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Wednesday, October 20, 2010

वंशवादी राजनीति देश के नौजवान को अलग थलग कर देगी

शेष नारायण सिंह

मुंबई में दशहरा के दिन शिव सेना के नेता बाल ठाकरे ने अपनी पार्टी में अपने और अपने बेटे के बाद तीसरी पीढी को भी राजनीति में शामिल कर लिया है और उसे अपने वंश का उत्तराधिकारी बनाने का अघोषित सन्देश जारी कर दिया है . इस तरह से वंशवाद की राजनीति के एक पुराने विरोधी ने धृतराष्ट्र की तरह पुत्र मोह की बेदी पर अपने आपको कुरबान कर दिया है . देश के भविष्य को सबसे बड़ा ख़तरा वंशवादी राजनीति से है . वंशवाद की राजनीति राष्ट्र की मुख्यधारा से नौजवानों के एक बड़े वर्ग को अलग कर सकने की क्षमता रखती है . देश में अपने बच्चों को की अपनी राजनीतिक विरासत थमा देने की राजनीति फिर से सामंती व्यवस्था लागू करने जैसा है . पिछले एक हज़ार साल के इतिहास पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि राजपरिवारों की बातों में देश का आम आदमी नहीं शामिल होता था. राजा महाराजा आपस में लड़ते रहते थे. उनकी लड़ाई में उनके निजी स्वार्थ मुख्य भूमिका निभाते थे. इसलिए आमआदमी को कोई मतलब नहीं रहता था. भारत की एकता का सूत्र उसकी संस्कृति और उसकी धार्मिक परम्पराएं थी. राजनीति पूरी तरह से वंशवाद की भेट चढ़ चुकी होती थी. देश एक रहता था और सामंत लड़ते रहते थे . महात्मा गाँधी ने यह सब बदल दिया . जब वे कांग्रेस में आये तो कांग्रेस एक तरह से अंग्रेजों से छूट मांगने का फोरम मात्र था लेकिन महात्मा गाँधी ने कांग्रेस को जन आकांक्षाओं से जोड़ दिया और १९२० में पूरा देश महात्मा गाँधी के साथ कहदा हो गया. महातम अगंधी ने पूरे देश में यह सन्देश पंहुचा दिया कि आज़ादी के लड़ाई किसी एक राजा ,एक वंश या एक खानदान के हितों के लिए नहीं लड़ी जा रही थी , वह भारत के हर आदमी की अपनी लड़ाई थी . और पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया. अपने किसी बच्चे को महात्मा गाँधी ने राजनीति में महत्व नहीं दिया . यह परंपरा आज़ादी मिलने के शुरुआती वर्षों में भी थी. जवाहरलाल नेहरू की बेटी , इंदिरा गाँधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं , वे राजनीति में भूमिका भी अदा करना चाहती थीं लेकिन आज़ादी की लड़ाई की जो गतिशीलता थी, उसके दबाव में जवाहरलाल नेहरू की भी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि वे इंदिरा गाँधी को अपने वारिस के रूप में पेश करते. उनकी मौत के बाद स्व लाल बहादुर शास्त्री ने इंदिरा गाँधी को पहली बार मंत्री बनाया था . लेकिन इंदिरा गाँधी में आजादी की महान परम्पराओं के प्रति वह सम्मान नहीं था . उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में शामिल किया और उसे मनमानी करने की पूरी छूट दी और भारतीय राजनीति में वंशवाद की बुनियाद रख दी. संजय गाँधी की याद इस देश के राजनीतिक इतिहास के उस अध्याय में की जायेगी जिसमें यह बताया जायेगा कि कांग्रेस ने महात्मा गाँधी की राजनीतिक मान्यताओं को कैसे तिलांजलि दी थी.. संजय गांधी की राजनीतिक ताजपोशी का बहुत सारे कांग्रेसियों ने विरोध भी किया था लेकिन वे सब इतिहास के डस्टबिन के हवाले हो गए. संजय गांधी को इंदिरा गाँधी ने १९८० में जितनी ताक़त दी थी , उतनी समकालीन इतिहास में किसी के पास नहीं थी. संजय गाँधी की राजनीतिक ताजपोशी की सफलता के बाद बाकी पार्टियों में भी यही ज़हर फैल गया .. मुंबई में शिव सेना की तीसरी पीढी की ताजपोशी उसी वंशवादी राजनीति का सबसे ताज़ा उदाहरण है .
इस दशहरे के दिन मुंबई में जो हुआ , उसके पहले बहुत सारी पार्टियों के नेता अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित कर चुके हैं और ज्यदातर ऐसे नेताओं की दूसरी तीसरी पीढी राजनीति के चरागाह में मौज उड़ा रही है . दक्षिण से लेकर उत्तर तक लगभग हर बड़े नेता के बच्चे बिलकुल नाकारा होने के बावजूद राज कर रहे हैं . करूणानिधि, शरद पवार , जी के मूपनार , करुणाकरण, राजशेखर रेड्डी, एन टी रामाराव ,बीजू पटनायक , लालू प्रसाद यादव , मुलायम सिंह यादव , चौधरी चरण सिंह , देवी लाल, बंसी लाल , भजन लाल, शेख अब्दुल्ला, प्रकाश सिंह बदल , सिंधिया परिवार, कांग्रेस में लगभग सभी नेता ,इस मर्ज़ के शिकार हैं. अभी पिछले दिनों बिहार से खबर आई थी कि बी जे पी के प्रदेश अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वे अपने बेटे को टिकट नहीं दिलवा पाए थे. देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में तो वंशवाद है ही.ज़ाहिर है कि हालात बहुत खराब हैं और अपने वंश जो कायम करने की बेसब्री में बहुत सारे नेता देश की राजनीतिक संस्थाओं का बहुत अपमान कर रहे हैं . अगर यही हालत चलती रही तो देश के नौजवानों की बहुत बड़ी संख्या राजनीति में रूचि लेना बंद कर देगी और देश की एकता और अखंडता को भारी ख़तरा पैदा हो जाएगा. जिन देशों में कुछ खानदानों के लोग ही सत्ता पर काबिज़ रहते हैं , उनके हस्र को देखना दिलचस्प होगा. पड़ोसी देश नेपाल के अलावा इस सन्दर्भ में उत्तर कोरिया का उदाहरण दिया जा सकता है अगर देश के सभी लोग देश की भलाई में साझी नहीं किये जायेगें तो देश का भला नहीं होगा. वंशवादी राजनीति आम आदमी को सत्ता से भगा देने की एक साजिश है और उसका विरोध किया जाना चाहिये

Monday, February 15, 2010

पवार और बाल ठाकरे की दोस्ती पर भारी पड़ी मुंबई की जनता

शेष नारायण सिंह

शिव सेना की राजनीति का आख़री दौर शुरू हो गया है. एक हफ्ते में लगातार दो बार उनके इलाकाई नेता पुलिस के हाथों विधिवत पीटे गए हैं . अक्खी मुंबई में शिव सेना छाप बकैती का कोई पुछत्तर नहीं है .जिस कांग्रेस ने उसे शुरू करवाया और बाकायदा मदद की , उसके सभी नेता पल्ला झाड चुके हैं . सबसे अजीब बात तो यह है कि अपने विरोधियों की सियासी चमक को फीका करने के लिए पिछले ३० वर्षों से शिव सेना का इस्तेमाल कर रहे शरद पवार ने भी अपने ताज़ा बयान में शिव सेना से पिंड छुडाने की कसरत शुरू कर दी है .यह अलग बात है कि राहुल गाँधी वाली धुनाई के दिन ही शिव सेना वालों के हौसले पस्त हो गए थे . शिव सेना के युवराज अपनी बिल में विराजमान थे और उनके चचेरे भाई बहुत ही अदब से बात कर रहे थे . शिव सेना के संस्थापक को औकातबोध हो चुका था और वे भीगी बिल्ली के रूप में अपने घर के अन्दर छुप गए थे. कहीं कोई बयान नहीं था . ऐसी हालत में मुंबई में अराजकता फैला कर सियासत करने वाले ,केंद्रीय कृषि मंत्री, शरद पवार ने बाल ठाकरे के घर जाकर फर्शी सलाम बजाया . उनकी मंशा यह थी कि शिव सेना वालों को भड़काया जाए क्योंकि अगर मुंबई में अमन-चैन कायम हो गया तो उनकी राजनीतिक रौनक कमज़ोर पड़ जायेगी. . उनकी इस यात्रा से घर के अन्दर दुबके , बाल ठाकरे की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने एक निहायत ही कमजोर विकेट पर खेलने के फैसला कर लिया. उन्होंने एक लोकप्रिय अभिनेता के खिलाफ मर्चा खोल दिया और १२ फरवरी को रिलीज़ होने वाली उसकी फिल्म के खिलाफ मैदान ले लिया . क्रिकेट के खेल का एक नियम है कि जब किसी मज़बूत खिलाड़ी के सामने कोई लूज़ बाल फेंकी जाती है तो एक ज़ोरदार छक्का लगता है ..लेकिन सियासत की क्रिकेट के नियम कुछ अलग हैं . इस खेल में जब कोई भी खिलाड़ी लूज़ बाल फेंकता है तो सैकड़ों छक्के लगते हैं और कई बार तो इस एक लूज़ बाल की वजह से उसकी टीम ही हार जाती है . मातोश्री जाकर बाल ठाकरे को भड़काने की शरद पवार की भड़ी में आकर शिव सेना ने वही बेवकूफी कर दी और अब शिव सेना मुंबई शहर में पूरी तरह से अलग थलग पड़ गयी है... मुसीबत में पड़े किसी भी साथी को मंझधार में छोड़ देने के खेल के उस्ताद, शरद पवार ने भी अब शिव सेना से पिंड छुडाने की कोशिश शुरू कर दी है ..

अब तक होता यह था कि शिव सेना का इस्तेमाल कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के नेता उन कामों के लिए करते थे , जो वे कानून के दायरे में रह कर खुद नहीं कर सकते थे .मुंबई के ट्रेड यूनियन आन्दोलन में कम्युनिस्टों की हैसियत को कम करने के लिए उस वक़्त के कांग्रेसी नेताओं ने एक मामूली कार्टूनिस्ट को आगे करके शिवसेना की स्थापना करवाई थी. उस दौर के कांग्रेसी ही शिवसेना के संरक्षक हुआ करते थे . परेल के विधायक सुभाष देसाई का मुंबई के ट्रेड यूनियन हलकों में ख़ासा दबदबा था . वे कम्युनिस्ट थे . १९७० में उनकी हत्या कर दी गयी . आरोप शिव सेना पर लगा लेकिन जानकार बताते हैं कि उस वक़्त की कांग्रेसी सरकार ने शिव सेना प्रमुख को साफ़ बचा लिया .. बात में दत्ता सामंत के खिलाफ भी शिव सेना का इस्तेमाल किया गया . उनके नेतृत्व वाली ट्रेड यूनियनों को सरकार ने ख़त्म किया और मुंबई का औद्योगिक नक्शा बदल दिया . जब कामगारों में शिव सेना की ताक़त बढ़ी तो मजदूरों के साथ साथ मिल मालिकों से भी वसूली जोर पकड़ने लगी और शिव सेना ने बाकायदा हफ्ता वसूली का काम शुरू कर दिया...यहाँ समझने वाली बात यह है कि जब दत्ता सामंत पर शिव सेना भारी पड़ी और उनकी हत्या हुई ,उस दौर में शरद पवार एक राजनीतिक ताक़त बन चुके थे . वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन चुके थे .तब से अब तक शिवसेना के मुखिया बाल ठाकरे और शरद पवार की दोस्ती का सिलसिला जारी है और दोनों हमेशा एक दूसरे के काम आते रहे हैं ..मौजूदा दौर में भी उनकी कोशिश यही थी कि शिवसेना का इस्तेमाल करके दिल्ली में अपने आप को महत्वपूर्ण बनाए रखें लेकिन उनकी बदकिस्मती है कि आजकल दिल्ली में राज करने वाला कोई लल्लू नहीं है . दिल्ली में सोच समझ कर फैसले लेने की परंपरा शुरू हो गयी है . शायद इसी लिए जब वे बाल ठाकरे को चने की झाड पर चढ़ा कर वापस लौटे तो दिल्ली वालों ने बाल ठाकरे के लोगों की धुनाई की योजना बना ली. बेचारे बाल ठाकरे अपने घर में बैठ कर शरद पवार को गरिया रहे हैं और उनकी समझ में नहीं आ रहा है अब क्या करें ? क्योंकि यह बात सारी दुनिया जानती है कि अगर गुंडे से लोग डरना बंद कर दें तो उसकी दूकान बंद हो जाती है . शिव सेना में काम करने वालों को कोई तनख्वाह तो मिलती नहीं , उनका खर्चा- पानी तो मोहल्ले और झोपड़-पट्टी में वसूली से ही चलता है . जब गरीब आदमी शिव सेना के मुकामी कार्यकर्ता से डरना बंद कर देगा तो उसे पैसा क्यों देगा. और अगर शिव सैनिक होने के बावजूद शहरी लुम्पन को खाने पीने की तकलीफ होने लगेगी तो वह शिव सेना के साथ क्यों रहेगा .वह कोई और रास्ता देखने के लिए मजबूर हो जाएगा. . यहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि शिव सेना की न्युसांस वैल्यू ख़त्म होने के बाद बाल ठाकरे और उनका कुनबा तो पैदल हो ही जाएगा, शरद पवार की सियासत भी बहुत कमज़ोर हो जायेगी.

महाराष्ट्र की राजनीति का कोई भी जानकार बता देगा कि महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार की ताक़त में जब भी वृद्धि हुई, उसी दौर में राज्य और राजधानी मुंबई में शिव सेना को मजबूती मिली. १९७८-७९ से शुरू हुआ यह सिलसिला आज तक चल रहा है. १९९२-९३ के मुंबई दंगों के दौरान तो उस वक़्त के महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री सुधाकर राव नाईक ने श्रीकृष्ण कमीशन के सामने बयान दिया था कि तत्कालीन रक्षा मंत्री, शरद पवार ने सेना की तैनाती में अड़चन लगाई जिस से कि शिव सेना के दंगाई गुंडे उन इलाकों में लूट,आगज़नी और क़त्ल का नंगा कर सकें जहां बड़ी संख्या में मुसलमान रहते थे .. उसके बाद भी जब भी मौक़ा मिलता है ,शरद पवार शिव सेना की मदद करते रहते हैं . यह अलग बात है कि इस बार शिव सेना को आगे बढाने की उनकी कोशिश को सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह ने पकड़ लिया और वे आजकल अपने घाव चाटते देखे जा रहे हैं .. शिव सेना ने भी उनकी हमेशा मदद की है पिछले दिनों जब प्रधान मंत्री पद एक लिए शरद पवार की दावेदारी की बात चली थी, शिवसेना के मुखिया बाल ठाकरे खुल कर उनके पक्ष में आ गए थे ..

लेकिन एक फिल्म की रिलीज़ जैसे मुद्दे पर अपना सब कुछ दांव पर लगा देने की बेवकूफी कर के शिव सेना ने अपना सर्वनाश कर लिया है .. शाहरुख खान की फिल्म की मुखालिफत करके शिवसेना की अपनी गुंडई वाली ज़मीन को वापस लेने की कोशिश बहुत महंगी पड़ गयी है .और एक बार साफ़ हो गया है कि अब मुंबई की जनता के ऊपर ,शिवसेना के बड़े से बड़े नेता की घुड़की का कोई असर नहीं पड़ने वाला है ..वरना दादर इलाके में लोगों को घरों में बैठे रहने की नसीहत देने वाले पूर्व मुख्यमंत्री, मनोहर जोशी की बात पर लोग विचार करते.जो ११ फरवरी को घूम घूम कर कह रहे थे कि अगर पत्थर न खाना हो तो १२ फरवरी को सड़क पर न निकलें .. जो आदमी महाराष्ट्र का मुख्य मंत्री रह चुका हो और लोकसभा का अध्यक्ष रह चुका हो उसे सड़क छाप गुंडों की तरह लोगों को धमकाते देख कर मन में बहुत तकलीफ होती है . लेकिन सच्चाई यह है कि यही शिवसेना की सियासत है और इसी के सहारे उसकी दाल रोटी चलती है . लेकिन इस देश के लोक तंत्र और राजनीति में काम करने वाले लोगों के लिए यह शर्म की बात है कि शरद पवार जैसा राष्ट्रीय स्तर का नेता भी शिव सेना की दादागीरी के खेल में शामिल हो कर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करता है ..बहरहाल जो भी हुआ,एक बात तो पक्की है कि शाहरुख खान की फिल्म के बाद हुए घटनाक्रम से साफ़ हो गया है कि अब शिव सेना को गंभीरता से लेने वालों की संख्या में बहुत बड़ी कमी आई है .

Sunday, February 14, 2010

तबाह शिवसेना के कार्यकर्ताओं को मुख्य धारा में लाने की ज़रुरत

शेष नारायण सिंह

पहली बार मुंबई की सडकों पर शिव सेना अपमानित हुई है . इसके पहले कभी भी ऐसा दिन नहीं देखा था... परेल और दादर के औद्योगिक इलाकों में १९७० के आस पास इनकी ताक़त का अहसास होने लगा था . कम्युनिस्ट विधायक, कृष्णा देसाई की हत्या के बाद तो बहुत बड़ी संख्या में मिल मजदूर शिव सेना वालों से डरने लगे थे . दत्ता सामंत की हत्या के बाद से यह संगठन मुंबई और उसके उप नगरों में सबसे ताक़तवर जमात के रूप में माना जाने लगा था. बेरोजगार युवकों की टोलियाँ उन दिनों जार्ज फर्नांडीज़ के साथ भी जुड़ रही थीं लेकिन वहां पैसा-कौड़ी नहीं था लिहाजा ज़्यादातर नौजवान शिव सेना से जुड़ने लगे. आज तक यही हाल था . मोहल्ले में लोग शिव सेना के युवकों से डरते थे और चंदा देते थे . कांग्रेस और बी जे पी की सरकारें कभी भी शिव सैनिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करती थीं. कभी कोई वारदात होती थी तो मुंबई पुलिस कुछ देर थाने में बैठाकर छोड़ देती थी . शायद इसी लिए शिव सेना में भर्ती होना राजनीति के साथ साथ आर्थिक विकास और मुकामी सम्मान का भी रास्ता माना जाता था लेकिन पिछले १० दिनों में सब कुछ बदल गया . राहुल गाँधी की यात्रा और उनके पारिवारिक मित्र ,शाहरुख खान की फिल्म को हिट करवाने के चक्कर में महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार की पुलिस ने शिव सैनिकों को खूब पीटा. शरद पवार की पार्टी का उप मुख्यमंत्री भी उन्हें बचा न सका . पहली बार मुंबई की सडकों पर सरकार के हाथों शिव सैनिक पिटा है. जिसका नतीजा यह है कि वह निराश है . बाल ठाकरे की अपने बन्दों को बचा सकने की योग्यता पर पहली बार सवाल उठा है . ज़ाहिर है कि बड़ी संख्या में नौजवान हताशा का शिकार हुआ है ..यह नौजवान बिलकुल निर्दोष है . इसे सामाजिक जीवन में जीने और अपने नेता की बात मानने की आदत पड़ चुकी है . इसको फिर से किसी राजनीतिक जमात में शामिल किये जाने की ज़रुरत है . इस लिए मुम्बई में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वे इन नौजवानों को अपने साथ ले कर इनका राजनीतिक पुनर्वास करें..अगर ऐसा न हुआ तो यह नौजवान किसी ऐसे संगठन में भी शामिल हो सकते हैं जिसके देशप्रेम का रिकॉर्ड संदिग्ध हो..इस लिए कांग्रेस, बी जे पी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तुरंत यह घोषणा कर देनी चाहिए कि अगर शिव सेना से निराश नौजवान चाहें तो उनको सम्मान पूर्वक मुख्य धारा की इन पार्टियों में शामिल किया जाएगा. . यह बहुत ज़रूरी है क्योंकि शिव सेना के मालिकों की नीति कुछ भी हो , मराठी बेरोजगार नौजवान तो उनके साथ देश और समाज की सेवा के लिए जुडा था. उसका इस्तेमाल इन लोगों ने गलत काम के लिए कर लिया तो नौजवान का कोई दोष नहीं है .इस लिए उसे बदमाशी की राजनीति से बाहर लाकर मुख्य धारा में शामिल करने का यह अवसर गंवाया नहीं जाना चाहिए . सवाल उठ सकता है कि इन गुमराह नौजवानों को राजनीति के पचड़े से दूर रख कर किसी रचनात्मक काम में लगा दिया जाए तो ज्यादा उपयोगी होगा . लेकिन इस तर्क में बुनियादी दोष है . पिछले १५-२० साल से जो लडके राजनीति में काम कर रहे हैं ,उन्हें और किसी भी काम में लगाना खतरे से खाली नहीं है .अव्वल तो राजनीति में शामिल ज़्यादातर नौजवानों के पास कोई ख़ास योग्यता नहीं होती और अगर होगी भी तो इतने दिनों तक शिव सेना की गुंडई और दादागीरी की राजनीति करके वे बेचारे सब कुछ भूल भाल गए होंगें .. ऐसी हालत में उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में ही पुनर्वास देने के बारे में सोचा जा सकता है ... दूसरा सवाल यह उठ सकता है कि शिव सेना टाइप राजनीति करने के बाद क्या यह नौजवान मुख्य धारा की राजनीति में शामिल हो सकते हैं . . जवाब हाँ में है क्योंकि बाकी पार्टियों में भी गुंडे ही बहुतायत में हैं . हाँ उनके यहाँ फर्क इतना है कि हर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व खुले आम बदमाशी को समर्थन नहीं करता जबकि शिव सेना वाले राष्ट्रीय नेता भी दादागीरी के पक्ष में भाषण देते पाए जाते हैं ..
इस बहस को हलके लेने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि इस बात का भी पूरा ख़तरा बना हुआ है कि दिशा से बहक गए ये नौजवान आतंकवादियों के हाथ भी लग सकते हैं . जहां तक महाराष्ट्र का सवाल है वहां बड़ी संख्या में आतंकवादी संगठनों के रिक्रूटिंग एजेंट घूम रहे हैं . मालेगांव में विस्फोट करने वालों को भी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाने के लिए नौजवानों की ज़रुरत है और उनके लिए हिंदुत्व की ट्रेनिंग पा चुके इन नौजवानों का बहुत ही ज्यादा इस्तेमाल है . इन लोगों का इस्तेमाल पाकिस्तान में रहने वाले आतंकवादी भी कर सकते हैं . यहाँ यह बात भी साफ़ कर देने की ज़रुरत है कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता.. पिछले ३० वर्षों का इतिहास देखें तो समझ में आ जाएगा कि पाकिस्तान की आई एस आई ने पंजाब, असम और मुंबई में आतंकवादी गतिविधियों के लिए हिन्दू और सिख लड़कों का इस्तेमाल किया था....इस लिए सभी पार्टियों को शिव सेना की तबाही का जश्न मनाना छोड़कर फ़ौरन उन लड़कों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने की कोशिश करनी चाहिए जो शिव सेना के चक्कर में रास्ते से बहक गए थे

Tuesday, February 9, 2010

मुंबई की दौलत में मुसलमानों का ख़ून पसीना

शेष नारायण सिंह

अभी कल की बात है जब मुंबई में राहुल गाँधी ने मुंबई की लोकल ट्रेन से यात्रा की और पूरी दुनिया के सामने यह बात एक बार साबित हो गयी कि अगर हुकूमत चाहे तो किसी भी गुंडे को उसकी बिल में छुपने को मजबूर कर सकती है . शिवसेना के मुखिया, बाल ठाकरे ने धमकी दी थी कि उनकी जमात के लोग राहुल गाँधी का स्वागत काले झंडों से करेंगें . महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्य मंत्री ने सरकार को चौकन्ना कर दिया और शिव सेना वालों की हिम्मत नहीं पड़ी कि कि वे कहीं भी उत्पात मचाएं. हम जैसे लोगों ने साफ़ कहा कि राहुल गाँधी की हिम्मत और राजनीतिक सोच की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी सरकार को शिवसेना की गुंडई पर लगाम लगाने के लिए तैयार किया ..लेकिन दो दिन बाद ही कांग्रेस के नेताओं ने उस भरोसे को चकनाचूर कर दिया . आज मुंबई की सडकों पर शिव सेना के कार्यकर्ता लाठी डंडे लेकर घूम रहे हैं और जहां चाह रहे हैं तोड़ फोड़ कर रहे हैं .पुलिस वाले चुपचाप खड़े नज़र आ रहे हैं और कुछ नहीं कर रहे हैं ... शिव सेना वाले शाहरुख खान के खिलाफ नारे लगा रहे हैं. और धमकी दे रहे हैं कि मुंबई में उनकी फिल्म रिलीज़ नहीं होने दी जायेगी. . उनकी फिल्म के निर्माता. करण जौहर ने मुख्य मंत्री और पुलिस कमिश्नर से मुलाक़ात की है और उन्हें भरोसा दिया गया है कि उनकी फिल्म जहां भी रिलीज़ होगी , वहां पुलिस का बंदोबस्त रहेगा.. उन पुलिस वालों की छुट्टियां रद्द कर दी गयी हैं जो छुट्टी पर गए हुए हैं .. ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि कि बहुत बड़ी आफत आ गयी है और सारी पुलिस शाहरुख खान की फिल्म दिखाने वाले सिनेमा हालों की सुरक्षा में लगा दी जायेगी.
महाराष्ट्र में जो कुछ भी वहां की सरकार कर रही है, उस से उसकी नीयत पर शक होता है .. जिस मुंबई पुलिस ने अभी दो दिन पहले राहुल गाँधी की मुंबई यात्रा के दौरान शिव सेना के अराजक लोगों को बिलों में घुसने को मजबूर कर दिया था, उसे क्या हो गया है .? ज़ाहिर है पुलिस अधिकारी अपने वे तरीके नहीं भूले होंगें जो उन्होंने राहुल गाँधी की सुरक्षा बंदोबस्त के दौरान इस्तेमाल किया था . कौन रोक रहा है . अब सबको मालूम है कि राहुल गाँधी की यात्रा के दौरान जिन लोगों पर शक था उन्हें पकड़ लिया गया था और ज़्यादा खूंखार शिव सैनिकों को माहिम पुलिस थाने में बैठा कर समझा दिया गया था कि अगर गड़बड़ी हुई तो हड्डियों का डिजाइन बदल दिया जाएगा.... ज़ाहिर है कि धौंस पट्टी से काम चलाने वाला आदमी कायर होता है ,इस लिए पुलिस की धुनाई के सामने सारी हेकड़ी धरी रह गयी थी और शिव सेना के उत्पाती लोग घरों से बाहर नहीं निकल सके थे .. . हमारा सवाल है कि मुंबई में आम आदमी को पुलिस की वहीं सुरक्षा क्यों नहीं मिल सकी जो एक स्वतंत्र देश के नागरिक का हक है .. क्या कारण है कि जब राहुल गांधी मुंबई आते हैं तो अशोक चह्वाण शिव सेना को औकात पर ला देते हैं और जब मुंबई में रहने वाले अन्य लोगों की सुरक्षा की बात आती है तो शिव सेना को उकसा देते हैं ..
इसका मतलब यह हुआ कि मुंबई में शिव सेना की बदमाशी में कांग्रेस की मिली भगत है . आज मुंबई पुलिस केबड़े अधिकारी और राज्य के मुख्य मंत्री का बयान आया है कि जिन थियेटरों में शाह रुख खान की फिल्म लगेगी वहां पुलिस तैनात रहेगी. क्या राहुल गांधी के लिए भी इसी तरह पुलिस लगाई गयी थी या शिव सैनकों का प्रिवेंटिव डिटेंशन किया गया था .. क्यों नहीं महाराष्ट्र की सरकार ऐसा उपाय करती कि शिव सेना की बदमाशी हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए.. मुख्य मंत्री के ताज़ा रुख से तो नहीं लगता कि वे शिव सेना को काबू में करना चाहते हैं ...उनका रुख तो ऐसा है कि वे शिव सेना को जिंदा रखना चाहते हैं .. और उस का इस्तेमाल लोगों को परेशान करने के लिए करना चाहते हैं ..क्या राहुल गाँधी और उनकी पार्टी का आला कमान मुंबई में सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कोई क़दम उठाएगा या पिछले ४० साल से जिस तरह से उनके पूर्वजों ने शिव सेना को बढ़ावा दिया है , वे भी उसी लाइन पर लग जायेंगें ..यह राहुल गाँधी की परीक्षा की घड़ी है कि जिस तरह से उनकी पार्टी की सरकार ने उनकी सुरक्षा की थी क्या वही सुरक्षा आम आदमी को मिल पायेगी क्योंकि संविधान तो यही गारंटी करता है ..

एक बात और . क्या कांग्रेस धर्म निरपेक्षता को केवल चुनावी नारा मानती है या उसे राज काज के दिशा निदेशक सिद्धांत के रूप में मान्यता देती है . क्योंकि अगर मुंबई में शाह रुख खान को पाकिस्तान समर्थक कह कर किसी जमात के लोग अपमानित कर सकते हैं तो देश के बाकी मुसलमान नागरिकों की हिफाज़त की क्या उम्मीद की जाए ? शाह रुख खान निजी हैसियत में भी बड़े कलाकार हैं लेकिन उस से भी बड़ी बात यह है कि वे उस बाप के बेटे हैं जो खान अब्दुल गफ्फार खान की लाल कुर्ती टुकड़ी का वालंटियर था. इसी लाल कुर्ती टुकड़ी ने महात्मा गांधी के अगले दस्ते के रूप में काम किया था. . क्या राहुल गाँधी एक बार कोशिश करेंगें कि इस देश में रहने वाले देशप्रेमी मुसलमानों से सड़क छाप गुंडे देश प्रेम की सर्टिफिकेट मांगना बंद कर दें . गौर करने वाली बात यह है कि यह सर्टिफिकेट उस फ़िल्मी दुनिया में माँगी जा रही है जहां पिछली सदी में भी और आज भी मुसलमान कलाकारों की एक बड़ी जमात पूरे देश की वाह वाही की हक़दार रही है ... क्या कांग्रेसी नेता एक मिनट के लिए कल्पना करना चाहेंगें कि दिलीप कुमार, सोहराब मोदी, मधु बाला, मीना कुमारी, शाहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी,. नौशाद, के आसिफ, कमाल अमरोही, ताहिर हुसैन, ख्वाजा अहमद अब्बास, नूर जहां, कैफ़ी आजमी, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह ,जावेद अख्तर, सलीम खान, हेलेन, निम्मी आदि आदि के बिना हिन्दी सिनेमा का क्या हाल हुआ होता. जिस मुंबई की दौलत पर शिव सेना के मालिक इतराते फिरते हैं , उसमें इन मुसलमानों का ख़ून पसीना लगा है .. कांग्रेस को चाहिए कि फ़ौरन से पेश्तर मुंबई में शिव सेना पर लगाम लागाने की अपनी मंशा का ऐलान करे और उसे लागू करें वरना इस देश के लोग यह मानने लगेंगें कि कांग्रेस और शिव सेना के बीच नूरा कुश्ती चल रही है.

Saturday, February 6, 2010

राहुल गाँधी बोल्या----- मुंबई में मनमानी नहीं चलेगी

शेष नारायण सिंह


राहुल गांधी ने अपनी मुंबई यात्रा से साबित कर दिया है कि उनमें जन नेता बनने की वही ताकत है जो उनके पिताजी के नाना जवाहर लाल नेहरू में थी। जवाहरलाल नेहरू के बारे में बताते हैं कि वे भीड़ के अंदर बेखौफ घुस जाते थे। राहुल गांधी ने उससे भी बड़ा काम किया है। उन्होंने मुंबई में आतंक का पर्याय बन चुके ठाकरे परिवार और उनके समर्थकों को बता दिया है कि हुकूमत और राजनीतिक इच्छा शक्ति की मजबूती के सामने बंदर घुड़की की राजनीति की कोई औकात नहीं है।

शुक्रवार को मुंबई में राहुल गांधी उन इलाकों में घूमते रहे जो शिवसेना के गढ़ माने जाते हैं लेकिन शिवसेना के आला अधिकारी बाल ठाकरे के हुक्म के बावजूद कोई भी शिवसैनिक उनको काले झंडे दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अपनी मुंबई यात्रा के दौरान राहुल गांधी के व्यवहार से एक बात साफ हो गई है कि अब मुंबई में शिवसेना का फर्जी भौकाल खत्म होने के मुकाम पर पहुंच चुका है। सुरक्षा की परवाह न करते हुए राहुल गांधी ने उन इलाकों की यात्रा आम मुंबईकर की तरह की जहां शिवसेना और राज ठाकरे के लोगों की मनमानी चलती है। लेकिन राहुल गांधी ने साफ बता दिया कि अगर सरकार तय कर ले तो बड़ा से बड़ा गुंडा भी अपनी बिल में छुपने को मजबूर हो सकता है।

मुंबई में राहुल गांधी का कार्यक्रम एसपी.जी. की सुरक्षा हिसाब से बनाया गया था। सांताक्रज हवाई अड्डे पर उतरकर उन्हें हेलीकोप्टर से जुहू जाना था जहां कालेज के कुछ लडके -लड़कियों के बीच में उनका भाषण था। यहां तक तो राहुल गांधी ने सुरक्षा के हिसाब से काम किया। कालेज में भाषण के बाद राहुल गांधी को फिर हेलीकाप्टर से ही घाटकोपर की एक दलित बस्ती में जाना था लेकिन उन्होंने इस कार्यक्रम को अलग करके मुंबई की लोकल ट्रेन से वहां पहुंचने का फैसला किया। जुहू से अंधेरी रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां एटीएम से पैसा निकाला, फिर वहां से चर्चगेट की फास्ट लोकल पकड़ी। दादर में उतरे और पुल से स्टेशन पार किया जैसे आम आदमी करता है। दूसरी तरफ जाकर सेंट्रल रेलवे के दादर स्टेशन से घाटकोपर की ट्रेन पर बैठे और आम आदमियों से मिलते जुलते अपने कार्यक्रम में पहुंच गए। शिवसेना वाले अपने मालिक के हुक्म को पूरा नहीं कर पाए और शहर में कहीं भी काले झंडे नहीं दिखाए गये।

राहुल गांधी की हिम्मत के यह चार घंटे भारत में गुंडई की राजनीति के मुंह पर एक बड़ा तमाचा है। अजीब इत्तफाक है कि इस देश में गुंडों को राजनीतिक महत्व देने का काम राहुल गांधी के चाचा, स्व. संजय गांधी ने ही शुरू किया था। और अब गुंडों को राजनीति के हाशिए पर लाने का बिगुल भी नेहरू के वंशज राहुल गांधी ने ही फूंका है। जो लोग मुंबई का इतिहास भूगोल जानते हैं, उन्हें मालूम है कि अंधेरी से लोकल ट्रेन के जरिए घाटकोपर जाना अपने आप में एक कठिन काम है। जिन रास्तों से होकर ट्रेन गुजरती है वह सभी शिवसेना के प्रभाव के इलाके हैं और वहां कहीं भी,कोई भी आम आदमी राहुल गांधी के खिलाफ नहीं खड़ा हुआ। इससे यह बात साफ है कि मुंबई महानगर में भी कुछ कार्यकर्ताओं के अलावा बाल ठाकरे और राज ठाकरे के साथ कोई नहीं है।

हालांकि यह मानना भी नहीं ठीक होगा कि सुरक्षा एजेंसियों ने राहुल गांधी की हर संभव सुरक्षा का पक्का इंतजाम नहीं किया होगा लेकिन मुंबई में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुकामी दादाओं के आतंक के साए में रह रहे लोगों का यह मुगालता जरूर टूटेगा कि शिवसेना वालों को कोई नहीं रोक सकता। राहुल गांधी की ताज़ा मुंबई यात्रा से यह संदेश जरूर जायेगा कि अगर हुकूमत तय कर ले तो कोई भी मनमानी नहीं कर सकता। पता चला है कि पुलिस ने शिवसेना के मुहल्ला लेवेल के नेताओं को ठीक तरीके से धमका दिया है और पुलिस की भाषा में धमकाए गए यह मुकामी दादा लोग आने वाले वक्त में जोर जबरदस्ती करने से पहले बार बार सोचेंगे। कुल मिलाकर राहुल गांधी ने शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के फर्जी भौकाल पर लगाम लगाकर आम मुंबईकर को यह भरोसा दिलाया है कि सभ्य समाज और बाकी राजनीतिक बिरादरी भविष्य में उसे शिवसेना छाप राजनीति के रहमोकरम पर नहीं छोड़ेगी।

Wednesday, November 18, 2009

सचिन की हैसियत के मुकाबले में बाल ठाकरे की औकात

शेष नारायण सिंह

भोजपुरी अभिनेता और गायक मनोज तिवारी के घर पर कुछ गुंडा टाइप लोगों ने हमला कर दिया और तोड़ फोड़ की. मनोज वहां थे नहीं वरना उनको भी नुक्सान पंहुंच सकता था. . जो लोग आये थे उन्होंने अपनी कोई पहचान तो नहीं बतायी लेकिन कहा कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने जब क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को फटकार लगाई तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मनोज तिवारी ने शिवसेना के मुखिया को नाराज़ कर दिया है. यह मुखिया महोदय सचिन तेंदुलकर से भी नाराज़ हैं क्योंकि उसने कहीं कह दिया था कि उन्हें भारतीय होने पर गर्व है..अब सचिन ने क्या गलत बात कह दी कि बाल ठाकरे नाराज़ हो गए. कमज़ोर लोगों को हड़का कर ही बाल ठाकरे ने अपनी राजनीतिक खेती की है. उन इस गुण को उनके बेटे तो नहीं अपना पाए लेकिन उनके भतीजे राज ठाकरे में वे सारे गुण विद्यमान हैं . वे भी अपने स्वनामधन्य चाचा की तरह ही मुंबई में आकर रोटी कमाने वालों को धमकाते रहते हैं . और पिछले चुनाव में उनकी हैसियत बढ़ गयी जबकि बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे बेचारे पिछड़ गए. .. सचिन तेंदुलकर को नसीहत देने वाला बाल ठाकरे का सम्पादकीय उसी लुम्पन राजनीति के खोये हुए स्पेस को फिर से हासिल करने की कोशिश है . लेकिन लगता है कि इस बार दांव उल्टा पड़ गया है . बाल ठाकरे के बयान पर पूरे देश में नाराज़गी व्यक्त की जा रही है. हालांकि इस बात की ठाकरे ब्रांड राजनीति करने वालों को कभी कोई परवाह नहीं रही लेकिन अब शिव सेना की सहयोगी पार्टी बी जे पी ने भी सार्वजनिक रूप से सचिन तेंदुलकर को सही ठहरा कर बाल ठाकरे को बता दिया है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के बर्दाश्त की भीएक हद होतीहै. और बी जे पी के लिए ठाकरे की हर बात को सही कहना संभव नहीं होगा. बी जे पी का बयान किसी प्रवक्ता टाइप आदमी ने नहीं दिया है . पार्टी की तरफ से उनके सबसे गंभीर और प्रभावशाली नेता , अरुण जेटली ने बयान दिया है. अरुण जेटली कोई प्रकाश जावडेकर या रवि शंकर प्रसाद तो हैं नहीं कि उनके बयान को कोई बड़ा नेता खारिज कर देगा . इसलिए अब यह शिव सेना को तय करना है कि मराठी मानूस की अहंकार पूर्ण नीति चलानी है कि सही तरीके से राजनीतिक आचरण करना है . अरुण जेटली के बयान का साफ़ मतलब है कि बी जे पी अब शिवसेना के उन कारनामों से अपने को अलग कर लेगी जो देशवासियों में नफरत फैलाने की दिशा में काम कर सकते होंगें..

सचिन तेंदुलकर को मराठी मानूस वाले खांचे में फिट करने की कोशिश करके बाल ठाकरे ने जहां राष्ट्रीय एकता का अपमान किया है वहीं सचिन को भी नुक्सान पहुचाने की कोशिश की है .सचिन तेंदुलकर आज एक विश्व स्तर के व्यक्ति हैं . पूरे भारत में उनके प्रसंशक हैं . जगह जगह उनके फैन क्लब बने हुए हैं. पूरे देश की कंपनियों से उन्हें धन मिलता है क्योंकि वे उनके विज्ञापनों में देखे जाते हैं . . इस तरह के व्यक्ति को अपने पिंजड़े में बंद करने की बाल ठाकरे की कोशिश की चारों तरफ निंदा हो रही है. विधान सभा चुनावों में राज ठाकरे की मराठी शेखी की मदद कर रही , कांग्रेस पार्टी ने भी बाल ठाकरे की बात का बुरा माना है .महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, अशोक चह्वाण ने भी बाल ठाकरे को उनके गैर ज़िम्मेदार बयान के लिए फटकार लगाई है. . लगता है कि शिव सेना के बूढ़े नेता से नौजवानों के हीरो सचिन तेंदुलकर की अपील के तत्व को समझने में गलती हो गयी क्योंकि अगर कहीं सचिन तेंदुलकर ने अपनी नाराज़गी को ज़ाहिर कर दिया तो शिव सेना का बचा खुचा जनाधार भी भस्म हो जाएगा. पता नहीं बाल ठाकरे को क्यों नहीं सूझ रहा है कि सचिन तेंदुलकर की हैसियत बहुत बड़ी है और किसी बाल ठाकरे की औकात नहीं है कि उसे नुक्सान पंहुचा सके. हाँ अगर सचिन की लोकप्रियता की चट्टान के सामने आकर उसमें सर मारने की कोशिश की तो बाल ठाकरे का कुनबा मराठी समाज के राडार से हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा. क्योंकि जिंदा कौमें अपने हीरो का अपमान करने वालों को कभी माफ़ नहीं करतीं.
सचिन से पंगा लेना बाल ठाकरे को महंगा पड़ेगा इसमें कोई शक नहीं है लेकिन जब तक समय की गति के साथ यह बात ठाकरे के लोगों को पता चलेगी तब तक अपने आका के हुक्म से काम करने वाले शिव सेना के लुम्पन भाई लोग कम से कम मुंबई में अपनी ताक़त का जलवा दिखाने से बाज़ नहीं आयेंगें. . इसका मतलब यह हुआ कि मुंबई एक बार फिर बदमाशी की राजनीति का शिकार होने वाली है. . महानगर के सभ्य समाज को अभी वे दिन नहीं भूले हैं जब राज ठाकरे ने बिहार से आये लोगों को कल्याण स्टेशन पर पिटवाया था, या उत्तर भारत के टैक्सी वालों को नुक्सान पहुचाया था. दुर्भाग्य की बात यह है कि महाराष्ट्र की सरकारें ठाकरे परिवार की राजनीतिक गुंडागर्दी को बर्दाश्त करती हैं , कभी कभी तो बढ़ावा भी देती हैं . ऐसा शायद इस लिए होता रहा है कि हर बार ठाकरे छाप बदमाशी गरीब उत्तर भारतियों या दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाती थी लेकिन इस बार तो ठाकरे ने मराठी गौरव के प्रतीक सचिन तेंदुलकर को ही अपनी नफरत की राजनीति के घेरे में ले लिया है . बाल ठाकरे के इस कारनामें को समझने के लिये अगर क्रिकेट की शब्दावली का प्रयोग करें तो इसे लूज़ बाल कहा जाएगा. सबको मालूम है कि जब लूज़ बाल आती है तो छक्का पड़ जाता है . सभ्य समाज को चाहिए कि महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बनाए कि वह बाल ठाकरे के इस लूज़ बाल पर छाका मारे और उसे पकड़ कर जेल में बंद कर दे. बाल ठाकरे की नफरत की राजनीति पर लगाम लगाने के लिए यह एक अच्छा अवसर है