाशिये पर लाने को मजबूर कर दिया. केंद्र में बी जे पी सरकार के दौरान बहुत ज्यादा असर रखने वाले कुछ कूटनीतिक चिंतकों की राय है कि भारत को पाकिस्तान के खिलाफ पख्तूनों की नाराज़गी का इस्तेमाल करना चाहिए और उनमें मौजूद तालिबान को भी अपने साथ लेने की कोशिश करनी चाहिए. जिस से पाकिस्तान को मजबूर हो कर भारत को अफगानिस्तान में कुछ स्पेस देना पड़े . लेकिन इस तरह की कूटनीति में भारत के हाथ कई बार जल चुके हैं और वह दुबारा वही गलती नहीं करना चाहता जो श्रीलंका में नटवर सिंह और रोमेश भंडारी की टोली ने केंद्र सरकार से करवा लिया था .डॉ मनमोहन सिंह को पक्का भरोसा है कि पख्तूनों को पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करने की सोच से बचना हे एथीक होगा .

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर तो विवाद शुरू से चल रहा है लेकिन दोनों के बीच के कूटनीतिक सम्बन्ध आजकल अफगान एजेंडे से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं . पाकिस्तान की कोशिश है कि अफगानिस्तान से भारत को दूर रखा जाए . और अपने इस मिशन में पाकिस्तान काफी हद तक सफल भी हो रहा है .रविवार को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक व्यापार समझौता हुआ जिसके हिसाब से भारत पर वागा बार्डर के रास्ते कोई भी सामान अफगानिस्तान भेजने की मनाही है . समझौते में लिखा है कि अफगानिस्तान को इस बात की आज़ादी है कि वह वागा के रास्ते कोई भी सामान निर्यात कर सकता है लेकिन उसे उस रास्ते से कुछ भी अपने देश में लाने की अनुमति नहीं दी जायेगी .यह समझौता अमरीका के आशीर्वाद से किया गया है . जब समझौते पर दस्तखत हो रहे थे अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीकी हितों की देखभाल करने वाले अमरीकी अफसर रिचर्ड हालब्रुक वहां मौजूद थे.इस समझौते पर कई वर्षों से काम हो रहा था. अफगानिस्तान से भारत को भगाने की पाकिस्तानी नीति की जीत का यह एक बड़ा मुकाम है . परंपरागत रूप से पाकिस्तान की मौजूदगी अफगानिस्तान में रहती रही है . लेकिन तालिबान के नेता मुल्ला उमर की सत्ता ख़त्म होने के बाद पाकिस्तान बैकफुट पर आ गया था. ओसमा बिन लादेन की तलाश में अमरीकी राष्ट्रपति अफगानिस्तान पंहुच गए थे और पाकिस्तानी हुकूमत के लिए वहां की सत्ता पर काबिज़ तालिबान को छोड़ देना मुश्किल था . तालिबान की सैनिक तबाही के बाद युद्ध के बाद बर्बाद हो चुके अफगानिस्तान को फिर से बसाने की कोशिश शुरू हो गयी. भारत की कोशिश थी कि अमरीका और तालिबान में दुश्मनी की वजह से वह अमरीकी आशीर्वाद से अफगानिस्तान में अपने एमौजूदगी मुकम्मल करे . इस दिशा में काम भी शुरू हुआ लेकिन पाकिस्तानी सेना को यह नागवार गुज़र रहा था. उसको अफगानिस्तान पूरा का पूरा चाहिए. जानकार बताते हैं कि इसीलिये भारत के दूतावास समेत अन्य भारतीय ठिकानों पार आतंकवादी हमले कराये गए. इस बात में कोई शक़ नहीं है कि अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान और पाकिस्तानी सेना में गहरे सम्बन्ध हैं . वास्तविकता तो यह है कि तालिबान का गठन पाकिस्तानी सेना के सामरिक लाभ के लिए ही किया गया था . जब तक्तालिबान का क़ब्ज़ा अफगानिस्तान पर रहा , उसे पाकिस्तानी सेना का क़ब्ज़ा ही माना जाता था . इसलिए अमरीका के इस आग्रह को पाकिस्तानी सेना ने कभी गंभीरता से नहीं लिया जिसके तहत अमरीका उम्मीद कर रहा था कि पाकिस्तान की सेना तालिबान को तबाह करने में अमरीकी सेना की मदद करेगी. . इस वक़्त दक्षिण एशिया में जो कूटनीतिक माहौल है उसमें अफगानिस्तान सबसे महत्व पूर्ण है . अमरीका पूरी तरह से अफगानिस्तान में गले तक डूबा हुआ है. भूराजनैतिक दबदबे के लिए चीन भी अफगानिस्तान में दखल चाहता है . उसकी कोशिश है कि वह पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान में अपने पाँव जमाये . इसीलिये वह पाकिस्तान को समझा रहा है कि ज्यादा से जादा अफगान प्रोएक्ट हथियाए . जहाना तक काम को पूरा करने की बात है , वह पाकिस्तान के बस की बात नहीं है ,उसे चीन पूरा कर देगा लेकिन ऐसा करके वह अफगानिस्तान में भारत को प्रभाव नहीं बढाने देगा और कुछ हद तक अमरीका को थाम सकेगा.

इतनी पेचीदा कूटनीतिक लड़ाई में अब तक की जो हालात हैं , उसमें सबसे ताक़तवर खिलाड़ी के रूप में पाकिस्तानी फौज के मुखिया ,जनरल अशफाक परवेज़ कयानी को देखा आ रहा है . पाकिस्तान की तथाकथित सिविलियन सरकार उनकी मुट्ठी में है . वे बीच रास्ते फैसले बदलवा देते हैं और प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री को डांट तक देते हैं . भारत -पाक विदेश मंत्री स्तर की बातचीत को जिस तरह से उन्होंने बेमतलब किया है उसे दुनिया ने देखा है . यह अलग बात है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी इस पूरी घटना के बाद एक जोकर के रूप में पेश किये जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि उनकी बेचारे की औकात ही वही है . ऐसी हालत में पाकिस्तान को दुरुस्त करने की कोशिश में वहां नए भस्मासुर पैदा करने की कोशिश से भारत को बच कर रहना चाहिए क्योंकि अगर तालिबान की मदद से पाकिस्तानी फौज अमरीका और भारत को डराना चाहती है तो यह बेवकूफी की कूटनीति है और इसका नुकसान बाद में पाकिस्तान को ही होगा .

Thursday, May 27, 2010

हाफ़िज़ सईद पाकिस्तानी फौज़ का भाग्यविधाता है

(दैनिक जागरण से साभार )

शेष नारायण सिंह

मुंबई हमलों के सरगना हाफ़िज़ मुहम्मद सईद को पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने रिहा कर दिया है . अदालत ने कहा कि सरकार हाफ़िज़ सईद के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं पेश कर सकी है इस लिए उसे हिरासत में रखने का कोई आधार नहीं है . पाकिस्तानी सरकार में किसी की भी औकात नहीं है कि वह हाफिज़ सईद के खिलाफ कोई कार्रवाई करे... .हाफ़िज़ मुहम्मद सईद के खिलाफ कार्रवाई करना इसलिए भी मुश्किल होगा क्योंकि आज पकिस्तान में आत्नक का जो भी इंतज़ाम है , वह सब उसी सईद का बनाया हुआ है . उसकी ताक़त को समझने के लिए पिछले ३३ वर्षों के पाकिस्तानी इतिहास पर एक नज़र डालना ठीक रहेगा. पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह , जिया उल हक ने हाफिज़ सईद को महत्व देना शुरू किया था . उसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में पूरी तरह से किया गया लेकिन बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ ने उसे कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल किया . और वह से पाकिस्तानी प्रशासन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया सब को मालूम है कि पाकिस्तान में हुकूमत ज़रदारी या गीलानी की नहीं है . . यह बेचारे तो अमरीका से लोक तंत्र बहाली के नाम पर पैसा ऐंठने के लिए बैठाए गए हैं . वहां सारी हुकूमत फौज की है और हाफिज़ सईद फौज का अपना बंदा है. फौज और आईएसआई में कोई फर्क नहीं है. सब मिलकर काम करते हैं और पाकिस्तान की गरीब जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं .हाफिज़ सईद की हैसियत का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जनरल जिया के वक़्त से ही वह फौज में तैनाती वगैरह के लिए सिफारिश भी करता रहा है और पाकिस्तान के बारे में जो लोग जानते हैं उनमें सब को मालूम है कि पकिस्तान में किसी भी सरकारी काम की सिफारिश अगर हाफिज़ सईद कर दे तो वह काम हो जाता है . यह आज भी उतना ही सच है . इसका मतलब यह हुआ कि जिन लोगों पर हाफिज़ सईद ने अगर १९८० में फौज के छोटे अफसरों के रूप में एहसान किया था, वे आज फौज और आई एस आई के करता धरता बन चुके होंगें . और वे हाफिज़ सईद पर कोई कार्रवाई नहीं होने देंगें.


यानी अगर पाकिस्तान पर सही अर्थों में दबाव बनाना है तो सबसे ज़रूरी यह है कि फौज में जो हाफ़िज़ सईद के चेले हैं उन्हें अर्दब में लिया जाए. इसका एक तरीका तो यह है उनकी फौज के ताम झाम को कमज़ोर किया जाए. इस मकसद को हासिल करने के लिए ज़रूरी है उनकी फौज को अमरीका से मिलने वाली मदद पर फ़ौरन रोक लगाई जाए. यह काम अमरीका कर सकता है और उसे करना भी चाहिए क्योंकि अब तक तो पाकिस्तानी आतंक का सबसे बड़ा नुकसान भारत ही झेल रहा है लेकिन अमरीका पर भी अब पाकिस्तानी आतंकवादियों की टेढ़ी नज़र है क्योंकि पिछले दिनों टाइम्स स्क्वायर में बम विस्फोट करने की कोशिश में जो आदमी पकड़ा गया है वह पूरी तरह से पाकिस्तानी फौज की पैदाइश है . ऐसी हालत में अगर अमरीका की सहायता पर पाल रहे पकिस्तान को अमरीका सहायता बंद कर दी जाए तो पाकिस्तान पर दबाव बन सकता है लेकिन इस सुझाव में भी कई पेंच हैं . .पाकिस्तान के गरीब लोगों को बिना विदेशी सहायता के रोटी नहीं दी जा सकती है क्योंकि वहां पहले प्रधान मंत्री लियाकत अली के क़त्ल के बाद से विकास का काम बिलकुल नहीं हुआ है .पहली बार जनरल अयूब ने फौजी हुकूमत कायम की थी, उसके बाद से फौज ने पाकिस्तान का पीछा नहीं छोडा. आज वहां अपना कुछ नहीं है सब कुछ खैरात में मिलता है इस सारे चक्कर में पकिस्तान का आम आदमी सबसे ज्यादा पिस रहा है. इसलिए विदेशी सहायता बंद होने की सूरत में पाकिस्तानी अवाम सबसे ज्यादा परेशानी में पड़ेगा क्योंकि ऊपर के लोग तो जो भी थोडा बहुत होगा उसे हड़प कर ही लेगें ..इस लिए यह ज़रूरी है कि पाकिस्तान को मदद करने वाले दान दाता देश साफ़ बता दें कि जो भी मदद मिलेगी, जिस काम के लिए मिलेगी उसे वहीं इस्तेमाल करना पड़ेगा. आम पाकिस्तानी के लिए मिलने वाली राशि का इस्तेमाल आतंकवाद और फौजी हुकूमत का पेट भरने के लिए नहीं किया जा सकता. इसके लिए दान करने वाले देशों को अपना इन्स्पेक्टर तैनात करने के बारे में भी सोचना चाहिए ..अमरीका और अन्य दान दाता देशों के लिए इस तरह का फैसला लेना बहुत मुश्किल पड़ सकता है लेकिन असाधारण परिस्थतियों में असाधारण फैसले लेने पड़ते हैं

ऐसी हालात में आतंकवाद के सबसे बड़े माहिर, हाफिज़ सईद पर कार्रवाई करने की उम्मीद करना भी बेकार की बात है जब तक उस व्यवस्था पर लगाम न लगाई जाए जो उसे चला रही है. और उस व्यवस्था का नाम है पाकिस्तानी फौज और आई एस आई .पाकिस्तान से आतंकवाद का ताम झाम हटाने के लिए फौज को कमज़ोर करना पड़ेगा और यह काम केवल भारत का ज़िम्मा नहीं है. पाकिस्तानी आतंकवाद का नुकसान सबसे ज्यादा भारत को हो रहा है, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन अब तो अमरीका भी उसी कतार में खड़ा हो गया है जिसमें पाकिस्तान की ज़मीन से शुरू होने वाले आतंक को भोग रहे भारत और अफगानिस्तान खड़े हैं .. इस लिए सबको मिलकर पाकिस्तानी फौज को तमीज सिखानी होगी. क्योंकि ज़रदारी या गिलानी तो मुखौटा हैं . असली खेल की चाभी फौज और आई एस आई के पास ही है . जब तक फौज को घेरे में न लिया जाएगा , हाफ़िज़ साई दक कुछ नहीं बिगड़ेगा . यहाँ यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हाफ़िज़ सईद की ताक़त के सामने पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट भी कोई हैसियत नहीं है .