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Tuesday, July 6, 2010

छत्रपति साहूजी और ज्योतिबा फुले से बड़ा कोई कांग्रेसी नहीं है.

शेष नारायण सिंह

अमेठी संसदीय क्षेत्र के इलाके को एक जिले में तब्दील कर दिया गया है. वास्तव में रायबरेली और सुलतानपुर जिले के कुछ इलाकों को मिला कर इस चुनावक्षेत्र का गठन किया गया था. आजादी के बाद यह इलाका बहुत ही उपेक्षित रहा. जब कि वी आई पी लोगों के चुनाव क्षेत्रों से घिरा हुआ था . इस इलाके में विकास नाम की कोई चीज़ नहीं थी इसलिए लोग इसे कोई मह्त्व नहीं देते थे. पड़ोसी संसदीय क्षेत्रों सुलतान पुर से डॉ केसकर और गोविन्द मालवीय चुने जाते थे, जबकि रायबरेली, फ़िरोज़ गाँधी और इंदिरा गाँधी का क्षेत्र था प्रतापगढ़ से दिनेश सिंह जीतते थे . लेकिन अमेठी से कोई मामूली नेता ही लड़ता रहा. लेकिन १९७५ में इमरजेंसी लगने के बाद जब संजय गाँधी ने रायबरेली के पड़ोसी इस उपेक्षित इलाके को अपना क्षेत्र बनाने का फैसला किया तो इस इलाके के दिन बदल गए. १९७७ के चुनाव में तो संजय गाँधी हार गए लेकिन १९८० से आज तक यह इंदिरा जी के बच्चों का ही क्षेत्र बना हुआ है . बीच में बड़े बड़े सूरमा यहाँ से चुनाव लड़ने गए लेकिन हारकर लौटे . राजमोहन गाँधी और शरद यादव भी यहाँ चुनाव हार चुके हैं . आमतौर पर माना जाता है कि अमेठी में कांग्रेस को हरा पाना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन है .. ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए कांग्रेस ने अमेठी में बहुत पैसा लगाया है . १९८० से लेकर अब तक अमेठी में सरकारी खजाने से हज़ारों करोड़ रूपया लग चुका है . पिछले ३० वर्षों में यहाँ कारोबार करने आये उद्योगपति , हज़ारों करोड़ का गबन कर चुके हैं . सम्राट साइकिल और मालविका स्टील वालों ने बड़ी रक़म सरकारी बैंकों और सरकारी वित्तीय संस्थाओं से ली और लेकर चम्पत हो गए. केंद्र सरकार में बैठे लोगों को खिलाते पिलाते रहे और सब डकार गए. राजीव गाँधी , सोनिया गाँधी ,सतीश शर्मा और राहुल गाँधी के कार्यकर्ताओं में ऐसे हज़ारों लोग मिल जायेगें जिन्होंने अपने नेताओं के आशीर्वाद से करोड़ों की संपत्ति जमा कर ली है .अमेठी संसदीय क्षेत्र में राजनीतिक लोगों की एक फौज तैयार हो गयी है जो लखनऊ, मुंबई और दिल्ली में घूमते रहते हैं और लोगों का काम करवा कर पैसा झटकते रहते हैं . एक और अजीब बात हुई है . राय बरेली और अमेठी को तो सरकारी अमला महत्व देता रहा है लेकिन पड़ोस के सुलतानपुर जिले को सौत के बच्चे की तरह ट्रीट करता है . सुलतान पुर जिले में आठ विधान सभा क्षेत्र हैं . इनमें से तीन अमेठी में पड़ते हैं और बाकी पांच सुलतानपुर संसदीय क्षेत्र में . लेकिन जब सुलतानपुर जिले के लिए केंद्र या राज्य सरकारों से कोई मदद मिलती है तो वह सारी की सारी अमेठी का हक मानी जातीहै . इस तरह सुलतान पुर का दो तिहाई हिस्सा विकास की गति में बहुत पिछड़ गया है .अमेठी को सुलतानपुर से अलग करके मायावती ने सुलतानपुर संसदीय क्षेत्र के लोगों का सम्मान अर्जित किया है . अब उनके जिले के लिए मिलने वाली मदद पर उनका ही हक होगा. जहां तक अमेठी को जिला बनाने की बात है इसका प्रस्ताव एक बार राजीव गाँधी के जीवन काल में भी गंभीरता से उठा था लेकिन उस वक़्त के मुख्य मंत्री वीर बहादुर सिंह ने समझा दिया था कि उस से राजनीतिक नुकसान होगा. बात आई गयी हो गयी थी . अपने पिछले कार्यकाल में मायवती ने जिले के गठन की घोषणा कर दी थी लेकिन मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद उस फैसले को बदल दिया गया. अब हाई कोर्ट के आदेश पर फिर से जिला बना है और उस पर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है .सच्ची बात यह है कि नए जिले के गठन से सबको खुशी है . लेकिन कांग्रेस में सोनिया गाँधी और राहुल गांधी के प्रति अपनी वफादारी का स्वांग करने वाले लोग जुट गए हैं कि जिले के नामकरण को मुद्दा बनाकर विरोध किया जाए. हालांकि उस विषय पर सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी से बात करने का मौक़ा नहीं मिला है लेकिन साधारण तरीके से सोचने वाला कोई भी व्यक्ति इस मामले को मुद्दा नहीं बनाना चाहेगा. भक्त कांग्रेसियों की इच्छा है कि इस जिले का नाम राजीव गाँधी के नाम पर रखा जाना चाहिए क्योंकि यह उनकी कर्मस्थली रही है. जहां जिला बना है उसकी हर सड़क पर राजीव गाँधी जा चुके हैं , यहाँ के हज़ारों परिवारों की मदद कर चुके हैं जब कि छत्रपति साहूजी महराज के बारे में इस इलाके में बड़ी संख्या में लोग जानते ही नहीं होंगें. लेकिन इस मामले में कांग्रेस के गंभीर नेताओं ने चुप रहना ही ठीक समझा . वैसे भी अगर एक जिले का नाम राजीव गाँधी के नाम पर नहीं पड़ा तो क्या फर्क पड़ने वाला है .जिस देश में लगभग हर इलाके में राजीव गाँधी के नाम पर कुछ न कुछ बन चुका हो , वहां एक जिले के नामकरण को मुद्दा बनाना ठीक नहीं है . वैसे भी जो पार्टी सरकार में रहती है वह अपने महान लोगों के नाम पर संस्थाएं तो बनाती है . कांग्रेस इस खेलमें सबसे आगे है. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी , राजीव गाँधी यहाँ तक कि संजय गाँधी के नाम पर भी संस्थाओं के नाम रखे गए हैं . इसलिए कांग्रेस को शिकायत नहीं होनी चाहिए .जहां भी बी जे पी की सरकार है वे लोग भी अपने नेताओं के नाम पर संस्थाओं के नाम रखते हैं . यह अलग बात है कि उनके पास ऐसे बहुत कम हीरो हैं जिन्होंने जीवन में या राष्ट्र निर्माण में बुलंदियां हासिल की हों लेकिन जो भी हैं , उनके नाम पर संस्थाएं बन रही हैं . बी जे पी वाले तो महापुरुषों को अपनाने के मामले में थोडा ज़्यादा ही उत्साही हैं . उनके यहाँ कांग्रेस पार्टी के सदस्य महात्मा गाँधी और सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश हो चुकी है . एक बार तो वे सरदार भगत सिंह को भी अपना बताने लगे थे . जब मालूम पड़ा कि सरदार भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे , तब जाकर उनको बख्शा गया .बी जे पी ने तो खैर वी डी सावरकर को भारत रत्न देने की कोशिश की थी . सही बात यह है कि कांग्रेस के अलावा बाकी पार्टियों में महान नेताओं और आज़ादी की लड़ाई के सेनानियों की किल्लत है . यह संकट मायावती का भी है . वे डॉ अंबेडकर के अलावा किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को नेता ही नहीं मानतीं . इसलिए ऐतिहासिक महापुरुषों के नाम पर संस्थाओं का नामकरण करती हैं . हालांकि यह भी सच है कि जिन लोगों के नाम पर वे संस्थाएं बना रही हैं वे सही अर्थों में आज के भारत के संस्थापक थे. मायावती ने ज्योति राव फुले के नाम पर कई संस्थाओं का नामकरण किया है , वे बहुत क्रांतिकारी समाज सुधारक थे. आज़ादी की लड़ाई में जिन मूल्यों की स्थापना करने की कोशिश की जा रही थी , महात्मा फुले उसके आदि पुरुष हैं . उन्होंने सवर्ण सत्ता के खिलाफ १८४८ में पूना में दलित लड़कियों के लिए स्कूल शुरू कर दिया था और सज़ा भोगी थी. उनके अपने पिता ने उन्हें इस जुर्म में घर से निकाल दिया था . ज़ाहिर है कांग्रेस में इतना बड़ा त्याग करने वाला कोई नहीं है . छत्रपति साहूजी भी अपने समय के क्रांतिकारी महापुरुष हैं . उनके नाम से किसी भी भारतवासी को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए

Tuesday, November 3, 2009

ज्योतिबा फुले ने दलित पक्षधरता की तमीज सिखाई

महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज की शताब्दी के वर्ष में कई स्तरों पर उस किताब की चर्चा हो रही है, जो जायज भी है। महात्मा जी की इसी किताब ने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक विजय के एक हथियार के रूप में विकसित करने की प्रेरणा दी और 1920 से 1947 तक की भारत की राजनीतिक यात्रा के पाथेय के रूप में हिंद स्वराज में बताये गये मंत्र अमर हो गये।
दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है।
1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने 1848 में ही मार्क्‍स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया। 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया।
महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है। इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है। न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है। महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया। उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया। कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए। उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी। ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे। वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे।
महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्घांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है। उनका कहना था कि यह सोच जातिव्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए। फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है। यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है।
महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा। उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है। ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे।
स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।
महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।
स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया।
महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है। आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है।