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Saturday, January 18, 2014

प्रधानमंत्री का निर्वाचन लोकसभा के सदस्य करते हैं , १० जनपथ और नागपुर को नहीं करना चाहिए

शेष नारायण सिंह

सोनिया गांधी ने एक बार फिर अपने परिवार के सदस्यों के आसपास गणेश परिक्रमा कने वाले कांग्रेसी नेताओं को औकातबोध करा दिया है . उन्होने साफ़ कह दिया है कि २०१४ के लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी किसी को भी प्रधानमंत्री पद दावेदार नहीं बनायेगी जबकि  कांग्रेस में राहुल गांधी के आसपास रहने वाले लोग उनको प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाकर २०१४ का चुनाव लड़ने पर आमादा थे.  उनकी कोशिश थी कि नरेंद्र मोदी की चुनौती को राहुल जी को सामने करके सम्भाला जा सकता है . अजीब बात है कि राहुल गांधी के इन भक्तों को पता नहीं है कि यह बीजेपी और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की योजना है . उन्होंने जाल बिछा रखा है और जैसे ही कांग्रेस अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती , वह तुरंत उनके जाल में फंस जाती . लेकिन सोनिया गांधी ने एक ऐसे फैसले को रोक दिया है जिससे उनकी पार्टी की  दुर्दशा तो होती ही ,संसदीय लोकतंत्र की नेहरूवादी परंपरा का भी बहुत नुक्सान होता .
प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की बीजेपी की योजना उनकी तीन साल पहले से चल रही रणनीति का हिस्सा है . पहले तो उन्होंने अन्ना हजारे के नेतृत्व में आन्दोलन चलवाकर कांग्रेस को भ्रष्टाचार का समानार्थी शब्द बनाने के प्रोजेक्ट पर गंभीरतापूर्वक काम किया . उनके इस  काम में कांग्रेस ने भी उनकी मदद की. कामनवेल्थ खेल , टू जी और कोयला घोटाला जैसे हथियार कांग्रेस ने बीजेपी के हाथ में थमा दिया .  जब कांग्रेस भ्रष्टाचार के कीचड में बुरी तरह से लिपटी नज़र आने लगी तो बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को मुक्तिदाता के रूप में पेश कर दिया . मोदी के पक्षधर टी वी चैनलों ने हाहाकार मचा दिया कि अब बीजेपी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है , कांग्रेस को फ़ौरन राहुल गांधी को उम्मीदवार बना देना चाहिए . कांग्रेस में राजनीति को न समझने वालों का एक बड़ा वर्ग और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को कम्यूटरबंद करने वाले नौजवानों ने भी दिनरात काम शुरू कर दिया . उनको सही मायनों में विश्वास था कि राहुल गांधी को आगे करने से बात बन जायेगी या यह कि राहुल गांधी के नाम से चुनाव जीता जा सकता है . लेकिन इस बीच चार महत्वपूर्ण विधानसभाओं  के चुनाव हुए और साफ़ हो गया कि राहुल गांधी का नाम चुनाव जीतने की गारंटी तो खैर बिलकुल नहीं है,उनके नाम से कोई लाभ भी नहीं होता. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के  आसपास लगे लोगों ने फिर भी वही राग अलापना जारी रखा जिससे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया जाए .जब कांग्रेस ने १७ जनवरी के लिए आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की बैठक का प्रस्ताव रखा तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नामज़द करने के नारे और तेज़ी से लगने लगे. लेकिन १६ जनवरी को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में जब इस ब्रिगेड ने तेज़ी से अपना राग अलापना शुरू किया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने  हस्तक्षेप किया और कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की कोई ज़रुरत नहीं हैं . इसके पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह इकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी से बार बार आग्रह किया था कि  बीजेपी की नक़ल करके कांग्रेस को  प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं करना चाहिए .जब सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस वर्किंग कमेटी में यह बात कह दी तो सभी यही उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगे और बैठक के बाद यह बात साफ़ कर दी गयी कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बनाये जायेगें , उनको कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार का मुखिया ज़रूर बनाया जाएगा . अपने इस एक फैसले से कांग्रेस ने संभावित गठबंधन के साथियों को यह सन्देश भी दे दिया  है कि अभी प्रधानमंत्री पद किसी के पास जा सकता है . इस रणनीति का नतीजा यह हो सकता है कि मई २०१४ में सहयोगी जुटाने में मदद मिलेगी .
 कांग्रेस ने तय कर दिया है कि वह लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में किसी को नहीं पेश करेगी तो उन टी वी चैनलों के सामने खासी परेशानी पैदा हो गयी है जो नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी चुनाव के लिये कई महीने से नारा लगा रहे थे .  बीजेपी में भी भारी चिंता है क्योंकि राहुल गांधी को कमज़ोर वक्ता समझकर नरेंद्र मोदी को लगता था कि वे विजयी हो जायेगें . लकिन सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी को अपनी रणनीति पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है . हालांकि सोनिया गांधी ने परंपरा के हवाले से दावा किया है कि कांग्रेस अपने उम्मीदवार नहीं घोषित करती लेकिन यह भी माना जा  रहा है कि २०१३ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली हार भी इसका एक प्रमुख कारण है .  कारण जो भी रहा हो ,प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न घोषित करके कांग्रेस ने बीजेपी को अलग थलग करने की दिशा में एक अहम् पहल कर दी है . अब यह तय है कि २०१४ के चुनावों में जो भी पार्टियां उतर रही हैं उनमें केवल बीजेपी की तरफ से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मैदान में होगा .  जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया गया था तो पार्टी को उम्मीद थी कि उनके नाम पर जिन राज्यों में पार्टी कमज़ोर है और जहां कांग्रेस बनाम बीजेपी चुनाव होते हैं , वहां बीजेपी को भारी बढ़त मिल जायेगी . २०१३ के विधानसभा  चुनावों  से एक अलग तरह की तस्वीर सामने आ गयी है . जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बीजेपी के अपने मुख्यमंत्री  रमन सिंह और  शिवराज चौहान की  लोकप्रियता ऐसी थी कि उन्होने पार्टी की जीत सुनिश्चित कर ली . इन राज्यों में नरेंद्र मोदी के नाम का कोई ख़ास इस्तेमाल नहीं हुआ.  इन राज्यों के ग्रामीण  इलाकों में लोगों को मोदी का नाम तक नहीं मालूम था  . दिल्ली और राजस्थान के चुनावों में  मोदी का असर दिखा . राजस्थान में पार्टी भारी बहुमत से विजयी हुयी जबकि  दिल्ली में सरकार बनाने लायक बहुमत भी नहीं मिला. बीजेपी के  नेता और मोदी के समर्थक मीडिया विश्लेषक सब जानते हैं कि दिल्ली में मोदी का इतना भी असर नहीं था कि वे चुनाव जीत सकें लेकिन  कोई कुछ कहता  नहीं . दिल्ली में बीजेपी का चुनाव शुद्ध रूप से नेन्द्र मोदी का चुनाव था क्योंकि उन्होंने अपनी मर्जी का  मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था और दिल्ली जैसे छोटे राज्य में बहुत अधिक चुनावी सभाएं की थीं . लेकिन मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था . अन्य तीन  राज्यों की तरह कांग्रेस बनाम बीजेपी नहीं रह गया था. आम आदमी पार्टी के चुनाव में प्रभावी तरीके से शामिल हो जाने के कारण सब कुछ बदल गया था . नतीजा  यह हुआ कि बीजेपी सत्ता से बाहर रह गयी .
 कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवार की घोषणा न करके एक अच्छा उदाहरण पेश किया है . साथ साथ बीजेपी की उस कोशिश को भी रोक दिया है जिसके तहत वे संसदीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण परम्परा और भारतीय संविधान की मूल भावना पर प्रहार कर  रहे हैं . संविधान के अनुसार बहुमत दल का नेता ही प्रधानमंत्री बन सकता  है . इसलिए पहले से प्रधानमंत्री तय करना हालांकि गैरकानूनी नहीं है लेकिन संविधानसम्मत भी नहीं है . यह तो रहीं संविधान की बातें लेकिन राहुल गांधी या किसी और को प्रधानमंत्री पद का दावेदार न बनाकर कांग्रेस ने एक बात  तय कर दिया है कि कांग्रेस अगर सरकार बनाने में शामिल होगी तो उसकी  तरफ से कोई भी प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं होगा . यह तय है कि २०१४ के बाद भी गठबंधन सरकार बनेगी . उस स्थिति में कांग्रेस ने संकेत दे दिया  कि वह  किसी मायावती, शरद पवार , जयललिता, नीतीश कुमार , मुलायम सिंह यादव या इसी तरह के किसी  व्यक्ति को समर्थन दे सकती है . जबकि बीजेपी के साथ  जो भी शामिल होगा ,उसे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार स्वीकार करना पडेगा . ज़ाहिर है कांग्रेस की रणनीति  राजनीतिक रूप से ज़्यादा सही नज़र आती है .
प्रधानमंत्री पद  का दावेदार घोषित करने में बीजेपी की सोच है कि २०१४ के चुनावों देश एक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी के समर्थन में टूट पडेगा .इस सोच में तर्कदोष है  और यह अनुभव से साबित भी हो चुका है कि ऐसा होना संभव नहीं है . २०१३ के विधानसभा चुनावों में जिन राज्यों में बीजेपी बनाम कांग्रेस मुकाबला था , वहां बीजेपी की जीत हुयी है लेकिन दिल्ली में मुकाबला त्रिकोणीय था इसलिए बीजेपी सत्ता से बाहर बैठ कर मौजूदा मुख्यमंत्री  के कार्यों का विश्लेषण करती नज़र आ रही है . दिल्ली में भी कांग्रेस विरोधी लहर थी लेकिन उस लहर का फायदा आम आदमी पार्टी ले गयी और कांग्रेस को मजबूर कर दिया कि वह बीजेपी के  खिलाफ सरकार बनाने में उसकी मदद करे . बीजेपी की पूरी कोशिश है कि  वह आम आदमी पार्टी को यू पी ए का हिस्सा साबित कर दे लेकिन उसे अभी कोई सफलता नहीं मिल रही है . अलबत्ता उन राज्यों में जहां बीजेपी मज़बूत है ,वहां आम आदमी पार्टी मजबूती से संगठन बना रही है . २०१४ की लगभग सभी सीटें बीजेपी को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़, दिल्ली , उत्तर प्रदेश , बिहार ,कर्णाटक और महाराष्ट्र से आने की उम्मीद है . इन सभी राज्यों में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति बहुत ही मज़बूत है . यहाँ तक कि गुजरात के सभी लोकसभा क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी की सदस्य संख्या बढ़ रही  है . इसका मतलब यह हुआ कि जिस गुजरात में कांग्रेस मोदी के सामने एक बहुत ही कमज़ोर पार्टी के रूप में मैदान में थी वहां अब बीजेपी को एक ऐसी पार्टी का मुकाबला करना पडेगा जिसका पिछला कोई रिकार्ड नहीं है और जो दिल्ली में बीजेपी को मिल रही निश्चित सत्ता से दूर रखने में सफल रही है ..
अब  तक के संकेतों से साफ़ है कि आम आदमी पार्टी  भी किसी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बनायेगी  यानी वह भी नरेंद्र मोदी और बीजेपी को कोई ऐसा  व्यक्ति नहीं देने वाली है जिसके खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर अभियान चलाया जा सके . लोकसभा २०१४ की एक ख़ास बात और यह है कि आम आदमी पार्टी की अपील उन राज्यों में तो है ही जहां बीजेपी मज़बूत है लेकिन उसकी पंहुच हैदराबाद, चेन्नई, त्रिवेंद्रम,कोलकता  आदि बड़े शहरों के आसपास भी है . उत्तर प्रदेश ,जहां लोकसभा  चुनाव २००९ में बीजेपी चौथे स्थान पर रही थी और अभी २०१२ में हुए विधानसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी,  वहां सभी ८० सीटों पर आम आदमी पार्टी की मौजूदगी प्रभावशाली तरीके से है और यह पक्का है कि समाजवादी पार्टी को होने वाले नुक्सान का सीधा लाभ  बीजेपी को नहीं मिलेगा . गठ्बंधन की राजनीति के ज़माने में अगर  झाडू वाली पार्टी अपना दिल्ली वाला  प्रदर्शन दोहरा सकी तो प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना किसी भी पार्टी को भारी पड़ जाएगा.    

Saturday, August 3, 2013

तेलंगाना के फैसले पर बीजेपी वाले कांग्रेस का समर्थन करने के लिए मजबूर है


शेष नारायण सिंह
विन्ध्य के उस पार , अपने पुराने वायदे को कांग्रेस ने पूरा कर दिया है .तेलंगाना का अलग राज्य बनाने के लिए राजनीतिक फैसला लेकर प्रशासनिक काम आगे बढ़ा दिया है.  अब सरकार  और संसद का ज़िम्मा है कि इस राजनीतिक फैसले को अमली जामा पहनाये. आंध्र प्रदेश के कुछ नेताओं और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा इस फैसले  का कोई विरोध नहीं है . विरोध के लिए विरोध करने वाली राजनीतिक जमात , बीजेपी , ने तो  पहले ही अपने आप को तेलंगाना का पक्षधर घोषित कर रखा था . उनको उम्मीद थी कि कांग्रेस इस फैसले को टालती रहेगी और बीजेपी के नेता कांग्रेस को ढुलमुल काम करने वाली पार्टी के रूप में पेश करते रहेगें  लेकिन सब कुछ उलट गया . कांग्रेस ने तेलंगाना के पक्ष में वोट डाल दिया . अब बीजेपी के सामने विरोध का मौक़ा नहीं है . उसे भी कम स कम एक मुद्दे पर कांग्रेस के साथ जाना पड़ रहा है . तेलंगाना के इलाके में खुशी की लहर है .यह उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सपनों की ताबीर है . सीमान्ध्र और रायलसीमा के नेता लोग परेशान हैं . उनकी राजनीतिक ब्लैकमेल की ताक़त कम हो रही है . अलग तेलंगाना राज्य की अवधारणा १९५३ में ही कर ली गयी थी और  भाषा के आधार पर जब राज्यों का गठन हुआ तप १९५६ में ही  तेलंगाना को अलग राज्य बन जाना चाहिए था लेकिन सीमान्ध्र और रायलसीमा में भी वही भाषा बोली जाती थी जो तेलंगाना की है ,इसलिए भाषाई आधार पर राज्य को अलग नहीं किया जा सका .हाँ एक जेंटिलमैन एग्रीमेंट तेलंगाना के लोगो के हाथ आया जो  बार बार तोडा गया .तेलंगाना  के लिए १९६९ और १९७२ में बहुत ही हिंसक आंदोलन भी हुआ.  इस इलाके के लोगों के दिमागों में यह बात घर कर गयी कि उनको बेवकूफ बनाया जाता रहेगा लेकिन राज्य का गठन कभी नहीं होगा.  
कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले में ऐसी बातें हैं जिस से तेलंगाना और बाकी आंध्र प्रदेश के लोगों के साथ न्याय होगा . सबसे बड़ी बात तो यह है कि तेलंगाना को भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के अंदर रखने के प्रस्ताव का जवाहरलाल नेहरू ने उस समय भी विरोध किया था जब १९५६ में आंध्र प्रदेश के ताक़तवर राजनेताओं ने हैदराबाद समेत बाकी तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में रखने का  फैसला करवा लिया था . उन्होने कहा था कि यह शादी बेमेल थी और इसमें तलाक की गुंजाइश थी . आज वह तलाक़  हो गया है केवल कागज़ी काम होना बाकी है . जवाहर लाल नेहरू की इच्छा को उनकी पार्टी ने पूरा कर दिया है . इस बात में दो राय नहीं है कि मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी  कांग्रेस की नेहरूवादी परम्परा को आगे बढ़ा रही हैं . निष्पक्ष और पारदर्शी राजनीतिक फैसलों की परम्परा कायम कर रही हैं . अभी दस साल तक बाकी आंध्र प्रदेश की राजधानी भी हैदराबाद में ही रहेगी . प्रस्ताव में लिखा है कि आंध्र प्रदेश को अपनी नई राजधानी बनाने के काम में केन्द्र से सहायता मिलेगी.. कानून व्यवस्था की हालत बिगड न जाए इसकी जिम्मेदारी भी फिलहाल केन्द्र सरकार की होगी . इस फैसले से कांग्रेस ने हैदराबाद की स्थिति के बारे में भी स्थायी हल तलाश लिया है .  हैदराबाद से राजधानी  हटाने के लिए आंध्र प्रदेश को जो रकम मिलेगी ,उससे एक बहुत ही आधुनिक राजधानी का विकास संभव है . पोलावरम सिंचाई परियोजना को केंद्रीय प्रोजेक्ट बनाकर कांग्रेस ने दूरदर्शिता  का परिचय दिया है .अभी प्रस्ताव में दस जिलों वाले तेलंगाना की बात की गयी है . ज़ाहिर है कि कुरनूल और अनंत पुर जिलों के बारे में अभी संसद या सरकारी विचार विमर्श में विधिवत चर्चा की जायेगी .
 तेलंगाना के गठन के कांग्रेस और यू पी ए के राजनीतिक फैसले के बाद टी वी चैनलों ने गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड आदि राज्यों के गठन की मांग को सूचना के विमर्श का मुख्य विषय बना दिया है . इस से बीजेपी के नेता बहुत नाराज़ हैं . उनका आरोप है कि जिन न्यूज़ चैनलों पर लगातार मोदीपुराण चलता रहता है , वहाँ तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों की चर्चा को लाकर न्यूज़ चैनल और कांग्रेस ने बीजेपी का बहुत नुक्सान किया है . टी वी चैनलों की कृपा से चर्चा में बने रहने की बीजेपी की रणनीति को इस नए राजनीतिक विकासक्रम से भारी घाटा हुआ है .इस तरह से साफ़ समझ में आ रहा है कि कांग्रेस ने यह फैसला लेकर बीजेपी को रक्षात्मक खेल के लिए मजबूर कर दिया है . जानकार बताते हैं कि इस फैसले को एक निश्चित दिशा देने के लिए कांग्रेस के आंध्र प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ज़िम्मेदार हैं . आमतौर पर बीजेपी की राजनीति की हवा निकालने के लिए विख्यात दिग्विजय सिंह ने इस बार राजनीतिक शतरंज की बिसात पर ऐसी चल चली है कि बीजेपी को बिना शह का मौक़ा दिए मात की तरफ बढ़ना पड़ सकता है .

Monday, January 21, 2013

जयपुर घोषणा: राहुल गांधी के अगले १० साल के लिए काम




शेष नारायण सिंह 



जयपुर,20  जनवरी। कांग्रेस का जयपुर घोषणा पत्र जारी हो गया . कांग्रेस ने दावा किया है की इस घोषणापत्र में जो कुछ लिखा है वह उनकी पार्टी का भावी कार्यक्रम भी है . कांग्रेस में आज नयी शुरुआत हुयी क्योकि  कल कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाए जाने को मंजूरी दे दी थी और कांग्रेस में एक नयी लीडरशिप की बुनियाद रख दी गयी थी। राहुल गांधी अपने नेहरू परिवार से आने वाले कांग्रेस अध्यक्षों की पांचवीं पीढी के नौजवान हैं . 42 साल के राहुल गांधी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में काम शुरू कर दिया हैं . इसी उम्र में इनके  पिता जी के नाना जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर में काग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल कर लिया था। जब जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में कांग्रेस अध्यक्ष  का पद संभाला था तो देश की राजनीति में महात्मा गांधी का था। वहीं रावी नदी के किनारे देश ने जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई  में पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य  निरधारित किया था। राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनाने के पहले भी कांग्रेस पार्टी में उपाध्यक्ष रह चुके हैं लेकिन उनको वह अधिकार नहीं मिले थे जो राहुल गांधी को मिल रहे हैं . आज  अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने जब उनकी तैनाती को मंजूरी दी तो सोनिया गांधी के चेहरे की प्रसन्नता बता रही थी कि  वे अपने बेटे की नयी ज़िम्मेदारी से बहुत खुश हैं।

 जयपुर घोषणा पत्र  जारी होने के साथ साथ राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी का एक तरह से सारा ही काम काज दे दिया  गया। जयपुर घोषणा पत्र में धर्म निरपेक्ष और प्रगतिशील ताक़तों से एकजुट होने की अपील की गयी है . और जो लोग समाज में ध्रवीकरण के ज़रिये दुशमनी पैदा करना चाहते हैं उनको शिकस्त देने की  बात की गयी है .यू पी ए  सरकार की आठ साल के एउप्लाब्धियों को लेकर वोट मांगने जाने के लिए तैयार कांग्रेस  पार्टी ने दावा किया है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अपने संघर्ष  को जारी रखेगी।लोकपाल बिल के बारे में हुयी प्रगति  को पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई के उदाहरण के तौर पर पेश किया है .राजनेताओं और सरकारी  अफसरों के भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़रूरी मुहिम चलाई जायेगी।

कांग्रेस पार्टी ने स्वीकार किया है कि अल्पसंख्यकों के अधिकार  अभी भी पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं .इसके लिए सरकार से मांग भी कर डाली गयी है . जयपुर घोषणा पात्र ने अल्पसंख्यकों के लिए बनायी गयी सच्चर कमेटी की सिफारिशों को प्रासंगिक माना है अब कांग्रेस  प्रधान मंत्री के १५ सूत्री कार्यक्रम को लागू करने में सरकार को सहयोग करेगी.

पिछले दिनों  सडकों पर आ रहे नौजवानों के गुस्से को भी कांग्रेस ने पहचाना है . शहरी और ग्रामीण नौजवानों के सपनों की शिनाख्त करके उन्हने पूरा करने की दिशा में काम करने की बात की गयी है .पकिस्तान के बारे में कांग्रेस ने  दृढ रुख अपनाया है और तय किया  है कि देश की आतंरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाएगा और  आतंकवाद को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा .पाकिस्तान के बारे में सोनिया गांधी के भाषण में जिन  मानदंडों की बात की  गयी थी उसे जयपुर घोषणा पत्र  का हिस्सा बनाया गया है . अलगाव वादी ताक़तों और साम्प्रदायिक ताक़तों के खिलाफ जारी राजनीतिक प्रयास को और तेज़ किया जाएगा .और उन्हें राजनीतिक  स्तर  पर हल करने की योजना बनायी जायेगी .न्याय पालिका और  चुनाव प्रक्रिया में सुधार को  प्राथमिकता दी जायेगी क्योंकि इन  रास्तों से भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा हो रहा है .. " आपका पैसा आपके हाथ " कार्यक्रम को भी कांग्रेस अपने कार्यक्रम के रूप  में पेश कर रही है और उसे लेकर उसके कार्यकर्ता अब जनता के बीच में जायेगें।

मूलभूत स्वास्थ और स्वच्छता  के कार्यक्रमों को भी प्रमुखता दी जायेगी . माओवादी आतंकवाद को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर  पर कमज़ोर  करने के  लिए कम किया जायेगा।असमानता को कम करके  रोज़गार के सृजन के साथ समावेशी विकास को सुनिश्चित करना सबसे बड़ी सामाजिक आर्थिक चुनौती है ./ साल २०२० तक महिलाओं और बच्चों को कुपोषण का शिकार न होने देने का भी संकाल्प उठाया गया है .घोषणा पत्र में किसानों के लिए भी कुछ विषय डाले गए हैं .किसानों की ज़मीन लेने के पुराने कानून को बदल कर उसे आधुनिक बनाने की बात की गयी है .खाद्य सुरक्षा को पक्का करना भी जयपुर घोषणा पत्र की एक खास बात है  भारतीयों में उद्यमिता के विकास को महत्व दिया जाएगा और कोशिश की जायेगी और पूंजी निवेश को प्रमुखता दी जायेगी. पूंजी देशी और विदेशी दोनों तरह की हो सकती है . हैंडलूम को विकसित करने की बात भी  की गयी है .पंचायती राज संस्थाओं , सरकारी स्कूलों और ग्रामीण नौजवानों के शैक्षिक विकास के लिए सरकारों की मदद के काम में  कांग्रेसी कार्यकर्ता भी  लगाए जायेगें .बुनियादी ढांचागत सुविधाओं को आर्थिक  विकास की बुनियाद माना गया है और उनके  विकास के लिये पार्टी हर प्रयास करेगी,संचार और सूचना के क्षेत्र में आई क्रान्ति को आम आदमी और अपनी पार्टी के हित में प्रयोग करने की भी कोशिश भी कांग्रेस पार्टी करेगी 
 . 
महिलाओं के  सुरक्षा के मसले पर  सोनिया गांधी और अन्य नेता बहुत संतुष्ट नहीं है . जिस से भी बात की गयी सभी दिल्ली गैंग रेप की घटना  से विचलित नज़र आये .कांग्रेस ने २००२ में महिलाओं के सशक्तीकरण  के लिए एक कार्य योजना बनाई थी . अब उसे अपने कार्यक्रम में शामिल करके उस दिशा में आगे बढ़ने  का कार्यक्रम बना लिया  गया है .लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति को बढ़ाया जाएगा.यौन अत्याचारों की परिभाषा के बारे में चल रही राष्ट्रीय  बहस में कांग्रेस ने अपने आपको जोड़ दिया है और तय किया है है कि जहां जहां कांग्रेस सरकारें हैं वहाँ पुलिस फ़ोर्स में ३० प्रतिशत  महिलाओं को भर्ती किया जाएगा. . महिलाओं के लिए एक अलग राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की जायेगी जो महिलाओं के कार्यक्रमों को उसी तरह से समर्थन देगी जिस तरह से खेती के कार्यक्रमों को नाबार्ड बैंक देता है . १८ से ६० साल की आयु के बीच की निराश्रित, परित्यक्ता और विधवा महिलाओं को उचित पेंशन दी जायेगी लेकिन इसमें एक सवाल पूछा जा  रहा है कि  ६० साल से ऊपर आयु की महिलायें कहाँ जायेगीं . कांग्रेस पार्टी में अब ३० प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए रिज़र्व कर दी जायेगीं.

विदेश नीति में नेहरू की विदेश नीति के आधार पर दावा करते हुए दुनिया में हुए बदलाव और कोल्ड वार  की समाप्ति के हवाले से अमरीका परस्ती के ढर्रे  पर चलने के संकेत दिए गए हैं .संगठन के स्तर पर कुछ काम लीक से हटकर किये जायेगें . ब्लाक और जिला स्तर पर कमेटियों में उन्हीं लोगों को  स्थान दिया जायेगा जिन्होंने  पंचायत के स्तर पर कहीं चुनाव में सफलता पायी हो . इसी योजना के सहारे सभी वर्गों के लोगों को कांग्रेस में काम दिया जाएगा .बूथ और ब्लाक  स्तर पर भी कांग्रेस कमेटियों का गठन किया जायेगा .  

Saturday, January 19, 2013

सोनिया गांधी ने कहा कि पब्लिक के गुस्से को गंभीरता से लेना पडेगा



शेष नारायण सिंह  


जयपुर,१८ जनवरी .जयपुर में शुरू हुए कांग्रेस चिंतन शिविर में सोनिया  गांधी अपनी पार्टी के उन नेताओं को आड़े हाथों लिया जो यह कहना चाहते हैं कि किसी भी समस्या हल के लिए  कनट्रोल का तरीका सही है.  उन्होंने अपनी पार्टी के बड़े नेताओं को चेताया कि सार्वजनिक जीवन में अगर सभ्य और पारदर्शी आचरण न किया गया कि तो सूचना के अधिकार से लैस जनता सूचना क्रान्ति के सभी साधनों को अपनायेगी और अपना हक लेने से आम आदमी को कोई नहेने रोक सकता . सोनिया गंधे एके पूरे भाषण में आम आदमी को सही मायनों में फोकस में रखने का संदेश  नज़र आया  उन्होंने सुझाया कि कंट्रोल की मानसिकता से बाहर आना आज कांग्रेस की सबसे बड़ी ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि रोज रोज के भ्रष्टाचार से जनता बहुत परेशान है और उसको दुरुस्त करना हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है .एक बात जो साफ़ नज़र आयी  वह थी राहुल गांधी की प्राथमिकता इस चिंतनशिविर के बाद लगभग औपचारिक रूप से स्थापित होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ गयी है . आज  का सोनिया गांधी का भाषण इसलिए बी भी याद किया जाएगा कि उन्होंने विपक्ष पर बहुत करारा प्रहार नहीं किया और अपनी पार्टी के उन लोगों  को आगाह किया जो अपनी हर असफलता में विपक्ष की साज़िश देखने के बहाने तलाशते हैं .
सोनिया गांधी को इस बात पर बहुत रंज था कि एक समाज के रूप में हम  महिलाओं और अन्य कमज़ोर तबकों के प्रति इतने वहशी क्यों हैं .उन्होंने अपनी पार्टी वालों को चेताया कि सब को साथ लेकर चलने की जो बात कांग्रेस में की जाती है वह हमारे लिए चुनाव जीतने की रणनीति  नहीं  है . हम उसमें विश्वास करते हैं . उन्होने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को सलाह दी कि कुछ ऐसा प्रबंध किया जाए हमारी नीतियां विपक्ष की किसी बात के आधार पर न हों . जो कांग्रेस की मान्यताएं रही हैं वही राष्ट्र निर्माण की भी मान्यताएं हैं. सोनिया गांधी ने दलितों ,आदिवासियों अल्पसंख्यकों और महिलाओं के  प्रति राजनीतिक बिरादरी के लोगों को ज़िम्मेदार रवैय्या अपनाने को कहा .बाद में उन्होंने ओ बी सी का नाम भी इस सूची में जोड़ दिया .
महिलाओं के प्रति हो रहे अन्याय से सोनिया गांधी सबसे ज्यादा विचलित नज़र आयीं . उन्होंने कहा अकी उन्हने इस बात का बहुत दुःख और पीड़ा है कि बच्चियों के प्रति भेदभाव जारी है .महिलाओं पर अत्याचार शर्मनाक है और हमारे समाज की सामूहिक अंतरात्मा पर कक्लांक के सामान है .  विधावा के साथ पेश आने का हमारा तरीका  कन्या भ्रूण की ह्त्या और बच्चों की खरीद फरोख्त और बेख़ौफ़  यौन हिंसा के के खिलाफ समाज झकझोरने और आँखे खोलने की ज़रूरत है .उन्होंने यह भी ताकीद की कि यह काम महिला और्कान्ग्रेस या महिलओं के संगठनों का हे एनाहेने है यह पूरे देश का अकाम है  इसलिए हर कांग्रेसी को इस काम को  गंभीरता से लेना चाहिए .
उन्होंने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को समझाया कि  कांग्रेस पार्टी हर गली मोहल्ले की पार्टी रही है लेकिन वहाँ पर पार्टी मज़बूत हो इसका तरीका इस चिंतन शिविर से मिलने वाली दिशा से तय होगा .उन्होंने कहा कि पार्टी को पुरानी गरिमा दिलवाने के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस गरीबी पर काबू पाए .देश की  अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाएँ ,अपने सेकुलर मूल्यों को और गहरा  करें, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती दें और बाकी दुनिया से और सकारात्मक सम्बन्ध बनाएँ .उन्होंने पड़ोसी देश से शान्ति  की  ज़रूरत पर बहुत जोर दिया और कहा कि बात चीत के महत्व को कम नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कहा कि हमारी बातचीत सभ्य और स्वीकृत व्यवहार पर आधारित होनी चाहिए .हम आतंकवाद और सीमाओं पर खतरे से निपटने के लिए सावधानी रखेगें और अपनी सुरक्षा से किसी तरह का समझौता नहीं करेगें.
सोनिया गांधी ने संगठन के मुद्दे पर अपनी पार्टी के नेताओं की ज़बरदस्त क्लास ली. उन्होंने कहा कि  कांग्रेस एक अनुशासित पार्टी के रूप में काम नहीं कर रही है . न्होंने कहा कि गुटबाजी के चक्कर में हमें बहुत सारे अवसर गँवा दिए हैं  . कांग्रेस वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि पार्टी की जीत होती है तो सब को लाभ मिलता है .सोशल मीडिया को काबू करने वालों को भी सोनिया गांधी ने आड़े हाथों लिया और  कहा कि भारत बदल रहा है .उन्होंने नौजवान साथियों से कहा कि हमारी जीवन शैली में जो भारी बदलाव आ रहे हैं उनसे वे परेशान होती हैं . उन्होंने कहा कि शादी और त्यौहार के समय फ़िज़ूल के दिखावे की संस्कृति से एक समाज के रूप में हमें बचना होगा . उन्होंने कहा कि आप लोग शादी व्याह में जो बेहिसाब खर्च करते हैं उसका पैसा कहाँ से आता है . उनके श्रोताओं में बड़ी संख्या में ऐसे नेता मौजूद तह जिन्होंने अपने बच्चों की शादियों में उल जलूल खर्च किया  है . सोनिया गांधी ने सीधा सवाल किया कि  इस शानो शौकत का पैसा कहाँ से आता है . ज़ाहिर है सोनिया गांधी नेताओं को रिश्वत की कल्चर के खिलाफ आगाह कर  रही थीं.
उन्होंने कहा कि नौजवानों में जो अशांति है वह इसलिए है कि नेताओं के आचरण के चलते उनका राजनीतिक संस्थाओं से विश्वास हट रहा है . राजनीतिक दलों से उम्मीदें बढ़ रही हैं .सोशल मीडिया और इंटरनेट के ज़रिये आज का नौजवान अपनी बात को दूर तक पंहुचा सकता है .यू पी ए ने सूचना का अधिकार क़ानून बनाया है. जाहिर है कि आपके काम पर सबकी नज़र हमेशा रहेगी . नेताओं से अपना हक मांगने के लिए भी सूचना क्रान्ति के हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है .इसलिए पारदर्शिता अब बहुत ज़रूरी राजनीतिक आचरण हो गया है . सच्चाई और ईमानदारी  जैसे मूल्यों के बिना  काम नहीं चलने वाला वाला है .जनता रोज़मर्रा के भ्रष्टाचार से तंग है . यह उनका हक है कि वे अपने प्रतिनधियों से जवाब मांगें उन्होंने कहा कि राजनीतिक वर्ग को वह जवाब देना होगा यह हमारी भविष्य को मज़बूत बनाएगा. और समाज के रूप में हम आगे बढ़ सकेगें

Friday, September 16, 2011

साम्प्रदायिक हिंसा रोकने वाले बिल की सही आलोचना की ज़रुरत

शेष नारायण सिंह

केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय एकता परिषद् के सामने पेश किया साम्प्रदायिक हिंसा रोकने वाला बिल मुंह के बल गिर पड़ा . होना भी यही चाहिए था. सोनिया गांधी के प्रिय संगठन , नेशनल एडवाइज़री काउन्सिल नाम की शहरी मंडली ने एक मसौदा बनाया था जिसमें बहुत खामियां थीं .लेकिन सोनिया जी की इच्छा को कानून मानने वाले डॉ मनमोहन सिंह ने उसे बिल की शक्ल दिलवाई और राष्ट्रीय एकता परिषद् के सामने पेश कर दिया . बिल अपने मौजूदा स्वरुप में पास नहीं होगा यह तो अब पक्का हो चुका है . लेकिन जिन मुद्दों पर उसका विरोध हो रहा है वह भी बेमतलब है . जिन राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें हैं उनको इस बात पर एतराज़ है कि यह बिल अगर क़ानून बन गया तो राज्य में उनकी सरकार और उनकी पार्टी के खिलाफ काम करने वालों को धमकाने की उनकी ताक़त कम हो जायेगी.. अजीब बात है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इस बेकार के बिल का इसलिए विरोध नहीं कर रही है कि इसके कानून बन जाने के बाद राज काज का पूरा व्याकरण बदल जाएगा जो कि राष्ट्र हित के खिलाफ भी जा सकता है . नेशनल एडवाइज़री काउन्सिल वालों का दावा है कि इस बिल के पास हो जाने के बाद धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के बारे में समाज और देश के रूप में हमारी प्रशानिक नज़र बदल जायेगी. यह बात कहने में ठीक लगती है लेकिन इसमें कमियाँ बहुत हैं .सबसे बड़ी कमी तो यही है कि यह कानून सरकारी तंत्र को बहुत ज्यादा ताक़त दे देगा . ज़रूरी नहीं कि उस ताक़त का सही इस्तेमाल ही हो . बिल की बुनियादी सोच में ही खोट है . इस बिल को बनाने वाले यह मानकर चलते हैं कि भविष्य में भी भारत में दंगे उतने ही खूंखार होंगें जितने कि अब तक होते रहे हैं . इस बिल की मंशा है कि प्लानिंग कमीशन की तर्ज़ पर एक अथारिटी बनायी जायेगी जिसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी केंद्र सरकार के सचिव स्तर का एक अफसर होगा . उस अथारिटी में बहुत सारे सदस्य होंगें जिनको केंद्र सरकार के राज्य मंत्री का दर्ज़ा दिया जाएगा . इस अथारिटी का अध्यक्ष कैबिनेट रैंक का मंत्री होगा . इस का भावार्थ यह हुआ कि एक और सरकारी विभाग खड़ा कर दिया जाएगा जो परमानेंट होगा और जो चौबीसों घंटे दंगों आदि को संभालने के लिए काम करता रहेगा. इस सोच में बहुत भारी दोष है . सोनिया जी की मंडली के लोगों को लगता है कि इस देश में दंगा अब एक स्थायी चीज़ के रूप में बना रहेगा . कोई भी कानून बनाने के लिए यह बिलकुल गलत बुनियाद है .

इस बिल का घोषित उद्देश्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है .इस उद्देश्य में कहीं कोई बुराई नहीं है .ऐसा लगता है कि दिल्ली में बैठकर जिन लोगों ने इस बिल को बनाया है वे हर बात को साबित करने के लिए २००२ के गुजरात को उदाहरण के रूप में पेश करते हैं . गुजरात में २००२ में जो कुछ भी हुआ ,उसको कोई सही नहीं मानता .यहाँ तक कि जिन लोगों ने उस काम को किया था अब वे भी उसके पक्ष में नहीं बोलते .सारी दुनिया के सभ्य समाजों में उसकी निंदा की जा रही है .उसको आधार मानकर कोई भी कानून नहीं बनाया जा सकता. गुजरात में २००२ में जिन लोगों ने नर संहार किया था ,उनको मुकामी नौकरशाही का आशीर्वाद प्राप्त था . उसी नौकरशाही को निरंकुश ताक़त देने की बात करने वाले इस बिल से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी की बात सोचना ठीक नहीं है. इस बिल में प्रावधान है कि जिन अधिकारियों को इलाके में साम्प्रदायिक दंगा होगा उन्हें दण्डित किया जाएगा. जो भी भारत की नौकरशाही को समझता है उसे मालूम है कि अपनी नौकरी बचाने के लिए अपने देश का अफसर कुछ भी कर सकता है . इस प्रावधान को कानून में शामिल कर लेने से इस बात का पूरा ख़तरा बना रहेगा कि दंगा रोकने के लिए मिले हुए अधिकार का प्रयोग सम्बंधित सरकारी अफसर अपनी मनमानी करने के लिए भी करेगा. बिल में लिखा है कि अगर कहीं साम्प्रदायिक हिंसा होती है तो यह मान लिया जाएगा कि उस इलाके के अधिकारी ने कानून द्वारा दिया गए अपने विधि सम्मत अधिकार का प्रयोग नहीं किया है और उसे ड्यूटी को सही तरीके से न करने के लिए दोषी माना जाएगा . इस दोष के लिए उसे दंड मिलेगा . यह दंड बहुत ही कठोर होगा. सरसरी तौर पर देखने तो यह बात ठीक लगती है . आई ए एस और आई पी एस अफसरों की सेवा शर्तों में साफ़ लिखा है कि वे भारत में संविधान का राज कायम करने के लिए ही काम करेगें . लेकिन अक्सर देखा गया है कि वे ऐसा नहीं करते . लेकिन उनको बता दिया जाए कि अगर उन्होंने संविधान के पालन को मुकम्मल तौर पर सुनिश्चित नहीं किया तो उनकी नौकरी भी जा सकती है तो यह अफसर कुछ भी कर सकते हैं .बिल को बनाने वाले यह मानकर चल रहे हैं कि अफसर को व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार ठहरा देने पर वह कानून का राज कायम कर देगा.लेकिन सरकारी अफसरों के बारे में इस तरह का विचार रखना सही नहीं है . वह किसी भी नए कानून को शोषण या धन वसूली का भी जरिया भी बना सकता है .

बिल का जो मौजूदा स्वरुप है उसके अनुसार सांप्रदायिक सद्भाव और इंसाफ़ को सुनिश्चित करने के लिए एक नए नौकरशाही के ढाँचे को तैयार किया जाना है .साम्प्रदायिक सद्भाव और इंसाफ़ के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय अथारिटी और उसके मातहत संगठनों के नाम पर एक सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार हो जायेगी. सरकारी तनखाहों और सरकारी कर्मचारियों की पेंशन की मार झेल रहे इस मुल्क पर इतना बड़ा आर्थिक बोझ लादना बिलकुल गलत होगा. खासकर जब इस तरह की सरकारी नौकरशाही की कोई ज़रुरत न हो . वास्तव में किसी नए सरकारी तंत्र की ज़रुरत नहीं है . ज़रुरत इस बात की है कि साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए ज़रूरी नियम कानून ऐसे बनाए जाएँ जिसको राज्य सरकारें मजबूती के साथ लागू कर सकें . इंसाफ़ की डिलीवरी के काम में पारदर्शिता के निजाम की आवश्यकता भी है . लेकिन उस मकसद को हासिल करते हुए यह भी देखना ज़रूरी है कि केंद्र -राज्य सम्बन्ध की जो संविधान की मौलिक व्यवस्था है वह भी खंड खंड न हो जाए.
दंगों के समाजशास्त्र का कोई भी जानकार बता देगा कि दंगे आर्थिक रूप से पिछड़े इलाकों में ज्यादा होते हैं . दिल्ली का १९८४ का सिख विरोधी क़त्ले-आम और २००२ का गुजरात का नरसंहार केवल दो केस हैं जहां साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार संपन्न वर्ग भी हुये थे. इसलिए साम्प्रदायिक दंगों के बार बार होने की संभावना घट रही है क्योंकि देश के ज़्यादातर इलाकों में लोग शिक्षा और सम्पन्नता की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं ज़ाहिर है कि ऐसा होने पर स्थायी नौकरशाही के ढाँचे के जरूरत नहीं रह जायेगी. मनमोहन सरकार के साम्प्रदायिकता विरोधी बिल के वर्तमान स्वरुप का विरोध तो किया जाना चाहिए लेकिन उसमे जो असली खामियां हैं उनको आलोचना का विषय बनाया जाना चाहिए . बेमतलब की आलोचना से बचना चाहिए

Wednesday, March 16, 2011

विकीलीक्स का सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा

शेष नारायण सिंह

सूचना क्रान्ति को इस्तेमाल करके जनपक्षधरता के एक बड़े पैरोकार के रूप में विकीलीक्स ने इतिहास में अपनी जगह बना ली है . विकीलीक्स के संस्थापक ,जूलियन असांज के काम को पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है . यह अलग बात है कि अब अमरीकी शासक वर्गों को उनका काम पसंद नहीं आ रहा है और उनके खिलाफ तरह तरह के मुक़दमे भी किये जा रहे हैं . अमरीकी कूटनीति की खासी दुर्दशा भी हो रही है . अमरीकी राजनीति की वे बातें भी पब्लिक डोमेन में आ रही हैं जो आम तौर पर गुप्त रखी जाती हैं . उन बातों को कहने के लिए कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जिसका आम तौर पर कुछ् मतलब नहीं होता . एक ही बयान के तरह तरह के अर्थ निकाले जाते हैं और यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक चलती रहती है . मनमोहन सिंह की सरकार में अमरीका परस्त त मंत्रियों की तैनाती की सूचना को जिस कच्ची भाषा में भारत में तैनात अमरीकी राजदूत ने वाशिंगटन को दिया था ,उसके चलते नई दिल्ली के कई मंत्रियों के चेहरे से नकाब उठ गया है. अब सबको पता है कि मुरली देवड़ा क्यों मंत्री बने थे और मणि शंकर ऐय्यर को क्यों पैदल किया गया था. दोनों का कारण एक ही था. सरकार के बनने में अमरीका की मर्जी चल रही थी. कभी इस देश की राजनीति में अमरीका विरोधी होना स्टेटस सिम्बल माना जाता था. सत्ता में आने के बाद इंदिरा गाँधी ने अमरीका विरोध को अपनी विदेश नीति और राजनीति का स्थायी भाव बना दिया था . दो खेमों में बंटी दुनिया में अमरीका और रूस के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती थी . इंदिरा गाँधी का दुर्भाग्य था कि उनके पास कुछ ऐसे मौक़ापरस्त और फैशनेबुल लोग इकठ्ठा हो गए थे जो कभी बायें बाजू की छात्र राजनीति में रह चुके थे . बाद में वे खिसक कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे . जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद हासिल किया तो यह लोग उनके साथ लग लिए और रूस छाप कम्युनिज्म के आधार पर राजनीतिक सलाह देने लगे . इसके बहुत सारे घाटे हुए लेकिन एक फ़ायदा भी हुआ.फायदा यह हुआ कि भारत की सरकार अमरीकी हित साधन का माध्यम नहीं बनीं. यह राजनीति १९९१ तक चली लेकिन सोवियत रूस के ढहने के बाद जब पी वी नरसिम्हाराव देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने ऐलानियाँ अमरीका की पक्षधरता की कूटनीति की बुनियाद डाल दी. आर्थिक रूप से अपने मुल्क में पूरी तरह से अमरीकी हितों को आगे बढाने का काम शुरू हो गया. पी वी नरसिम्हाराव के वित्तमंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह ने अमरीकी हितों का पूरा ध्यान रखा और भारत के राष्ट्रीय हित को अमरीकी फायदों से जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई . बाद में जब अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो भारतीय विदेशनीति की छवि अमरीकी हुक्म के गुलाम की बन गयी. अमरीकी विदेश विभाग के एक मझोले दर्जे के अफसर को पटाने के लिए भारत के विदेश मंत्री बिछ बिछ जाते थे.उसको लेकर अपने गाँव भी गए और हर तरह से राजपूताने की चापलूसी वाली परंपरा के हिसाब से उसका स्वागत सत्कार किया . हालांकि यह विदेश मंत्री महोदय दावा करते थे कि उनके पूर्वज महान थे और वे राजपूताने की गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि थे लेकिन इन श्रीमान जी ने चापलूसी वाला रास्ता ही अपनाया . बाद में उस अफसर ने जब एक किताब लिखी तो भारतीय विदेश मंत्री की छवि की खासी छीछालेदर की.वाजपेयी जी के बाद डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने जिनकी अमरीका के प्रति मुहब्बत किसी से छुपी नहीं है . इस पृष्ठभूमि में नई दिल्ली में तैनात अमरीकी राजदूत के तार को देखने से तस्वीर साफ़ हो जाती है .अमरीकी राजदूत का यह दावा कि मनमोहन सिंह की सरकार में अमरीका के कई दोस्तों को जगह दी गयी है ,भारतीय राजनीति की दुखती रग पर हाथ रख देता है . साथ ही यह भी साफ़ हो जाता है कि अमरीका विरोध की राजनीति अब इतिहास की बात है , भारत में अमरीका परस्ती पूरी तरह से घर बना चुकी है . इस तार के अलावा भी बहुत सारी सूचनाओं को सार्वजनिक करके विकीलीक्स ने पारदर्शिता का निजाम कायम करने की दिशा में पहला क़दम उठा दिया है . राष्ट्रीय अखबार " द हिन्दू " ने इन तारों को सिलसिलेवार छापकर भारतीय राजनीति के ऊपर बहुत उपकार किया है . एक तार में अमरीकी राजदूत ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की कार्यशैली का विश्लेषण किया है . अगर कांग्रेस का आला नेतृत्व इस तार को ध्यान में रख कर आगे की रणनीति बनाए तो उसकी राजनीति को सही ढर्रे पर लाया जा सकता है . जो बात सारे देश को मालूम है वह अमरीकी राजदूत के तार में स्पष्ट तरीके से लिख दी गयी है . जनवरी २००६ के एक तार में अमरीकी राजदूत ने अपनी सरकार को सूचित किया है कि कांग्रेस की एलीट लीडरशिप हिन्दी बेल्ट के ग्रामीण इलाकों में जाकर आम आदमी से कोई भी संपर्क बनाने की कोशिश नहीं करती .इस एलीट लीडरशिप में सोनिया गांधी और उनके बच्चे भी शामिल हैं . तार में लिखा है पूरी कांग्रेस राजनीति सोनिया गाँधी के करिश्मा के आधार पर सत्ता में बने रहने की राजनीति को प्रमुखता देती है . सोनिया गांधी के आस पास जमी हुई कोटरी को भरोसा है कि अगर वे मैडम की नज़र में ठीक हैं तो किसी की भी इज्ज़त उतारने का उन्हें लाइसेंस मिला हुआ है . पार्टी के नंबर एक परिवार के अलावा बाकी लोग एक दूसरे की टांगखिंचाई और निंदा अभियान में मशगूल रहते हैं . इसी तार में कांग्रेस के २२ जनवरी २००६ के हैदराबाद अधिवेशन का भी ज़िक्र है जब वहां जुटे करीब दस हज़ार कांग्रेसियों में से बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि राहुल गांधी को मंच पर बैठाया जाए. ज़ाहिर है उन कांग्रेसियों के दिमाग में रहा होगा कि अगर राहुल गांधी की बात की जायेगी तो मैडम को खुशी होगी. इस तरह विकीलीक्स के दस्तावजों में बहुत सारी सूचना पब्लिक डोमेन में आई है अगर उसका सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा