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Monday, March 1, 2010

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!

कवि ,लेखक और चिन्तक अरविन्द चतुर्वेद का यह शाहकार मुझे इतना अच्छा लगा कि मन ने कहा , हाय हसन ,हम न हुए. बिना उनको बताये, इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूँ. देखें क्या होता है .
http://yaarkahani.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html


अरविंद चतुर्वेद


सृष्टि की सर्वोत्तम रचना होकर भी पुरूष रंगों के मामले में प्रकृति से कई हाथ पीछे है। प्रकृति हमसे कहीं ज्यादा रंगीन है। उसके खजाने में रंग ही रंग हैं। आदमी ने रंगों के आचरण का पहला पाठ भी प्रकृति से ही पढ़ा होगा। यानी रंगों की पाठशाला में प्रकृति की भूमिका शिक्षक की है और पुरूष की महज एक छात्र की। भांति-भांति के पशु-पक्षी हमसे ज्यादा रंग-बिरंगे हैं और तितलियां तो खैर उड़ते-थिरकते रंग ही हैं। हालांकि ये सब न फैशन शो लगाते हैं और न कैटवाक करते हैं। इसकी जरूरत हमें पड़ती है, क्योंकि जैसे-जैसे आदमी के भीतर के रंग गायब होते जाते हैं, वैसे-वैसे वह बाहर ही बाहर रंग तलाशने लगता है। मन न रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा! लेकिन यह जरा दार्शनिक किस्म की बात हो गई, इसलिए इसे यहीं छोड़ते हैं।
फिर भी होली का त्यौहार है- रंगों का उत्सव, तो भीतरी रंग के लिए कबीर को याद करना ही पड़ेगा- लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल/ लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल। ऐसी सम्पूर्ण रंगीनी क्यों नहीं है हमारे मिजाज में? पहले थी लेकिन आज क्यों नहीं है। एक तरफ तो आदमी के भीतर के रंग सूखते जा रहे हैं और दूसरी ओर वे राजनीति और साम्प्रदायिकता के शिकार होते गए हैं। एक सम्प्रदाय हरे रंग का दीवाना है तो दूसरा केशरिया रंग ले उड़ा है। जिसे दोनों सम्प्रदायों की राजनीति करते हुए अपनी रोटी सेंकनी है, वह दुरंगा हो गया है। एक मोहतरमा तो नीले रंग पर कब्जा जमाकर नीलिमा ही बन बैठी हैं। इस बदरंग परिदृश्य में भीतर के रंग सूखगें नहीं तो क्या होगा?
हाय, कहां हो नीलांजना! होली का त्यौहार है और तुम उदास खोई-खोई-सी बैठी हो? वेलेंटाइल डे जैसे प्रेम दिवस को पानी पी-पीकर कोसने वाले संस्कृति के वीर बांकुड़े होली के हास-उल्लास, रंग-उमंग और रस रंग को बनाए रखने के लिए क्या कर रहे हैं? राग फाग गाते हुए, अबीर गुलाल उड़ाते हाथों में रंग पिचकारी लिए सबको रंगों में सराबोर कर देने के लिए क्या उनकी टोलियां सड़कों पर निकलेंगी? उनके मन में वेलेंटाइन के प्रति केवल घृणा भरी है, विद्वेष और उन्माद ही भरा है या होलिकोत्सव के लिए वह राग-अनुराग भी है, जो सबको प्रेम के रंग में सराबोर कर दे! कहीं उनकी होली की तैयारी क्यों नहीं है, जो ढोल-मंजीरा बजाते हुए फाग गा सकते हैं। अधिक से अधिक यही होगा कि होली पर फिल्मों के गाने बजेंगे-होली आई रे कन्हाई या फिर रंग बरसे, भीजे चुनर वाली..., थोड़ा हुल्लड़ होगा, कुछ लोग रंग में भंग करेंगे और होली की जैसे-तैसे रस्म अदा कर दी जाएगी। सच्चाई तो यह है कि दूसरे लोकोत्सवों और तीज-त्यौहारों की तरह होली पर भी हमारी पकड़ ढीली पड़ती जा रही है।
दरअसल, रंगों का त्यौहार होली हो या दूसरे लोकोत्सव हों, सभी प्रकृति के सहचार में उपजी संस्कृति के ही अंग हैं। चूंकि आज हम प्रकृति विरोधी हो गए हैं इसलिए तीज-त्यौहारों की संस्कृति भी हमसे गाहे बगाहे छूटती जा रही है। गांवों के विनाश की कीमत पर जिस शहरी संस्कृति का हमने विकास किया है, उसमें प्रकृति का तो कोई स्थान है नहीं, लिहाजा हमारे तीज-त्यौहार या तो उसमें अनफिट हो जाते हैं या फिर उनका स्वरूप विकृत हो जाता है। हम जितने बड़े शहर में रहते हैं, तीज-त्यौहारों से हमारी दूरी भी उतनी ही बढ़ जाती है। उसकी आत्मा, उसका मन, जीवन के राग, उमंग, उल्लास सभी उससे विदा ले लेते हैं। आदमी महज एक कामकाजी मशीन बनकर रह जाता है और त्यौहार प्रकृति की छांह से अनाथ होकर आदमी के लिए आनंदोत्सव के बजाय पीड़ादायक अनुभूति बन जाते हैं। लाखों की भीड़ में जहां आदमी इतना अकेला हो गया है कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को पहचानता तक नहीं, जहां लोक ही नहीं बसता, वहां लोकोत्सव कैसे जीवित रह सकते हैं? आज हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों की सभ्य सड़कों पर होली मनाने वाले अलमस्तों की टोली ढोलक-मंजीरे की ताल पर रंग-गुलाल उड़ाते, फाग गाते, नाचते-झूमते निकले और सबको रंग-उमंग से सराबोर कर दे! हां, यह जरूर है कि महानगरों की उन बस्तियों में जहां आज भी गांवों का बचा-खुचा हस्तक्षेप है, तीज-त्यौहार के मौके पर एक चहल-पहल हो जाया करती है। दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में ये इलाके शहर सीमांत पर या पुरानी बस्तियों के रूप में हैं। वरना शहरीकरण की प्रक्रिया में पनपी अपदूषण की संस्कृति में लोक उत्सव और लोकगीतों की जगह ही कहां है। भौतिकता में ऊभचूभ करती शहरी संस्कृति में हर चीज उत्पादन और खरीद-फरोख्त के दायरे में है, सो इस उत्पादक और बाजार मनोवृत्ति की छाया में तीज-त्यौहारों का रूप भी बदला और विकृत हुआ है। होली में प्राकृतिक रंगों की जगह वार्निश, रासायनिक रंग, पिचकारियों के स्थान पर रंग भरे गुब्बारे फें क कर दूसरे को रंग देना और लोकरंग में सराबोर फाग के रसिया की जगह शोर भरे फिल्मी गानों के कैसेट पर फूहड़ ढंग से कूल्हे लचकाकर उछल-कूद करते युवक - आम शहरी होली की यही तस्वीर है। असल में प्रकृति की सहचारिता को छोड़कर भौतिकता का बीमार आदमी जो इकतरफा खेल खेल रहा है, उसमें लोकजीवन की उष्मा और आत्मा को बचाया ही नहीं जा सकता। महानगरों की बात छोड़ भी दें तो लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर, पटना, रांची, जबलपुर जैसे मंझोले दर्जे के शहरों में भी गांवों के लोक जीवन का हस्तक्षेप दिन-प्रतिदिन तेजी से घटता गया है। इन शहरों का स्वभाव भी ग्रामोन्मुखी न होकर महानगरोन्मुखी होता गया है। इसीलिए इन शहरों में भी दस बरस पहले होली के राग-रंग में जो स्वाभाविता और अंतरंगता दिखाई पड़ती थी, उसकी जगह अब फूहड़ कृत्रिमता और प्रदर्शनप्रियता की झलक मिलती है। चूंकि त्यौहार सामाजिकता की अभिव्यक्ति होते हैं और शहर में आदमी का सामाजिक होना आधुनिकता के लिहाज से पिछड़ापन है, इसलिए होली जैसे उन्मुक्तता और उमंग के उत्सव में असामाजिकता का शहरों में भयानक ढंग से प्रवेश हुआ है। शायद होली ही हमारा एक ऐसा पर्व है जिसमें स्त्रियों की भागीदारी सबसे कम होती है। विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थाओं में होली के चार-पांच दिन पहले से ही लड़कियों का आना बंद हो जाता है। यह त्यौहार उनके लिए आक्रामक होता है। होली के अवसर पर स्त्रियों के अंगों का बखान करने वाले जिस तरह के द्विअर्थी गीत-संगीत के कैसेट नंगी भाषा में सार्वजनिक तौर पर पेश किए जाते हैं, वे इस हद तक स्त्री विरोधी होते हैं कि उन्हें सुनने और झेलने का साहस कोई स्त्री जुटा ही नहीं सकती। क्या हम होलिकात्सव में आई विकृतियों को दूसरे प्रदूषणों की तरह ही दूर करने की चिंता के साथ एक स्वस्थ सुंदर जीवन-पर्यावरण रचने का सांस्कृतिक पराक्रम नहीं दिखा सकते? तनी हुई रस्सी पर नट-खेल की अभ्यासी हमारी कसी हुई दिनचर्या के तनाव को ढीला कर हमें उन्मुक्त और अनौपचारिक बनाकर राग-अनुराग और उमंग-उल्लास से भर देने वाला रंगोत्सव दस्तक दे रहा है। आइए, सारी कुंठाएं मिटाकर हम इसका स्वागत करें और अपने को इसके योग्य बनाएं।

Saturday, January 23, 2010

अलविदा, छोटे लोहिया

शेष नारायण सिंह

76 साल की उम्र में जनेश्वर मिश्र ने इस दुनिया को अलविदा कहा। आज सुबह इलाहाबाद में उन्होंने अंतिम सांस ली। सुबह अचानक तबीयत बिगडऩे पर उन्हें लखनऊ के पी.जी.आई. ले जाने की सलाह दी गई क्योंकि उन के ऊपर ब्रेन हैमरेज का अटैक हुआ था। शहर से बाहर भी नहीं निकल पाए थे कि आखरी वक्त आ गया

और समाजवादी राजनीति के शलाका पुरूष ने हमेशा के लिए कूच कर दिया है और इस तरह से उसी इलाहाबाद में उन्होंने अपने आपको समाहित कर दिया जहां की क्षिति, जल, पावक और वायु उनके रोम-रोम में समाया हुआ था।

जनेश्वर मिश्र की मृत्यु समाजवादी आंदोलन की उस परम्परा का पटाक्षेप है जिसमें गप के जरिये सभी विषयों पर चर्चा होती थी। डॉ. लोहिया भारतीय राजनीति की इस पंरम्परा के आदि पुरूष थे। दिल्ली में लोहिया के बाद मधु लिमये ने उस पंरम्परा को जारी रखा था। मधु जी के बाद जनेश्वर मिश्र के यहां पूरे देश से आए समाजवादियों का मिलन स्थल बना था। अब उजड़ गया। जनेश्वर मिश्र समाजवादियों की उस पंरम्परा के प्रतिनिधि थे फकीरी जिसका स्थाई भाव है। इलाहाबाद में बी.ए. की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया लेकिन ऐसी पढ़ाई शुरू की कि कभी छुट्टी ही नहीं मिली और आज पांच दशक बाद अपना नाम ही कटवा कर चल पड़े।

इंटरमीडिएट के छात्र के रूप में ही जनेश्वर मिश्र ने यह सबूत दे दिया था कि वे संघर्ष के लिए ही पैदा हुए हैं। बलिया में जब उन्हें पता लगा कि उपस्थिति कम होने की वजह से परीक्षा नहीं दे सकते तो इलाहाबाद आकर बोर्ड के अधिकारियों से मिले। जब यहां भी काम नहीं बना तो लखनऊ जाकर शिक्षामंत्री संपूर्णानंद से मिलकर उत्तर प्रदेश के उन सभी छात्रों को इंटर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति का आदेश पारित करवाया जिनकी उपस्थिति कम थी। पचास के दशक से ही इलाहाबाद और बाकी उत्तर प्रदेश के सभी समाजवादी आंदोलनों में जनेश्वर मिश्र के हस्ताक्षर साफ नजर आते थे। समाजवादी नेताओं की एक बड़ी फेहरीस्त है जो जनेश्वर मिश्र के कामरेड रहे चुके है। मुलायम सिंह यादव, बृज भूषण तिवारी, मोहन सिंह, जनार्दन द्विवेदी, सत्यदेव द्विवेदी आदि सभी उनके साथी थे। गैर कांग्रेसवाद की डॉ. लोहिया की राजनीतिक सोच को अमली जामा पहनाने की गरज से 1963 में जो चार उपचुनाव हुए थे उसमें फर्रूखाबाद वाला चुनाव डॉ. लोहिया ने खुद लड़ा था। पूरे देश के समाजवादी वहां जमा हुए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय और उत्तर प्रदेश के नौजवानों की अगुवाई जनेश्वर ने की थी।

जब उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को फूलपुर संसदीय क्षेत्र में चुनौती दी तो पूरी दुनिया के प्रगतिशील लोगों की नजर उस चुनाव पर थी। संयुक्त राष्ट्र के राजदूत बनने के चक्कर में विजय लक्ष्मी पंडित ने इस्तीफ दिया तो कांग्रेस ने केशव देव मालवीय को फूलपुर उपचुनाव के 1969 में उम्मीदवार बनाया। जनेश्वर मिश्र ने जब उनको पराजित किया तो पूरी दुनिया के प्रगतिशीलों ने जश्न मनाया था। यह समय लोकसभा में बहसों को भी स्वर्ण युग है। हरि विष्णू कामथ मधुलिमये, ज्योतिर्मय बसु, अटल बिहारी वाजपेयी, जनेश्वर मिश्र सभी विपक्षी बेंचों पर बैठते थे और इंदिरा गांधी की सरकार को सही विपक्ष मिलता था।

इमरजेंसी में जेल यात्रा काटने के बाद जब वे 1977 में फूलपुर से चुनकर आए तो जनता पार्टी की सरकार में मंत्री बने। वैसे मंत्री तो वे 1989, 1990 और 1996 में भी बनाए गए लेकिन मंत्री पद का उन पर कोई असर नहीं पड़ता था। गंभीर से गंभीर राजनतिक विषयों पर बातचीत के जरिए विमर्श करना उनकी फितरत थी। समाजवाद में भी उन्होंने पाखंड का हमेशा विरोध किया और पूंजीवादी समाजवाद को कभी बर्दाश्त नही किया। जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें अपनी पार्टी के एक नेता की तल्ख बातों का भी सामना करना पड़ा लेकिन इस रिर्पोटर को उन्होंने जो बात ऑफ दि रिकार्ड बताई थी। उससे साफ है कि वे बिना मतलब की टिप्पणी की परवाह नहीं करते थे। बृज भूषण तिवारी, मुलायम सिंह यादव और राम गोपाल यादव के खिलाफ वे कोई भी उल्टी सीधी बात बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। आखरी कुछ वर्षो मे मिठाई खाना मना था लेकिन साथ बैठे लोगों को जरूर खिलवाते थे और थोड़ा सा खुद भी चख लेते थे। उनकी महानता में बाल सुलभ सादगी थी जिसकी वजह से बड़ा से बड़ा और मामूली से मामूली आदमी उन्हें अपना मानता था।