Sunday, July 11, 2010

अमरीकी-पाकिस्तानी-जिहादी आतंक और राष्ट्रों की सुरक्षा

शेष नारायण सिंह

शुक्रवार को पाकिस्तान में फिर आतंकवादी हमला हुआ , जिसमें करीब ६० लोग मारे गए. इंसानी ज़िन्दगी को इस तरह से आतंकवादी हिंसा का शिकार बनाना किसी तरह से सही नहीं है . लेकिन पाकिस्तान की फौज और सरकार के साथ किसी तरह की सहानुभूति नहीं दिखाई जानी चाहिए . पाकिस्तान में जो आतंक आजकल फल फूल रहा है , उसकी शुरुआत पाकिस्तानी हुक्मरान ने ही की थी. हाँ यह अलग बात है कि उस वक़्त पाकिस्तानी फौज के सुपर जनरल और तानाशाह, जिया उल हक को मुगालता था कि जिन आतंकवादियों को वे भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं , वे पाकिस्तान के प्रति वफादार रहेगें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ . भारत एक मज़बूत मुल्क है और जब भारतीय सुरक्षा बलों ने पाकितानी आतंकवादियों को सख्ती से खदेड़ना शुरू किया तो वे भाग कर पाकिस्तान की अपनी बिलों में ही छुप गए . लेकिन ज़्यादा दिन तक नहीं . अब वे पाकिस्तान सरकार और राष्ट्र को ही आतंकवादी हमलों के ज़रिये कमज़ोर कर रहे हैं . भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के जिया उल हक के खेल में अमरीका ने उनकी खूब मदद की थी. कोल्ड वार का ज़माना था, भारत और सोवियत रूस की दोस्ती अमरीका को फूटी आँखों नहीं सुहाती थी . शायद इसी लिए अमरीका ने पाकिस्तानी ज़मीन पर आतंकवादी पैदा करने की पाकिस्तानी फौज और जनरलों की योजना को खूब पैसा दिया . अब जाकर अमरीका को लग रहा है कि गलती हो गयी. जिस आतंकवाद को पाकिस्तानी फौज ने भारत के खिलाफ तैयार किया था, वही आज अमरीका की सबसे बड़ी दुश्मन है . वही आतंकवाद अब पाकिस्तान के अस्तित्व के सामने संकट बन कर खडा हो गया है.और पाकिस्तानी अस्तित्व पर आये संकट के बाद अमरीकी सरकार बहुत दुखी है . अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता, मार्क टोनर का बयान आया है कि पाकिस्तान, आतंकवादी ताक़तों के मुकाबले अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है .इस लड़ाई में अमरीका उसको पूरा समर्थन देगा. मार्क टोनर का बयान पाकिस्तान में शुक्रवार को हुए आतंकवादी हमले के बाद आया है जिसमें करीब साठ लोग मारे गए थे. प्रवक्ता ने कहा कि अमरीका हमेशा से ही पाकिस्तान को समर्थन देता रहा है और इस संकट की घड़ी में भी वह समर्थन जारी रहेगा.

अब अमरीका को कौन बताये कि मेरे भाई , आपके समर्थन की वजह से ही पाकिस्तान में आज आतंकवाद की खेती लहलहा रही है . यानी आपने ही दर्द दिया है और अब आप ही दवा देने चले हैं . अस्सी के दशक में जब अमरीकी पैसे और पाकिस्तानी फौज की कृपा से भारत के राज्य, पंजाब में चारों तरफ आतंक का तूफ़ान था तो अमरीकी हुकूमत को खूब मज़ा आ रहा था . अफगानिस्तान से सोवियत रूस की सेना को भगाने की जो कोशिश की जा रही थी, उसके लिए पाकिस्तान को खुलकर अमरीकी धन मिल रहा था. उसी धन में से कुछ भारत के पंजाब में भी झोंक दिया जाता था . अमरीका को उम्मीद थी कि भारत को पाकिस्तानी आतंक के सामने मजबूर किया जा सकता था . शायद उन्होंने सोचा होगा कि बाद में जब भारत, अमरीका की शरण आना स्वीकार कर लेगा तो आतंकवाद को ख़त्म कर दिया जाएगा. कितनी गलत थी यह सोच . वास्तव में अमरीका के अन्दर भी जो आतंकवादी हमला हुआ, उसके पीछे पाकिस्तान में पैदा हुए आतंक का हाथ था. सोवियत रूस के दौर में तो आज के अमरीका के दुश्मन नंबर एक कहलाने वाले ओसामा बिन लादेन भी अमरीकी पैसे पर चलते थे और अमरीका के ख़ास रिसोर्स हुआ करते थे. करीब २० साल पहले , जब सोवियत रूस टूट गया और बहुत कमज़ोर हो गया तो अमरीका को उसके खिलाफ किसी आतंकवादी संगठन की ज़रूरत नहीं रह गयी और उसने ओसामा बिन लादेन समेत सारे पाकिस्तानी आतंकी ताम-झाम को बाय बाय कह दिया . यहीं अमरीका से गलती हो गयी. अमरीकी नीति निर्धारकों को मालूम होना चाहिए था कि अगर किसी पाप को जन्म दे रहे हो तो उसको आखिर तक दाना-पानी देते रहने में ही भलाई रहती है. अगर उसका खर्चा-पानी बंद कर दिया तो वह अपने पैदा करने वाले पर ही हमला कर देगा. भारत में ऐसी ही एक कथा भस्मासुर की है . जो भी भस्मासुर को जन्म देने की सोच रहा हो उसे पता होना चाहिए कि भस्मासुर अपने पैदा करने वाले को भी भस्म करने की कोशिश करता है . बाद में वही ओसामा बिन लादेन और पाकिस्तानी मूल के आतंकवादियों ने अमरीका की आतंरिक सुरक्षा के परखचे उड़ा दिए. और अब पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में ख़त्म करने पर आमादा हैं .

लेकिन अमरीकी और पाकिस्तानी हुक्मरान अभी तक सच्चाई को समझने से परहेज़ कर रहे हैं .पाकिस्तान में आतंकवाद का सबसे बड़ा सरगना , हाफ़िज़ मुहम्मद सईद है . वह कभी जिया उल हक का धार्मिक सलाहकार हुआ करता था . मुंबई हमलों की साज़िश उसी ने रची थी. लेकिन वह पाकिस्तान में छुट्टा घूम रहा है. दरअसल पाकिस्तान में तथाकथित सिविलियन सरकार में किसी की हिम्मत नहीं है कि उसे पकड़ सके . वह पाकिस्तानी फौज का ख़ास बन्दा है . लेकिन उसे पकड़ना अमरीका के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है . पाकिस्तान में हो रहे रोज़ के आतंकवादी हमलों पर सहानुभूति प्रकट करने के साथ साथ, अगर अमरीकी हुक्मरान यह समझ लें कि आतंकवादी किसी का दोस्त नहीं होता तो बात संभल जायेगी. क्योंकि अगर उनकी समझ में यह आ गया तो वे पाकिस्तानी आतंकवाद को जड़ से ख़त्म करने की योजना पर काम कर सकेगें . सब को मालूम है कि पाकिस्तानी आतंकवाद की मुख्य धारा हाफ़िज़ मुहम्मद सईद और उसके संगठनों , जमात उद दावा और लश्कर-ए-तय्यबा से होकर गुज़रती है. इसलिए अगर उसे ख़त्म कर दिया जाए तो पाकिस्तान में भी आतंकवाद कम हो जाएगा . अमरीका को भी बड़ी राहत मिलेगी और भारत में भी आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लग जायेगी,.हाफ़िज़ सईद को पकड़ पाना पाकिस्तानी सरकार के लिए तो नामुमकिन है लेकिन वहां की फौज़ उसको काबू में कर सकती है . दुनिया जानती है कि पाकिस्तानी फौज में बहुत बड़ी संख्या में आला अफसर ऐसे हैं जो अमरीकी सरकार से पैसा-कौड़ी लेते हैं और उनके सामने खीस निकालते रहते हैं . पूर्व राष्ट्रपति, परवेज़ मुशर्रफ ऐसे ही अमरीकी कारिंदे थे. इन्हीं अफसरों पर दबाव डाल कर अमरीका , हाफ़िज़ सईद को ठीक कर सकता है और आतंकवाद पर काबू कर सकता है. घडियाली आंसू से कुछ नहीं होगा और अमरीकी विदेश नीति हमेशा ही पाकिस्तानी आतंकवाद के दबाव में रहेगी.

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