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Saturday, May 4, 2013

चीनी घुसपैठ के पीछे कहीं उस इलाके का यूरेनियम तो नहीं है ?



शेष नारायण सिंह
लद्दाख में चीनी सेना भारतीय नियंत्रण वाले कुछ क्षेत्रों में घुस आयी है और भारत में इस मुद्दे पर राजनीतिक तूफ़ान मचा हुआ है . मीडिया में हायतोबा मची हई है जैसे दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया हो . भारत में चीन के सन्दर्भ में बहुत भावनात्मक स्तर पर प्रतिक्रिया होती है क्योंकि पचास साल बीत जाने के बाद भी यहाँ १९६२ का चीन का हमला कोई भी नहीं भूल पाया है . चीन के इस काम को कूटनीतिक हलकों में समझ पाना बहुत मुश्किल हो रहा है क्योंकि चीन के मौजूदा रुख से उसका बहुत नुक्सान होने वाला है . आजकल भारत और चीन के बीच व्यापार बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है . २००१ में दोनों देशों के बीच करीब 150 अरब रूपये का कारोबार होता था आज वह बहुत बड़ा हो गया है .बीते साल भारत और चीन के बीच करीब 3300  अरब रूपये का कारोबार हुआ  . इस कारोबार में चीन मुख्य लाभार्थी हैं क्योंकि चीन भारत को जो कुछ निर्यात करता है उसका एक बहुत ही मामूली हिस्सा वह भारत से आयात करता है यानी भारत-चीन व्यापार का पलड़ा चीन के पक्ष में झुका हुआ है और  चीन के तेज़ी से हो रहे आर्थिक विकास में चीन से होने वाले निर्यात का भी योगदान है . अगर दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब होते हैं तो जाहिर है यह व्यापार भी प्रभावित होगा और उसका आर्थिक नुक्सान चीन को ही उठाना होगा. भारत से अच्छे संबंधों का कूटनीतिक लाभ चीन को बाकी दुनिया में भी मिल रहा है . ब्रिक्स देशों की जो राजनीति है उसमें चीन को रूस,ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की तरह ही भारत के साथ होने का लाभ मिल रहा है भारत की हैसियत अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हमेशा से ही एक प्रभावशाली देश की रही है .यहाँ तक कि जब भारत एक गरीब देश माना जाता था तब भी गुटनिरपेक्ष देशों के नेता के रूप में भारत की पहचान एक ऐसे देश की थी जो अमरीका और रूस की मर्जी के खिलाफ कोल्ड वार में सीधे शामिल होने को तैयार नहीं था. चीन को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि १९६२ में जब उसने भारत पर हमला किया था तो उसकी छवि एक आक्रांता देश के रूप में बन गयी थी . पूरी दुनिया में चीन को एक शान्तिविरोधी देश के रूप में देखा जाता था . वह तो जब अपनी आन्तारिक राजनीतिक मजबूरियों को ठीक करने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और विदेशमंत्री हेनरी किसिंजर ने चीन के साथ सम्बन्ध ठीक करने की योजना पर काम करना शुरू किया तब जाकर अंतरराष्ट्रीय जगत में चीन को स्वीकार करने का रिवाज़ शुरू हुआ . इसलिए यह पहेली समझ में नहीं आती कि चीन भारत से रिश्ते खराब करने के लिए क्यों कोशिश करता नज़र आ रहा है जबकि उसमें उसका कोई फायदा नहीं होने वाला है बल्कि नुक्सान ही ज्यादा होगा . बाकी दुनिया की तरह चीन को भी मालूम है कि भारत को आसानी से धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि चीन की तरह ही भारत भी परमाणु हथियार संपन्न देश है और उसकी सैनिक क्षमता १९६२ की तुलना में बहुत ही अच्छी है.
चीन की आतंरिक और पड़ोसी राजनीति भी उसे किसी और मोर्चे पर दुश्मनी का राग शुरू करने की अनुमति नहीं देती . अपने दो महत्वपूर्ण पड़ोसियों जापान और फिलीपीन से उसके कूटनीतिक सम्बन्ध बहुत खराब हो चुके हैं और  रोज ही बिगड रहे हैं . चीन के अंदर भी कुछ राज्यों में तनाव का माहौल है .कुछ राज्यों में अलग अलग समूहों के बीच हिंसक वारदात हो रही हैं .लद्दाख  के देस्पांग इलाके में चीन के सैनिकों की तरफ से पांच टेंट लगा लेने का जो सन्देश भारत की अवाम के बीच पंहुचा है वह १९६२ में खराब हुए रिश्तों को और खराब कर देने की क्षमता रखता है . भारत में एक ताक़तवर विपक्ष है और उस विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी है जिसको चीन के खिलाफ जनमत बनाने से राजनीतिक फायदा होता है क्योंकि वह  देश में एक सन्देश देने की कोशिश करती है कि वामपंथी राजनीतिक विचारधारा वाला चीन हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है और उसका विरोध किया जाना चाहिए. उसके साथ साथ ही बीजेपी राजनीतिक रूप से ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करती है कि भारत में उन राजनीतिक पार्टियों का विरोध किया जाना चाहिए जो कम्युनिस्ट विचारधारा से किसी तरह का वास्ता रखती हों .

इस पृष्ठभूमि भारत से किसी तरह की दुश्मनी चीन के लिए भी घातक हो सकती है इसलिए लद्दाख में उसकी कारस्तानी को समझने के लिए और कुछ और पक्षों पर नज़र डालना होगा .आज की सच्चाई यह है कि लद्दाख क्षेत्र में चीनी सेना भारत के इलाक में घुस गयी है और करीब बीस किलोमीटर अंदर आकर अपने टेंट लगा दिए हैं . गाफिल पड़े भारतीय मिलिटरी इंटेलिजेंस वालों की तरफ से तरह तरह की व्याख्याएं सुनने को मिल रही है लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय सीमा में चीनी सैनिक जम गए हैं और ताज़ा जानकारी के मुताबिक वे वहाँ से हटने को तैयार नहीं हैं .जम्मू-कश्मीर में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में घुसे चीनी सैनिकों ने  तंबू लगाकर अस्थायी चौकी बना ली है.चीन के टेंट को हटाने की कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं लेकिन चीनी सेना फिलहाल पीछे हटने को तैयार नहीं है। दोनों पक्षों के बीच कई बार फ्लैग मीटिंग होने के बावजूद चीन अपने रुख पर अड़ा हुआ है। इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बजाय चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में और भीतर तक बढ़ने की कोशिश में हैं। सूत्र बताते हैं कि घुसपैठ कर रहे चीनी  सैनिकों के पास आधुनिक हथियार  हैं और वे वापस जाने के लिए नहीं आये हैं .
चीनी सेना ने जिस इलाके में घुसपैठ की है वहाँ कोई आबादी तो नहीं है लेकिन इस बात की भी चर्चा है कि उस क्षेत्र में भूगर्भ वैज्ञानिकों ने यूरेनियम होने के संकेत दिए हैं .अगर ऐसा है तो दोनों ही देशों के  लिए इस क्षेत्र का महत्व बहुत बढ़ जाता है कि क्योंकि परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियारों के  लिए  यूरेनियम की ज़रूरत पड़ती ही रहती है . यह बात अभी पक्के तौर पर नहीं मालूम है लेकिन अगर चर्चा है तो धीरे धीरे सब कुछ साफ़ हो जाएगा. भारत में चीन की इस कारस्तानी की तरह तरह से व्याख्या की जा रही है .जानकार बता रहे हैं कि चीन लदाख में भारतीय इलाके में  घुसकर ऐसा माहौल बनाने के चक्कर में है जिससे वह भारत पर दबाव बढ़ा  सके जिस से भारत अपनी सीमा के अंदर जो सड़कें आदि बना रहा है उसे रोका जा सके .चीन ने अपनी तरफ तो बहुत सारी कांक्रीट वाली सड़कें बना ली हैं रेलवे लाइनें बिछा दी हैं  यहाँ तक कि कश्मीर के उन इलाकों में भी चीनी कब्जा हो चुका है जिसे पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर कहा जाता है .दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की हिम्मत चीन के हितों की अनदेखी करने की नहीं है .लेकिन चीन ने भारत में उन लोगों के सामने मुश्किल खड़ी कर दिया है जो दोनों देशों के बीच में  रिश्ते सुधारने के पक्ष में हैं . लद्दाख में चीनी सेना के तम्बुओं ने भारत के उदारमना लोगों की मुश्किल बढ़ा दी है . लेकिन चीन की अपनी रणनीति है .उसने कूटनीतिक चैनलों के ज़रिये यह बात भारत तक पंहुचा दिया है कि दोनों देशों की विवादित सीमा में भारत के कब्जे वाले इलाके में भी अगर भारत कोई स्थायी निर्माण करता है तो वह चीन को स्वीकार नहीं होगा . यह भारत के हित में है कि चीन की इस बात को वह गंभीरता से न ले और तेज़ी से अपना काम करता रहे . अपनी सीमा के अंदर भारत भी चीन की तरह मज़बूत सड़कें वगैरह बनवाता रहे और सीमा पर ऐसी तैयारियां रखे कि अगर चीन किसी तरह के सैनिक एडवेंचर की कोशिश करे तो उसको माकूल जवाब दिया जा सके. कूटनीतिक मोर्चे पर चीन की स्थिति बहुत साफ़ है . वह यह मानने को तैयार नहीं है कि कहीं कोई गडबड है . चीनी नेता तो यह भी मानने को तैयार नहीं है कि उनके हेलीकाप्टरों ने भारतीय  इलाके में कोई घुसपैठ की थी. इस बीच दोनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला भी जारी है . अगले हफ्ते भारत के विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद चीन की यात्रा पर जा रहे हैं .हालांकि भारत की कुछ विरोधी पार्टियां इस दौरे का विरोध कर रही हैं. बीजेपी का विरोध तो शुद्ध रूप से राजनीतिक है लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव भी चीन से अच्छे संबंधों की कीमत पर सीमा पर चीन की गतिविधियों के घोर विरोधी हैं . उन्होंने पिछले दिनों संसद में बहुत ही ज़ोरदार शब्दों में भारत की चीन नीति का विरोध किया और मांग की कि जब तक चीन अपनी सेना को भारत के क्षेत्र से वापस नहीं बुला लेता तब  तक विदेशमंत्री को चीन जाने की ज़रूरत नहीं है .
 अमरीका भी भारत और चीन के अच्छे संबंधों का  पक्षधर हो गया है .अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता पैट्रिक वेंट्रल ने अपनी नियमित प्रेस वार्ता में बताया कि अमरीका चाहता है कि भारत और चीन अपने सीमा विवाद को आपसी बातचीत से बिना किसी अन्य देश के सहयोग  के खुद  हल कर लें .यह अलग बात है कि भारत और चीन को अब अमरीकी राय की कुछ भी परवाह नहीं है लेकिन हर देश के मामलों में दखल देने की आदत बना चुके अमरीका को कुछ न कुछ कहना होता है सो उसने भी अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया है .
इस बीच संतोष की बात यह है कि चीनी घुसपैठ के बावजूद दोनों देशों के बीच सामान्य संवाद की स्थिति बनी हुई है . चीन की यात्रा पर जा रहे विदेशमंत्री की यात्रा का विरोध बीजेपी वाले कर ही रहे हैं . लेकिन वे जायेगें . समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने लोकसभा वाले भाषण में कह दिया था कि सेना के मुखिया ने सरकार से लद्दाख क्षेत्र में घुस आये चीनियों को खदेड़ने की अनुमति माँगी है . यह गंभीर मामला है क्योंकि सेनाध्यक्ष  को सरकार के हुक्म का पालन करना  होता है उनके पास किसी तरह का कूटनीतिक दखल देने का अधिकार नहीं होता . बहरहाल सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के सामने बुधवार को सेनाध्यक्ष की पेशी हुई और उनसे स्थिति की सही जानकारी ली गयी . उन्होने  साफ़ किया कि उन्होंने ऐसी कोई बात कहीं नहीं की थी और सेना की तैयारी के बारे में भी सरकार को जानकारी दी. सेना का चीनी सेना के साथ प्रस्तावित अभ्यास भी अभी रद्द नहीं किया गया है . दो देशों की सेनाएं समय समय पर  अभ्यास करती रहती हैं .इसके अलावा मई दिवस के दिन भारतीय सेना का एक प्रतिनधिमंडल चीन की सीमा में जाकर उनके समारोह में शामिल हुआ . दोनों देशों के बीच साल में चार बार इस तरह की औपचारिक मुलाकातें होने की परम्परा है . चीनी सेना के अफसर भारत की सीमा में १५ अगस्त और २६ जनवरी को आते हैं और भारतीय सेना का प्रतिनिधिमंडल चीन की तरफ  मई दिवस  के लिए १ मई को और चीन के राष्ट्रीय दिवस के जश्न के लिए १ अक्टूबर को जाता है . दुनिया के शांतिप्रिय लोगों की नज़र चीनी घुसपैठ पर  लगी हुई है क्योंकि अगर दो बड़े देशों के बीच तनाव बढ़ेगा तो शान्ति को बहुत बड़ा नुक्सान होगा.

Thursday, May 2, 2013

जंग मगरिब में या कि मशरिक में ,उसका विरोध किया जाना चाहिए



 
 
शेष नारायण सिंह
 
 
लद्दाख क्षेत्र में चीनी सेना भारत के इलाक में घुस गयी है और करीब बीस किलोमीटर अंदर आकर अपने टेंट लगा दिए हैं . गाफिल पड़े भारतीय मिलिटरी इंटेलिजेंस वालों की तरफ से तरह तरह की व्याख्याएं सुनने को मिल रही है लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय सीमा में चीनी सैनिक जम गए हैं और ताज़ा जानकारी के मुताबिक वे वहाँ से हटने को तैयार नहीं हैं .जम्मू-कश्मीर में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में घुसे चीनी सैनिकों ने यहां अपना एक और तंबू गाड़ कर अस्थायी चौकी बना ली है.चीन के टेंट को हटाने की कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं लेकिन  चीनी सेना फिलहाल पीछे हटने को तैयार नहीं है। दोनों पक्षों के बीच तीन बार फ्लैग मीटिंग होने के बावजूद चीन अपने रुख पर अड़ा हुआ है। इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बजाय चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में और भीतर तक बढ़ने की कोशिश में हैं। सूत्र बताते हैं कि घुसपैठ कर रहे चीनी  सैनिकों के पास आधुनिक हथियार  हैं और वे वापस जाने के लिए नहीं आये हैं . यू पी ए के मुख्य सहयोगी समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा में लद्दाख क्षेत्र में  चीनी  घुसपैठ के मुद्दे को बहुत जोर शोर से उठाया .उन्होंने कहा कि  डॉ राम मनोहर लोहिया ने आज़ादी के बाद ही जवाहर लाल नेहरू को चेतावनी  दे दी थी कि चीन के इरादों से चौकन्ना रहें लेकिन नेहरू ने उनकी बात को तवज्जो नहीं दी . और चीन से दोस्ती का राग जारी रखा . जब तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाइ भारत आये थे तब भी डॉ लोहिया ने उनकी मंशा पर नज़र रखने को कहा था लेकिन जवाहरलाल नेहरू उन दिनों पंचशील की बात पर अड़े हुए थे . जब १९६२ में चीन ने  हमला कर दिया तब नेहरू की आँखें खुलीं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और चीन ने भारत को पीछे हटने को मजबूर कर दिया था . मौजूदा चीनी कार्रवाई के बारे में मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सरकार इस मामले में हाथ में हाथ धरे बैठी है.उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार घुसपैठ की समस्या से निपटने में कायरों की तरह काम कर रही है.उन्होंने चीन को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बताया और कहा कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है .उन्होंने कहा कि हम कई वर्षों से  चेतावनी दे रहे हैं कि चीन ने हमारे क्षेत्र पर कब्जा करना शुरू कर दिया है. लेकिन सरकार है कि सुनने को तैयार नहीं है.”मुलायम सिंह यादव ने कहा सेना चीन को खदेड़ने के लिए तैयार है लेकिन सरकार की तरफ से इस मामले में भी ढिलाई बरती  जा रही है . मुलायम सिंह ने दावा किया  कि “ये सरकार कायर, अक्षम और बेकार है.” साथ ही उन्होंने खुर्शीद के चीन की यात्रा पर जाने के माले में भी सवाल उठाए. चीन के प्रधानमंत्री की अगले महीने होने वाली भारत यात्रा की तैयारियों के सिलसिले में खुर्शीद नौ मई को चीन जा रहे हैं.उन्होंने कहा कि जब चीन हमारे क्षेत्र में घुस रहा है क्या विदेश मंत्री चीन के दौरे पर भीख मांगने जा रहे हैं .मुलायम सिंह यादव ने सरकार से यह भी कहा कि जब सेना प्रमुख कह रहे हैं कि वे चीनियों को वापस खदेड़ने के लिए तैयार हैं तो  सरकार क्यों नहीं क़दम उठाती . मुलायम सिंह को यह पता होना चाहिए कि अगर सरकार फौज के ज़रिये सीमा की समस्या का हल निकालने की कोशिश करेगी तो युद्ध होगा और डॉ राम मनोहर लोहिया कभी भी युद्ध के पक्ष में नहीं थे. वे हमेशा शान्ति पूर्ण तरीके से ही समस्या का हल निकालने के पक्ष धर रहे . क्योंकि जंग मगरिब में या कि मशरिक में ,खून गरीब इंसान का ही बहता है . सत्ताधीश तो खून बहाने के बाद शान्ति समझौते करते नज़र आते हैं . १९६२ की लड़ाई के बाद भारत और चीन के सम्बन्ध बहुत बिगड गए थे . दोनों देशों के बीच में कूटनीतिक सम्बन्ध भी खत्म हो गए तह लेकिन जब अमरीका ने हेनरी कीसिंजर के दौर में चीन से  दोस्ती बढानी शुरू की तो  बाकी दुनिया में भी माहौल बदला और भारत ने चीन के साथ दोबारा १९७६ में कूटनीतिक सम्बन्ध कायम कर लिया लेकिन दोनों देशों के बीच जो चार हज़ार किलोमीटर की सीमा है उसमें जगह जगह पर विवाद के मौके पैदा होते रहते हैं . चीन के १९६२ के हमले के पचास साल बाद भी आज दोनों देशों के बीच सीमा का विवाद  कहीं से भी हल होता नज़र नहीं आता .सीमा के  इलाकों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां दोनों ही देश अपनी दावेदारी की बात करते  हैं. लद्दाख में  बहुत बड़े भारतीय भूभाग पर चीन का कब्जा है . वह उसको अपना बताता है और उसका दावा है कि बाकी लद्दाख भी उसी के पास होना चाहिए . अरुणाचल प्रदेश को भी चीन अपना बताता है और सारी दुनिया में कहता फिरता है कि भारत ने उसके इलाके पर कब्जा कर रखा है . अरुणाचल के विवाद की जड़ में पूर्वी भाग की करीब नौ सौ  किलोमीटर की सीमा पर झगडा है . करीब सौ साल पहले १९१४ में सर हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत और ब्रिटेन के बीच इस विवाद को सुलझा देने का दावा किया था .तिब्बत  तब एक स्वतन्त्र देश हुआ करता था .आजकल तो चीन का कब्जे में है .जो सीमा रेखा तय हुई थी उसको ही आज मैकमोहन लाइन कहते हैं .जब ब्रिटेन और तिब्बत के बीच सीमा की बातचीत चल रही थी तो भारत तो पूरी तरह से ब्रिटेन के अधीन था .ज़ाहिर है कि उसका हित ब्रिटेन ही देख रहा था . और ब्रिटेन एक ताक़तवर साम्राज्य था इसलिए उस विवाद को सुलझाने में सर हेनरी मैकमोहन ने चीन को भी केवल आब्ज़र्वर की हैसियत ही दी थी ,उसको विचारविमर्श में शामिल नहीं किया था. मैकमोहन लाइन की एक खास बात यह भी है कि वह बहुत मोटी निब वाले कलम से मार्क की गयी थी जिसकी वजह से  गलती का मार्जिन १० किलोमीटर तक का है . ८९० किलोमीटर की सीमा में अगर १० किलोमीटर का गलती का मार्जिन है तो वह करीब ८९०० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विवाद की ज़द में तुरंत ही स्थापित कर देता है .उत्तराखंड के इलाके में भी भारत और चीन का सीमा विवाद होता ही रहता है क्योंकि बहुत सारे इलाके ऐसे हैं जहां भारतीय और चीनी सैनिक पंहुच ही नहीं सकते . नतीजा यह होता है कि सेना के साथ काम करने वाले कुत्तों का इस्तेमाल ही अपनी सीमाओं को रेखांकित करने के लिए किया जाता है .भारत और चीन के बीच में कई बार ऐसे माहौल को देखा गया है जैसा कि आजकल बना हुआ है . एक बार तो १९८६ में ऐसा लगने लगा था कि उत्तरी तवांग जिले में फौजें भिड जायेगीं . भारत ने भी अपने करीब दो लाख सैनिक वहाँ भेज दिया था लेकिन बात संभल गयी . सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच में १९६२ की लड़ाई के बाद बहुत ही तल्ख़ रिश्ते बन गए थे और १९६७ तक कभी कभार सीमा पर तैनात दोनों देशों के सैनिकों के बीच गोली भी चल जाया करती थी लेकिन १९६७ के बाद दोनों देशों के बीच एक भी गोली नहीं चली है . १९६२ की अपमानजनक हार के बाद भारत में चीन को लेकर बहुत चिंताएं हैं . चीन के साथ किसी तरह की  दोस्ती की बात को आगे बढ़ा पाना भारतीय राजनेताओं के लिए लगभग असंभव होता है .लेकिन दोनों देशों के बीच के झगडे को खत्म करने का एक ही तरीका है कि भारत और चीन यह बात स्वीकार कर लें कि जो जहां है वहीं ठीक है . भारत के बहुत बड़े भूभाग पर चीन का कब्जा है . कश्मीर और लद्दाख में कई जगहों पर चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर भारतीय ज़मीन पर कब्जा कर रखा है . चीन दावा करता है कि अरुणाचल प्रदेश समेत एक बड़ा हिस्सा उसका है जिसपर भारत का  कब्जा है .ज़ाहिर है  कि दोनों ही  देश सैनिक ताक़त में बहुत मज़बूत हैं . दोनों ही परमाणु हथियार संपन्न देश हैं और आर्थिक ताक़त भी बन रहे हैं . न चीन भारत को हडका सकता है और न ही चीन भारत से डरने वाला है . ज़ाहिर है दोनों देशों के विवाद को हल करने में सेना का  कोई योगदान नहीं होगा . जो भी हल निकलेगा वह बातचीत से ही निकलेगा . और बातचीत में सहमति का सबसे मज़बूत आधार स्टेट्स को यानी यथास्थिति को बनाए रख कर समझौता करना ही हो सकता है . इस तरह का प्रस्ताव अस्सी के दशक में चीन के प्रधानमंत्री डेंग शाओपिंग दे भी  चुके हैं लेकिन भारत में यथास्थिति को बरकरार रख कर कोई समझौता करने वाली पार्टी और उसका नेता राजनीतिक रूप से समाप्त हो जाएगा . इन खतरों के बावजूद  2003 में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार ने पहल की और वाजपेयी सरकार ने यथास्थिति के सिद्धांत का पालन करते हुए शान्ति स्थापित करने की कोशिश शुरू की . चीन ने भी जो ज़मीन भारत के पास  है उसको भारत का मानने की  नीति पर काम करना शुरू कर दिया. दोनों देशों ने  इस काम के लिए विशेष दूतों की तैनाती की और बातचीत का सिलसिला चल पड़ा .अब तक इस सन्दर्भ में दो दर्ज़न से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं .२००५ में एक समझौता भी हुआ जिसमें संभावित अंतिम समझौते के दिशा निर्देश और राजनीतिक आयाम को शामिल किया गया है .इस समझौते में यह भी लिखा है कि आबादी का विस्थापन  नहीं होगा. इसका मतलब यह हुआ कि चीन तवांग जिले पर अपनी दावेदारी को भूलने को तैयार था. लेकिन बाद में सब कुछ बिगड गया . चीन ने मीडिया और अपने नेताओं के ज़रिये अजीबोगरीब बातें करना शुरू कर दिया और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों के लिए अलग तरह  का वीजा देना शुरू कर दिया . जिसके कारण रिश्ते खराब होते गए . चीन ने सीमा के पास बहुत  ही अच्छी सड़कें बना ली हैं और भारत ने भी असम के आसपास अपनी सैनिक मौजूदगी को और पुख्ता किया है . दोनों देशों के बीच जो अविश्वास का माहौल बना है उसके चलते सब कुछ गडबड होने की दिशा में पिछले कई वर्षों से चल रहा है और लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेकटर में चीनी सैनिकों का आगे बढ़ कर अपने  टेंट लगा देना उन्हीं  बिगड़ते रिश्तों का एक नमूना है . लेकिन बिगड़ते रिश्तों को ठीक करने की कोशिश की जानी चाहिए ,उसके लिए हर तरह के प्रयास किये जाने चाहिए क्योंकि दोनों देशों के बीच अगर युद्ध की  स्थिति बनी तो खून तो गरीब आदमी का ही बहेगा .