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Saturday, August 14, 2010

क्या इसी नेतृत्व के साथ किया जायेगा फासिस्टों से मुकाबला

शेष नारायण सिंह

पश्चिम बंगाल में सरकार गँवा देने के मुहाने पर खडी मार्क्सवादी काम्युनिस्ट पार्टी को अपनी एक और ऐतिहासिक भूल का पता लग गया है . पार्टी के लगभग सभी बड़े नेता आन्ध्र प्रदेश के नगर ,विजयवाड़ा में मिले और स्वीकार किया कि यू पी ए सरकार से समर्थन वापस लेने में देर हो गयी . पार्टी को लगता है कि समर्थन उसी वक़्त वापस ले लेना चाहिए था जब यू पी ए -प्रथम सरकार अमरीका से परमाणु समझौता करने का मंसूबा ही बना रही थी. अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा गया है कि पार्टी के पोलित ब्यूरो और सेन्ट्रल कमेटी ने इस बात का सही आकलन नहीं किया कि मनमोहन सिंह की उस वक़्त की सरकार का इरादा कितना पक्का है . इसलिए गलती हो गयी. ज़ाहिर है कि मार्क्सवादी पार्टी ने अपनी एक और ऐतिहासिक भूल को स्वीकार कर लिया है . इसके पहले भी यह पार्टी कई ऐतिहासिक भूलें कर चुकी है लेकिन इस भूल का रंग थोडा अलग है . जब १९९६ में ज्योति बसु को मुख्य मंत्री बनने से रोका गया था ,उसे भी सी पी एम के आर्काइव्ज़ में एक बड़ी ऐतिहासिक भूल की श्रेणी में रख दिया गया है . उस भूल के सूत्रधार भी आज के महासचिव , प्रकाश करात को माना जाता है लेकिन उन दिनों वे परदे के पीछे से अपना काम करते थे. . अब खेल बदल गया है . वे खुद ही पार्टी के आला अफसर हैं और जो मन में आता है उसी को नीति बनाकर पेश कर देते हैं . इसलिए जब परमाणु समझौते के मुद्दे पर मनमोहन सिंह सरकार को गिराने की बात आई तो वे पूरी तरह से कंट्रोल में थे. जिसने भी उनकी बात नहीं मानी उसको डांट दिया . महासचिव का फरमान आया कि पार्टी के बड़े नेता और लोक सभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी अपना पद छोड़ दें . सोमनाथ जी ने पार्टी के सबसे आदरणीय नेता ज्योति बसु से राय ली और कहा कि अभी इस्तीफ़ा देना ठीक नहीं है क्योंकि स्पीकर तो पार्टी की राजनीति से ऊपर उठ चुका होता है.. करात बाबू को गुस्सा आ गया और उन्होंने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया. अपनी जीवनीमें सोमनाथ चटर्जी ने उस वक़्त की तानाशाही की बात को विस्तार से लिखा है . मार्क्सवादी पार्टी के बड़े नेता और पार्टी से सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवी मानते हैं कि वह फैसला इतना बेतुका था कि उसके घाव को वामपंथी आन्दोलन बहुत दिन तक झेलेगा. एक मत यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पार्टी की हालत उसी दिन से बिगड़ना शुरू हो गयी थी जिस दिन सोमनाथ दा को निकाला गया था. अब विजयवाड़ा में पेश किये गए कागजों से पता चलता है कि पार्टी ने स्वीकार किया है कि ' पार्टी ने अपनी ताक़त को ज्यादा आंक लिया था, इसी वजह से गलती हो गयी . आत्मालोचन की इस बात में दम है . यह बात बिकुल सच है कि पार्टी ने अपनी ताक़त को बहुत बढ़ा चढ़ा कर आंक लिया था . पार्टी के आला हाकिम को मुगालता हो गया था कि वह मायावती, चन्द्रबाबू नायडू आदि नेताओं का नेता बन जाएगा और तीसरा मोर्चा एक सच्चाई बन जाएगा और जब चुनाव होगें तो चारो तरफ मार्क्सवादी पार्टी की ताक़त का डंका बज जाएगा. इस सारे खेल में सबसे अजीब बात यह है कि पार्टी के सबसे बड़े नेता के अलावा सब को मालूम था कि वह मुंगेरी लाल के हसीन सपने देख रहा है लेकिन उसे उस वक़्त रोकना असंभव था. केरल में एक भ्रष्ट नेता को ईमानदार साबित करने का प्रोजेक्ट भी उसी मनोदशा का नमूना है . बहर हाल अब पार्टी का लगभग सब कुछ ख़त्म होने को है . और अगर सोमनाथ चटर्जी की बात का विश्वास करें तो इसके लिए जिम्मेवार केवल प्रकाश करात हैं . उनका कहना है कि पार्टी के वर्तमान महासचिव में दंभ बहुत ज्यादा है और वे अपनी बात के सामने किसी को सही नहीं मानते. उनकी दूसरी सबसे बड़ी दिक्क़त यह है कि वे किसी तरह के विरोध को बर्दाश्त नहीं कर पाते और विरोध करने वाले को दुश्मन मान बैठते हैं. बहर हाल विजयवाड़ा में एक बार फिर यह तय किया गया है कि गैर कांग्रेस-गैर बी जे पी विकल्प की तलाश जारी रहेगी . अब जब कुछ महीनों बाद बंगाल में भी सत्ता लुट जायगी तो इस काम को करने के लिए बड़ी संख्या में नेता भी मिल जायेगें और एक बार फिर जनवादी राजनीति को ज़मीन पर विकास का मौक़ा दिया जाएगा . इस बार बस फर्क इतना है कि आर एस एस की रहनुमाई में फासिस्ट ताकतें पहले से बहुत ज्यादा मज़बूत हैं और एक आदमी की जिद के चलते कम्युनिस्ट पार्टियां बहुत कमज़ोर हो चुकी हैं